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भारत का पहला Liquid Tree सोखेगा 25 गुना प्रदूषण क्या है नई तकनीक ?

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भारत का पहला लिक्विड ट्री बन गया है। अब आप सुनेंगे लिक्विड ट्री भी हो सकता है तो आप यकीन नहीं करेंगे। लेकिन एक ऐसा पेड़ जो सामान्य पेड़ से 25 गुना तक कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता रखता है और तरल पेड़ है। यह किस तरीके का पेड़ है? किसने बनाया है? कहां लगा है।

भारत में और कहां लग सकता है? क्या तकनीक है? और भारत के वायु प्रदूषण को कम करने में कैसे मदद करेगा? इन सारी बातों को आज हम इस सेशन में समझने वाले हैं। लेकिन उससे पहले हम इसकी भूमिका के तौर पर ये बात समझ लें कि ऐसे लिक्विड हमारे लिए जरूरी क्यों हैं? भारत में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। अभी जो रिपोर्ट आई थी हमने आपको दी थी उस पे सेशन किया था।

आप जा कर के देखिए। हमने बताया था कि दुनिया के 100 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से ज्यादातर शहर भारत और पाकिस्तान और बांग्लादेश और साउथ एशिया के आप कह सकते हैं कि थे। तो इतनी बड़ी समस्या को सुलझाने के लिए भारत सरकार को हमें कुछ तो करना पड़ता।

तो उसके लिए सरकार ने कदम उठाया है और ऐसा पहला पेड़ जो भारत की हवा को साफ करेगा, प्रदूषण को सोखेगा। दिल्ली जैसे शहरों में मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और जहां-जहां प्रदूषण है हमारे शहरों में वहां पर आने वाले समय में इसे लगाया जा सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार जो 2026 की ही है मार्च की बताती है कि इंडिया सिक्स्थ मोस्ट पोल्यूटेड कंट्री है इन द वर्ल्ड और जो एयर क्वालिटी हमारी है वो लगातार खराब रहती है। दिल्ली जैसे शहर में अगर आप रहते हैं तो आप जानते हैं कि इसका जो एक्यूआई स्तर है वह 500 के पार चला जाता है और 500 के बाद भी जाता होगा लेकिन हम उसको मेजर नहीं कर सकते। इसलिए हमें पता नहीं है कि वह कितना ज्यादा चला जाता है और एक मॉडरेट और गुड जो लेवल होता है एयर पोलुशन का वो दिल्ली जैसे शहर में हमें बहुत रेयरली एक आध दिन कभी बारिश हो जाए तो देखने को मिलता है। ज्यादातर नहीं मिलता है। हमारे बच्चे बूढ़े सांस नहीं ले पाते हैं। क्रॉनिक डिजीज का खतरा पैदा हो जाता है और हमारे हेल्थ केयर इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ता है। अब यह जो एल्ग ट्री इसको कहा जा रहा है।

इसे आप कह सकते हैं शैवाल वृक्ष है। तो शैवाल वृक्ष क्या होता है? शैवाल को आप जानते हैं कि सामान्य भाषा में अगर आप कहें तो काई भी कह सकते हैं। तो काई जो समुद्रों में लगती है, जो तालाबों में लगती है, बारिश हो जाती है। जब मॉनसून का समय होता है उस समय सड़कों पर भी आप कई बार देखते हैं। तो वो जो काई होती है ना वो हमारे बहुत काम की चीज होती है और हमारी हवा को साफ करती है। आप एक बात समझिए कि इस धरती पर आप जानते हैं कि 70% तो समुद्र ही है और उससे ज्यादा ही है।

तो जब समुद्र में काई होती है तो आपको लगता होगा कि वह कुछ काम नहीं आती है। जबकि दरअसल बात ये है कि काई भारत में और दुनिया में जहां-जहां पर ये इकोसिस्टम बनता है वहां की हवा को साफ करने के लिए जिम्मेदार होती है। एक पेड़ से ज्यादा हवा को साफ काई करती है और इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने एक पेड़ बनाया जो काई पर काम करेगा। अब यह कैसे काम करेगा? अगर आप इसको देख पा रहे होंगे तो यहां पर एक कांच की प्लेट लगी हुई है।

