यह जवान वीरगति को प्राप्त हो चुका है। इस जवान का नाम करम सिंह है। और यह सेंट्रल रिजर्व पुलिस बल में डिप्टी सेंट्रल इंटेलिजेंस ऑफिसर के पद पर अपने साथी जवानों के साथ हॉटस्प्रिंग्स लद्दाख में 16000 फीट की ऊंचाई पर तैनात था। 21 अक्टूबर 1959 का दिन इसका और इसके 10 साथी जवानों का आखिरी दिन बन गया। उस दिन इनके सात-साती भी बंदी बना लिए गए हैं।
अगला चेहरा महावीर त्यागी का है। जो देहरादून से सांसद हैं। नेहरू के पुराने जेल साथी भी हैं। कुल तीन बार जेल जा चुके हैं। इंडिपेंडेंस के बाद 1953 से 57 तक भारत के डिफेंस प्रोडक्शन मिनिस्टर भी रह चुके हैं। 5 दिसंबर 1961 के दिन त्यागी संसद में अपने गंजे सिर की ओर इशारा करके प्रधानमंत्री नेहरू से एक ऐसा सवाल पूछने जा रहे हैं जो कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा। तीसरा चेहरा 1955 से 61 तक भारत के फॉरेन सेक्रेटरी रह चुके सुबमल दत्त का है।
उनका प्रधानमंत्री को लिखा फरवरी 3, 1958 का नोट और उस पर प्रधानमंत्री का जवाब अपने हाथ से और उसी नोट के नीचे। इस पूरी कहानी का सबसे काला सच होने वाला है। चौथा चेहरा 1957 से 61 के बीच भारत के आर्मी चीफ रहे जनरल के एस थिमैया का है। उन्होंने एक ब्रिटिश पर्वतारोही को एक एक्सपडिशन पर भेजा है एक सड़क का सबूत लाने के लिए। पर्वतारोही सबूत लाएंगे भी लेकिन फिर प्रधानमंत्री के सामने डिफेंस मिनिस्टर कहेंगे कि यह सब अमेरिकी सीआईए का प्रचार है और उसके बाद मई 7th 1961 को वो रिटायर कर दिए गए।
जी हां, हमने आपको जो यह चार चेहरे दिखाए, यह वो चार चेहरे हैं जो चार अलग-अलग जगहों पर चार अलग-अलग कामों में लगे थे। लेकिन इन चारों की कहानी एक ही प्रश्न पर आकर रुकती है। 38,000 वर्ग कि.मी. भारतीय भूमि कैसे चीन के कब्जे में चली गई? और भारत के प्रधानमंत्री ने संसद से सच क्यों छुपाया? और इस प्रश्न का उत्तर इन चार चेहरों की कहानी में छुपा है। और आज अक्साई चीन का असली गुनहगार बेनकाब होने वाला है सबूत के साथ। 22 अप्रैल 1959 दिल्ली लोकसभा एक युवा सांसद खड़े होते हैं।
नाम बृजराज सिंह हाथ में अखबार की कतरने हैं और उन्होंने एक प्रश्न पूछा है। क्या यह सच है कि चीन ने भारत के 3000 वर्ग मील भूभाग पर दावा किया है जैसा कई अखबारों में छापा है। प्रधानमंत्री खड़े होते हैं। वे जवाब देते हैं। मैं माननीय सदस्यों से अनुरोध करूंगा कि हांगकांग और अन्य अजीब जगहों से आने वाली खबरों पर ज्यादा ध्यान ना दें।
हमारे खिलाफ कोई दावा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नहीं किया गया है। हांगकांग की अफवाह। चलिए मैं आपको ले चलती हूं 18 महीने पीछे। 6 अक्टूबर 1957 चीन का सरकारी अखबार वांगमिनजी पाओ एक खबर छापता है। जिंजियांग तिब्बत हाईवे दुनिया का सबसे ऊंचा हाईवे पूरा हो चुका है। पिछले कुछ दिनों में ट्रक्स ने टेस्ट रन के रूप में झिंजियांग के यह चंग से तिब्बत के गढ़टोक तक यात्रा [संगीत] पूरी की है। हाईवे की कुल लंबाई 10,179 कि.मी. इस सड़क का 180 कि.मी. भारत की जमीन से होकर गुजरता है। अक्साई चिन्ह से होकर जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र से होकर। अब फिर से वापस लोकसभा में चलते हैं। 22 अप्रैल 1959 के दिन पर और याद दिलाते हैं नेहरू ने क्या कहा था।
