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मीना कुमारी की जिंदगी का वो सच… जो फिल्मों से भी ज्यादा दर्दनाक था!

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साल 1960 फिल्म पाकीजा की शूटिंग चल रही थी। फिल्म की एक्ट्रेस मीना कुमारी अपने शौहर और फिल्म मेकर कमाल अमरोहो के साथ शूटिंग के सिलसिले में सफर कर रही थी। रास्ता गुजर रहा था मध्य प्रदेश के शिवपुरी इलाके से एक ऐसा इलाका जो उस दौर में डाकुओं के लिए बदनाम था। लेकिन उस वक्त तक यह बस एक जानकारी थी हकीकत नहीं बनी थी। रात गहराती गई और अचानक उनकी गाड़ी का पेट्रोल खत्म हो गया। चारों तरफ सन्नाटा था, ना कोई बस्ती थी, ना कोई रोशनी, सिर्फ अंधेरा और अंधेरे का इंतजार। ऐसे में उन्होंने फैसला किया कि रात यहीं गुजारी जाएगी।

सुबह होते ही आगे बढ़ा जाएगा। लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह रात उनकी जिंदगी के सबसे अजीब और खौफनाक किस्सों में दर्ज होने वाली है। करीब 2:00 बजे अंधेरे को चीरती हुई कुछ परछाइयां उभरी। हथियार बंद लोग जिन्होंने आते ही गाड़ियों को घेर लिया। माहौल एकदम बदल गया। खामोशी अब डर में बदल चुकी थी।

पहली सोच यही थी कि अब लूटपाट होगी या फिर शायद इससे भी कुछ बदतर। लेकिन जैसे ही उन लोगों को पता चला कि गाड़ी में बैठी औरत और कोई आम मुसाफिर नहीं बल्कि खुद मीना कुमारी है। उनके तेवर अचानक बदल गए। डाकुओं का बर्ताव बदल गया। आवाज में सख्त की जगह नरमी आ गई। विनोद मेहता अपनी किताब मीना कुमारी क्लासिकल बायोग्राफी में किस्से का जिक्र करते हुए बताते हैं कि उनके सरदार ने मीना कुमारी और उनकी पूरी टीम को अपने ठिकाने पर ले जाकर खाने-पीने और आराम करने का इंतजाम किया। जो रात कुछ देर पहले उस खौफ से भरी हुई थी वही अब मेहमान नवाजी में बदल चुकी थी। लेकिन इस कहानी का सबसे हैरान करने वाला हिस्सा अभी भी बाकी था।

सुबह होने लगी और अब वापस लौटने का वक्त था। तभी उस वक्त डाकू के सरदार ने मीना कुमारी के सामने एक अजीब सी ख्वाहिश रख दी। वह अपने हाथ में एक नुकीला चाकू लेकर आया और बोला कि वो उनका बहुत बड़ा फैन है और वह चाहता है कि मीना कुमारी उसी चाकू से उनके हाथ पर अपना ऑटोग्राफ दे। अपना नाम लिखें। एक पल के लिए सब कुछ ठहर जाता है। मीना कुमारी हिम्मत दिखाती हैं और उसी चाकू से उनके हाथ पर अपना नाम लिख देती हैं। कुछ देर बाद जब वह वहां से निकलकर एक सुरक्षित जगह पहुंचती हैं तब उन्हें पता चलता है कि वो कोई मामूली डाकू नहीं था बल्कि उस दौर का कुख्यात डाकू अमृत लाल था। नमस्कार, मेरा नाम है मन।

आप देख रहे हैं खबरगांव और आज बात उस अभिनेत्री की जिसकी जिंदगी पैसे कमाने की मशीन बनी रही। जिसे ठोकरें मिली। शूटिंग के दौरान जिसकी जान जाते-जाते बची चार फिल्म फेयर अवार्ड जीते मगर अपने आखिरी दिनों में ₹100 के लिए भी तरसी। बात ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी की आबला पा कोई इस दश्त में आया होगा। वरना आंधी में दिया किसने जलाया होगा? मीना कुमारी की जिंदगी अपने आप में किसी फिल्म से कम नहीं है। एक ट्रेजडी है। मीना की जिंदगी में लगातार शूटिंग्स थी। घर वालों और बाद में पति से मिली पाबंदियां थी और एक ऐसी दुनिया थी जो उनके दर्द को नहीं देख पा रही थी। ऐसे में जब जिंदगी ने उन्हें मां बनने का मौका दिया। एक ऐसे साथी के होने का मौका दिया जो उनकी पीड़ा को बांट पाता तो वह मौका करियर की आपाधापी में निकल गया। वरिष्ठ पत्रकार और संपादक विनोद मेहता अपनी किताब मीना कुमारी या क्लासिकल ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं एक बार मीना मां बनने वाली थी। लेकिन उन्हें उनके पति कमाल अमरोली [संगीत] ने समझाया कि एक्ट्रेस की इमेज पर असर पड़ेगा। लोग तुम्हें मां के रूप में नहीं देखना चाहेंगे

और उन्होंने अबॉर्शन के लिए दबाव डाला और ऐसा ही एक बार नहीं लगभग दो बार हुआ। बाद में जब दोबारा कोशिश हुई तो हालात इतने बिगड़ गए कि ऑपरेशन तक कराना पड़ा। इस पूरी कहानी में अगर किसी ने मीना के दर्द को करीब से देखा तो वह थी नरगिस। कहते हैं एक रात उन्होंने मीना के कमरे से तेज आवाजें सुनी जैसे झगड़ा हो रहा हो, मारपीट हो रही हो। एक और रात उन्होंने उन्हें होटल के बाहर हाफते हुए देखा। बुरी तरह थकी हुई शरीर पर मारपिटाई के दाग थे और डरी हुई। इन सबके बाद एक दिन नरगिस ने बाकिर अली जो कमाल अमरोवी के सेक्रेटरी थे उनसे पूछा, क्या आप लोग उन्हें मार देना चाहते हैं? यह सवाल गुस्से का नहीं था। यह डर से निकला था। अपनी दोस्त मीना कुमारी के लिए। सालों बाद जब मीना कुमारी इस दुनिया से चली गई तो नरगिस ने एक खत लिखा। उसमें उन्होंने शोक नहीं जताया। उन्होंने कहा मैं तुम्हें मौत की मुबारकबाद देती हूं और दुआ करती हूं कि तुम फिर कभी इस दुनिया में वापस ना आओ।

तुम क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी बेलुत्फ जिंदगी के किस्से हैं। पी के फीके। मीना कुमारी की ट्रैजिक लाइफ की शुरुआत उनके पहले चंद घंटों में ही हो गई थी। साल 1933 की उमस भरी शाम थी। मुंबई के दादर में डॉक्टर गडरे क्लीनिक के बाहर अली बख्श नामक एक व्यक्ति बेचैनी [संगीत] में टहल रहे थे। जिनकी जिंदगी खुद संघर्षों से भरी हुई थी। माया नगरी में अपना गुजारा करने की वो कोशिश कर रहे थे। अंदर इकबाल बेगम उनकी बीवी प्रसव पीड़ा यानी लेबर पेन से गुजर रही थी। और बाहर एक बाप अपने होने वाले बच्चे में अपनी तकदीर ढूंढ रहा था। एक बेटे की शक्ल में। मगर जब बच्ची पैदा होती है मैं जमीन बानो तो उसकी ख्वाहिश की जगह एक भारी खामोशी ले लेती है। तंगी इतनी थी कि डॉक्टर की फीस देने के लिए भी पैसे नहीं थे और उसी दबाव में अली बख्श ने नवजात को अनाथालय के दरवाजे पर छोड़ दिया। घर आए तो देखा बीवी रो रही है। उनकी आंखों में आंसू हैं। कुछ घंटों बाद वो वापस लौटे।