इसके अंदर थोड़ा सा पानी है। इसके अंदर थोड़ी सी काई है। ऊपर इसके एक सोलर पैनल लगा हुआ है जो बिजली का काम करेगा। इसमें फोटो सिंथेसिस कराने के लिए इसको लाइट प्रोवाइड करेगा। नीचे एक इसमें पंप लगा होगा और इसके अंदर जो तकनीक काम करेगी उसको हम जानते हैं फोटोबायो रिएक्टर के नाम से। और दरअसल ये असल में पेड़ नहीं है। ये एक मशीन तरीके की है जो पेड़ की तरीके से लगती है। इसे हम फोटो बायो रिएक्टर के सिद्धांत पर चलने वाली मशीन कह सकते हैं जो हवा को साफ करने के लिए शैवाल, बिजली और पानी का प्रयोग करता है और आसपास के 10 से 15 मीटर की रेडियस को यह इतना साफ कर देता है कि आपको वो एक प्रॉपर ऑक्सीजन चेंबर जैसा लगता है।

अब आप समझिए कि दिल्ली की अगर हर सड़क पर हम इसे एक इंस्टॉल कर दें तो 10 से 15 मीटर के दायरे में अगर हम लगातार इसे लगाते जाएं तो कितनी हवा को यह साफ कर देगा। करीब-करीब इसकी जो क्षमता है वह 25 गुना होती है। मैं इसके काम करने का मैकेनिज्म भी आपको बताऊंगा और किस तरीके से हम इसे यूज़ करेंगे वो भी समझेंगे। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि यह सिर्फ खयाली पुलाव हैं। बातें हैं। बातें नहीं है। भोपाल के अंदर इसे इंस्टॉल किया जा चुका है। भोपाल में कहां पर? स्वामी विवेकानंद पार्क है। वहां पर मशरूम वर्ल्ड ग्रुप नाम की एक संस्था है। एक ऑर्गेनाइजेशन है। तो इस मशरूम वर्ल्ड ग्रुप ने इसको इंस्टॉल किया है भोपाल के अंदर। और अब ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले समय में अगर यह प्रोजेक्ट सफल रहा तो हम इसे दुनिया भर में और भारत में तो कम से कम इसे सारे शहरों में इंस्टॉल कर पाएंगे और हमारी जो प्रदूषण की समस्या है उससे हम लड़ पाएंगे ताकि आने वाले समय में यह ना कहा जाए कि हम इन प्रोजेक्ट्स पर कोई काम नहीं कर रहे हैं। अब मैं आपको दिखा देता हूं। यह वह ओरिजिनल फोटो है जो लगाई गई है और स्वामी विवेकानंद पार्क है।

एल्गिगेटरी इसको बोला जाता है। और बाकी सारी चीज़ें आप जानते हैं। इसमें क्या-क्या यूनिट्स इंस्टॉल होती हैं, कहां क्या लगा होता है वो आपको पता होता है। ये इससे पहले सर्बिया में भी लगाई जा चुकी है। तो काम कैसे करती है? आप इसको यह समझो। यह वाला जो पैनल होगा ना इस पे यहां पर एक सोलर प्लेट होगी। सोलर प्लेट जो है वो प्रकाश लेकर के इसमें प्रकाश देने का काम करेगी ताकि फोटोसिंथेसिस को वर्क कराया जा सके। इसके अंदर शैवाल होगा। इसके अंदर काई होगी और यहां पर जो मोटर लगी होगी वो इस तरफ से सक्शन करेगी हवा का। अगर इसकी वर्किंग को आपने समझना है तो थोड़ा सा आप यहां समझो ताकि बेटर अंडरस्टैंडिंग आपकी हो पाए।

ये एल्गी है पूरा। यहां पर जो सोलर प्लेट लगी होगी वो होगी। यहां से सोलर लाइट आएगी। यह जो पंप होगा यह हवा को सक्शन करके इधर से इस चेंबर के अंदर छोड़ेगा और जब चेंबर के अंदर छोड़ेगा तो आप जानते हैं कि फोटोसिंथेसिस के दौरान CO2 जो है वो अवशोषित कर ली जाती है और उसे बायोमास में कन्वर्ट कर दिया जाता है। तो ये जो CO2 इसके अंदर आएगी पंप के जरिए लेके आई जाएगी। उसको बायोमास में कन्वर्ट करके वापस से बाहर O2 के फॉर्म में छोड़ दिया जाएगा।

