दोस्तों माना कि सरकार को डिफेंड करना सरकारी अधिकारियों की ड्यूटी होती है। अगर प्रधानमंत्री को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेशी दौरे पर कोई सवाल किया जाता है तो उसका लॉजिकल जवाब देना विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की ड्यूटी होती है।
लेकिन ये ड्यूटी निभाने में कम से कम लॉजिकल बातें तो करनी चाहिए। पीएम मोदी को डिफेंड करने में क्या भारत के मतदाताओं के दिमाग का मजाक बनाना चाहिए? क्या उनके विवेक का दुनिया में मजाक बनवाना चाहिए? क्या भारत के मतदाताओं ने बोला है पीएम मोदी को कि अगर प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो हम बुरा मान जाएंगे। अगर आपने प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो हम वोट नहीं करेंगे।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने विदेश सचिव रुद्रेंद्र टंडन ने क्या जवाब दिया है जब न्यूजीलैंड की रिपोर्टर ने सवाल पूछा। यह सवाल पूछा कि पीएम मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते? न्यूजीलैंड में भी नॉर्वे वाला सीन हो जाता है। जहां पीएम मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करने की खबर सामने आती है। तो वहां की मीडिया इसे मुद्दा बनाती है। एक महिला रिपोर्टर सवाल करती हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो विदेश सचिव की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। यह तस्वीर आप देख सकते हैं। दो बड़े अधिकारी आपको फ्रेम में दिखाई देंगे।
रणधीर जायसवाल स्पोक्सपर्सन विदेश मंत्रालय के और रुद्रेंद्र टंडन। यह सेक्रेटरी हैं, सचिव हैं। तो इन्होंने क्या जवाब दिया जब महिला रिपोर्टर ने सवाल पूछा? भारत के मतदाताओं के विवेक का ही मजाक बनवा दिया। क्या सवाल पूछा रिपोर्टर ने? पहले सवाल आप सुनिए। वी हैव क्वेश्चन। व्हाई मिस्टर मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस? तो विदेश सचिव को हंसी आ जाती है जब रिपोर्टर सवाल करती हैं कि आपके जो प्रधानमंत्री हैं पीएम मोदी है वो प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते सीधा सा सवाल पूछा गया था उसके बाद विदेश सचिव को समझ नहीं आता कि बोलूं तो बोलूं क्या ना बोलते और यह कहते कि यह हमारा मुद्दा नहीं है। यह उनका डिसीजन है।
तो यह कहते तो काम चल जाता। लेकिन पीएम मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करने पर विदेश सचिव साहब ने जो जवाब दिया वह कितना बचकाना है। शुरुआत में मुस्कुराने के बाद बात को टालने की कोशिश के बाद जो जवाब दिया ना देते तो ही अच्छा था। क्योंकि क्या बोला विदेश सचिव ने आप बयान सुनिए कि पीएम मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करने पर वो क्या लॉजिक देते हैं और कैसे लॉजिक की ऐसी तैसी करते जरा देखिए। सी इट्स नॉट अप्रोप्रियट फॉर मी एस अ सिविल सर्वेंट क्वेश्चन मिस्टर मोदी पिटिकल मेथड वेरी सक्सेसफुल पॉलिटिशियन लेट मी गिव यू सम कॉन्टेक्स्ट मिस्टर मोदी इस प्राइम मिनिस्टर मोदी इस अेंट्रल इंडियन पॉलिटिशियन बाय एंड लार्ज इंडियन पॉलिटिश फेवर डायरेक्ट यू नो कांटेक्ट वि दे इलेक्टेट रिमेंबर दैट इंडियन इलेक्टेट आर प्रडोमिनेंटली रूरल दे वांट डायरेक्ट कांटेक्ट दे डोंट लाइक बी स्पोकन डाउन टू दे डोंट लाइक बी स्पोकन टू इंटरमीडियरी एंड मिस्टर मुंडे हैज़ परफेक्ट द डायरेक्ट हरे ही सीम्स टू बी डूइंग गुड जॉब इट्स यू नो वन ऑफ़ द लगेस्ट सर्विंग प्राइम मिनिस्टर इन तो विदेश सचिव यहां पर जवाब देते हैं कि भारत की बहुत सारी जनता गांव में रहती है और गांव की जनता अगर पीएम मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं अगर रिपोर्टर्स से बातचीत करते हैं, सवाल जवाब करते हैं तो गांव की जनता कैसे नाराज हो सकती है? हिंदी अनुवाद मैं आपको बता देता हूं। जो अंग्रेजी में बोला विदेश सचिव रुद्रेंद्र टंडन ने तो उसका हिंदी अनुवाद कुछ इस प्रकार है।
उन्होंने शुरुआत में कहा कि देखिए एक सिविल सेवक होने के नाते मेरे लिए प्रधानमंत्री मोदी की राजनीतिक कार्यशैली पर सवाल उठाना उचित नहीं होगा। तो जवाब की शुरुआत जहां से की लगा कि आगे ज्यादा नहीं बोलेंगे कि यह तो पीएम मोदी का मामला है। उनकी कार्यशैली का मामला है। मैं तो सिविल सेवक हूं। तो मैं इस पर क्या बोलूं? लेकिन उसके बाद अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हैं और जो लॉजिक न्यूजीलैंड की रिपोर्टर के सामने रखा वहां पर बैठी भारतीय और न्यूजीलैंड की मीडिया के सामने रखा तो बहुतों का सिर चकरा गया होगा। क्या भारत की जनता इतनी भोलीभाली है? छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाएगी। क्या कहते विदेश सचिव? वह पीएम मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करने को लेकर क्या संभावना जताते हैं?