जरूर बच्ची को वापस ले भी लिया। लेकिन शायद उसी दिन मीना की जिंदगी का पहला सच तय हो गया था कि यह जिंदगी अपनाए जाने से ज्यादा सहने की होगी। विनोद मेहता लिखते हैं कि घर का गुजारा पहले ही उनकी बड़ी बहन खुर्शीद की कमाई से चल रहा था। एक चाइल्ड आर्टिस्ट थी उनकी बहन। यानी बचपन यहां एक भाव नहीं था। एक लग्जरी था और 1935 में जब अली बख्श एक अजीब बीमारी का शिकार हुए तो ये लग्जरी भी खत्म हो गई। इलाज के लिए पूरा परिवार लाहौर गया और इस सफर में तीन साल की मेहजबीन ने पहली बार डर को बहुत करीब से महसूस किया। ट्रेन के पुल पर आते ही महज इन बानो को लगा कि सब खत्म हो जाएगा। खिड़की बंद करते हुए उनका हाथ फंस गया। वो बेहोश हो गई और होश में आते ही इतना पूछा पुल पार हो गया क्या? यह सवाल एक बच्ची का था। लेकिन उनके भीतर जो डर था वो उस उम्र से कहीं बड़ा था। जब परिवार वापस मुंबई लौटा तो बीमारी ने सिर्फ शरीर नहीं पूरे घर की हालत तोड़ दी थी। पैसे खत्म हो चुके थे। और अब फैसला लिया गया कि बेटियां कमाएंगी। अली बख्श के लिए खेल, पढ़ाई या बचपन जैसी चीजें मायने नहीं रखती थी। वो उन्हें वक्त की बर्बादी समझते थे। ऐसे में महजबीन बानो का बचपन धीरे-धीरे एक जिम्मेदारी में बदलने लगा। सिर्फ उनकी मां इकबाल बेगम ही थी जिनके साथ होने पर माहौल थोड़ा इंसान ही लगता था। 4 साल की उम्र में जब बच्चे स्कूल की कॉपी में अपना नाम लिखना सीखते हैं। उस उम्र में महजबीन बानो स्टूडियो के चक्कर लगा रही थी। अली बख्श हर दरवाजे पर वही बात दोहराते। साहब यह बहुत हुनरमंद बच्चे हैं और आखिरकार फिल्म निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें लेदर फेज में एक छोटा सा रोल दे दिया। एक चाइल्ड आर्टिस्ट का रोल। सेट पर मेहजबीन ने जिस सहजता से काम किया उसने सबको चौंका दिया।

जैसे यह दुनिया उनकी अपनी ही हो। शूटिंग खत्म हुई और उससे ₹25 मिले। उस वक्त के लिए यह रकम छोटी नहीं थी। लेकिन असल कीमत कुछ और थी जो उस दिन चुकाई जा चुकी थी। वह कीमत थी मीना की बचपन की। इसके बाद फिल्में आती गई। अधूरी कहानी, पूजा, नई रोशनी, बहन और हर सुबह मीना की शुरुआत स्टूडियो जाने से होती। [संगीत] वो 18-18 घंटे काम करती। लेकिन इस चमक के पीछे एक अजीब सा खालीपन हमेशा उनके साथ मौजूद रहता। एक बार जब मीना से कहा गया कि उन्हें एक सीन में मरना है तो छोटी मीना ने फौरन मना कर दिया क्योंकि वह समझ ही नहीं पा रही थी कि यह खेलख में हो रही शूटिंग है या सच में उनसे मरने के लिए कहा जा रहा है। बच्ची को जबरदस्ती गिराया गया। सालों बाद मीना कुमारी ने खुद कहा मुझे लगा था कुछ दिनों की बात है। फिर मैं स्कूल जाऊंगी खेलूंगी। लेकिन ऐसा कभी हुआ ही नहीं। 4 साल की उम्र से शुरू हुआ यह सफर उन्हें शोहरत तक ले गया। लेकिन उसी रास्ते में कहीं उनका बचपन हमेशा के लिए छूट गया। घंटोंघंटों की शूटिंग, अनियमित समय [संगीत] और थकावट इन सबके बीच खाने का कोई तय रूटीन था नहीं। ऐसे में उन्हें अक्सर ठंडी बची हुई बासी रोटियां ही मिलती थी। कभी सेट पर कभी घर लौट कर धीरे-धीरे यही उनके स्वाद का हिस्सा बन गया और तमाम जिंदगी मीना बासी रोटी से प्यार करती रही। मगर उनके नसीब में बासी रोटियां भी नहीं थी। जब वह बड़ी स्टार बनी और कमाल अमरोवी के साथ रहने लगी तब भी वह आदत नहीं बदली। घर में सब कुछ था, ताजा खाना था, रसोइए थे। लेकिन मीना कभी-कभी जानबूझकर बासी रोटी मांगती थी या खुद ढूंढकर खा लेती थी। एक दिन जब कमाल ने उन्हें ऐसा करते देखा तो उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं आया। वो गुस्सा हो गए।

उनके लिए यह सिर्फ एक आदत नहीं थी। यह उनकी स्टार छवि के खिलाफ था। उन्होंने नाराज होकर टोक दिया कि अब वह उस दौर में नहीं है जहां बासी खाना खाया जा सके। साल 1940 के आसपास की बात है जब मीना कुमारी के हम उम्र बच्चे अपनी दुनिया स्कूल, खेल और दोस्तों के बीच बना रहे थे। उसी दौर में मीना कुमारी की दुनिया स्टूडियो के सेट्स पर बस रही थी। जहां कहानियां थी, किरदार थे लेकिन उनका बचपन कहीं नहीं था। माई इकबाल बेगम के गुजर जाने के बाद घर का जो थोड़ा बहुत सहारा था वो भी खत्म हो चुका था। अब काम सिर्फ जरूरत नहीं था, मजबूरी था। इसी दौरान उनका ज्यादातर वक्त बीतने लगा चमूर के बसंत स्टूडियोज में जहां होमी वाडिया जैसे फिल्म मेकर मिथकीय और स्टंट फिल्मों की दुनिया रच रहे थे और यहीं एक अजीब विरोधाभास शुरू होता है। एक सुन्नी मुस्लिम लड़की जिसे धार्मिक ग्रंथों की बुनियादी जानकारी भी नहीं थी वही लड़की पर्दे पर लक्ष्मी देवी बनकर खड़ी होती है। उनकी शुरुआती फिल्मों में लक्ष्मी नारायण जैसी फिल्में शामिल थी। जहां उन्होंने देवी लक्ष्मी का किरदार निभाया। उसके बाद हनुमान पटल विजय और श्री गणेश महिमा जैसी फिल्मों में भी वो लगातार देवी देवताओं के रूप में दिखाई देने लगी। लेकिन हैरानी की बात सिर्फ यह नहीं थी कि वो किरदार कर रही थी। हैरानी की बात यह थी कि उन्होंने जिस सच्चाई, जिस श्रद्धा और जिस यकीन के साथ उन किरदारों को निभाया वो लोगों को चौंकाने लगा और पसंद आने लगा। बेबी मीना का फेस रिकॉग्नाइज होने लगा।