हमारे खिलाफ कोई दावा नहीं किया गया है। हमारे खिलाफ कोई दावा नहीं किया गया है। बाई ओर एक सरकारी चीनी अखबार और उसकी 6 अक्टूबर 1957 की रिपोर्ट। दाई ओर भारत के प्रधानमंत्री नेहरू का 22 अप्रैल 1959 का संसद में दिया बयान। दोनों के बीच में 18 महीने। 18 महीने। दोस्तों क्या सच में नेहरू को नहीं मालूम था या फिर वर्ल्ड लीडर और अपनी स्टेट्समैन वाली छवि को बनाने की जरूरत उनसे वह सब बुलवा रही थी। चलिए 6 महीने आगे चलते हैं। 22 अप्रैल 1959 के दिन पर और याद दिलाते हैं नेहरू ने क्या कहा था। हमारे खिलाफ कोई दावा नहीं किया गया है। 6 महीने बाद 21 अक्टूबर 1959 का दिन है और हॉटस्प्रिंग्स लद्दाख में करम सिंह और उनके नौ साथियों की अंतिम सुबह। जी हां, इस पूरी कहानी में सब कुछ इस एक प्रश्न पर ही आकर टिकता है। प्रधानमंत्री नेहरू ने अप्रैल में संसद को क्या बताया था और वो क्या जानते थे? पार्लियामेंट्री रिकॉर्ड्स एंड आर्काइव्स में दबा सच जनता के बीच शायद कभी पहुंच ही नहीं पाया या फिर उस पर ध्यान नहीं गया। इस डॉक्यूमेंट्री में हम उन्हीं रिकॉर्ड्स को खंगाल कर आपके सामने कुछ तथ्य रखने जा रहे हैं। कंक्लूजन हम आप पर छोड़ेंगे। सन 1952 से 1958 तक के 7 साल के दौरान भारत की तत्कालीन नेहरू सरकार को पांच अलग-अलग सोर्सेज से चीनी सड़क के बारे में चेतावनी मिली थी और ठीक उसी दौरान भारत के प्रधानमंत्री नेहरू इसके विपरीत पांच अलग-अलग मंचों पर चीन की दोस्ती की कसमें खा रहे थे। बताते चले यही वो दौर था जब नेहरू अपनी वर्ल्ड स्टेट्समैन की छवि पुख्ता कर रहे थे।
नॉन अलाइन मूवमेंट के नेता बन रहे थे। मोरल हाई ग्राउंड से भरी बातें और ना जाने क्या-क्या। भारत में जब नेहरू डिप्लोमेसी फलफूल रही थी और अपने चरम पर जाने वाली थी और यही वो दौर था जब भारत की जमीन पर चीन क्रीपिंग एक्वज़िशन कर रहा था।
धीरे-धीरे लेकिन चुपके-चुपके नहीं क्योंकि तमाम सरकारी और सैन्य अधिकारी अपनी-अपनी रिपोर्ट्स के माध्यम से सरकार को समय-समय पर चेता रहे थे। पहली चेतावनी मिली जब 1952 में भारतीय सेना ने अक्साई चिन्ह के दक्षिणी भाग में एक रेकी पेट्रोल भेजी। इस पेट्रोल पार्टी में कुमाऊं रेजीमेंट और लद्दाख स्काउट्स के कुल 10 सिपाही थे। लानकला के पास स्थानीय लोगों ने बताया कि चीनी एक lसड़क बनाने वाले हैं।
चीनी सैनिक और इंजीनियर्स पहले से ही अक्साई चिन्ह क्षेत्र में पेट्रोल लगा रहे हैं। इस पेट्रोल पार्टी की रिपोर्ट के बाद क्या होता है।
