[संगीत] प्यार दीवाना होता है, मस्ताना होता है। श्याम मस्तानी मदहोश किए जा। आज हम बात करेंगे एक ऐसी खूबसूरत एक्ट्रेस के बारे में जिनको बंगले के पीछे ऐसा कांटा लगा कि वो सबसे कहने लगी। बंगले के पीछे बंगले के पीछे तेरी बेरी के नीचे हाय रे पिया। ए गाड़ी स्टार्ट कर। एक ऐसी फेमस एक्ट्रेस जिसके प्यार में पड़कर शशि कपूर उनको याद में खत लिख रहे थे। लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में हजारों रंग के नजारे। इस एक्ट्रेस की फिल्में इतनी हिट पर हिट होती थी कि उसका नाम ही लोगों ने हिट गर्ल रख दिया था। क्या बात कर रहा है? वो एक्ट्रेस जो अपने हीरो से मिलने के लिए मंदिर का बहाना बनाती थी। मैं तुझसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने। तो हम बात कर रहे हैं 60 70 और 80 के दशक की सबसे खूबसूरत और हिट पे हिट फिल्में देने वाली एक्ट्रेस आशा पारिक की। साथिया मैंने माना कि जीना लगे। आखिर क्यों आशा पारिक ने दिलीप कुमार के साथ कभी भी काम नहीं की? जहां हर एक्टर आशा के प्यार में पड़कर शादी करने के लिए लाइन में लगा हुआ था, तो वहीं आशा ने सभी एक्टर्स को निराशा करते हुए एक शादीशुदा दो बच्चों के बाप के प्यार में पड़ गई। क्या बात कर रहा है? आखिर क्यों धर्मेंद्र ने आशा पारेक से डर कर शराब छोड़ दी। जिस एक्ट्रेस से शादी के लिए बड़े-बड़े एक्टर डायरेक्टर पागल थे, तो वहीं आशा ने शादीशुदा फिल्म प्रोड्यूसर नासिर हुसैन को अपना दिल दे बैठी और उनका घर तोड़ने के बजाय जिंदगी भर अकेली रही। लो आ गए उनकी याद वह जिंदगी भर अपने मन को दबाकर कुंवारी ही रह गई। आज आशा पारे कहां है
और किस हाल में है जानेंगे और भी बहुत कुछ। आप बस दिल थाम कर बैठ जाइए और इस वीडियो को एक लाइक कर दीजिए। तो चलिए शुरू करते हैं आशा पारिक की कहानी। राजा किसी दोस्तों आशा पारिक का जन्म 1942 को गुजरात के एक छोटे से शहर में हुआ था और वह तारीख थी 2 अक्टूबर। एक और चीज हुई थी 2 अक्टूबर को। हां मालूम है महात्मा गांधी का जन्म और दृश्यम मूवी का वो कांड वाला दिन। आशा पारिक का जन्म हिंदू मुस्लिम के मिलाप से हुआ था। उनके पिता का नाम था बाचू भाई पारेक और मां का नाम था सलमा जो शादी के बाद सुधा पारेक बन गई थी। आशा बचपन से डॉक्टर बनने के सपने देखती थी। लेकिन उनकी मां ने उन्हें समझाया कि तुम्हारा जन्म लोगों की दिल की धड़कन को चेक करना नहीं बल्कि लोगों की धड़कन को बढ़ाने के लिए हुआ है। कितने शानदार विचार रखते हैं। बचपन में आशा को डांस का बड़ा शौक था। इसलिए उनकी मां ने बचपन से ही अपनी बेटी को कत्थक डांस की शिक्षा दिलवाई। जब आशा ने बचपन से ही डांस करना सीखा तो छोटी सी ही उम्र से वह एक बेहतरीन क्लासिकल डांसर बन चुकी थी और कई बड़े-बड़े प्रोग्राम में डांस करने लगी। पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठा। और इसी तरह एक स्टेज पर डांस करते हुए उन पर फिल्म डायरेक्टर विमल रॉय की नजर पड़ गई थी। और उन्होंने आशा को एक चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर अपने फिल्म में साइन कर लिया। 1952 में आई फिल्म मां में पहली बार आशा ने एक बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी। हालांकि आशा की मां को ना तो फिल्म पसंद आई और ना ही बेटी का काम। लेकिन फिल्म डायरेक्टर्स की नजर में वह आ चुकी थी
