साल 1995 बॉलीवुड का वो दौर जब एक तरफ थे इंडस्ट्री के सबसे बड़े प्रोड्यूसर बोनी कपूर जिन्होंने अपनी भव्य फिल्म फ्रेम पर पानी की तरह ₹5 करोड़ बहा दिए। नई स्टार कास्ट, खूबसूरत लोकेशनेशंस, शेखर कपूर और सतीश कौशिक जैसा बड़ा निर्देशन और सालों का प्रमोशन। दूसरी तरफ थे डिस्को डांसर मिथुन दा जिनकी एक छोटे बजट की एक्शन फिल्म द डॉन। बिना किसी बड़े शोशराबे के बिल्कुल चुपचाप सिनेमाघरों में उतरी। उस वक्त पूरे बॉलीवुड का मानना था कि 5 करोड़ प्रेम मिथुन दा की इस 1 करोड़ फिल्म को मसल कर रख देगी। लेकिन दोस्तों जब बॉक्स ऑफिस का पर्दा उठा तो जो नतीजा सामने आया उसने पूरे बॉलीवुड के होश उड़ा दिए। संजय कपूर और तबुक की इस मेगा बजट रोमांटिक फिल्म का ऐसा हाल हुआ कि बोनी कपूर के करोड़ों रुपए डूब गए। वहीं मिथुन दा की कम बजट वाली द डॉन सिनेमाघरों में ऐसा गदर मचा रही थी
कि देखकर हर कोई हैरान रह गया। आखिर कैसे 1 करोड़ की फिल्म ने 5 करोड़ की महा फिल्म को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। प्रेम फिल्म के बनने में ऐसी कौन सी तीन बड़ी गलतियां हुई थी जिसने इसे डिजास्टर बना दिया और मिथुन दा का वो कौन सा सीक्रेट फार्मूला था जिसने उन्हें बीओसी सेंटर्स का असली राजा बना दिया। आज के इस स्पेशल वीडियो में हम 1995 की सबसे बड़ी क्लैश की पूरी इनसाइड स्टोरी और अनसुनिक फैक्ट से पर्दा उठाने वाले हैं। वीडियो को बिना स्किप किए अंत तक जरूर देखिएगा क्योंकि क्लाइमेक्स में छुपा है एक ऐसा राज जो आपने पहले कभी नहीं सुना होगा। 90 के दशक की शुरुआत में बोनी कपूर का नाम बॉलीवुड के सबसे बड़े और प्रभावशाली निर्माताओं में शुमार था। मिस्टर इंडिया जैसी ब्लॉकबस्टर देने के बाद बोनी कपूर अपने छोटे भाई संजय कपूर को बॉलीवुड में एक ग्रैंड ल्च देना चाहते थे। संजय कपूर को लॉन्च करने के लिए बोनी कपूर ने कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने फिल्म प्रेम की कमान सौंपी उस दौर के दिग्गज डायरेक्टर शेखर कपूर को। हीरोइन के तौर पर चुना गया एक नई और बेहद खूबसूरत अदाकारा तब्बू को।
संगीत की जिम्मेदारी सौंपी गई दिग्गज संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को और गीत लिखे आनंद बक्शी साहब ने। फिल्म की स्टार कास्ट में सिर्फ नए चेहरे नहीं बल्कि अमरीश पुरी, दिलीप ताहिल और अरुणा ईरानी जैसे बड़े-बड़े मंजे हुए कलाकार भी शामिल थे। यानी कागज पर देखा जाए तो प्रेम एक ऐसी फिल्म थी जिसे सुपरहिट होना ही था। लेकिन कहते हैं ना कि हर चमकती चीज सोना नहीं होती। फिल्म प्रेम की घोषणा तो 1989 से 90 के आसपास ही हो चुकी थी। लेकिन यह फिल्म बनते-बनते लगभग 5 से 6 साल के लंबे समय में फंस गई। प्रोडक्शन में हो रही देरी की