1954 में प्रधानमंत्री नेहरू चीन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं। इसको नाम दिया जाता है पंचशील। इस समझौते के अंतर्गत भारत ने तिब्बत पर चीन का अधिकार को स्वीकार कर लिया था और इसके अनुसार भारत ने तिब्बत में अपनी सभी विशेष सुविधाएं छोड़ दी। लेकिन बदले में कोई सीमा निर्धारण नहीं हुआ। सुविधाएं क्या-क्या छोड़ी यह भी देख लेते हैं। तिब्बत पर भारत का रुख। भारत ने आधिकारिक तौर पर तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया। इससे तिब्बत एक स्वतंत्र बफर स्टेट के रूप में अपनी पहचान [संगीत] खो बैठा। जो पहले भारत और चीन के बीच एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता था। संचार और बुनियादी ढांचा। भारत ने तिब्बत में चल रही अपनी डाक, टेलीग्राफ और टेलीफोन सेवाएं चीन को सौंप दी। इसके साथ ही भारत के 12 सरकारी विश्राम ग्रह भी छोड़ दिए गए। राजनयिक और सैन्य मौजूदगी। लहासा में मौजूद भारतीय मिशन को घटाकर सिर्फ एक कॉन्सुलेट जनरल बना दिया गया। याटंग ज्ञानसे और गारटक में भारत की व्यापारिक एजेंसियां भी बंद कर दी गई। इसके अलावा इन भारतीय परसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए तिब्बत में तैनात भारतीय सैन्य दस्ते भी वापस बुला लिए गए।
चलिए देखते हैं चेतावनी। नंबर दो। 1953 में अमेरिकी सीआईए की एक क्लासिफाइड रिपोर्ट आती है। फीशक, चीनी कम्युनिस्ट सेना, पश्चिमी तिब्बत, सड़क निर्माण, जिनजियांग से, तिब्बत और लद्दाख। 1952 के अंत में दूसरी घुड़सवार रेजीमेंट का हेड क्वार्टर्स गढ़ोक में था। कमांडर हांतसे मेन ने इस क्षेत्र में नई सड़कें बनाने की चीनी मंशा की घोषणा की। जिंजियांग में चीनी कम्युनिस्ट स्थानीय लोगों को बता रहे हैं कि लद्दाख झिंजियांग का हिस्सा है। और उस दौरान नेहरू क्या कर रहे थे? हम चलते हैं।
अप्रैल 1955 के बांडू सम्मेलन में। प्रधानमंत्री नेहरू और चीनी प्रधानमंत्री चावल लाए दुनिया के सामने दोस्त की तरह खड़े हैं और एक नया नारा कर रहे हैं हिंदी चीनी भाई। जी हां, हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा यहीं से उठा था। चेतावनी नंबर तीन 1955 सिडनी विगनल। एक ब्रिटिश पर्वतारोही सिडनी विगनल वेल्स हिमालयन एक्सपिडिशन का नेतृत्व कर रहे हैं। दुनिया को बताया गया कि वो तिब्बत के सबसे ऊंचे पहाड़ गुरला मानधाता के एक्सपिडिशन पर जा रहे हैं। लेकिन असली मिशन था भारतीय सेना के लिए चीनी सड़क का सबूत लाना।
जी हां, जनरल थिमैया ने इनको उस पर्पस के लिए ही भेजा था। पिग्नल पकड़े गए। दो महीने तक चीनी जेल में पीटे गए। उनसे पूछताछ की गई और फिर घोर सर्दियों के बीच चीनियों ने उन्हें एक उच्च दर्रे पर छोड़ दिया। ताकि वे मर जाए पर विग्नल बच गए। वो भारत लौटे और सारी जानकारी मिलिट्री इंटेलिजेंस ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल बैज मेहता को सौंप दी।
सिग्नल ने अपनी किताब में स्वयं लिखा है आपकी जानकारी [संगीत] हमारे एक सीनियर ऑफिसर ने नेहरू को दिखाई। उन्होंने जोर लगाया पर कृष्ण मेनन नेहरू के सामने उन ऑफिसर को डांटा कि वो अमेरिकी सीआईए [संगीत] के एजेंट का प्रचार निगल रहे हैं। मेनन ने आपकी सारी जानकारी दबा दी। ठीक इसी समय नेहरू क्या कर रहे थे? दिसंबर 1956 चालाय भारत यात्रा पर आए हैं। नेहरू उनकी खूब खातिरदारी कर रहे हैं। और तो और प्रधानमंत्री नेहरू ने राष्ट्र को संबोधित भी किया था। चीन भारत का सबसे करीबी मित्र है।