और उनको फिल्मों में चाइल्ड एक्ट्रेस के तौर पर ऑफर मिलने लगे थे। झूला झूले सखियां झूला झूले सखियां के घर आजा बालम हमारे आशा पारिक ने बाप बेटी आसमान ज्वाला अयोध्यापति चैतन्य महाप्रभु जैसी कई फिल्मों में बाल कलाकार के तौर पर एक के बाद एक लगभग आठ से भी ज्यादा फिल्मों में नजर आ चुकी थी लेकिन आशा की मां नहीं चाहती थी कि आशा इतनी छोटी सी उम्र में फिल्मों में काम करें और अपनी पढ़ाई लिखाई को कोने में रख दे। उसने आशा से कहा कि पहले अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी करो और फिर हीरोइन बनने के सपने देखना। बात तो सही है। तो आशा ने आखिरी बार अपने ही नाम की फिल्म आशा में काम किया और फिर इसके बाद आशा ने फिल्मों से दूरी बना ली और अपनी पढ़ाई लिखाई करने लगी। नहीं मैं समझा आप भी पढ़ रही हैं। लेकिन अब उन्हें फिल्मों में मजा आने लगा था। उनके दिलो दिमाग में हीरोइन बनने का कीड़ा जाग चुका था। जैसे ही आशा की शुरुआती पढ़ाई लिखाई पूरी हुई और वह 16 साल की हुई तो उनसे रहा नहीं गया और उसने सोच लिया कि जब सपना पर्दे पर नाचने से ही पूरा होना है तो मैथ, साइंस और इंग्लिश सीखने का कोई फायदा नहीं है। बात तो सही है। तो उन्होंने पढ़ाई लिखाई छोड़ दी और हीरोइन बनने के लिए निकल पड़ी। उनकी किस्मत अच्छी रही और उन्हें एक साथ तीन फिल्मों में काम करने का मौका मिला। उन्होंने सबसे पहले राजेंद्र कुमार के साथ फिल्म गूंज उठी शहनाई में काम किया। हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं। फिल्म की शूटिंग शुरू हुई लेकिन तीन-चार दिन की शूटिंग के बाद ही डायरेक्टर ने उन्हें यह कहकर फिल्म से बाहर कर दिया था कि तुम में वह हीरोइन वाली अदाकारी नहीं है और फिर आशा की सारी आशाओं का दीपक बुझ गया। यह खबर जैसे ही इंडस्ट्री में फैली कि आशा एक्टिंग में कच्ची है और वह इतनी खराब एक्टिंग करती है कि उन्हें अपनी पहली ही फिल्म से बाहर कर दिया गया तो यह सुनकर डायरेक्टर उन्हें उनकी दूसरी दो फिल्मों से भी बाहर कर दिया और आशा की ऐसी आशा टूटी कि उनके दिल से बस यही निकला। दिल के अरमा आंसुओं में रह गए। लेकिन आशा ने हार नहीं मानी और दूसरे डायरेक्टर के घर ऑफिस के चक्कर लगाने लगी और तभी उनकी मुलाकात हुई आमिर खान के चाचा नासिर हुसैन से और उन्होंने आशा को देखते ही अपना दिल दे दिया भाई और अपने फिल्म में साइन कर लिया। फिल्म का नाम था दिल दे के देखो। दिल देखो दिल देखो दिल देके देखो जी। और इस तरह 1959 में आशा पारिक ने शमी कपूर के साथ एक हीरोइन के तौर पर अपनी फिल्मी करियर की शुरुआत की। यह फिल्म बड़ी हिट हुई मगर इस फिल्म के सिंगर को जब गाने का कोई अच्छा लिरिक्स नहीं मिला तो गायक ने दो के पहाड़े को ही गाना बना दिया। दो एकम दो दूनी चार थोड़ा थोड़ा दे दे मेरे दिल को करार। कमाल की