वजह से डायरेक्टर शेखर कपूर और बोनी कपूर के बीच अनबन हो गई। जिसके बाद शेखर कपूर ने फिल्म बीच में ही छोड़ दी। बाद में सतीश कौशिक को फिल्म के निर्देशन का जिम्मा सौंपा गया। साल दर साल फिल्म का बजट बढ़ता चला गया। विदेशी लोकेशनेशंस, रीशूट्स और यह भारीभरकम सेट्स के कारण इस फिल्म का बजट उस जमाने के हिसाब से ₹5 करोड़ तक पहुंच गया। आप अंदाजा लगाइए 1995 में ₹5 करोड़ का बजट आज के समय के ₹100 करोड़ से भी ज्यादा के बराबर माना जाता है। बोनी कपूर को पूरा भरोसा था कि जब यह फिल्म 5 मई 1995 को सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी, तो संजय कपूर रातोंरात सुपरस्टार बन जाएंगे और तब्बू की किस्मत चमक जाएगी। अब बात करते हैं सिक्के के दूसरे पहलू की यानी बॉलीवुड के सबसे भरोसेमंद और जन-जन के चहेते स्टार मिथुन दा की। 90 के दशक के मध्य में मिथुन दा का बॉलीवुड में काम करने का तरीका पूरी तरह से अलग हो चुका था। उन्होंने मुंबई के चकाचौंध से थोड़ा दूर जाकर तमिलनाडु के ऊटी में अपना होटल बिजनेस शुरू किया और वहीं से अपनी फिल्मों की शूटिंग का एक नया मॉडल तैयार किया जिसे ऊटी लो बजट मॉडल कहा जाता है।
मिथुन दा एक साथ कई फिल्मों की शूटिंग करते थे। उनकी फिल्मों का बजट बहुत सीमित था। आमतौर पर ₹80 लाख से ₹1 करोड़ के बीच शूटिंग कुछ ही हफ्तों में पूरी हो जाती थी और फिल्में बिना किसी बड़े भाई या बड़े प्रमोशन के सीधे बी और सी सेंटर्स के सिनेमाघरों तक पहुंच जाती थी। 12 मई को रिलीज हुई फिल्म द डॉन को डायरेक्ट किया था फारुख सिद्दीकी ने। फिल्म में मिथुन दा के साथ नजर आई थी सोनाली बेंद्रे, जुगल हंसराज, असिफ शेख, प्रेम चोपड़ा, कादर खान, सदाशिव अमरापुरकर और रजा मुराद। फिल्म की कहानी एक ऐसे साधारण इंसान देवेंद्र के इर्द-गिर्द घूमती है जो हालात के थपटे से मजबूर। कानून के खिलाफ जाकर गरीबों का मसीहा यानी डॉन बन जाता है। फिल्म में भरपूर एक्शन था, डायलॉगबाजी थी, इमोशन था और कादर खान साहब का ट्रिपल रोल में जबरदस्त कॉमेडी तड़का भी था। मिथुन दा जानते थे कि उनका असली दर्शक वर्ग कौन है।
सिंगल स्क्रीन थिएटर छोटे शहरों के दर्शक और आम मजदूर रिक्शा चालक जो पर्दे पर अपने हीरो को ढिशुमशुम करते और अन्याय से लड़ते देखना चाहते थे। मई 1995 में जब प्रेम और द डॉन आमने-सामने आई तो ट्रेड एनालिस्ट का मानना था कि प्रेम की भव्यता के आगे मिथुन दा की द डॉन कहीं टिक नहीं पाएगी। लेकिन जैसे ही फिल्में पर्दे पर लगी बाजी पूरी तरह पलट गई। फिल्म प्रेम को दर्शकों ने पूरी तरह नकार दिया। 