जिस शिला को आप स्क्रीन पर देख रहे हैं, बताया जा रहा है कि यह दुनिया की सबसे बड़ी और विशालकाय शालिग्राम शिला है। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर यह दावा बहुत तेजी से वायरल हो रहा है कि नेपाल में आई और तेज बहाव के कारण यह शिला पहाड़ों से बहकर मुक्तिनाथ धाम के पास आ पहुंची है।
इस दावे के सामने आते ही यह वीडियो हर जगह भारी सुर्खियां बटोर रहा है और लोग इसे भगवान का रहे हैं। लेकिन इस वायरल दावे के पीछे की पूरी सच्चाई क्या है? असल में यह शिला आज या कल आई से बहकर नहीं आई है। यह पावन शिला काफी लंबे समय से मुक्तिनाथ धाम के पास कालीगंडकी क्षेत्र में मौजूद है जहां श्रद्धालु और साधु संत वर्षों से इसका पूजन करते आ रहे हैं।
यानी में इसके अचानक बहकर आने का दावा पूरी तरह भ्रामक है। जबकि शिला का वहां होना एक स्थापित तथ्य है। अब आइए समझते हैं कि इस शिला को लेकर सनातन परंपरा में इतनी गहरी आस्था क्यों है। हिंदू धर्म में शालिग्राम को कोई साधारण पत्थर नहीं बल्कि नहीं होती। इस शिला पर जो प्राकृतिक चक्र बने दिखते हैं उन्हें भगवान चक्र का प्रतीक माना जाता है।
पौराणिक मान्यता है कि माता तुलसी के वरदान के कारण भगवान नारायण ने गंडकी नदी में शिला रूप में वास स्वीकार किया था। इसी वजह से शालिग्राम की पूजा सदैव तुलसी दल के साथ ही की जाती है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ इसके बनने के पीछे एक अद्भुत वैज्ञानिक इतिहास भी है। करोड़ों साल पहले जहां आज हिमालय पर्वत है, वहां टेथिस नाम का एक विशाल समुद्र हुआ करता था। उस समुद्र में एमोनाइट नाम के समुद्री जीव रहते थे, जिनके खोल चक्रुमा होते थे।
जब पृथ्वी की प्लेट्स आपस में और हिमालय बना तो ये जीव के नीचे दब गए। लाखों करोड़ों वर्षों के भारी दबाव से वे पत्थर में तब्दील हो गए जिन्हें भूविज्ञान में जीवाश्म कहा जाता है। नेपाल की कालीगंड की नदी घाटी दुनिया की इकलौती ऐसी जगह है जहां यह प्राकृतिक शालिग्राम शिलाएं मिलती हैं।