बात यह थी कि आशा केवल 16 साल की एक्ट्रेस थी। वहीं उनके हीरो शमी कपूर उनके बाप की उम्र के थे और आशा से लगभग 25 साल बड़े थे। यह तो लेटेस्ट न्यूज़ है। एक और कमाल की बात यह थी कि शूटिंग के दौरान श्म कपूर की पत्नी आशा को अपनी बेटी की तरह तैयार करती थी, और आशा पारिक भी श्मी कपूर को अंकल कहती थी। वो अलग बात है कि फिल्म में दोनों हीरो हीरोइन थे और रोमांस कर रहे थे। हमारे यहां ऐसा ही होता है। मतलब पहली ही फिल्म में आशा ने अपनी बाप की उम्र के हीरो के साथ रोमांस किया और यह फिल्म आशा के जन्मदिन के मौके पर रिलीज़ किया गया था। यानी कि 2 अक्टूबर को। एक और चीज हुई थी 2 अक्टूबर को। हां, पता है यार। इसके बाद 1960 में आशा सुनील दत्त की हीरोइन बनी। फिल्म आई हम हिंदुस्तानी। यह फिल्म बड़ी हिट हुई और जब सुनील दत्त ने यह गाया नए दौर में दिखेंगे मिलकर नई कहानी। हम हिंदुस्तानी। तो यह गाना इतना बड़ा हिट हुआ कि आज भी इसे 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन देशभक्ति के गाने के रूप में बजाया जाता है। नया खून है नई उमंगे अब है नई जवानी हम हिंदुस्तानी। इसके बाद आशा की फिल्म आई घूंघट और यह फिल्म भी बड़ी हिट हुई। 1961 में आशा पारख जुबली कुमार यानी कि राजेंद्र कुमार की हीरोइन बनी। मूवी का नाम था घराना। हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं और इस फिल्म ने भी सफलता के झंडे गाड़ दिए। फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए और राजेंद्र कुमार के साथ आशा की जोड़ी ने गजब कर दिखाया। फिल्म में रामायण कथा की मंथरा भी थी जो नाराज बैठी हुई थी और उनके पोते उसे कुछ इस तरह से मना रहे थे। दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ। यह फिल्म इतनी बड़ी हिट हुई थी कि इसे कई हफ्तों तक थिएटरों में चलाया गया था। इसके बाद आशा एक बार फिर से सुनील दत्त की हीरोइन बनी और मूवी आई छाया। इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा कि मैं एक बादल आवारा। और इस फिल्म का यह गाना ऐसा था जो दुख और सुख दोनों सिचुएशन में सुना जाता था। इसके बाद आशा ने कहा जब प्यार किसी से होता है। फिर मनोज कुमार ने आशा से कहा अपना बनाकर देखो। मतलब पहले के जमाने में फिल्म के नाम ऐसे रखे जाते थे जैसे कोई हीरो हीरोइन एक दूसरे से बात कर रहा हो। अच्छा तो हम चलते हैं। फिर कब मिलोगे? इसके बाद भरोसा, बिन बादल बरसात, मेरी सूरत, तेरी आंखें, फिर वही दिल लाया हूं। जिद्दी, मेरे सनम, तीसरी मंजिल जैसे कई बेहतरीन फिल्मों में आशा पारिक ने काम किया। और आशा पारिक हर किसी की चहती एक्ट्रेस बन गई थी। पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठा। 1966 में आशा पारिक ने धर्मेंद्र के साथ काम किया। मूवी का नाम था आए दिन बहार के और यह फिल्म भी बड़ी सुपरहिट हुई। जब तक फूल बन के इसके कुछ गाने भी बेहतरीन रहे और आशा पारिक ने हर किसी का दिल जीत लिया था। इसके बाद मनोज कुमार के साथ उन्होंने दो बदन में काम किया। फिर राजेश खन्ना के साथ बहारों के सपने फिल्म आई। जा पिया तोहे प्यार तुम ओ गोरी भैया यह राजेश खन्ना की दूसरी फिल्म थी और इस समय तक राजेश खन्ना को कोई भी नहीं जानता था। लेकिन आशा पारिक के साथ काम करके राजेश खन्ना भी बड़े एक्टर बन गए थे। ओ मेरे दिल के चैन। 