विनोद मेहता अपनी किताब में लिखते हैं कि सेट पर कई बार लोग यह भूल जाते थे कि वो हिंदू नहीं है। [संगीत] उनके हावभाव, उनकी भाषा, उनकी मौजूदगी सब कुछ इतना सहज होता था कि वो किरदार में घुल जाती थी। यह बात दर्शकों की नजर से भी छुपी नहीं रही। एक बार एक दर्शक ने फिल्म मैगजीन को चिट्ठी लिखकर सवाल किया। अगर मीना कुमारी हिंदू नहीं है तो वह बार-बार हिंदू देवियों के किरदार क्यों निभा रही हैं? लेकिन इस सवाल के पीछे जो असली जवाब था, वह आस्था में नहीं था। वो मजबूरी में था। क्योंकि उस वक्त हर किरदार, हर फिल्म सिर्फ एक चीज तय कर रही थी। घर का खर्च, शाम की रोटी। इन फिल्मों के बदले उन्हें पैसे मिलने लगे। पहली फिल्म से करीब ₹4,000 और धीरे-धीरे यह रकम ₹1,000 तक पहुंच गई। यही वह पैसे थे जिनसे उनके परिवार ने 1950 के आसपास अपनी पहली बड़ी चीज खरीदी। एक सेकंड हैंड प्लाई माउथ कार छोटी उम्र में मीना कुमारी ने गाड़ी चलाना सीख लिया। बांद्रा की सड़कों पर वह पुरानी प्लाई माउथ कार खुद चलाती थी। साल 1950 जब मीना कुमारी बेबी मीना नहीं रही थी। 18 साल की उम्र में वह अपने जिस्म, अपने एहसास और अपने अकेलेपन तीनों से वाकिफ हो रही थी। इसी दौर में एक दिन एक मैगजीीन के पन्ने पलटतेपलटते उनकी नजर एक तस्वीर पर आकर ठहरती है। तस्वीर थी कमाल अमरोहो की। वही कमाल अमरोवी जिनकी फिल्म महल उस वक्त की सबसे बड़ी कामयाबी मानी जा रही थी। कहते हैं उस तस्वीर को देखकर मीना कुछ देर तक वहीं रुक गई और जैसे उन्हें अचानक अपने ख्वाबों का चेहरा मिल गया। कुछ ही समय बाद किस्मत ने वो मुलाकात भी करवा दी।

