फिल्म शोले में अपनी सीधी [संगीत] साधी मौसी की एक्टिंग से सबको हंसाने वाली लीला मिश्रा की असली कहानी इससे भी ज्यादा दिलचस्प है। क्या आप यकीन करेंगे कि जिस औरत ने बॉलीवुड की 300 से ज्यादा [संगीत] फिल्मों में काम किया उसने अपनी पूरी जिंदगी में सिनेमाघर जाकर कभी एक भी फिल्म नहीं देखी और महज 18 साल की उम्र में [संगीत] उन्होंने हीरो की मां का रोल क्यों स्वीकार कर लिया था। आइए जानते हैं बॉलीवुड की सबसे [संगीत] मशहूर मौसी लीला मिश्रा के जीवन के वो अनसुने किस्से जो आपने पहले कभी नहीं सुने होंगे। लीला मिश्रा का जन्म 1 जनवरी 1908 को उत्तर प्रदेश के
[संगीत] रायबरेली जायज में एक रायबरेली के जमींदार परिवार में हुआ था। उस दौर की सामाजिक परंपराओं के अनुसार महज 12 साल की कम उम्र में उनकी शादी [संगीत] रामप्रसाद मिश्रा से कर दी गई थी। 17 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते वह दो बच्चों की मां बन चुकी थी। उनके पति राम प्रसाद मिश्रा नाटकों और साइलेंट फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किया करते थे। 1930 [संगीत] के दशक में दादासाहेब फाल्के की कंपनी के एक सहयोगी मामा शिंदे ने [संगीत] लीला मिश्रा को फिल्मों में काम करने की सलाह दी। 1936 में आई फिल्म सती सुलोचना [संगीत] से दोनों ने अपने करियर की शुरुआत की। उस जमाने में महिलाओं का फिल्मों में काम करना बहुत दुर्लभ था। इसलिए लीला जी को महीने के [संगीत] ₹500 मिलते थे।
जबकि उनके पति को सिर्फ ₹150 मिलते थे। फिल्म होनहार। 1936 में उन्हें पहले हीरोइन का रोल मिला था। लेकिन जब सीन में [संगीत] हीरो साहू मोदक को गले लगाने का मौका आया तो लीला जी ने साफ इंकार कर दिया। इसके चलते मेकर्स ने फिल्म का कॉन्ट्रैक्ट बदलने के बजाय 18 से 19 [संगीत] साल की लीला मिश्रा को उसी फिल्म में हीरो की मांग का किरदार दे दिया। यहीं से उनके कैरेक्टर आर्टिस्ट बनने का सफर शुरू हो गया। पांच दशकों [संगीत] से
अधिक लंबे करियर में उन्होंने 300 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया। आवारा, प्यासा, [संगीत] लाजवंती, नदियां के पार और गीत गाता चल जैसी दर्जनों फिल्मों में उन्होंने मान, चाची [संगीत] और नानी के रोल निभाए लीला मिश्रा एक पारंपरिक परिवार से थी। 300 से ज्यादा फिल्मों में [संगीत] काम करने के बावजूद लीला मिश्रा ने अपनी जिंदगी में एक भी फिल्म थिएटर में जाकर नहीं देखी। जब उनसे किसी ने [संगीत] पूछा कि आप अपनी ही फिल्में क्यों नहीं देखती? तो उनका सीधा जवाब होता था फिल्म देखने में टिकट और टैक्सी का पैसा बेकार खर्च होता है।
वह अपने खाली वक्त में घर बैठकर रामायण या धार्मिक पुस्तकें पढ़ना पसंद करती थी। चाहे मुंबई की भीषण गर्मी हो [संगीत] या आउटडोर लोकेशन। लीला मिश्रा ने कभी भी अपनी सूती साड़ी और सिर का पल्लू नहीं हटाया। उन्होंने निर्देशकों [संगीत] से साफ कह रखा था कि उनका लुक और पहनावा वहीं रहेगा जो एक ठेट भारतीय बुजुर्ग महिला का होता है और किसी भी रोल [संगीत] के लिए इसे बदला नहीं जाएगा। तो दोस्तों, यह थी हमारी भारतीय सिनेमा की सबसे प्यारी और सीधी साधी मौसी [संगीत] लीला मिश्रा जी की अनोखी जिंदगी। 17 जनवरी 1988 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने [संगीत] के कारण 80 वर्ष की उम्र में उनका प्राकृतिक निधन हो गया। आज भले ही लीला जी हमारे बीच नहीं है लेकिन शोले [संगीत] का वो मौसी वाला किरदार और उनकी सादगी हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगी। और क्या आपको शोले में जय और मौसी का वो डायलॉग [संगीत] आज भी याद है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर बताएं।