1967 में ही मनोज कुमार की एक बेहतरीन फिल्म आई उपकार और इस फिल्म में आशा पारिक ने गजब का काम किया। यह वो फिल्म थी जिसे नेशनल अवार्ड मिला। मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती। मेरे देश की धरती क्योंकि इसे लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर बनाया गया था। तलवार की नोक पर या एटम बम के डर से कोई हमारे देश को झुकाना चाहे यह देश हमारा दबने वाला नहीं। इसके बाद आशा पारिक ने फिर से धर्मेंद्र के साथ काम किया। मूवी का नाम था शिखर और यह फिल्म भी ब्लॉकबस्टर साबित हुई। पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठा। इसके गाने भी बहुत हिट हुए। इसके बाद कन्यादान, साजन, चिराग जैसी कई फिल्में आई। इसके बाद आई आया सावन झूम के और धर्मेंद्र के साथ एक बार फिर से आशा ने सबको एंटरटेन किया। साथिया नहीं जाना के जी ना लगे। यह फिल्म बड़ी हिट हुई और खासकर इसके गाने। इसके बाद प्यार का मौसम और महल जैसी फिल्में भी ठीक-ठाक रही। 1970 में आशा पारिक ने राजेश खन्ना से कहा, आन मिलो सजना और फिल्म ब्लॉकबस्टर हो गई। तेरे कारणन तेरे कारणन तेरे कारणन मेरे साजन और इसके गाने आज भी लोग ओल्ड इज गोल्ड कह कर सुनते हैं और जब आशा पारिक ने यह कहा अच्छा तो हम चलते हैं तो राजेश खन्ना ने भी पूछा फिर कब मिलोगे और इस गाने ने प्रेमी जोड़ों में खुशी का माहौल बना दिया था। यह फिल्म हिट हुई तो आशा ने राजेश खन्ना के साथ एक और फिल्म में काम किया। मूवी का नाम था कटी पतंग। जिंदगी है क्या एक कटी पतंग और शायद ही कोई होगा जिसने राजेश खन्ना और आशा पारिक की कटी पतंग ना देखी हो चाहे भीगे तेरी चुनरिया चाहे भीगे रे चोली खेलेंगे कैसी अपमानजनक बातें कर रहा है लड़का ये यह फिल्म इतनी बड़ी हिट हुई थी कि आज भी इसे आशा की सबसे बेहतरीन फिल्म माना जाता है मस्त सानी मदोश किए जा और इस मूवी के गाने की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम लगती है। मेरा नाम है शबनम। ये क्या है? यह वो फिल्म बनी जिसने राजेश खन्ना को सुपरस्टार बना दिया था।
और जब उन्होंने यह गाया तो छोड़ो भी जाने दो यार हम ना करेंगे प्यार तो हर कोई उनका दीवाना होता चला गया इसके बाद 1971 में आशा जितेंद्र के साथ दिखाई दी फिल्म का नाम था कारवा और यह फिल्म भी बड़ी हिट हुई इतना प्यारा वादा है हिम्मत वाली आंखों का इस मस्ती में सूझे और इसके गानों ने खूब धूम मचाई। फिल्म में राजा बाबू की मां भी थी जो जितेंद्र से यह कह रही थी धरती जवानी मेरी ताल मस्तानी तूने इसके बाद धर्मेंद्र और विनोद खन्ना ने मिलकर कहा मेरा गांव मेरा देश और यह फिल्म भी बेहतरीन थी और इसकी गानों की तो क्या ही बात करें फिर चाहे भरे बाजार में शर्मा शर्मा कर अपनी प्रेम कहानी बताने वाला यह गाना हो हाय शर्माऊं किस-किस को बताऊं ऐसे कैसे मैं सुनाऊं हम सबको अपनी