फिल्म तमाशा के सेट पर जहां मीना काम कर रही थी। अशोक कुमार ने उनका परिचय कराया कमाल अमरोवी से। लेकिन यह मुलाकात वैसी नहीं थी जिसके सपने शायद मीना कुमारी ने अपने फर्स्ट क्रश के लिए देखे हो। अमरोवी ने बस उन्हें एक नजर देखा और खामोश रहे। मीना को यह एक तरह का गुरूर लगा। लेकिन उसी खामोशी में शायद एक जिज्ञासा एक क्यूरियोसिटी भी छुपी हुई थी। उसी शाम जब कमाल ने फिल्म के कुछ सीन्स देखे तो वो जाते वक्त अपने साथी से सिर्फ इतना बोले इस लड़की पर नजर रखना किसी फिल्म में इसे काम नहीं। मीना की कहानी में सबसे बड़ा मूड आता है फिल्म अनारकली का। कमाल अमरोगी इसे डायरेक्ट कर रहे थे। पहले इसमें हीरोइन का रोल मधुबाला को मिलने वाला था। लेकिन आखिरी वक्त पर उन्होंने मना कर दिया। उसी रात लगभग 9:00 बजे के आसपास कमाल अमरोवी ने अपने सेक्रेटरी बकर अली को अली बख्श के घर भेजा। उस वक्त अली बख्श अपने छोटे से गार्डन में बैठे थे और जैसे ही यह प्रस्ताव उनके सामने आया वो खुशी से भर उठे। वहीं थोड़ी दूर पर खड़ी मीना यह सब सुन रही थी, हल्की सी मुस्कान के साथ उन्हें उनके क्रश के साथ काम करने का मौका मिलने वाला था। 13 मार्च 1951 को मीना कुमारी ने अनारकली का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया। लेकिन इसके कुछ ही हफ्तों बाद अप्रैल 1951 में [संगीत] उन्हें टाइफाइड हो गया। हालत इतनी खराब हुई कि मीना के पिता को सुझाव दिया गया कि इन्हें हिल स्टेशन ले जाकर वहां पर अच्छी हवा और अच्छे एनवायरमेंट में रखा जाए। ऐसे में वह महाबलेश्वर गए और वहीं से लौटते वक्त एक भयानक एक्सीडेंट हो गया। उन्हें सैसन हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। हाथ बुरी तरह जख्मी था और डॉक्टरों को शक था कि वह शायद कभी ठीक से काम ना कर पाएं। यहीं से उनकी मोहब्बत की असली शुरुआत होती है। किसी फिल्म सेट पर नहीं बल्कि एक अस्पताल के कमरे में। 24 मई 1951 की एक उदास शाम जब मीना अपने भविष्य को लेकर टूट चुकी थी। उन्होंने अचानक अपने सामने कमाल अमरोहो को खड़ा पाया। वो आए चुपचाप हाल पूछा और उसी खामोशी में ही सब कुछ कह दिया। उसके बाद यह एक सिलसिला बन गया। हर हफ्ते कमाल अमरोवी सायन से पुणे आते। घंटों बैठते बातें कम होती लेकिन एहसास बहुत कुछ कहे जाते और जब मुलाकात नहीं होती तो खत लिखे जाते। इन्हीं मुलाकातों में एक दिन नाम भी बदल दिए गए। कमाल बन गए मीना के चंदन और मीना बन गई कमाल की मंजू। एक बार अमरोवी ने उनके हाथ पर अनारकली लिखा और उसके साथ मेरी यानी मेरी अनारकली जोड़ दिया। अस्पताल से निकलने के बाद यह रिश्ता और गहरा हो गया। रात 11:30 से सुबह 5:30 तक फोन पर बातें होने लगी। लेकिन यह मोहब्बत आसान नहीं थी क्योंकि एक दीवार हमेशा बीच में खड़ी थी। वह दीवार थी मीना के पिता अली बख्श की। मीना जानती थी कि उनके पिता इस रिश्ते को कभी मंजूर नहीं करेंगे। इसलिए एक फैसला लिया गया। चुपचाप बिना किसी शोर के निकाह करने का। 14 फरवरी 1952 की शाम वार्डन रोड पर एक क्लनिक के बाहर सब कुछ वैसा ही था जैसा हर दिन होता है। अली बख्श अपनी बेटियों को स्टूडियो के सेट पर छोड़कर चले गए। लेकिन उस दिन मीना और उनकी बहन ऊपर नहीं गई। वो एक दूसरी गाड़ी में बैठी और सीधा पहुंची उस जगह जहां कमाल और मीना का निकाह होना था। एक सादा सा कमरा एक काजी कुछ गवाह और बिना किसी शोरशराबे के महजबीन बानो और सैयद अमीन हैदर कमाल अमरोवी पतिप बन गए। कमाल उनसे उम्र में काफी बड़े थे। निकाह के बाद एक हल्का सा माथे पर चुमन लिया गया और फिर दोनों अपने-अपने रास्ते को लिए। मीना वापस उसी स्टूडियो के गेट पर लौटी और रात 10:00 बजे जब उनके पिता उन्हें लेने आए तो उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनकी बेटी की शादी हो चुकी है। मीना लगातार फिल्में कर रही थी मगर अब तक की एक बड़ी फिल्म आनी बाकी थी। वो फिल्म जो उन्हें मीना कुमारी बनाकर एस्टैब्लिश कर देती। साल 1952 मीना कुमारी के लिए वही साल था। जिंदगी एक अजीब दो राहे पर खड़ी थी। एक तरफ छुपी हुई शादी थी। दूसरी तरफ करियर का सबसे बड़ा मौका बैजू बावरा की शूटिंग चल रही थी और इसी फिल्म के दौरान एक ऐसा हादसा होता है जिसने उनकी जिंदगी लगभग खत्म कर दी थी। नदी के बीच नाव चलाने वाला सीन शूट हो रहा था। गाना था तू गंगा की मौज। सीन खत्म होने के बाद भी मीना नाव चलाती रही। जैसे पहली बार उन्हें किसी चीज में मजा आ रहा हो। लेकिन कुछ ही दूर एक झरना था जिसकी आवाज अब धीरे-धीरे उनके कानों तक पहुंच रही थी। किनारे से लोग इशारे कर रहे थे, चिल्ला रहे थे। लेकिन मीना इशारों को समझ नहीं पा रही। अचानक धारा तेज हो गई। नाव काबू से बाहर हो गई। उस पल उन्होंने आंखें बंद कर ली और अपने पिता से माफी मांगी। अपने शौहर को याद किया और खुद को मौत के हवाले कर दिया। लेकिन ठीक उसी वक्त नाव एक चट्टान से टकरा कर रुक गई। जब उन्होंने आंखें खोली तो सिर्फ 15 कदम दूर मौत खड़ी थी। वह बच गई। इसी हादसे के कुछ समय बाद बैजू बावरा रिलीज भी होती है और सब कुछ बदल जाता है। फिल्म सिर्फ हिट नहीं होती। वो एक सनसनी बन जाती है। सिल्वर जुबली डायमंड जुबली बनती है। हफ्तों तक थिएटर्स में लगी रहती है। लोग इसे बार-बार देखने जाने लगते हैं। गाने गलियों में गूंजने लगते हैं और अचानक बेबी मीना अब एक स्टार बन जाती है। वो मीना कुमारी बन जाती है। वही लोग जो कल तक शक कर रहे थे। अब उनके नाम पर फिल्में बेचने लगते हैं। यह सफलता सिर्फ तालियों की नहीं थी। पैसों की थी, कॉन्ट्रैक्ट्स की थी और उस पहचान की थी जिसने मीना को इंडस्ट्री में स्थाई कर दिया था। शादी को छुपाने की कोशिश ज्यादा दिन चली नहीं। कैसे खुला? इस पर कई कहानियां हैं। कोई कहता है रसोइए ने फोन पर बात सुन ली। कोई कहता है बहन से बात निकल गई। लेकिन एक दिन अली बख्श ने मीना से सीधे पूछा और उन्होंने सच-सच बता दिया। उस एक सच ने पूरे घर को हिला कर रख दिया। अली बख्श के लिए यह सिर्फ एक शादी नहीं थी। एक धोखा था। उन्हें लगा उनकी बेटी जिस पर वो पूरी तरह निर्भर है। जिनकी कमाई से उनका घर चल रहा है वो अब उनसे दूर जा रही है। घर का माहौल बदल गया। हर दिन ताने आने लगे। हर दिन एक इल्जाम होने लगा। साल 1953 आते-आते हालात और बिगड़ गए। कमाल अमरोवी चाहते थे कि मीना उनकी फिल्म दायरा में काम करें। लेकिन दूसरी तरफ मीना के पिता महबूब खान की फिल्म अमर को कमिटमेंट दे चुके थे। अली बख्श ने मीना से साफ कहा तुम सिर्फ अमर में काम करोगी। लेकिन इस बार मीना ने फैसला खुद लिया। कुछ दिन शूटिंग करने के बाद उन्होंने अमर का सेट छोड़ दिया और सीधे अपने पति के सेट पर पहुंची। यह फैसला सिर्फ एक फिल्म को लेकर नहीं था। यह अपने पिता और अपने प्यार के बीच किसी एक को चुनने का था। जब वो उस दिन काम करके घर लौटी तो दरवाजा बंद था अंदर से। अली बख्श ने दरवाजा खोलने से इंकार किया। मीना रोती रही और बाहर देर रात तक बैठी रही। मगर दरवाजा नहीं खुला। उनके पिता नहीं पिघले और फिर मीना वहां से उठी और बिना मुड़े अपनी राह चल पड़ी। मीना ने कमाल अमरोबी को फोन किया और कहा कि अब वो इस रिश्ते को और नहीं छुपा सकती। वो उनके घर आ रही हैं। मीना उनके कमरे में गई और उनकी अलमारी में अपनी साड़ियां टांगने लगी। बस इतना ही काफी था। कमाल भी मीना के आने से खुश थे। उस रात मीना ने अपने पिता को एक खत लिखा कि वह जा चुकी हैं और अब कुछ नहीं चाहती सिर्फ अपने कपड़े और किताबों के अलावा। उस दिन के बाद उनकी जिंदगी में एक और बदलाव आया। पहले उनके काम और पैसों का हिसाब अली बख्श रखते थे।