हिंदी चीनी भाई-भाई चेतावनी नंबर चार 1957 में आई [संगीत] जब बीजिंग में भारत के मिलिट्री अटैशे ब्रिगेडियर मलिक ने अपनी रिपोर्ट भेजी और उसमें चीन द्वारा एक स्ट्रेटेजिक रोड बनाने की बात लिखी। यह सड़क अक्साई चिन्ह से होकर गुजरती है। चीन ने भारतीय भूभाग पर निर्माण पूरा कर लिया है। नेहरू जी ठीक इसी समय दिसंबर 1957 में चावल लाइक को एक पत्र लिख रहे हैं। साइनो इंडियन मित्रता की प्रशंसा करते हुए। यह सब उसी महीने में हुआ जब उनके अपने मिलिट्री अटैश ने तीसरी बार पुष्टि की कि चीन ने भारतीय भूमि पर सड़क बना ली है। और फिर पांचवी चेतावनी आती है।
1958 की शुरुआत में भारत के फॉरेन सेक्रेटरी सुबमल दत्त के द्वारा। पर यह चेतावनी इतनी महत्वपूर्ण है कि इसके बारे में हम अगले अध्याय में अलग से बात करेंगे। आपने देखा कैसे चार चेतावनियां चार अलग-अलग चैनल से आ रही हैं। चार अलग-अलग समय पर और इसके बावजूद प्रधानमंत्री नेहरू ने पंचशील पर हस्ताक्षर किए। बांडूग में चीन को गले लगाया।
हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा दिया। चाओमलाय को पत्र लिखे। यह सब विरोधाभास सहयोग नहीं था। यह नीति थी। नेहरू की नीति जिसका डंका आज तक पीटा जाता है और जिसके कसीदे पड़ते-पढ़ते नेहरू वियन फैंस कभी थकते नहीं। यह बोलना देखिए इसलिए जरूरी है क्योंकि हर चेतावनी को नेहरू के द्वारा नजरअंदाज किया जा रहा था और उसी समय वो चीन के साथ दोस्ती की कसमें खा रहे थे।
चलिए आगे चलते हैं। जनवरी 1958 चीनी सरकार के द्वारा अपनी सड़क की ऑफिशियल घोषणा को 5 महीने हो चुके हैं। भारत के फॉरेन सेक्रेटरी सुबमल दत्त ने प्रधानमंत्री नेहरू को फरवरी 3, 1958 को एक नोट लिखा। इसमें बहुत कम संदेह है कि नवनिर्मित 1200 किलोमीटर लंबी सड़क जो पश्चिमी तिब्बत के गर्टों को झिंजियांग के येच से जोड़ती है अक्साई चिन्ह से होकर गुजरती है। जी हां, यह भारत के तत्कालीन फॉरेन सेक्रेटरी की निजी क्लासिफाइड टिप्पणी थी जो प्रधानमंत्री नेहरू को सीधे भेजी गई थी। साफ था कि कोई संदेह नहीं था और ना ही कोई अफवाह।
था तो एक दस्तावेजी सबूत। भारत के फॉरेन सेक्रेटरी का नोट। और फिर अगले दिन उस नोट पर प्रधानमंत्री का जवाब आया उनके अपने हाथ से लिखा हुआ। मैं नहीं सोचता कि हवाई रिकनासेंस करना उचित होगा। वास्तव में मुझे नहीं लगता कि यह हमारे किसी काम की होगी। जमीनी रिकेंस भी शायद बहुत मददगार नहीं होगी। देखिए एक बात स्पष्ट है। यहां पर कोई जानकारी का अभाव नहीं था। समय-समय पर पिछले 7 सालों से चेतावनियां विभिन्न सोर्सेस से आ रही हैं।
प्रधानमंत्री नेहरू को बताया भी गया था। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने इन्वेस्टिगेशन से इंकार कर दिया। बाई ओर फॉरेन सेक्रेटरी कहते हैं सड़क बन चुकी है। भारतीय भूमि पर है। दाई ओर प्रधानमंत्री कहते हैं, इन्वेस्टिगेशन का कोई फायदा नहीं। दोनों डॉक्यूमेंट्स एक ही फाइल में एक ही दिन में प्रधानमंत्री के अपने हस्ताक्षर के साथ अब 4 साल आगे चलिए। नवंबर 1962 में भारतीय चीन युद्ध समाप्त हो चुका है।