प्रेम कहानियां या फिर धर्मेंद्र को बांधकर उसे पकड़ के धमकी देना हो मार दिया जाड़ दिया जा या फिर यह गाना हो सोना ले जा रे ओ चांदी ले जा रे 1972 में धर्मेंद्र ने समाधि बनाई मतलब मूवी का नाम था समाधि और यह फिल्म भी बेहतरीन रही। इसके गाने बड़े हिट हुए। बंगले के पीछे तेरी बेरी के नीचे हाय रे पिया का लगा। और खासकर फिल्म का यह गाना इतना बड़ा हिट हुआ कि आज भी इसकी धुन पर लड़कियां ऐसे कमर मटकाती है। [संगीत] वाह क्या एक्टिंग कर रहा है। इतना ही नहीं इस गाने पर दो रिमेक गाना भी बन चुका है। एक गाना अक्षय और शेफाली ने बनाया और दूसरा टोनी कक्कड़ ने भी रिकक्रिएट करने की कोशिश की और गाना बनाया उईमा उईमा। लगा इसके बाद सुनील दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ आशा की फिल्म आई हीरो और यह फिल्म भी बड़ी चर्चित रही। अगर भगवान संसार के सारे मकानों में तुम्हारे जैसी मूर्तियां बनाकर रख दे तो दुनिया वालों को सिवाय प्यार के ना पाप की फुर्सत मिलेगी ना पुण्य। फिल्म में जब आशा ने यह कहा मैं तुझसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने तो कई लड़कियों को अपने प्रेमी से मिलने का बहाना मिल गया। यह मूवी तो इतनी बड़ी हिट नहीं हुई लेकिन विवाद ज्यादा हुआ था। इसी मूवी में काम करने के दौरान आशा पारिक की शत्रुघ्न सिन्हा से झड़प भी हो गई थी। बलवंत मैं तुमसे कई बार कह चुकी हूं कि मुझसे मिलने की कोशिश मत करो। उस समय शत्रुघ्न सिन्हा कोई बहुत बड़े एक्टर नहीं हुआ करते थे। लेकिन आशा उनसे काफी बड़ी हीरोइन थी। तो किसी ने शत्रुघ्न सिन्हा से चुगली कर दी कि आशा ने तुमको कहा है कि यह नया लड़का कौन है? बहुत अडियल और घमंडी है। गजब बेेज्जती है यार। इसके बाद शत्रुघ्न सिन्हा इतने भड़क गए कि उन्होंने मीडिया के सामने आशा के खिलाफ अपनी पूरी भड़ास निकाल दी। उन्होंने कहा कि मुझे आशा पारिक बिल्कुल भी पसंद नहीं है। मैं उसके साथ कभी काम नहीं करना चाहता और उसके साथ सीन करने के बाद मैं अपने हाथों को साबुन से धोता हूं। खाओ मां कसम। ताकि मेरे हाथों में से आशा की बदबू ना आए। जब यह बात आशा ने सुनी तो वह भी भड़क गई और फिर दोनों के बीच यह लड़ाई बड़ी जंग बन गई थी जो सालों तक चलती रही। इसके बाद भी आशा पारे कई फिल्मों में दिखाई दी। कुछ हिट हुई और कुछ फ्लॉप। 1978 में आई फिल्म मैं तुलसी तेरे आंगन की मैं तुलसी तेरे आंगन की और इस मूवी ने भी आशा को खूब चर्चित किया और इस फिल्म के गाने भी बड़े हिट हुए थे। इसके बाद बिन फेरे हम तेरे प्रेम विवाह बदला और बलिदान गुनहगार 100 दिन सांस के जैसी कई फिल्में आई और अब धीरे-धीरे आशा पारिक की उम्र ढलने लगी थी और वह फिल्म की मेन हीरोइन से हटकर एक सपोर्टिंग एक्ट्रेस बन चुकी थी। अब आशा पारिक बहन, भाभी और मां के किरदार निभाने लगी थी। भाभी जा कहां रही हो? कहीं भी मैं अब इस घर में नहीं रह सकती। क्या हुआ क्या? किया क्या मैंने? तुमने तो वो किया है भैया जो बेगानों ने भी नहीं किया। और आशा पारिक ने बुलंदी, कालिया, पाखंडी, धर्म और कानून, सागर संगम, हम तो चले परदेश, हमारा खानदान, उस्ताद बंटवारा जैसी कई फिल्मों में आशा पारिक ने साइड किरदार निभाई और अब उनके फिल्मों में होने या ना होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता था। मेरी जिंदगी है क्या? एक कटी पतंग है। इंडस्ट्री में कई नई हीरोइन आ चुकी थी और आशा पारिक अब उनकी मां या सांस बनने लगी थी। 