अब यह जिम्मेदारी कमाल अमरोवी के पास थी। बैजू बावरा की सफलता ने उन्हें स्टार बना दिया था। आगे चलकर जब पहले फिल्मफेयर अवार्ड्स रखे गए 1954 में तो बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड मीना कुमारी को ही मिला और यह अवार्ड सिर्फ पहली बार नहीं दूसरी बार भी उन्हें ही मिला। साल 1953 के बाद एक अजीब सी रफ्तार शुरू हुई। मीना कुमारी अब एक साथ चारप फिल्मों में काम कर रही थी। फुटपाथ हो, परिनीता हो, दायरा हो, दाना पानी हो, नौ लखाहार हो और यह सब भी एक ही सांस में पूरा हो रहा था। मीना 18-18 घंटे शूटिंग करती जैसे वो बचपन में किया करती थी। जब एक फिल्म जर्नलिस्ट ने उनसे पूछा कि यह सब कैसे मुमकिन है? वो इतनी मेहनत कैसे कर रही हैं? तो उन्होंने बहुत सादगी से कहा, “मैं सूरज निकलने से लेकर आधी रात तक काम करती हूं।” लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू यह भी था कि उनके काम का पूरा हिसाब किताब कमाल अमरोवी और उनके साथी बकर अली संभाल रहे थे। कौन सी फिल्म करनी है, कितने पैसे लेने हैं, कब शूटिंग करनी है, सब कुछ तय होता था। मीना बस एक ऐसी मशीन बन गई थी जो रुकती नहीं थी। पहले अपने पिता के लिए और अब अपने पति के लिए। पत्नी की बढ़ती शहरत देख कमाल ने कुछ शर्तें रखी। पहली शर्त थी शाम 6:30 बजे तक घर लौटने की। सिर्फ अपनी गाड़ी में सफर करने की, मेकअप रूम में किसी और मर्द के ना आने की और हर हरकत का हिसाब रखने की। मगर मीना कमाल से इतना प्यार करती थी कि उन्होंने इन शर्तों को भी अपना लिया। मगर जितना मीना त्याग कर रही थी, कमाल का शक उतना गहरा हो रहा था। साल 1955 तक मीना कुमारी अपने करियर के शिखर पर थी। परिनीता के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड मिला था। रोशनी, तालियां, कैमरे सब कुछ उनके पास था। उसी शाम अवार्ड फंक्शन खत्म हुआ और भीड़ के बीच से जल्दी निकलते हुए अपनी सीट पर एक सुनहरा पर्स फूल गई जो उनका था। पीछे खड़े कमाल अमरोवी उनके पति ने उसे देखा लेकिन उठाया नहीं। कुछ दिन बाद निम्मी नामक एक्ट्रेस ने मीना कुमारी को वो पर्स दिया। बात वहीं खत्म हो सकती थी। लेकिन घर पहुंचकर मीना ने कमाल से पूछा। चंदन आपको पता है वह पर्स कितना महंगा था? तो आपने उसे क्यों नहीं उठाया? जवाब आया ठंडा और सीधा। कमाल ने कहा मेरी इज्जत से ज्यादा महंगा नहीं था। एक छोटे से पल में एक बड़ी दराज साफ दिखाई देने लगी। यह सिर्फ एक पर्स नहीं था।

यह उस रिश्ते की एक झलक थी जहां मदद करना भी ईगो के तराजू में तोला जाने लगा था। इसी दौर का एक और वाक्या मुंबई के एरोस सिनेमा में एक भव्य प्रीमियर के दौरान हुआ। बड़े-बड़े लोग मौजूद थे। फिल्म इंडस्ट्री, समाज, सत्ता सब एक जगह मौजूद थी। मेजबान थे सौहरा मोदी और वहां पहुंचे हुए थे महाराष्ट्र के तबके राज्यपाल। उन्होंने बड़े गर्व से राज्यपाल से परिचय करवाया। यह है मशहूर अदाकारा मीना कुमारी और यह है उनके पति कमाल अमरोवी। बस यही एक लफ्ज़ अटक गया। कमाल अमरोवी ने तुरंत राज्यपाल से कहा, नहीं मैं कमाल अमरोवी हूं और यह मेरी पत्नी है। मशहूर फिल्म एक्ट्रेस मीना कुमारी। एक्टिव पैसिव वॉइस आपको लग सकती है। लेकिन मतलब उससे कहीं ज्यादा गहरा था। लहजा सीधा था लेकिन उसमें एक अजीब सी शक्ति थी और फिर वो मुड़कर चले गए पूरे हॉल पूरी फिल्म और मीना को पीछे छोड़कर उस रात एक स्टार अकेली बैठी थी अपनी ही दुनिया के बीच घर आकर मीना ने पूछा अगर आपको मेरे पति के तौर पर पेश भी किया गया तो उसमें गलत क्या था लेकिन कुछ सवालों के जवाब नहीं होते या फिर होते हैं तो बहुत भारी होते हैं। इन्हीं छोटी-छोटी बातों में एक रिश्ते का सच धीरे-धीरे सामने आने लगता है। 1950 और 60 के दशक तक मीना एक सक्सेसफुल एक्ट्रेस बन चुकी थी। उन्हें कार का शौक था जिसमें उनकी पसंदीदा थी शेवरले इम्पाला। उस दौर में इमामला खरीदने वाली वह पहली भारतीय अभिनेत्री थी। लेकिन अजीब बात यह थी कि इतनी बड़ी जिंदगी में भी कुछ चीजें बहुत छोटी-छोटी होकर रह जाती हैं। जिस दिन उन्होंने इम्पाला खरीदी तो कमाल अमरोवी ने साफ कह दिया तुम अपनी कार में स्टूडियो जा सकती हो। लेकिन अगर मेरे साथ कहीं जाना है तो मेरी कार में ही बैठना होगा। मीना ने कुछ नहीं कहा। वो अक्सर कुछ नहीं कहती थी और धीरे-धीरे यह कुछ नहीं कहना ही उनकी आदत बन गई और जब कहने के लिए आवाज कम पड़ी तो उन्होंने सहारा लिया अपनी कलम का। मीना कुमारी की शख्सियत का सबसे अनछुआ पहलू है उनके शायरा होने का। वो नास के नाम से शायरी करती थी। बचपन से ही उन्हें यह शौक था। लेकिन अब अल्फाज़ बदल गए थे। अब उनमें दर्द साफ दिखता था। एक ऐसा दर्द जो कैमरे के सामने नहीं था। कागज पर जिंदा था। आगाज तो होता है अंजाम नहीं होता जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता हंसहंस के जवा दिल के हम क्यों ना चुने टुकड़े हर शख्स की किस्मत में इनाम नहीं होता वो खुद कहती थी मैं जो एक्टिंग करती हूं उसमें कमी है वो मेरा नहीं है। किरदार किसी और का होता है लेकिन जो मैं लिखती हूं वो मेरा है।

और शायद पहली बार वो कुछ अपना बना रही थी। कुछ ऐसा जो उन्हें दर्द नहीं पहुंचा रहा था। उनका दर्द बांट रहा था। एक शाम एक मुशायरे में जब फिराग गोरखपुरी जैसे बड़े शायर मंच पर थे। अचानक खबर आई कि मीना कुमारी मुशायरा सुनने आ रही हैं। बस फिर क्या था? लोग शायरी छोड़कर उनकी एक झलक पाने के लिए उठ खड़े हुए। मुशायरा रुक गया। शायर मंच पर ही रह गए और भीड़ स्टार के पीछे चलने लगी। फिराग साहब ने यह देखा और खामोशी से उठकर जाने लगे। आयोजकों ने रोका। मीना खुद आगे बढ़ी। जनाब मैं आपको सुनने आई हूं। लेकिन फिराग गुस्से में थे। उन्होंने जवाब दिया मुशायरा मुजरा बन चुका है। मैं ऐसी महफिल का हिस्सा नहीं बन सकता। मीना चुप रह गई। उस दिन शायद उन्हें एहसास हुआ कि स्टारडम और अदब दोनों एक साथ खड़े नहीं होते। ये दोनों बहुत अलग-अलग दुनिया है। इसलिए मीना ने अपनी शायरी अपने जीते जी किसी को नहीं सुनाई। सिवाय एक शख्स के। वो शख्स थे गुलजार। गुलजार पर उन्हें इतना भरोसा था कि मरने से पहले उन्होंने गुलजार को अपनी 25 डायरियां दी थी। जिन्हें बाद में गुलजार ने उनके संकलन के रूप में तन्हा चांद के नाम से निकाला। जिसकी शुरुआत उन्होंने एक नज्म से की जिसे उन्होंने मीना कुमारी के लिए लिखा था। शहतूत की शाख पर बैठी मीना बुनती है रेशम के धागे। लम्हालम्हा खोल रही है पत्ता पत्ता बीन रही है। एक-एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन। एक-एक सांस को खोल के अपने तन पर लिपटाती जाती है। अपने ही धांगों की कैदी रेशम की यह शायर एक दिन अपने ही धागों में घुट कर मर जाए। गुलजार उनके एक सच्चे दोस्त थे। उनसे उनकी मुलाकात हुई थी 1964 में बेनज़र [संगीत] फिल्म के सेट पर। गुलजार उस वक्त एक असिस्टेंट डायरेक्टर थे और शायर थे। और शायद यही बात मीना को उनसे जुड़ गई। शूटिंग के बीच-बीच में दोनों बातें करते किताबों की, डायरी की, मीर की, गालिब की यह रिश्ता अलग था। ना इनमें कोई शोर था, ना कोई दावा था कुछ होने का। बस एक समझ थी सामने वाला सुन सकता है। जब मुलाकात नहीं होती तो फोन होता और इसी तरह मीना को पहली बार एक सच्चा दोस्त मिल चुका था। लेकिन उसके बाद वह हादसा होता है जो मीना की जिंदगी को बदल के रख देता है। विनोद मेहता मीना कुमारी पर लिखी ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं कि 1964 में फिल्म पिंजरे के पंछी के मोर शॉट का सीन था। मेकअप रूम के बाहर कमाल अमरोवी के सेक्रेटरी बकर अली ने सख्त हिदायत दी हुई थी कि मीना के कमरे में मीना के मेकअप रूम में कोई मर्द नहीं आएगा। जब मीना कुमारी को यह बताया गया तो वह चुप नहीं रही। उन्हें यह बहुत बुरा लगा। उन्होंने उसी वक्त गुलजार को बुलवाया। गुलजार दरवाजे की तरफ बढ़े लेकिन रास्ते में रोक लिए गए। बहस चली, धक्कामुक्की हुई और अचानक सबके सामने बकर अली ने मीना कुमारी को एक थप्पड़ मार दिया। कुछ सेकंड के लिए सब थम गया। मीना ने सिर्फ इतना कहा। क्या मैं कोई वैश्या हूं जो मेरे कमरे में ही सब कुछ तय होगा। उस दिन वो रोते हुए बाहर निकली और जाते-जाते बकर अली से बस एक बात कह गई। अमरोहोवी साहब से कह देना कि अब मैं घर वापस नहीं आऊंगी। मीरा उस दिन के बाद कभी कमाल के घर नहीं गई।

साल 1964 के ही आसपास फिल्म आती है। मैं भी लड़की हूं और उसके सेट पर एक अजीब सी जोड़ी बनने वाली थी बॉलीवुड की। एक तरफ मीना कुमारी थी जो अब तक इंडस्ट्री की सबसे बड़ी और सबसे महंगी अदाकाराओं में गिनी जाने लगी थी। दूसरी तरफ धर्मेंद्र थे, नए थे, अनगढ़ थे और भीतर से घबराए हुए थे। मगर जल्द ही मैन बनने वाले थे। धर्मेंद्र के लिए सिर्फ एक फिल्म नहीं थी। उनके सपनों का दरवाजा था क्योंकि सामने वही औरत खड़ी थी जिसे वह दूर-दूर से देखकर बड़े हुए थे। पहले ही कुछ दिनों में मीना ने उनकी घबराहट पकड़ ली। कैमरे के सामने धर्मेंद्र का चेहरा सख्त हो जाता। संवाद अटक जाते, डायलॉग्स भूल जाते। तब मीना हर सीन के पहले उन्हें एक तरफ ले जाती। धीरे-धीरे समझाती, रिहर्सल करवाती जैसे कोई हीरोइन नहीं बल्कि एक टीचर अपनी शागिर्द को तैयार कर रही हो। कई बार तो वह खुद डायलॉग बोलकर दिखाती और कहती अब वैसे नहीं अपने तरीके से कहो। धर्मेंद्र बाद में कहते भी हैं कि अगर उस वक्त मीना उनका हाथ ना पकड़ती तो शायद वह इतने सहज कभी नहीं हो पाते। लेकिन सेट के बाहर की कहानी कुछ और थी। मीना कुमारी जो कैमरे के सामने इतनी ठोस और संतुलित दिखती थी। असल जिंदगी में बिखर चुकी थी। घर टूट चुका था। शादी एक कैद में बदल चुकी थी। और अब उनके पास अपने दुख कहने के लिए कोई नहीं था। ऐसे में धर्मेंद्र से बातचीत उन्हें थोड़ी राहत देने लगी थी। वह घंटे बातों करती, कभी फिल्मों पर, कभी जिंदगी पर और कभी बिना किसी विषय के भी। यह रिश्ता धीरे-धीरे दोस्ती में बदला और दोस्ती तब सहारे में बदल गई। शायद दोनों को ही ठीक-ठीक पता नहीं चला। इसी बीच एक और खामोश कहानी चल रही थी। मीना को शराब की लत लग चुकी थी। मीना अब शराब से पी नहीं रही थी। उसे जी रही थी। सेट पर आने से पहले शूट के बाद शूट के दौरान अकेले में शराब उनके हर खालीपन को भरने की कोशिश कर रहा था। और सबसे कड़वी बात यह थी कि उनके अपने लोग ही उन्हें धोखा दे रहे थे। मीना कमाल का घर छोड़कर अपनी बहन के घर गई थी। जहां पर काफी रिश्तेदार रहते थे। उन रिश्तेदारों को जब वो शराब के लिए पैसे देती तो वो महंगी शराब की बजाय वहां पर सस्ती शराब मीना को पिला देते। मीना को यह बात पता थी लेकिन उन्होंने कभी भी किसी से कुछ नहीं कहा। शायद उनमें अब लड़ने की ताकत ही नहीं बची थी। एक बार की बात है दिल्ली में एक पार्टी के दौरान धर्मेंद्र काफी नशे में थे। उसी हालत में उन्होंने ज़िद पकड़ ली। मुझे बॉम्बे जाना है। मीना मेरा इंतजार कर रही है। अगले दिन अखबारों ने इस इश का ऐलान कर दिया। सुर्खियां बन गई। अफवाहें फैल गई और दोनों के रिश्ते को नाम दे दिया गया अफेयर। एक और किस्सा है। कुछ दोस्त पिकनिक पर गए हुए थे। लौटते वक्त धर्मवीन दूसरी कार में बैठ गए। शायद बिना सोचे शायद किसी और वजह से। लेकिन मीना के लिए यह छोटी सी बात छोटी नहीं थी। गेहूं उन्हें चुभ गई। रास्ते में शराब के नशे में और अंदर से भरे अकेलेपन के बीच उन्होंने अचानक गाड़ी रुकवाई। नीचे उतरी और सड़क पर बैठ गई। और फिर बस एक ही बात दोहराती रही। मेरा धर्म कहां है? मेरा धर्म कहां है? यह सवाल सिर्फ धर्मेंद्र के लिए नहीं था। यह सवाल उस हर चीज के लिए था जो उनसे छूटती जा रही थी। रिश्ते, भरोसा, घर खुद वो भी। लोगों ने इसे भी गसिप बना दिया। अखबारों और मैगजीनंस ने इसे सनसनी बनाकर पेश किया। धीरे-धीरे मीना की जिंदगी एक ऐसे चक्कर में फंस गई जहां दिन शूटिंग में गुजरता और रात शराब में ना खाने का होश रहता ना सोने का। वो बस चल रही थी लगातार जैसे कोई मशीन हो जिसे रुकने की इजाजत ही नहीं है।