5 से 6 साल पुरानी होने के कारण फिल्म की कहानी और संजय कपूर का लुक पुराना लगने लगा। लव स्टोरी में दर्शकों को नयापन महसूस नहीं हुआ। मल्टीप्लेक्स का जमाना तब था नहीं और सिंगल स्क्रीन के दर्शकों को फिल्म की धीमी रफ्तार बिल्कुल पसंद नहीं आई। नतीजा यह हुआ कि 5 करोड़ में बनी प्रेम बॉक्स ऑफिस पर बम मुश्किल से 3 से ₹3.5 करोड़ ही कमा पाई और इसे बॉलीवुड इतिहास की इस बड़ी फ्लॉप फिल्मों में गिना गया। बोनी कपूर और संजय कपूर को इस फिल्म से भारी नुकसान झेलना पड़ा। दूसरी तरफ मिथुन दा की द डॉन महज एक से ₹1.5 करोड़ के बजट में बनी थी। उसने सिनेमाघरों में तहलका मचा दिया। द डॉन ने भारत में लगभग 4.5 से ₹5 करोड़ का शानदार ग्रास कलेक्शन किया। उस दौर में 1 करोड़ की फिल्म का 5 करोड़ कमाना एक बहुत बड़ी व्यवसायिक सफलता माना जाता था। फिल्म ने अपने लागत से चार गुना से भी ज्यादा का मुनाफा कमाया।
डिस्ट्रीब्यूटर्स और प्रोड्यूसर्स की जेबें नोटों से भर गई। यूपी, बिहार, सीपी बरार और राजस्थान के सिंगल स्क्रीन थिएटर्स में द डॉन के शो हाउस पूल चलने लगे। मिथुन दा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बॉक्स ऑफिस पर सफलता पाने के लिए 5 करोड़ के बजट और 6 साल के वक्त की जरूरत नहीं बल्कि सही दर्शकों की नब्ज़ पकड़ना सबसे ज्यादा जरूरी होता है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? चलिए इसे आसान शब्दों में तीन बड़े कारणों से समझते हैं। फिल्म प्रेम को बनने में 5 साल से ज्यादा का समय लगा। इस दौरान दर्शकों की पसंद बदल चुकी थी। वहीं मिथुन दा की डॉन ताजा तरीन बनी थी और बिना किसी देरी के दर्शकों के सामने आ गई। संजय कपूर एक नए चेहरे थे और दर्शकों से जुड़ाव नहीं बना पाए। जबकि मिथुन दा की मास फैन फॉलोइंग छोटे शहरों में इतनी मजबूत थी कि उनके नाम से ही थिएटर्स में टिकटें बिकती थी। बोनी कपूर ने 5 करोड़ खर्च किए। इसीलिए फिल्म को हिट होने के लिए कम से कम 8 से 10 करोड़ कमाने थे। जबकि मिथुन दा की फिल्म का बजट इतना कम था कि पहले हफ्ते में ही फिल्म ने अपनी पूरी लागत वसूल कर ली और प्रॉफिट में आ गई। तो दोस्तों 1995 का यह बॉक्स ऑफिस क्लैश हमें सिखाता है कि सिनेमा में सिर्फ पैसा और बड़ा नाम ही सब कुछ नहीं होता। कंटेंट और ऑडियंस की समझ सबसे बड़ी ताकत होती है। बोनी कपूर की 5 करोड़ी प्रेम जहां फ्लॉप साबित हुई। वहीं मिथुन दा की डॉन ने अपनी लागत से कई गुना कमाई करके यह साबित कर दिया कि वह 90 के दशक के असली बॉक्स ऑफिस किंग थे। क्या आपने मिथुन दा की फिल्म डॉन या संजय कपूर की प्रेम देखी है? इन दोनों में से आपकी पसंदीदा फिल्म कौन सी है? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताइए। अगर आपको 90ज के बॉलीवुड की यह अनसुनी कहानी और बॉक्स ऑफिस विश्लेषण पसंद आया हो तो इस वीडियो को एक लाइक जरूर करें और अपने दोस्तों के साथ शेयर करें। मिलते हैं अगले वीडियो में।