1995 में आई फिल्म आंदोलन में आशा पारिक ने गोविंदा और संजय दत्त की मां का किरदार निभाया था और अपने किरदार की गहरी छाप भी छोड़ी। आशा ने आखिरी बार 1999 में आई फिल्म सर आंखों पर में काम की थी और इसके बाद हमेशा के लिए उन्होंने फिल्मी दुनिया से दूरी बना ली। यही यहां कोई आता जाता नहीं। और अब हम बात करेंगे आशा पारिक की पर्सनल लाइफ की।
साथ ही जानेंगे उनसे जुड़े कुछ काली सच्चाई के बारे में। दोस्तों, आशा पारिक शुरुआत से ही बड़े नटखट स्वभाव की थी। वह अक्सर फिल्म के सेट पर मस्तीमजाक करती रहती थी। कई बार तो उनका मस्तीमजाक और मजाकिया होना फिल्म मेकर को पसंद नहीं आता था। ऐसा ही एक किस्सा था फिल्म घूंघट का। इसके डायरेक्टर थे रामायण बनाने वाले रामानंद सागर की। फिल्म में एक सीन था जिसमें आशा पारिक को रोना था। लेकिन वह उस समय मस्तीमजाक के मूड में ज्यादा रहती थी तो उसे रोने की वजह हंसी आ रही थी। और अभी तो रुको। क्लाइमेक्स अभी बाकी है। करीब 30 बार रामानंद सागर ने रिटेक लिए लेकिन सीन शूट नहीं हो पाया। रामानंद सागर सीन के भावनाओं पर इतना खो गए कि उनकी आंखों से भी आंसू निकल आए और आशा यह देखकर और भी ज्यादा हंसने लगी थी। इसके बाद रामानंद सागर का गुस्सा अपने चरम पर पहुंच गया था। उन्होंने सबके सामने आशा को बच्चा दिमाग और लापरवाह कहकर खूब फटकार लगाई और ऐसी लगाई कि आशा पारिक भरे सेट पर ही रोने लगी और डायरेक्टर अपना लक्ष्य पूरा कर लिया और रोते हुए ही उनका सीन शूट कर लिया गया। शाबाश। इस फटकार का आशा पर इतना ज्यादा असर हुआ कि फिर उसने कभी काम को मजाक में नहीं लिया और अपनी एक्टिंग को लेकर भी सीरियस हो गई। भाई, फिल्म मेरा गांव, मेरा देश में काम करने के लिए आशा पारिक ने ₹3 ला,000 एडवांस में लिए थे। जो उस समय किसी भी हीरोइन को नहीं दिए जाते थे। और यह फीस लेकर आशा उस समय बॉलीवुड की सबसे महंगी हीरोइन बन चुकी थी। और जा [संगीत] आशा पारिक उस समय इतनी बड़ी हीरोइन बन चुकी थी कि उनकी फिल्में 25 हफ्तों तक थिएटर में चलती रहती थी और इसीलिए उन्हें बॉलीवुड की पहली जुबली गर्ल भी कहा गया। मतलब जैसे एक्टर राजेंद्र कुमार को बॉलीवुड के जुबली कुमार कहते हैं वैसे ही आशा पारिक बनी जुबली गर्ल। आप कहां जा आएंगे। आशा एक बड़ी हीरोइन बन चुकी थी तो इसीलिए कोई भी छोटा एक्टर उनकी बात को नहीं काटता था और वह जैसा बोलती थी काम वैसा ही होता था। वह फिल्म में अपनी मनमानी भी करने लगी थी। वह किसी भी हीरोइन का फिल्म में सीन कटवा देती थी। और जब भी कोई दूसरा हीरोइन किसी फिल्म में आशा पारिक के साथ काम करती थी, तो उसे कम सीन देती थी। राज कपूर का उस समय बॉलीवुड में एक बड़ा नाम था। और हर हीरोइन उनके साथ काम करने के सपने देखती