उनकी तबीयत दिन-बदिन बिगड़ने लगी और इसी दौर में वो फिल्म आई जिसकी कीमत उन्होंने अपनी जान देकर चुकाई। साल 1958 में पाकीजा की शुरुआत हुई थी। एक ऐसी फिल्म जिसे कमाल अमरोवी से बना नहीं रहे थे बल्कि जी रहे थे। उनका ड्रीम प्रोजेक्ट थी। तब दोनों साथ में रहते थे। कमाल अमरोवी और मीना कुमारी। आधी फिल्म शूट भी हो चुकी थी ब्लैक एंड वाइट में। लेकिन वक्त बदला सिनेमा रंगीन हुआ और कमाल ने ठान लिया कि पाकीजा अब नई सिरे से बनाई जाएगी। कलर फिल्म की शूटिंग शुरू भी हो गई। मगर साल आया 1964 और इस बार फिल्म नहीं जिंदगी टूट गई। मीना और कमाल अलग-अलग हो गए। सेट्स उन्हें पड़ गए। फिल्म रुक गई और वो खाक जो इतने करीब था अधूरा छूट गया। कहानी शायद यहीं खत्म हो जाती। अगर एक दिन दो लोग उस अधूरी फिल्म की कुछ रील्स ना देखते। कहते हैं एक दिन सुनील दत्त और नरगिस ने पाकीजा के शूट किए हुए कुछ हिस्से देखे। कुछ देर तक खामोशी रही। फिर उन्होंने कमाल अमरोही से सिर्फ एक बात कही। यह फिल्म इतिहास रचने वाली है। इसे अधूरा मत छोड़िए। प्लीज बनाइए। शायद यह वही धक्का था जिसकी इस कहानी को जरूरत थी। 25 अगस्त 1968 को कमाल अमरोवी ने मीना कुमारी को एक खत लिखा और कहा तुम अगर इस शर्त पे पाकीजा करने के लिए तैयार हो जाओ कि मैं तुम्हें तलाक दे दूं तो मुझे यह भी मंजूर है इस फिल्म को बनाने में कई लोगों की जिंदगियां जुड़ी इसे पूरा करने में मेरी मदद करो। यह सिर्फ एक फिल्म की बात नहीं थी। दो लोगों के बीच आखिरी बातचीत के जैसा था। कुछ महीनों बाद जवाब आया। पाकीजा मेरे दिल के बहुत करीब है। मैं यह फिल्म जरूर करूंगी और मेहनताने के तौर पर मैं आपसे सिर्फ एक सिक्का लूंगी। 16 मार्च 1969 को मीना फिर से पाकीजा के सेट पर लौटती। शुरुआत होती है मौसम है आशिकाना गाने को शूट करने से लेकिन अब सब कुछ बदल चुका था। अब मीना का शरीर शराब के नशे की वजह से पहले की तरह नहीं रहा था। शरीर साथ नहीं दे रहा था। बीमारी ने भीतर से खोखला कर दिया था। पेट फूल चुका था। कमजोरी इतनी थी कि खड़े रहना मुश्किल था। उस गाने में उनके पेट को छुपाने के लिए सलवार की जगह लुंगी पहनाई जाती है। जो मजबूरी थी वही बाद में फैशन बन जाती है। एक दिन शूटिंग के दौरान वो डांस करते-करते बेहोश होकर गिर पड़ी। हालत इतनी नाजुक थी कि हर शॉट के बाद एक कुर्सी उनके पीछे खड़ी रहती ताकि वह गिरने से पहले बैठ सके। फिर भी शूटिंग रोकी नहीं गई। लगातार शूटिंग कराई गई। विनोद मेहता मीना कुमारी या क्लासिकल बायोग्राफी में एक किस्से का जिक्र करते हैं। कहते हैं कमाल अमरोवी हर सीन को परफेक्टली शूट करना चाहते थे। ऐसा ही एक सीन था जहां मीना को पहाड़ से नीचे दौड़ना था। मीना पहले से ही बहुत बीमार थी। मगर कमाल परफेक्ट टेक के चक्कर में मीना से 20 से 25 रिटेक करवाते हैं। मीना बीमारी की हालत में पहाड़ से नीचे दौड़ती रहती है। कुछ लोग इसे कमाल की परफेक्शन कहते हैं कुछ बेरुखी। लेकिन सच यह है कि अब उनके बीच रिश्ता था ही नहीं। एक अधूरी फिल्म थी जिसे पूरा करना था। मीना का शरीर वैसा नहीं था जैसा 1958 में फिल्म की शुरुआत के दौरान था। उनका पेट फूल आया था। लीवर साइरोसिस से वो जूझ रही थी। हीरो भी वक्त के साथ बदल गए। पहले अशोक कुमार थे। फिर सोचा गया धर्मेंद्र को लिया जाए। लेकिन कमाल को धर्मेंद्र से जलन थी। अफवाहें सुनी थी उन्होंने। सो यह रास्ता बदल दिया गया। आखिरकार राजकुमार आए जो खुद बहुत बड़े स्टार थे। लेकिन मीना के सामने आकर अक्सर अपने डायलॉग्स भूल जाते। बीमारी बढ़ती जा रही थी। लंदन में इलाज हुआ। डॉक्टरों ने आराम की सख्त सलाह दी। लेकिन मीना घर लौटते ही काम पर आ गई। अपने आखिरी दिनों में अभिलाषा की शूटिंग उन्होंने अपने घर पर ही की। अपने दोस्त और अभिनेता सावन कुमार की फिल्म गोमती के किनारे को बनाने के लिए अपना बंगला तक उन्होंने बेच दिया ताकि फिल्म पूरी हो सके। और हर बार जब कोई उनकी हालत देखकर डर जाता तो मुस्कुरा कर कहती तुम्हारी फिल्म होने से पहले मैं कहीं नहीं जाऊंगी। यह एक वादा था और वो उसे निभा भी रही थी। 4 फरवरी 1972 मराठा मंदिर मुंबई पाकीजा का प्रीमियर रखा जाता है। मीना सफेद कपड़ों में वहां पहुंचती है। बेहद कमजोर थी। बीमारी से जूझ रही थी लेकिन आंखों में शांति थी। जैसे कोई अपना सबसे बड़ा अधूरा काम पूरा कर चुका हो। फिल्म रिलीज हुई और इतिहास बन जाती है। डायमंड जुबली बनती है। लेकिन उसी इतिहास की कीमत चुकाई जाती है एक जान से। रिलीज के कुछ ही समय बाद मीना पूरी तरह बिस्तर पर आ जाती। शरीर जवाब दे चुका था। दर्द अब हर हरकत में था। हर सांस में था। लेकिन जब कोई मिलने आता तो वो मुस्कुरा कर कहती, “मुझे दर्द की वजह से रोने में शर्म महसूस होती है।” मैं मरने के लिए तैयार हूं। और फिर आता है 25 मार्च 1972 जब मीना बीमारी की हालत में अपनी बहन से कहती हैं आपा शायद यह सही वक्त है। मेरे पास कोई अधूरा काम नहीं है। कमाल साहब की पाकीजा पूरी हो गई। प्रेम जी की फिल्म दुश्मन और सावन कुमार की फिल्म गोमती के किनारे भी पूरी हो चुकी है। अब कोई यह नहीं कहेगा कि मीना अपना काम पूरे किए बिना चली गई। मैं आपके लिए और आपके बच्चों के लिए जितना भी कर सकी वह मैंने किया है। अब मैं मरने के लिए पूरी तरह तैयार हूं। 4 साल की उम्र से लेकर अपने जीवन के आखिरी क्षणों तक मीना फिल्मों के लिए काम करती रही। कभी अपने पिता के लिए, कभी अपने पति के लिए और कभी आखिर में खुद की जरूरतों को पूरा करने के लिए। 26 मार्च 1972 रविवार का दिन था। मीना कुमार की तबीयत अचानक बिगड़ती है। घर में बेचैनी छा जाती है। डॉक्टर को बुलाया जाता है। बहन खुर्शीद कमाल अमरूरी को फोन करती है। सबको अंदाजा लग जाता है कि अब ये बीमारी नहीं रही है। यह इंतजार है जो खत्म होने वाला है। मगर जब बीमारी अपने चरम पर थी, मीना कुमारी ने एक छूटा हुआ काम पूरा करने के बारे में सोचा। फिल्म दुश्मन का एक सीन बाकी था दुल्हन वाला सीन। मेकर्स उन्हें देखने अस्पताल आए तो उन्होंने सीधा कहा सीन यहीं कर लेते हैं अस्पताल के बेड पर। सब ने मना किया लेकिन मीना नहीं मानी। वो किसी काम को अधूरा छोड़कर नहीं जाना चाहती थी।

