Cli

गुगल के ऐलान से मची सनसनी : इन शहरों में छोड़ेगा 3 करोड़ मच्छर।

Uncategorized

अमेरिका के दो राज्य फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया। यहां किसी गली में अगर अगले कुछ महीनों में लाखों मच्छर एक साथ छोड़ दिए जाए तो पहला ख्याल यही आएगा कि कोई बीमारी फैलने की तैयारी होने वाली है।

लेकिन ये मच्छर छोड़ने की इजाजत मांग रही है दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में से एक Google और मकसद बीमारी फैलाना नहीं है बल्कि मच्छरों को ही खत्म करना है। जिस कंपनी को हम सॉफ्टवेयर के बग यानी गड़बड़ियां ठीक करने के लिए जानते हैं वो अब असली कीड़े मकोड़ों वाले मच्छर पर हाथ आजमा रही है। प्रोजेक्ट का नाम भी यही है ।

पहले यह समझिए कि बात इतनी बड़ी क्यों है? अगर आपसे पूछा जाए कि दुनिया में इंसानों की सबसे ज्यादा मौत किस जानवर की वजह से होती है? तो जवाब आएगा शेर या सांप। जबकि ऐसा नहीं है। जवाब है मच्छर। WHO के मुताबिक मच्छरों और दूसरे ऐसे कीड़ों से फैलने वाली बीमारियों से हर साल 7 लाख से ज्यादा लोगों की मौत होती है।

अकेले मलेरिया ने 2024 में करीब 60000 लोगों की जान ली और डेंगू का खतरा जो आज दुनिया की लगभग आधी से ज्यादा आबादी पर मंडरा रहा है। उसमें भी हर साल 10 से 40 करोड़ लोग इससे इंफेक्ट होते हैं। यानी कि एक छोटा सा जीव जिसे हम हाथ के झटके से उड़ा देते हैं। इंसानी सेहत के लिए सबसे बड़ा दुश्मन है। अब तक इन मच्छरों से लड़ने का तरीका रहा है ।

दवाओं का छिड़काव। लेकिन दिक्कत यह है कि वक्त के साथ कई मच्छरों पर इन कीटनाशकों का असर कम होता चला गया है। और दूसरी बात कि किसी भी शहर में हर गड्ढे, हर नाली और हर छत पर नजर रखना बहुत मुश्किल है। जहां पर मच्छर जो हैं वह अंडे दे सकते हैं। तो Google का आईडिया इससे उलट है। मच्छरों को मारने के बजाय मच्छरों की मदद से ही मच्छरों को खत्म किया जाए। प्रोजेक्ट डीबग की लाइन है बैड बग्स को गुड बग्स से रोकना। यह प्रोजेक्ट Google की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट की लाइफ साइंसेस यूनिट वेरली चला रही है और इस पर करीब 10 साल से काम हो रहा है। यह काम कैसे करता है? इसे समझने के लिए एक जरूरी बात जान लीजिए।

हम में से ज्यादातर लोग सोचते हैं कि सारे मच्छर काटते हैं। पर ऐसा नहीं है। इंसानों का खून सिर्फ मादा मच्छर चूसती है और बीमारियां भी वही फैलाती है। नर मच्छर इंसानों को काटते नहीं है बल्कि उनका खाना तो फूलों का रस होता है। डीबर की पूरी प्लानिंग इसी बात पर टिकी है क्योंकि कंपनी सिर्फ नर मच्छर छोड़ने की बात कर रही है जो कि किसी को नहीं काटेंगे। अब इन नर मच्छरों में ऐसा क्या खास है यह भी समझ लेते हैं। लैब में इनके अंदर एक नेचुरल बैक्टीरिया डाला जाता है जिसका नाम है वो बाकिया।

जब यह बुलबाकिया वाला नर मच्छर किसी जंगली मादा के साथ मेटिंग करता है तो उनके अंडों में एक जैविक गड़बड़ी शुरू हो जाती है। साइंस की भाषा में इसे साइटोप्लाज्मिक इनकंपैटिबिलिटी कहते हैं। आसान भाषा में समझिए कि जैसे किसी ताले में गलत चाबी का लगा देना। मादा मच्छर अंडे तो देती है लेकिन उन अंडों से अगली पीढ़ी पैदा नहीं हो पाती। अगर लगातार लाखों ऐसे नर मच्छर किसी इलाके में छोड़ दिए जाए तो ज्यादातर मादा मच्छर इन्हीं के साथ मीटिंग करेगी और धीरे-धीरे उस इलाके में मच्छरों की आबादी अपने आप गिरने लगेगी।