थी। जरा पास आओ तो चैन आ जाए। जरा पास आओ। लेकिन राज कपूर का एक खराब आदत यह था कि वह अपने फिल्मों में हीरोइन को अंग प्रदर्शन के लिए प्रेशराइज करते थे। उनकी किसी भी फिल्म में हीरोइन को नंगा नाच करवाए बिना पूरी ही नहीं होती थी। बात तो सही है। राज कपूर आशा को लेकर एक फिल्म बनाना चाहते थे। लेकिन आशा पारिक किसी भी तरह का बोल्ड सीन देने को तैयार ही नहीं थे और यही कारण रहा कि आशा पारिक ने कभी भी राज कपूर की फिल्म में काम ना करने की कसम खा ली थी। जब आशा पारिक का करियर डूबने लगा था तब भी वह अपने असूलों पर टिकी रही और दूसरे एक्ट्रेसेस की तरह अंग प्रदर्शन नहीं किया। इसी तरह उस समय दिलीप कुमार भी वह अभिनेता थे जिसे देखकर हर लड़की बस यह कहती थी। किसी उम्र में है लग गया रोग कहते हैं लोग मैं मर जाऊंगी और हर कोई उनके साथ काम करने के सपने देखती थी लेकिन आशा पारिक ने कभी भी दिलीप कुमार के साथ काम नहीं किया। आशा पारिक दिलीप कुमार को पसंद नहीं करती थी। अब क्यों नहीं करती थी यह तो आशा ही जाने। शशि कपूर आशा पारिक को बहुत पसंद करते थे और शायद मन ही मन वह आशा को चाहते भी थे। लेकिन आशा ने कभी भी कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया और शशि कपूर को बहुत जल्द यह समझ में आ गया कि आशा उन्हें सिर्फ एक अच्छा दोस्त मानती है। तुम बिन जाऊं कहां के दुनिया में आ तो कुछ भी ऐसा हरकत ना किया जाए जिससे यह दोस्ती भी खत्म हो जाए।
तो शशि कपूर ने अपने दिल की बात को अपने दिल में ही दबा कर रखा। लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में हजारों रंग के नजारे। धर्मेंद्र के साथ भी आशा पारिक ने कई फिल्मों में काम किया। धर्मेंद्र अक्सर शूटिंग के बाद शराब पीकर शराबी बन जाते थे और जब कभी उन्हें शूटिंग करनी होती थी तो वह अपने मुंह की बदबू छुपाने के लिए प्याज खा लेते थे। उसको पता लग गया छोटे पुलसिए को तो मैं तेरा अंडा फेंटा एक कर दूंगा। आशा पारिक को धर्मेंद्र के मुंह से प्याज की ब आती थी तो उसने धर्मेंद्र से प्याज ना खाने को कहा। लेकिन जब धर्मेंद्र ने असलियत बताई तो आशा पारिक को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। तो आशा ने धर्मेंद्र को समझा दिया कि अगर तुम शराब पीकर मेरे सामने आए तो मैं तुम्हें फिल्म से बाहर करवा दूंगी और सबको बता दूंगी कि तुम शराब के नशे में शूटिंग करते हो। फिर कोई भी दूसरी हीरोइन तुम्हारे साथ काम नहीं करेगी और तुम्हारा करियर बर्बाद हो जाएगा। इसके बाद धर्मेंद्र इतना डर गए कि उन्होंने कसम खा ली कि वह कभी भी आशा पारिक के सामने शराब पीकर नहीं आएंगे। शाबाश बेटा बहुत बढ़िया। वैसे तो आशा पारिक के पीछे बॉलीवुड के अधिकतर हीरो पागल थे। हर कोई उनके बाहों में आराम करना चाहता था। लेकिन जब आशा पारिक का दिल आया तो एक ऐसे आदमी पर आया कि लोगों का दिमाग चकरा गया। वह आदमी था आमिर खान का चाचा और फिल्म प्रोड्यूसर नासिर हुसैन। आशा पारिक ने नासिर हुसैन की कई फिल्मों में काम किया था और धीरे-धीरे वह नासिर हुसैन की दीवानी हो गई थी। आशा पारिक मन ही