और बाकी अब आप कहेंगे कि जी अगर मान लो ये साफ कर ही रहा है तो काई तो खराब भी हो जाती है। काई लग जाती है, जम जाती है, काली हो जाती है। फिर उसका क्या करेंगे? तो ये जब खराब हो जाएगा टैंक इस इसकी जब सफाई की जाएगी इसको खाली जब किया जाएगा तो इस बायोमास को एज बायोफर्टिलाइजर यूज किया जाएगा जो कि हमारे गार्डंस में यूज़ किया जा सकता है खेती में यूज़ किया जा सकता है और जब इतने पैमाने पर ये निकलेगा तो हमारे लिए बायोफर्टिलाइजर की समस्या को भी कम करने का काम ये करेगा और बहुत अच्छी तकनीक आप इसको कह सकते हैं कि वर्तमान समय की आवश्यकता के हिसाब से हमने यह तकनीक बनाई है और यह जो प्रक्रिया मैं आपको कह रहा था कि इधर से हवा आएगी अंदर जाएगी फिर बाहर निकल चल जाएगी।

O2 के फॉर्म में CO2 जो है वो अवशोषित हो जाएगी। बायोमास उसका बन जाएगा। एक और काम यह करेगा। आपको यह बात भी पता है कि जो हमारा पीएम 2.5 ये प्रदूषण कण होते हैं इतने छोटे जिन्हें हम देख नहीं सकते जो हमारे श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं। उनको अवशोषित करेगा ये। तो आसपास एक तो पीएम 2.5, पीएम 10 जैसे जो कण हैं जो धूल कण हैं जो पॉल्यूटेंट पार्टिकल्स हैं वो हमें नुकसान पहुंचाते हैं वो नहीं पहुंचा पाएंगे और उसके अलावा जो O2 छोड़ने का काम यह करेगा वो तो अपने आप में कर ही रहा है। तो क्या आपको क्या लगता है कि ये कैसी तकनीक है?

दिल्ली जैसे शहरों में इसका हम क्या यूज़ कर सकते हैं? यह मशरूम वर्ल्ड ग्रुप का एक उनकी वेबसाइट से लिया गया फोटो है। इसके जो मेंबर्स हैं, वह आप इसमें देख पा रहे होंगे और एल्ग ऑक्सीजन प्रोडक्शन किस तरीके से होता है, क्यों होता है, यह हमने पहले ही देख लिया था। हम जान चुके थे। मैंने आपको समुद्री जो पारिस्थितिकी तंत्र होता है उसका महत्व समझाया और मैंने आपको बताया था कि लगभग अर्थ का 29% जो है वो सिर्फ जमीन है और 71% जो है वो अर्थ के सरफेस का लगभग ओशियन है।

तो यहां पर ये जो ओशियनिक एनवायरमेंटल स्ट्रक्चर्स होते हैं वो हमें मदद करते हैं ऑक्सीजन प्रोडक्शन में बहुत ज्यादा। तो हम जो सोचते हैं ना कि जो चीजें खराब हैं वो सिर्फ खराब हैं। तो खराब कुछ नहीं होता। आप जब कह देते हैं कि फला चीज़ खराब हो गई तो वहां भी बहुत सूक्ष्म स्तर पर उसमें कार्य हो रहा होता है। वहां भी कोई ना कोई फर्मेंटेशन हो रहा होता है। वहां भी किणवन की प्रक्रिया जारी होती है। प्रकृति को किसी प्रकार से सहायता करने की मदद करने की प्रक्रियाएं वहां पर चल रही होती हैं। तो ये फ्यूचरिस्टिक एल्गाइट्री हमारे बहुत काम आने वाला है। ये मैं आपको बार-बार इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हम हमेशा समस्याओं की चर्चा करते हैं। कभी समाधान की बात नहीं करते। आज पहली बार शायद ऐसा हो रहा है कि कुछ फ्यूचरिस्टिक रियल प्रॉब्लम सॉल्यूशन हमारे सामने आया है और उसको हमने सराहना चाहिए आगे लेके जाना चाहिए। अगर यह अच्छे से फंक्शन करता है तो हम इसे भारत के बाकी शहरों में भी लागू कर सकते हैं।

जो वेदरिंग हीट वेव है उसमें भी यह मदद करता है। सिर्फ ऐसा नहीं है कि भारत की मोटी समस्या प्रदूषण की भी है। हीट वेव भी एक बड़ी समस्या है उत्तर भारत के शहरों में जिसे हम लू के नाम से जानते हैं। तो लू का भी एक निदान है यह। अगर दिल्ली में, भोपाल में, इंदौर में, गोरखपुर में, इलाहाबाद में, पटना में कहीं पर भी इसे इंस्टॉल किया जाएगा वहां ये फंक्शन करेगा और शहरी आबादी हमारी जो है उसको लाभ देगा। हमारे हेल्थ केयर स्ट्रक्चर के ऊपर भी थोड़ा सा दबाव कम होगा। आप इस बात को समझिए कि जबजब प्रदूषण खराब प्रदूषण होता है पर्यावरण खराब होता है तो उसका सीधा असर ह्यूमन रिसोर्स पर भी पड़ता है।

अगर आप काम कर रहे हैं आप बीमार हो गए तो आपका एक वर्किंग डे का लॉस होता है और वो वर्किंग डे जब मल्टीप्लिक मल्टीप्लिकेशन में होता जाता है बहुत बड़ी आबादी के साथ तो हमारी इकॉनमी का नुकसान होता है। तो इसीलिए भी ये हमारे लिए जरूरी है। हालांकि ओरिजिनल पेड़ का कोई विकल्प नहीं है। ओरिजिनल पेड़ ओरिजिनल पेड़ होता है क्योंकि वो भूमि की उर्वरता भी बढ़ाता है। वह जमीन को अपने साथ जकड़ करके भी रखता है और एक ओवरऑल पारिस्थितिकी तंत्र के लिए पेड़ ज़रूरी हैं। हम ऐसा नहीं कह रहे कि अगर यह आ गए, तो सारे पेड़ों को काट दो, उनका यूटिलाइटिलाइज़ेशन कर लो। उनकी आवश्यकता नहीं है। यह उनके सपोर्ट में एक तरीके से लग सकता है, काम कर सकता है और उनको एक सहायता यंत्र के तौर पर काम कर रहा है। प्रदूषण कम करने के लिए हम इसका यूज़ कर रहे हैं। क्योंकि हमारे जो ऑलरेडी एकिस्टिंग पेड़ हैं उनके ऊपर बहुत ज्यादा दबाव है। तो आप इसको इसी तरीके से समझना है। इसकी जो फोटो बायोरिएक्टर तकनीक है, यह मैंने आपको समझा दी कि किस प्रकार सूर्य के प्रकाश की सहायता से कार्बन डाई अह कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण किया जाएगा और उसको ऑक्सीजन में कन्वर्ट करके खुली हवा में छोड़ा जाएगा। जिससे शहरों का जो माहौल है वह प्रदूषण के लिहाज से थोड़ा सा अच्छा रहेगा और जो कीटना सॉरी यह जो धूल के कण हैं प्रदूषक हैं इनको भी कम करने में मदद मिलेगी।

इस तरीके का कुछ दिखता है जब आप इसको लैबोरेटरी में देखते हो लेकिन जब लगाया जाएगा जब लगाया गया है जो हमने भोपाल में देखा वो एक चकोर फॉर्म में और उसके ऊपर एक पैनल होगा सोलर पैनल होगा और आगे उसके शीशे लगाए जाएंगे और नीचे एक पंप जो कि हवा को उसमें से लगातार पास कराता रहेगा। ये प्रक्रिया लगातार उसमें चलती रहेगी। अब आप उसको समझ गए होंगे। शैवाल का इसमें सहायता ली जाएगी जिसको एल्गाई कहते हैं। शुद्ध हिंदी में या आप जिस तरीके समझते हैं उसमें काई कहा जाता है। यहां पर किरणन की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। जो कृत्रिम प्रकाश है या जो सूर्य का प्रकाश है। अब जब तक सूरज रहेगा तब तक सूरज की सहायता से जब सूरज नहीं रहेगा तो जो सोलर पैनल है वो उसमें लाइट डालेगा और लाइट की मदद से जो फ़र्मेंटेशन होगा वो ऑक्सीजन पैदा करने के लिए जिम्मेदार होगा और CO2 का अवशेषण इसके इसके अंदर कराया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया थी जो मैंने आपसे पहले कही थी। अब इसकाेंस हमें समझना चाहिए कि भारत में जितना प्रदूषण होता है उसको अगर हम थोड़ा बहुत भी कंट्रोल कर पाए अपने तरीके से तो ये एक बड़ा रेवोलशनरी कदम हमारे सामने हो सकता है। तो इससे एक चीज हुई है कि आप जब अपना मेंस का उत्तर लिखेंगे तो उसमें एक पॉइंट के तौर पर एल्ग ट्री को और उसके वर्किंग फंक्शनल स्टाइल को भी लिख सकते हैं।

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