38,000 वर्ग कि.मी. भारतीय भूमि पर चीनी कब्जा हो चुका है। 1383 भारतीय सैनिक मारे गए हैं। 3968 बंदी बना लिए गए हैं। अमेरिकी विशेष दूत एवरेल हरमन दिल्ली आ रखे हैं। प्रधानमंत्री नेहरू से चार बार मिलते हैं और अमेरिकी एंबेसी का क्लासिफाइड टेलीग्राम दर्ज करता है। हरिमन प्रधानमंत्री से चार बार मिले। 23 नवंबर की मीटिंग में हरिमन के प्रश्न पर नेहरू ने कहा चीनी कम्युनिस्टों का मुख्य उद्देश्य भारत को अपमानित करना था। नेहरू ने टिप्पणी की कि अक्साई चीन और सड़क चीनियों के लिए महत्वपूर्ण थी।
परंतु लद्दाख के बाकी हिस्से का कोई मूल्य नहीं था। देखा आपने प्रधानमंत्री नेहरू के काल के तीन डॉक्यूमेंटेड प्रूफ। नेहरू का फॉरेन सेक्रेटरी को नोटिंग। 1958 के इन्वेस्टिगेशन की जरूरत नहीं। से अमेरिका दूत को नेहरू का 1962 का कन्फेशन सड़क चीनियों के लिए महत्वपूर्ण थी और बीच के 4 साल में कई चेतावनियों को इग्नोर करने के कारण एक युद्ध में 8000 से ज्यादा भारतीय सैनिकों की क्षति। यदि सच नहीं पता था तो 58 में इन्वेस्टिगेशन क्यों नहीं ऑर्डर की? यदि सच पता था, तो संसद को क्यों बताया कि यह हांगकांग की अफवाह है? क्यों बार-बार वार्निंग्स को इग्नोर किया गया? और इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है जो आगे अपने आप क्लियर होता चला जाएगा।
चलिए अब इसे फिर से देखते हैं। जी हां, हमने पहले देखा था कि कैसे नेहरू ने संसद में 22 अप्रैल 1959 को एक झूठ बोला था। जब प्रधानमंत्री ने संसद में खड़े होकर बृजराज सिंह एमपी के सवाल के जवाब में कहा था, मैं माननीय सदस्यों से अनुरोध करूंगा कि हांगकांग और अन्य अजीब जगहों से आने वाली खबरों पर ज्यादा ध्यान ना दें। हमारे खिलाफ कोई दावा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नहीं किया गया है।
तमाम डॉक्यूमेंट्स, पांच चेतावनियां और प्रधानमंत्री के अपने हाथ से एक एडमिशन सब उनके सामने थे। सब उनकी ही फाइल्स में थे। फिर भी उन्होंने संसद को बताया हांगकांग की अफवाह। झूठ। प्रश्न यह नहीं कि प्रधानमंत्री जानते थे या नहीं। हम जानते हैं कि वे जानते थे। प्रश्न यह है उन्होंने झूठ क्यों बोला? उत्तर सरल है। सच बोलना पंचशील का अंत होता। सच बोलना हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे का अंत होता। सच बोलना नॉन अलाइन मूवमेंट के नैतिक नेता के रूप में अपनी छवि का अंत होता। सच बोलने का अर्थ था एक पूरी नेहरू फॉरेन पॉलिसी का पतन और यह प्रूफ होता है 4 मई 1959 की राज्यसभा में हुई बहस से पंचशील पर हमला हो रहा था और प्रधानमंत्री ने इस बहस में स्वयं उत्तर दिया यदि यह सिद्धांत सही है तो हम इन पर डटे रहेंगे चाहे पूरी दुनिया में कोई इन पर ना टिके।
देखा आपने पंचशील को बचाने के लिए कैसे नेहरू डटे रहने का दावा कर रहे हैं। क्या दूसरी पार्टी चीन भी उनकी ही तरह डटी थी? वैसे 1952 से 1959 तक की रिपोर्ट्स इवेंट्स तो यह नहीं दिखा रहे और चीन के विपरीत देखिए कैसे नेहरू की भारत सरकार बार-बार सच को इग्नोर कर रही है। भाई-भाई को बचाने के लिए सेना की रिपोर्ट्स को सीआईए का प्रचार कहा गया। प्रधानमंत्री की छवि को बचाने के लिए संसद से झूठ बोला गया। फॉरेन सेक्रेटरी, मिलिट्री अटैशे और आर्मी चीफ थिमैया सबकी रिपोर्ट्स को इग्नोर किया गया।