मन नासिर को प्यार करने लगी थी। लेकिन जब उसे यह पता चला कि नासिर हुसैन ना सिर्फ शादीशुदा है बल्कि दो बच्चे का बाप भी है। तो आशा पारिक का दिल निराशा में तब्दील हो गया। मेरी जिंदगी है क्या? एक कटी पसंद। हालांकि आशा ने नासिर को प्यार करना कभी नहीं छोड़ा था। लेकिन कभी भी अपनी दिल की बात नासिर हुसैन को नहीं बताई क्योंकि आशा पारिक नहीं चाहती थी कि उनकी वजह से एक खुशहाल परिवार टूट जाए और एक औरत की जिंदगी बर्बाद हो जाए। यही सब सोचकर उसने अपने प्यार को अपने ही अंदर दबाकर रखा और जिंदगी भर शादी ना करने की कसम खा ली। इसी तरह आशा पारिक बॉलीवुड की एकमात्र ऐसी हीरोइन बनी जिसने किसी से सच्चा प्यार किया और केवल उसकी खुशी के लिए अपनी पूरी जिंदगी को तन्हाई और अकेलेपन से भर दिया और पूरी जिंदगी अकेले ही काट दी। लोग आ गए उनकी याद। आशा पारेक ने खुद की प्रोडक्शन कंपनी भी खोली थी जिसका नाम था अकृति और उन्होंने पलाश के फूल बाजे पायल कोरा कागज दाल में काला जैसी कई टीवी सीरियल्स भी बनाई। आशा पारेक साल 1994 से 2000 तक सीने आर्टिस्ट एसोसिएशन की चेयरमैन भी रही है। और वह बॉलीवुड की पहली महिला बनी जो सेंसर बोर्ड की सदस्य रही। फिर मैं हीरोइन बनी। हीरोइन बनी। उसके बाद मैं डिस्ट्रीब्यूटर बनी।
डिस्ट्रीब्यूटर बनने के बाद प्रोड्यूसर बनी। उस दौरान मैं सिने आर्टिस्ट एसोसिएशन की प्रेसिडेंट बनी। और उसके बाद मैं सेंसर बोर्ड की चीफ बनी। और सालों तक उन्होंने फिल्मों के सींस को कंट्रोल करने का भी काम किया। मतलब फिल्म का कौन सा सीन रखना है और कौन सा हटाना है इसका फैसला वही करती थी। उनके अप्रूवल के बिना फिल्म को पब्लिश करने का सर्टिफिकेट ही नहीं मिलता था और वह कई फिल्म डायरेक्टर्स से भिड़ भी जाती थी। शेखर कपूर की फिल्म एलिजाबेथ में कुछ सीन ऐसे थे जो आपत्तिजनक थी। आशा पारेक ने वो सभी सीन हटाने को कहा। जिस पर शेखर कपूर आशा पारिक से नाराज हो गए। साले को बम से उड़ा दूंगा एक बार हाथ में आ जाए तो। इसी तरह महेश भट्ट की फिल्म जख्म में भी कई सीन ऐसे थे जो बहुत ज्यादा हिंदू मुस्लिम करने वाले थे और आशा पारिक को वो सीन बिल्कुल भी सही नहीं लगा। हालांकि कहानी अच्छी है लेकिन कुछ सींस एलिजिबल नहीं है पब्लिश करने के लिए। इस पर महेश भट्ट इतना ज्यादा भड़क गए कि उन्होंने आशा पारिक को धमकी दे दी कि मैं यह सीन दिल्ली के होम मिनिस्टर से पास करवाऊंगा और वह सीधे लालकृष्ण आडवाणी के पास पहुंच गए। उस समय लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे। हालांकि होम मिनिस्टर ने आशा पारिक को सही ठहराया और महेश भट्ट को फिल्म से सींस हटाने को कहा। बाद में आशा पारिक और महेश भट्ट के बीच तनाव बना रहा और महेश भट्ट आशा पारिक के घर के सामने आशा पारिक मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए हंगामा करने लगे। एक बिजनेसमैन एक दलाल बैठा है। वो दलाल जो है हम लोगों की प्राइवेट लाइफ को बेचने का क्लेम करता है। इसके बाद महेश भट्ट को कोर्ट में आके आशा से माफी मांगनी पड़ी। 2002 में आशा पारिक इस पद से रिटायर हो गई।