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भगत सिंह की मां को देख क्यों फूट-फूट कर रोए थे मनोज कुमार? फिर अपनी पूरी कमाई कैसे दांव पर लगा दी?

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एक दिन अभिनेता मनोज कुमार स्वतंत्रता सेनानी शहीद भगत सिंह की माता (विद्यावती कौर) से मिलने उनके घर गए थे। जब भगत सिंह की मां ने मनोज कुमार को देखा, तो उन्होंने तुरंत कहा, “अरे, यह तो मेरे भगत जैसा ही लगता है।” यह सुनकर मनोज कुमार ने भगत सिंह की मां की गोद में अपना सिर रख दिया, जिसके बाद वे दोनों फूट-फूट कर रो पड़े।इस घटना ने मनोज कुमार के दिल पर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि उन्होंने ठान लिया कि वह भगत सिंह के जीवन पर एक फिल्म बनाएंगे। इस फिल्म को बनाने का उद्देश्य पैसे कमाना नहीं, बल्कि दुनिया को भगत सिंह की महान कहानी बताना था।

इस फिल्म के निर्माण के लिए मनोज कुमार ने अपनी जीवनभर की पूरी कमाई (सर्वस्व) दांव पर लगा दी थी। उन्हें इस बात का भी जोखिम था कि फिल्म फ्लॉप होने पर वे पूरी तरह बर्बाद हो सकते हैं, लेकिन देशप्रेम के जज्बे के आगे उन्होंने पीछे कदम नहीं हटाए। आगे चलकर उनकी यह ऐतिहासिक फिल्म ‘शहीद’ (1965) बनकर तैयार हुई, जिसने देश के युवाओं में देशभक्ति का अभूतपूर्व जोश भर दिया और इस फिल्म के लिए मनोज कुमार को राष्ट्रीय पुरस्कार (National Award) से भी सम्मानित किया गया।

मनोज कुमार और शहीद भगत सिंह के परिवार के इस भावनात्मक रिश्ते और फिल्म ‘शहीद’ के निर्माण से जुड़े कुछ और दिलचस्प और विस्तृत पहलू नीचे दिए गए हैं:जब मनोज कुमार ने भगत सिंह की मां को दिया था ‘बेटे’ का अहसासभगत सिंह की मां विद्यावती कौर से मिलने के बाद मनोज कुमार के मन में क्रांतिकारी शहीदों के प्रति सम्मान और भी अधिक गहरा हो गया था। जब उन्होंने फिल्म ‘शहीद’ बनाने का फैसला किया, तो यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। उस दौर में देशभक्ति पर बनी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर चलेंगी या नहीं, इसे लेकर ट्रेड पंडितों में काफी संशय रहता था।

इसके बावजूद मनोज कुमार ने इस प्रोजेक्ट को अपने दिल के बेहद करीब रखा।फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम करने से लेकर इसके हर एक सीन को शूट करने तक, मनोज कुमार ने पूरी ईमानदारी बरती। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि फिल्म में भगत सिंह के त्याग, उनकी विचारधारा और उनके बलिदान को पूरी सच्चाई के साथ दिखाया जाए, न कि सिर्फ फिल्मी मसाला परोसा जाए।जब फिल्म बनकर तैयार हुई और सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो इसने इतिहास रच दिया। 1965 में आई इस फिल्म ने पूरे देश में देशभक्ति की एक ऐसी लहर दौड़ाई कि सिनेमाघरों के बाहर युवाओं की लंबी कतारें लग गईं।

लोग भगत सिंह की शहादत को याद कर सिनेमाघरों में ही रोने लगे थे।इस फिल्म की सफलता ने मनोज कुमार को रातों-रात एक साधारण अभिनेता से नेशनल सुपरस्टार बना दिया। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म और पटकथा (Screenplay) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार (National Award) से सम्मानित किया गया। खास बात यह थी कि मनोज कुमार पहले ऐसे अभिनेता और फिल्मकार बने जिन्हें फिल्म की कहानी और लेखन के लिए नेशनल अवार्ड मिला था।भगत सिंह की मां के साथ हुई उस मुलाकात की प्रेरणा से बनी यह फिल्म आज भी भारतीय सिनेमा के इतिहास में देशभक्ति की सबसे बेहतरीन मिसाल मानी जाती है।

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