नेहरू के पंचशील और स्टेटसमैन वाली छवि को बचाने के लिए। और अब प्रश्न रह जाता है। इस झूठ की कीमत किसने चुकाई? अप्रैल 1959 के झूठ के 6 महीने बाद ही 21 अक्टूबर 1959 को हॉटस्प्रिंग्स लद्दाख में अक्साई चिन्ह के करीब 16,000 फीट की ऊंचाई पर हमने बताया था कि कैसे सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स का एक पेट्रोल करम सिंह की कमान में तीन साथियों को ढूंढने जा रहा था जो एक दिन पहले लापता हो गए थे। बाद में इस पेट्रोल के 10 जवान शहीद हो गए और सात लोगों को बंदी बना लिया गया।
इसकी सरकारी सूचना कुछ ऐसे शब्दों में दी गई। दोपहर के समय चीनी सैनिकों ने एक पहाड़ी से करम सिंह की टुकड़ी पर गोलियां चलाई और हद गोले फेंके। चूंकि कोई आड़ नहीं थी। अधिकांश घायल हो गए। 10 मारे गए। सात बंदी बना लिए गए। वो 10 शहीदों के नाम थे। करम सिंह धर्म सिंह पून सिंह नरबू लंबा बेगराजमल मक्खन लाल ईमान सिंह तेरिंग बोखू नरबू हंगजीत सुब्बा शिवनाथ प्रताप इन सभी शहीदों की बॉडीज का 13 नवंबर को हॉटस्प्रिंग्स में पूर्ण पुलिस सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया और आज इनकी स्मृति में हर साल 21 अक्टूबर को भारत पुलिस का मेमोरेशन डे मनाता है और जिस जमीन पर यह जवान शहीद हुए थे। यह वह जमीन थी जिसके इंक्रोचमेंट की चेतावनी को प्रधानमंत्री नेहरू ने 6 महीने पहले हांगकांग की अफवाह कहा था।
हॉटस्प्रिंग्स के बाद संसद में बहसें चलती रही। चीन से संबंध और सीमा विवाद पर भी बहस हुई और ऐसे ही बहसों के दौरान 5 दिसंबर 1961 को प्रधानमंत्री नेहरू ने अक्साई चिन्ह के बारे में कुछ ऐसा बोला था जो इतिहास में दर्ज हो गया। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता। लगभग 17,000 फीट ऊंचा। वहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता। हमें तो यह भी नहीं पता था कि वह कहां है। हमें तो यह भी नहीं पता था कि वह कहां है। यह उस प्रधानमंत्री ने कहा जिसकी सेना ने 1952 में वहां रेकी पेट्रोल भेजी थी। जिसकी अपनी सीआरपीएफ के 10 जवान 2 साल पहले उसी जमीन पर मारे गए थे। उसी जमीन के बारे में जिसके लिए पुलिस कमेरेशन डे मनाया जाता है। यहां पर उस दिन सदन में एक कांग्रेस सांसद ने क्या कहा था वो बताना आवश्यक है।
यह सांसद थे देहरादून से महावीर त्यागी। स्वतंत्रता सेनानी पूर्व डिफेंस प्रोडक्शन मिनिस्टर महावीर त्यागी। त्यागी खड़े हुए। उन्होंने अपने गंजे सिर की ओर इशारा किया और प्रधानमंत्री से एक सवाल पूछा। मेरे सिर पर बाल नहीं उगते तो क्या इसका मतलब मेरे सिर का कोई मूल्य नहीं है? सदन में सन्नाटा छा गया। फिर सदन हंसा, नेहरू भी हंसे और कुछ ही महीनों बाद चीनी सेना ने भारत पर हमला किया। 20 अक्टूबर 1962 को हॉटस्प्रिंग्स की घटना के 3 साल बाद हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे के छ साल बाद पंचशील के 8 साल बाद चीनी सेना ने एक साथ दो मोर्चों पर हमला किया। पश्चिम में लद्दाख, पूर्व में नेफा जो आज अरुणाचल प्रदेश है।