उन्हें यह डर था कि कहीं उनसे कोई पूछ ना ले कि तुम एक शूट किए बिना आ गई। और फिर वही हुआ जो शायद हिंदी सिनेमा का सबसे अजीब सबसे दर्दनाक शूट था। एक दुल्हन अस्पताल के बिस्तर पर कैमरा चालू हुआ। डायलॉग्स पूरे हुए और यही उनका आखिरी शॉट बन गया। अपने जीवन के आखिरी क्षणों तक भी मीना काम करती रहीं। दर्द के बीच भी मीना का हिसाब साफ था। उन्होंने अस्पताल जाने से पहले अपनी बहन से पूछा था हमारे पास कितने रुपए हैं? जवाब आया था सिर्फ 100। जवाब सुनकर मीना ने कहा था इतने कम पैसों में हम इस महंगे नर्सिंग होम में कैसे रहेंगे? फिर अचानक उन्हें याद आया कि फिल्म दुश्मन की फीस अभी बाकी है। उन्होंने तुरंत प्रोड्यूसर प्रेम जी को फोन करवाया। उनकी हालत सुनकर बिना एक पल गवाए प्रेम जी ने ₹10,000 भिजवा दिए। उसी दिन मीना आखिरी बार सजी। धीरे-धीरे बालों में कंघी गई। अपने कमरे को देखा और ताला लगाते हुए कहा मेरे मरने के बाद मुझे पहले इसी कमरे में लाना और फिर ताला लगा देना। 30 मार्च की रात अचानक कमरे नंबर 26 से एक चीख आई। खुर्शीद भागते हुए पहुंची। मीना ने उन्हें देखकर कहा, आपा मैं मरना नहीं चाहती। मुझे बचा लो। अगले ही पल उनका सर एक तरफ ढल गया। शरी ने जवाब दे दिया था। वह कोमा में चली गई थी। अगले दिन शुक्रवार था, गुड फ्राइडे था। दोपहर के करीब 3:25 पर एक गहरी सांस के बाद सब कुछ थम गया। कहते हैं आखिरी पलों में उन्होंने एक झटके से आंख खोली। कमरे में मौजूद लोगों को देखा और फिर हमेशा के लिए आंखें बंद कर ली। उनके पास उनकी बहन थी खुर्शीद और मधु। कमाल अमरोवी भी वहीं मौजूद थे। लेकिन मौत के बाद भी सुकून कहां मिलना था। अस्पताल का बिल चुकाने के लिए परिवार के पास उनकी बहनों के पास पैसे नहीं थे। मीना सख्त हिदायत देकर गई थी कि कमाल अमरोवी से ₹1 भी नहीं लेना है। उसी वक्त एक डॉक्टर करीब ₹3500 की उनकी फीस भरकर चला जाता है ताकि मीना को आखिरी विदाई दी जा सके। शाम 7:00 बजे उनका पार्थिव शरीर घर लाया गया। बाहर हजारों लोग इंतजार कर रहे थे आखिरी विदाई देने के लिए। रात तक उन्हें मक्का से मंगाए गए कफ़न में दफनाया गया। रहमताबाद कब्रिस्तान मजगांव मुंबई में। उनकी कब्र पर वही लाइन लिखी गई जो उन्होंने खुद चुनी थी।

शी एंडेड लाइफ वि अ ब्रोकन फिडल विथ अ ब्रोकन सॉन्ग विथ अ ब्रोकन हार्ट बट नॉट अ सिंगल रिग्रेट। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे कड़वा सबसे सच्चा आखिरी शब्द एक चिट्ठी में आया जब नरगिस की तरफ से जिसका जिक्र हमने पहले शुरुआत में किया था। मीना मौत मुबारक हो। मैंने कभी किसी को मौत की बधाई नहीं दी। लेकिन आज तुम्हें देती हूं। तुम्हारी बाजी तुम्हें तुम्हारी मौत पर मुबारकबाद कहती है और दुआ करती है कि तुम फिर कभी इस दुनिया में कदम मत रखना। यह दुनिया तुम जैसे लोगों के लिए नहीं है। यह थी ट्रेजडी क्वीन की कहानी मीना कुमारी की कहानी। उनकी कहानी को इस वीडियो में खत्म करते हैं उनकी एक गजल से। चांद तन्हा है आसमा तन्हा। दिल मिला है कहां-कहां तन्हा। बुझ गई आज छुप गया तारा। थरथराता रहा धुआ तन्हा। जिंदगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तन्हा है और जा तन्हा हमसफर कोई अगर मिले भी कहीं दोनों चलते रहे यहां तन्हा जलती बुझती सी रोशनी के परे सिमटा सिमटा सा एक मका तन्हा राह देखा करेगा सदियों तक छोड़ जाएंगे यह जहां तन्हा आपको वीडियो कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं कोई सुझाव हो तो आप हमें अमन@ kg.com पर भेज भेज सकते हैं। सुझाव, कविता, कोई लेख जो भी आप इस शो के बारे में बताना चाहे इस वीडियो को आपके लिए रिकॉर्ड कर रहे थे सर्वेश। बाकी खबरों के लिए जुड़े रह खबर गांव के साथ।

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