क्या लॉजिक देते हैं? कहते हैं। मैं इसका संदर्भ जरूर बताना चाहूंगा। प्रधानमंत्री मोदी एक विशिष्ट भारतीय राजनेता हैं। आमतौर पर भारत के नेता अपने मतदाताओं से सीधे जुड़ना पसंद करते हैं। यानी डायरेक्ट कनेक्शन। आगे कहते हैं यह भी याद रखना चाहिए कि भारत के अधिकांश मतदाता ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। वह अपने नेता से सीधा संवाद चाहते हैं। उन्हें यह पसंद नहीं कि कोई उनके और नेता के बीच मध्यस्थ बने यानी बिचोलिया बने या उनकी ओर से बात करें। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मतदाताओं से सीधे जुड़ने की इस शैली को बहुत प्रभावी ढंग से विकसित किया है।
यही वजह है कि उनका यह तरीका राजनीतिक रूप से सफल भी रहा है। वह लगातार चुनाव जीतते रहे हैं और आज अपने तीसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री हैं। इसी कारण वह भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्रींत्रियों में शामिल हैं। यानी रुद्र टंडन के लॉजिक क्या कहते हैं? लॉजिक कहते हैं कि ज्यादातर गांव की जनता है और गांव की जनता यह पसंद नहीं करती कि बीच के लोगों से बातचीत की जाए। यानी मीडिया वाले क्या बिचोलिए हैं? क्या इससे पहले मनमोहन सिंह प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे? बाजपेय जी करते थे। तमाम प्रधानमंत्री करते आए हैं?
तो क्या वो भारत की जनता को नाराज कर देते थे? क्या भारत की गांव की जनता इस बात से नाराज हो जाती कि प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं कि देखिए बिचोलियों से बात कर रहे हैं। क्या देश की मीडिया को इंटरनेशनल मीडिया को बिचोलिया बना दिया गया है? अगर न्यूजीलैंड गए हैं देश के प्रधानमंत्री ऑस्ट्रेलिया गए वहां पर मीडिया से बात कर लेते तो क्या भारत की गांव की जनता नाराज हो जाती? क्या आप कभी इस लॉजिक का इस्तेमाल कर सकते हैं? क्या आप ऐसा सोच सकते हैं? तो रुद्रन टंडन के दिमाग को सलाम है कि भाई साहब क्या गजब का लॉजिक ढूंढकर निकाला है आपने।
इसके बाद यह भी कहते हैं कि तरीका सफल रहा है। इसी वजह से पीएम मोदी तीन बार चुनाव जीत चुके हैं। वो लगातार सफल रहे हैं तो क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करना उनकी सफलता की वजह है? क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस ना करने से जनता नाराज नहीं होती? ऐसा लॉजिक लगाने की बजाय विदेश सचिव जवाब ना देते तो अच्छा रहता। लेकिन यह पूरा वाक्या यह भी संदेश देता है कि प्रधानमंत्री तो सवालों का सामना नहीं करते। बेचारे विदेश मंत्रालय के अधिकारी फंस जाते हैं। उनके लिए जवाब देना मुश्किल हो जाता है।
क्योंकि एक तरफ तो हम कहते हैं कि हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। प्रधानमंत्री डायलॉग मारते हैं कि भारत तो लोकतंत्र की जननी है। तो जहां लोकतंत्र की जननी कहा जाता है अपने देश को क्या वहां पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का इतना सम्मान नहीं करना चाहिए कि देश के प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस करें। दुनिया के तमाम ताकतवर देशों के नेता मीडिया से बातचीत करते हैं। सवाल जवाब करते हैं। चाहे अमेरिका हो, फ्रांस हो, ऑस्ट्रेलिया हो, इंग्लैंड हो। सब देशों के राष्ट्रध्यक्ष मीडिया के सामने आते हैं। सवालों का सामना करते हैं। जो अपने आप को लोकतांत्रिक देश कहते हैं।
वहां पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करना भी एक लोकतंत्र का हिस्सा होता है। एक कल्चर होता है। पीएम मोदी से नॉर्वे में यही सवाल किया गया था। जब पीएम मोदी सवाल को अनसुना करके निकल गए तो विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से भी नॉर्वे की रिपोर्टर ने सवाल किया था। अब न्यूजीलैंड की रिपोर्टर ने भी वही सवाल किया है। नॉर्वे के बाद न्यूजीलैंड में जिस तरह सवाल पूछा गया है ऑस्ट्रेलिया में भी तंज कसा गया कि भारत के प्रधानमंत्री अनस्क्रिप्टेड प्रेस कॉन्फ्रेंस करना पसंद नहीं करते। उन्हें स्टेज्ड इवेंट ज्यादा पसंद है जो पूरी तरह से अपने हिसाब से आयोजित किए जाते हैं।
तो दुनिया में इस बात की चर्चाएं हो रही हैं, सवाल हो रहे हैं और जवाब ऐसे आ रहे हैं जो भारत के मतदाताओं को ही एकदम से मासूम दिखाते हैं कि भारत के मतदाता नाराज हो जाएंगे। अगर पीएम मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ली।