चीन ने लद्दाख का मोर्चा उसी सड़क के कारण खोला था जिसके अस्तित्व से नेहरू ने इंकार किया था। इस युद्ध के दौरान चीनी सेना अरुणाचल में 100 कि.मी. अंदर तक प्रवेश कर लिया था और तेजपुर तक पहुंचने में कुछ ही दिन बाकी थे। और फिर 21 नवंबर 1962 [संगीत] को युद्ध समाप्त हो गया। युद्ध में भारतीय सेना को 8000 से अधिक भारतीय सैनिकों की हानि हुई। इसमें 1383 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। 1047 घायल हुए और 1696 लापता हो गए। 3968 सैनिक बंदी बना दिए गए और यह सब क्षति उस सड़क की रक्षा में हुई जिसके बारे में प्रधानमंत्री ने 3 साल पहले संसद को बताया था। यह हांगकांग की अफवाह है जिसकी तमाम वार्निंग्स नेहरू ने इग्नोर की। यहां पर जनरल थिमैया जिन्होंने विग्नल को भेजा था 1961 के दौरान अपने विदाई भाषण में सेना के ऑफिसर से कही बात पर ध्यान देना आवश्यक है।
मुझे आशा है कि मैं तुम्हें चीनी कम्युनिस्टों के लिए बारूद के रूप में नहीं छोड़ रहा हूं। हिमैया की चेतावनी सच साबित हुई। बारूद वही जवान थे जिन्होंने करम सिंह और उनके साथियों के शहीद होने के बाद वॉर में अपनी जान गवाई। हां, जमीन वही थी जहां करम सिंह 2 साल पहले मरे थे। सड़क वही थी जिसे फॉरेन सेक्रेटरी ने 1958 में नक्शे पर दिखाया था। 21 नवंबर 1962 युद्ध समाप्त हो चुका है। चीनी सेना ने एक तरफा सीज फायर घोषित कर दिया है। 38,000 वर्ग कि.मी. भारतीय भूमि चीन के कब्जे में है।
अमेरिकी विशेष दूत एवरेल हैमन दिल्ली पहुंचते हैं। हरिमन प्रधानमंत्री से चार बार मिले। 23 नवंबर की मीटिंग में हरिमन के प्रश्न पर नेहरू ने कहा, चीनी कम्युनिस्टों का मुख्य उद्देश्य भारत को अपमानित करना था। नेहरू ने टिप्पणी की कि अक्साई चीन और सड़क चीनियों के लिए महत्वपूर्ण थी। परंतु लद्दाख के बाकी हिस्से का कोई मूल्य नहीं था। सड़क चीनियों के लिए महत्वपूर्ण थी। यह वही प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने 3 साल पहले संसद को बताया था कि सड़क की बात को हांगकांग की अफवाह करार कर दिया था। युद्ध से पहले वैसे दिसंबर 1959 में प्रधानमंत्री नेहरू ने स्वयं संसद में माना था। लद्दाख के उस कोने में वह सड़क बनी थी। 2 साल या उससे ज्यादा तक हमें इसके बारे में कुछ नहीं पता था। यह बिल्कुल सच है। शायद यह हमारी गलती थी। 11 साल पांच चेतावनियां, एक हाथ से लिखी टिप्पणी, संसद में बोला गया झूठ, 10 पुलिस की शहादत, 8000 सैनिकों की क्षति, 38,000 वर्ग कि.मी. जमीन का खोना और अंत में एक अमरीकी राजदूत के सामने स्वीकार रोकती।
संसद के सामने नहीं, जनता के सामने नहीं, एक विदेशी राजनयिक के सामने और वह भी निजी कमरे में। 65 साल बीत चुके हैं। 38,000 वर्ग कि.मी. अभी भी चीन के कब्जे में है। 2020 में गलवान घाटी में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए। उसी सीमा पर, उसी विवाद में, उसी अनसुलझे प्रश्न में।