सबसे बड़ी बात कि इसमें ना तो जहरीले केमिकल लगते हैं ना ही पूरे इलाके में छिड़काव करना पड़ता है। अब आते हैं उस एप्लीकेशन पर जिसकी वजह से यह खबर सुर्खियों में है। वेरली ने अमेरिका की एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी यानी कि ईपीए से इजाजत मांगी है कि उसे फ्लोरिडा और कैलिफोर्निया में कुल 3 करोड़ 20 लाख नर मच्छर छोड़ने की मंजूरी दी जाए।

यह 2 साल का प्लान है। हर राज्य में 1 करोड़ 60 लाख मच्छर पहले साल फ्लोरिडा में और दूसरे साल कैलिफोर्निया में। और यहां एक दिलचस्प बात है। दीबग ने अब तक ज्यादातर काम उस मच्छर पर किया है जिसे एडिस कहते हैं। एडिस इजिप्ट जो डेंगू जीका और चिकनगुनिया फैलाता है। लेकिन यह नई अमेरिकी एप्लीकेशन एक अलग मच्छर को निशाना बना रही है। क्यूलेक्स क्वीन जिसे साउथर्न हाउस मॉस्किटो भी कहा जाता है।

यह मच्छर वेस्ट नाइल वायरस और सेंट लुईस इंसेफेलाइटिस फैलाता है और अमेरिका के लिए यह बड़ी बात है क्योंकि वहां की सेहत एजेंसी सीडीसी के मुताबिक वेस्ट नाइल वायरस अमेरिका में मच्छरों से फैलने वाली सबसे आम बीमारी है। यह तरीका कागजी नहीं है। इसके नतीजे भी सामने आ चुके हैं।

कैलिफोर्निया के फ्रेंजो शहर में हुए ट्रायल्स में काटने वाली मादा मच्छरों की संख्या एक साल में 95% तक घट गई थी और कंपनी का दावा है कि डीबक अब तक चार महाद्वीपों में से 1 अरब से ज्यादा मच्छर छोड़ चुका है। यह आईडिया हालांकि नया भी नहीं है। इसकी जड़े करीब 70 साल पुरानी है। 1950 के दशक में अमेरिकी वैज्ञानिक एडवर्ड निपलिंग और रेमंड बुशलैंड ने एक तरीका खोजा था। स्टेरॉइड इंसेक्ट टेक्निक।

उस जमाने में न्यू वर्स कॉम नाम की एक मक्खी जानवरों के घावों में अंडे देकर उन्हें मार देती थी। वैज्ञानिकों ने रेडिएशन की मदद से लाखों नर मक्खियों को बांझ बना दिया और खुले में छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही सालों में कई इलाकों से वो मक्खी लगभग खत्म हो गई। आज का फर्क सिर्फ इतना है कि रेडिएशन की जगह ववाकिया जैसे बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या इसमें कोई खतरा है? मच्छर भले ही हमारे लिए मुसीबत हो पर वो कुदरत का भी एक हिस्सा है। कई पक्षी, चमगादड़, मछलियां और मकड़ियां मच्छरों को खाकर ही जिंदा रहती हैं। अगर मच्छर बहुत ज्यादा घट गए तो क्या यह फूड चेन पर असर नहीं पड़ेगा?

हालांकि इस पर वैज्ञानिकों का कहना है कि मकसद मच्छरों को पूरी तरह खत्म करना नहीं है बल्कि सिर्फ इंसानी बस्तियों के आसपास उनकी संख्या को काबू में रखना है। एक चिंता यह भी है कि जैसे मच्छरों ने कीटनाशक के खिलाफ खुद को ढाल लिया है तो क्या वो इसका भी कोई तोड़ निकालेंगे? इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि अभी यह पूरा का पूरा प्लान सिर्फ एक एप्लीकेशन है। मंजूरी नहीं मिली है।

ईपीए इसकी जांच पड़ताल कर रही है और लोगों से राय भी मांग रही है। फैसला इसके बाद ही होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *