क्या कभी ऐसा हो सकता है कि जिस चेहरे को दुनिया ने पूजा हो उसी चेहरे को एक दिन भीड़ सरेआम रौंद दे एक लड़की जिसकी मुस्कान पर करोड़ों दिल धड़कते थे जिसकी एक झलक पाने के लिए लोग दीवाने हो जाते थे वो अचानक अपने ही घर में कैद हो जाए यह कहानी सिर्फ चमक दमक की नहीं है। यह कहानी है उस अंधेरे की जो रोशनी के पीछे छिपा होता है। हर तालियों के पीछे एक सन्नाटा होता है। हर मुस्कान के पीछे एक टूटा हुआ सच। सोचिए जिस औरत को दुनिया सबसे खूबसूरत कहती थी, वह अंदर से इतनी टूटी हुई क्यों थी? क्यों उसे अपने ही फैसलों की सजा जिंदगी भर भुगतनी पड़ी? क्यों उसका [संगीत] प्यार उसका सबसे बड़ा दर्द बन गया? और क्यों वो कभी अपने ही सपनों को पूरा नहीं कर पाई? यह कहानी है एक ऐसे सफर की जहां शुरुआत होती है मासूमियत से। लेकिन रास्ते में मिलते हैं धोखे ताने और ऐसे जख्म जो कभी भरते नहीं। यहां रिश्ते भी हैं लेकिन अपने नहीं। यहां भीड़ भी है लेकिन कोई साथ नहीं। और फिर एक ऐसा मोड़ आता है जहां ताकतवर लोग इज्जत को खेल बना देते हैं।
जहां नाम बदनामियों में बदल जाता है। एक सवाल जो इस पूरी कहानी में आपका पीछा नहीं छोड़ेगा। आखिर एक इंसान कितनी बार टूट सकता है और फिर भी जिंदा रह सकता है। आखिर क्यों जया प्रदा जैसी खूबसूरत हीरोइन को तीन बच्चों के बाप से शादी करनी पड़ी और उस पति ने ही उनकी जिंदगी [संगीत] नर्क बना दी। मैं शादी नहीं कर सकती। क्यों वह कभी भी मां नहीं बन पाई और दूसरों के बच्चों को अपना [संगीत] बच्चा मानकर ही जीवन करती रही। क्या आपने कभी सोचा कि दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला जिसे खुद सत्यजीत रे ने यह खिताब दिया हो उसकी जिंदगी में इतना अंधेरा कैसे हो सकता है? जिस औरत ने तीन दशक तक करोड़ों दिलों पर राज किया वो 60 साल की उम्र में 300 से ज्यादा पुलिस वालों से अपने ही घर में बंधक क्यों बनी और कैसे वो राजनीति का ऐसा गंदा शिकार बनी जिसने उनके चरित्र की धज्जियां उड़ा दी। क्या हुआ जब सड़कों पर उनकी अश्लील तस्वीरें चिपकाई गईं और घर-घर जाकर उनके गंदे और अश्लील सीढ़ी कैसेट बांटे गए? दोस्तों, आज हम बात करेंगे उस औरत की, जिसकी ज़िंदगी किसी भी डार्क थ्रिलर फिल्म से ज्यादा दिल दहला देने वाली है। आंध्र प्रदेश के राजमुंद्री शहर में गोदावरी [संगीत] नदी के शांत किनारों के बीच 3 अप्रैल 1962 को एक बच्ची का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया ललिता रानी।
राजमुंद्री अपनी कला, संगीत और साहित्य के लिए जाना जाता है और शायद इसी माटी ने इस बच्ची [संगीत] के भीतर कला का वो बीज बोया जो आगे चलकर एक विशाल वृक्ष बन गया। उनके पिता कृष्ण राव तेलुगु फिल्मों के [संगीत] फाइनेंसर थे। तो घर में हमेशा फिल्मों और कलाकारों का आना-जाना लगा रहता था। मां नीलावाणी [संगीत] एक साधारण, धार्मिक और संस्कारी गृहिणी थी। जिन्होंने ललिता को जमीन से जुड़े रहना सिखाया। लेकिन इस साधारण मां की एक असाधारण खूबी थी। वह अपनी बेटी की प्रतिभा को पहचानती थी। बचपन से ही ललिता की आंखों में एक अजीब सी चमक थी। उनके पांव में एक नैसर्गिक लय थी। मां ने बहुत कम उम्र में ही उन्हें शास्त्रीय नृत्य और संगीत की कड़ी ट्रेनिंग दिलाना शुरू कर दी। एक मध्यमवर्गीय घर में यह सब कोई आसान फैसला नहीं था। लेकिन नीला वाणी जानती थी कि उनकी बेटी में कुछ खास है। सुबह 4:00 बजे उठकर रियाज़ फिर स्कूल। यही थी छोटी ललिता की दिनचर्या। तेलुगु मीडियम स्कूल में पढ़ने वाली यह शर्मीली लड़की क्लास में तो चुप रहती थी। लेकिन जब मंच मिलता था तो सब कुछ बदल जाता था। जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब ललिता महज 13 साल की थी। अपने स्कूल के वार्षिक फंक्शन में उन्होंने एक ऐसा डांस परफॉर्मेंस दिया कि देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह गई। दर्शकों में उस दिन एक जाने-माने तेलुगु फिल्म निर्माता तिलक भी मौजूद थे। उनकी पारखी नजरों ने मंच पर थिरकती इस बच्ची में एक भावी सुपरस्टार को पहचान लिया। बिना देर किए उन्होंने परिवार के पास फिल्म का ऑफर भेज दिया।
[संगीत] परिवार हिचकिचाया लेकिन अंततः हां कर दी और इस तरह 1974 में आई फिल्म भूमि कौसम में ललिता रानी को महज 3 मिनट [संगीत] का एक डांस सीक्वेंस करने का मौका मिला। उस 3 मिनट के लिए उन्हें मिले सिर्फ ₹10। लेकिन यही वो ₹10 थे जिन्होंने उस विशाल साम्राज्य की नीव रखी जिसकी कल्पना उस वक्त किसी ने नहीं की थी। निर्देशकों ने उस दिन उस बच्ची का नाम बदल दिया। ललिता रानी हमेशा के लिए बन गई जयप्रदा। 3 मिनट के उस डांस ने साउथ फिल्म [संगीत] इंडस्ट्री में एक खामोश तहलका मचा दिया था। निर्देशक और निर्माता उनके पीछे पड़ गए। जब वो महज 17 साल की थी, तब तक वह कोई बाल कलाकार [संगीत] नहीं बल्कि साउथ सिनेमा की एक स्थापित सुपरस्टार बन चुकी थी। उनका नाम किसी भी [संगीत] फिल्म के ब्लॉकबस्टर होने की सबसे बड़ी गारंटी बन गया था। एंटी राम राव जिन्हें तेलुगु सिनेमा का भगवान माना जाता था। अक्का नयनी नागेश्वर [संगीत] राव, मेगा स्टार चिरंजीवी, स्टाइल आइकन रजनीकांत और अभिनय के सम्राट कमल हासन, इन सबके साथ उनकी जोड़ी [संगीत] रूपले पर्दे पर जादू बिखेरती थी। के बालचंद्र जैसे महान निर्देशक ने उनके हुनर को पहचाना और अंतुलिनी कथा में मुख्य भूमिका दी जिसने [संगीत] उनके करियर को आसमान पर पहुंचा दिया। दक्षिण भारतीय सिनेमा में जब उनका डंका इस कदर बज रहा था तो बॉलीवुड के दरवाजे [संगीत] उनके लिए अपने आप खुलने लगे। 1979 में उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा फिल्म सरगम से। यह उन्हीं की सुपरहिट तेलुगु फिल्म श्री मुआवावा की हिंदी रीमेक थी। सरगम बॉक्स ऑफिस पर धमाका कर गई और जया प्रधान रातोंरात पूरे उत्तर भारत में घर-घर का नाम बन गई। उनके डफली डांस ने दर्शकों को दीवाना बना दिया। लेकिन इस चमक के पीछे एक बड़ी मुसीबत छुपी हुई थी। वो ठेट [संगीत] तेलुगु भाषी लड़की थी। हिंदी उन्हें बिल्कुल नहीं आती थी। सरगम में उन्हें जानबूझकर एक गूंगी लड़की का किरदार दिया गया था। घी खाऊं? घेरे कैसे खाऊं? खाने में इतना स्वाद है रोका ही नहीं जाता। और जब फिल्म हिट [संगीत] हुई तो बॉलीवुड के क्रिटिक्स ने तंज कसा कि निर्देशकों ने उन्हें गूंगा इसलिए बनाया क्योंकि इस दक्षिण भारतीय [संगीत] लड़की को हिंदी का एक शब्द भी नहीं आता। जब उन्होंने हिंदी फिल्मों [संगीत] में डायलॉग वाले रोल करने शुरू किए तो उनकी आवाज को पेशेवर डबिंग आर्टिस्ट द्वारा डब किया जाता था। एक स्थापित सुपरस्टार होने [संगीत] के बावजूद अपनी ही शक्ल पर किसी और की आवाज सुनना यह उनके स्वाभिमान के लिए एक [संगीत] गहरी ठेस थी। लेकिन यहां जया प्रथा का वो जुझारू किरदार सामने आया जो उन्हें बाकी सबसे अलग बनाता था। आलोचनाओं से हार मानकर वापस दक्षिण भारत लौट जाना उन्होंने स्वीकार नहीं किया। उन्होंने हिंदी भाषा पर महारत हासिल करने का फैसला किया और हर सुबह 4:00 बजे उठकर घंटों [संगीत] हिंदी डिक्शन और उच्चारण की ट्रेनिंग लेने लगी।
आईने के सामने खड़े होकर भारीभरकम संवाद बोलने का अभ्यास [संगीत] कर दी। दिन रात एक कर दिया। इस अथक मेहनत का नतीजा दिखा 1982 की फिल्म कामचोर में। राकेश रोशन [संगीत] के अपोजिट इस फिल्म में उन्होंने पूरी तरह से खुद अपने डायलॉग बोले और आलोचकों का मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया। कामचोर की ब्लॉकबस्टर सफलता के बाद बॉलीवुड में उनके घर के बाहर बड़े-बड़े [संगीत] निर्माताओं की कतार लग गई। 80 और 90 का दशक जया प्रदा के निर्विवाद राज का गवाह बना। उन्होंने उस दौर के लगभग हर बड़े सुपरस्टार के [संगीत] साथ काम किया। अमिताभ बच्चन के साथ शराबी और आखिरी रास्ता ने तहलका मचा दिया। जितेंद्र के साथ तो उन्होंने तोहफा, संयोग, [संगीत] मवाली और स्वर्ग से सुंदर जैसी फिल्मों की ऐसी झड़ी लगाई कि बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड टूट गए। धर्मेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती, जितेंद्र सबके साथ उनकी ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री दर्शकों को मंत्रमुग्ध करती थी। वो ना सिर्फ अपनी पीढ़ी की सबसे अधिक फीस लेने वाली अभिनेत्री बनी बल्कि हिंदी, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम चारों सिनेमाओं में उनका समान रूप से दबदबा था। तीन दशक के करियर में उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। यह वो दौर था जब सत्यजीत [संगीत] रे ने उन्हें भारतीय स्क्रीन का सबसे खूबसूरत चेहरा करार दिया था। लेकिन जब करियर अपने सबसे सुनहरे मुकाम पर था, सफलता कदम चूम रही थी, तभी जिंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया जिसने सब कुछ बदल दिया। उनके घर पर इनकम टैक्स विभाग की एक अघोषित और भयानक रेट पड़ी। यह वो पल था जब पूरी फिल्म इंडस्ट्री का असली चेहरा सामने आया। जिसके लिए [संगीत] उन्होंने दिन रात एक करके करोड़ों रुपए कमाए थे। उस पूरी इंडस्ट्री में से कोई एक शख्स, कोई सह कलाकार, [संगीत] कोई बड़ा निर्माता उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। वो सब जो आज इंडस्ट्री को एक सुरक्षित थाली और परिवार बताते हैं। उस [संगीत] वक्त खामोशी से मुंह फेर कर तमाशा देख रहे थे। इसी घोर निराशा और अकेलेपन के दौर में एक इंसान फरिश्ते की तरह सामने आया। फिल्म निर्माता श्रीकांत ना हटा। उन्होंने ना सिर्फ जया प्रदा को उस कानूनी और वित्तीय भवर से निकाला बल्कि मानसिक रूप से [संगीत] टूट चुकी अपनों से धोखा खा चुकी जया को एक मजबूत भावनात्मक सहारा भी दिया। एक ऐसी औरत जो पर्दे पर देवी थी, लेकिन असल जिंदगी [संगीत] में बिल्कुल अकेली थी, उसके लिए यह सहारा किसी डूबते को तिनके जैसा था। धीरे-धीरे यह सहारा और आभार प्यार का रूप लेता गया। लेकिन यह प्यार कोई आम खुशनुमा प्रेम कहानी नहीं थी।
श्रीकांत नाहटा पहले से ही चंद्रा नाहटा नाम की महिला से शादीशुदा [संगीत] थे और तीन बच्चों के पिता थे। यह सब जानते हुए भी भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर पड़ चुकी [संगीत] और श्रीकांत के प्यार में गिरफ्तार जया प्रदा ने 22 फरवरी 1986 को उनसे गुपचुप तरीके से शादी कर ली। जैसे ही [संगीत] यह खबर मीडिया में लीक हुई, पूरे देश और फिल्म इंडस्ट्री में भूचाल आ गया। सबसे बड़ा विवाद इस बात पर था कि श्रीकांत [संगीत] ने जया से दूसरी शादी करने के लिए अपनी पहली पत्नी चंद्रा को तलाक नहीं दिया था। [संगीत] समाज ने उनके दशकों के कड़े संघर्ष, उनकी बेदाग छवि, और उनकी कला को एक [संगीत] झटके में दरकिनार करते हुए रातों-रात उनके माथे पर दूसरी औरत का कलंकित टैग लगा दिया। वो समाज जो कल तक उनकी पूजा करता था अचानक उनके चरित्र पर उंगलियां उठाने लगा। एक वक्त ऐसा आया जब मीडिया ट्रायल और सामाजिक [संगीत] तानों के कारण उनका अपने ही घर से बाहर निकलना दुभ हो गया। और यह शादी जिसे जया प्रदा ने [संगीत] अपनी जिंदगी का अंतिम सहारा माना था। वो उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन गई। कानूनी और सामाजिक तौर पर उन्हें पत्नी का वो दर्जा और सम्मान कभी नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी। श्रीकांत अपनी पहली [संगीत] पत्नी चंद्रा और अपने बच्चों के साथ ही एक घर में रहते थे और जया को एक अलग घर में एकाकी और घुटन भरा जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ा। वो एक [संगीत] ऐसी विवाहिता बन गई जिसका पति उसका अपना होकर भी उसका नहीं था। इस रिश्ते का सबसे दिल दहला देने वाला पहलू तब सामने आया [संगीत] जब जया से शादी के बाद श्रीकांत की पहली पत्नी ने उनके एक और बच्चे को जन्म दिया। यह घटना जया के स्वाभिमान, [संगीत] उनके अस्तित्व और उनके वजूद पर एक क्रूर आघात था। एक मां बनने की, अपने आंगन में किलकारियां सुनने की इच्छा। यह एक स्त्री का सबसे [संगीत] स्वाभाविक सपना था। जया प्रदा ने कई बार यह इच्छा श्रीकांत के सामने जाहिर की। लेकिन श्रीकांत जया के साथ बच्चा पैदा करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। एक ही आदमी को बांटने की मजबूरी, पहली पत्नी के बच्चों का सामना, लगातार बढ़ता एकाकीपन और मातृत्व से हमेशा के लिए वंचित रहने का गहरा अवसाद। इन सब ने दोनों के बीच भयंकर कड़वाहट भर दी। अंततः दोनों के बीच अलगाव हो गया। जया ने श्रीकांत से अलग होने के [संगीत] बाद दोबारा कभी शादी नहीं की। मातृत्व की इस भयानक खालीपन को भरने के लिए उन्होंने अपने सगी बहन के बेटे सिद्धू को कानूनी रूप से गोद लिया और उसे एक सगी मां से भी बढ़कर पाला। आज वह उसी बेटे के साथ रहती हैं। लेकिन दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला कही जाने और अपार दौलत होने [संगीत] के बावजूद खुद मां ना बन पाने की वो कसक आज भी उनकी आंखों में झलकती है। निजी जिंदगी के इस दर्दनाक तूफान [संगीत] के बीच-बीच में एक और जंग चल रही थी। और वो जंग थी उस दौर की एक और दिग्गज अभिनेत्री [संगीत] श्रीदेवी के साथ। दोनों ही दक्षिण भारत से आई थी। दोनों ही बेहतरीन डांसर थीं और दोनों के चाहने वालों की संख्या करोड़ों में थी। मीडिया हमेशा दोनों की तुलना करता रहता था।
लेकिन असली चिंगारी [संगीत] तब भड़की जब सुपरहिट फिल्म नगीना का ऑफर जो पहले जरा प्रदा को दिया गया था किन्ही [संगीत] अज्ञात कारणों से श्रीदेवी की झोली में चला गया। नगीना बॉक्स ऑफिस पर ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर रही और श्रीदेवी रातोंरात नंबर वन की कुर्सी पर काबिज हो गई। यहीं से दोनों के बीच एक ऐसी भीषण प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या और नफरत शुरू हुई, जिसने [संगीत] पूरे बॉलीवुड को दो खेमों में बांट दिया। यह दुश्मनी इतनी गहरी थी कि इन दोनों अभिनेत्रियों [संगीत] ने लगभग 25 से 30 सालों तक एक दूसरे से सीधे मुंह बात नहीं की। दोनों ने तोहफा, अंबावाली और मकसद जैसी करीब नौ बड़ी फिल्मों में एक साथ काम किया। पर्दे पर सगी बहनों और पक्की सहेलियों का किरदार भी निभाया। लेकिन जैसे ही डायरेक्टर कट बोलता, [संगीत] दोनों सेट के दो अलग-अलग कोनों में जाकर बैठ जाती थी। उनकी नफरत का आलम यह था कि वो एक दूसरे से नजरें मिलाना भी बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। [संगीत] इस मशहूर दुश्मनी को खत्म करने के लिए 1984 में फिल्म मकसद के सेट पर जितेंद्र और राजेश खन्ना ने एक अजीब और गरीब योजना बनाई। लंच के समय जया प्रदा और श्रीदेवी को धोखे से एक ही मेकअप रूम में धकेल दिया और बाहर से ताला लगा दिया। [संगीत] दोनों अभिनेताओं को लगा कि 1 घंटे में भूख और मजबूरी में दोनों बात करेंगे। बर्फ [संगीत] पिघले की सुलह हो जाएगी। लेकिन ठीक 1 घंटे बाद जब दरवाजा खुला वहां मौजूद हर शख्स सन रह गया। दोनों अभिनेत्रियां कमरे के दो अलग-अलग कोनों में एक दूसरे की तरफ पीठ किए बिना एक शब्द बोले खामोश और जिद में बैठी थी। यह शीत युद्ध आखिरकार 25 साल के लंबे अंतराल के बाद 2015 में तब थमा जब जया प्रदा ने बड़ा दिल दिखाते हुए पहल की और श्रीदेवी को अपने बेटे सम्राट की शादी में ससम्मान आमंत्रित किया। वहां दोनों दिग्गज अभिनेत्रियां पुरानी कड़वाहटों को भुलाकर [संगीत] हंसते हुए गले मिली। लेकिन 2018 में श्रीदेवी के अचानक और दुखद निधन के बाद कपिल शर्मा के शो पर जया प्रदा फूट-फूट कर रो पड़ी और कहा कि काश उन्होंने उन 25 [संगीत] सालों में अपनी इस प्रतिद्वंदी और साथी से बात कर ली होती। यह दुश्मनी बॉलीवुड के इतिहास की [संगीत] सबसे चर्चित और कड़वी कहानियों में दर्ज हो गई। फिल्मी दुनिया से धीरे-धीरे दूर होते हुए जया प्रदा ने राजनीति की तरफ रुख [संगीत] किया। 1983 में उन्होंने अपने पुराने तेलुगु के सह कलाकार एनटी राम राव के चुनाव प्रचार में हिस्सा लेकर पहली बार राजनीति का स्वाद चखा था। फिर 1994 में उन्होंने तेलुगु देशम पार्टी यानी टीडीपी का दामन थाम लिया। पार्टी में उनका कद बेहद तेजी से बढ़ा और 1996 में आंध्र प्रदेश से राज्यसभा की सदस्य बनी। लेकिन चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली पार्टी में गुटबाजी ने उनका मुंह भंग कर दिया। इसी हताशा के दौर में उनकी मुलाकात दिल्ली के पावर ब्रोकर और समाजवादी [संगीत] पार्टी के कद्दामर नेता अमर सिंह से हुई। अमर सिंह ने जयाप्रदा के ग्लैमर के प्रभाव को पहचाना। जया प्रदा ने उत्तर प्रदेश की जटिल राजनीति में एंट्री मारते हुए समाजवादी पार्टी ज्वाइन कर ली। दक्षिण की एक गैर हिंदी भाषी ग्लैमरस अभिनेत्री के लिए उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के बेहद जटिल, जातिवादी और बाहुबलियों से भरे राजनीतिक मैदान में अपनी जगह बनाना असंभव सा काम था।
लेकिन जया प्रदा ने इसे एक चुनौती की तरह लिया। मुलायम सिंह यादव के सानिध्य में उनका राजनीतिक ग्राफ तेजी [संगीत] से ऊपर चढ़ा और यही उनकी पहली मुलाकात रामपुर के दबंग मुस्लिम नेता आजम खान से हुई। शुरुआत में यही आजम खान थे जिन्होंने रामपुर की राजनीति में जया प्रदा का खुलकर समर्थन किया था। 2004 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी [संगीत] पार्टी ने जयाप्रदा को रामपुर लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार घोषित किया। रामपुर जो नवाबों [संगीत] का शहर और पारंपरिक मुस्लिम राजनीति का एक अभेद्य किला माना जाता था। वहां जयाप्रदा ने अपनी कड़ी मेहनत और अपने स्टारडम के दम पर इतिहास रच दिया। उन्होंने अपनी प्रतिद्वंदी और रामपुर राजघराने की बेगम नूर बानो को 85,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से धूल चटा दी। ये जीत ने पूरी [संगीत] दिल्ली और यूपी की राजनीति को चौंका दिया। 2009 में उन्होंने सभी विरोधों के बावजूद फिर से इसी सीट पर फतेह हासिल की। लेकिन राजनीति का यह दस्तूर है कि साहब जैसे-जैसे आपका रसूख बढ़ता है, दुश्मनों की साजिशें भी बढ़ती जाती हैं। रामपुर में जया [संगीत] प्रदा के बढ़ते प्रभाव और अमर सिंह से उनकी नजदीकियों ने सबसे ज्यादा बेचैन किया आजम खान को। विवाद की असली चिंगारी तब भड़की जब [संगीत] पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को समाजवादी पार्टी के करीब लाया गया। जया प्रदा ने इस मुद्दे पर अमर सिंह का खुलकर समर्थन किया जो आजम खान को बिल्कुल नागवार गुजरा और फिर 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान यह वैचारिक तनाव एक व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल गया।
आजम खान और उनके समर्थकों ने एक महिला [संगीत] राजनेता के चरित्र हनन का वो घिनौना खेल खेला, जो भारतीय राजनीति के सबसे काले पन्नों में दर्ज है। पूरे रामपुर शहर की दीवारों पर उनके फिल्मों के दिनों के अश्लील मॉर्फ पोस्टर चिपकाए गए और फर्जी वीडियो सीडी घर-घर बंटवाई गई। एक वक्त ऐसा आया जब जया प्रदा के लिए अपने ही संसदीय क्षेत्र की सड़कों पर प्रचार करना किसी खौफनाक सपने से कम नहीं था। इस दौर में जब आजम खान खुलेआम उनके दुश्मन बन गए थे तब केवल एक इंसान चट्टान की तरह उनके सामने ढाल बनकर खड़ा हुआ। [संगीत] अमर सिंह जया प्रदा उन्हें राजनीति में अपना गॉडफादर और बड़ा भाई मानती थी। हर साल राखी भी बांधती थी। लेकिन इस पवित्र भाई-बहन के रिश्ते को भी दुश्मनों ने नहीं बख्शा। [संगीत] जया प्रदा और अमर सिंह के अफेयर के झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाए गए। [संगीत] फर्जी तस्वीरें फैलाकर दोनों के चरित्र को तार-तार करने की कोशिश की गई। आजम खान की वजह से पार्टी की आंतरिक राजनीति और दबाव इतना हावी हो गया कि 2010 में पार्टी विरोधी गतिविधियों का बेबुनियाद आरोप लगाकर जयाप्रदा और अमर सिंह दोनों को समाजवादी पार्टी से हमेशा के लिए निष्कासित कर दिया गया। समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के बाद जया प्रदा और अमर सिंह ने 2011 में अपनी खुद की नई राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय लोक मंच का गठन किया। उन्होंने सोचा जनता उनके साथ हुए अन्याय का बदला वोट से देगी। लेकिन 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सैकड़ों सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बावजूद उन्हें पूरे राज्य में एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई। यह उनके राजनीतिक करियर का एक कमर तोड़ देने वाला झटका था। 2014 के [संगीत] लोकसभा चुनावों से पहले वो राष्ट्रीय लोकदल में शामिल हुई
और बिजनौर सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन फिर हार का सामना करना पड़ा। [संगीत] राजनीतिक वनवास का ये दौर बेहद लंबा और थका देने वाला था। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले उन्होंने [संगीत] भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा। भाजपा ने उन्हें एक बार फिर रामपुर से उनके धुर और कट्टर विरोधी [संगीत] आजम खान के खिलाफ उतारा जिससे उनकी पहले ही व्यक्तिगत दुश्मनी रह चुकी थी। यह चुनाव केवल एक राजनीति लड़ाई नहीं थी। यह एक आत्मसम्मान की जंग थी। इसी चुनाव के प्रचार के दौरान उन पर आजम खान के समर्थकों द्वारा सरेआम पत्थरबाजी हुई। उन्होंने अपनी जान पर हमले झेले लेकिन बेशर्मी की सारी हदें तो चुनाव प्रचार के दौरान पार हो गई। जब आजम खान ने एक सार्वजनिक रैली में मंच से हजारों की भीड़ के सामने जयाप्रदा के लिए खाकी अंडरवेयर जैसी अश्लील [संगीत] टिप्पणी की। आपको पहचानने में 17 बरस लगे। मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनके नीचे का जो अंडरवेयर है वह खाकी रंग का है। [
संगीत] यह सुनकर पूरे देश में गुस्से की लहर दौड़ गई। इस बयान पर आजम खान के खिलाफ एफआईआर दर्ज [संगीत] हुई लेकिन जो जख्म जयप्रदा के जहन पर पड़ा वो शायद कोई कानून नहीं भर सकता। इस मानसिक उत्पीड़न का स्तर इतना भयानक था कि जया प्रदा को हर वक्त [संगीत] एसिड अटैक होने और अपनी जान जाने का खौफ सताने लगा था। हम लोग इसको रिपीट भी नहीं कर सकते। [संगीत] इसको वापस हम यह यह टिप्पणी किया करके हम मुंह से बोल भी नहीं सकते हैं। उस तरह की जुबान इन्होंने इस्तेमाल किया है। इस एक टेलीविजन इंटरव्यू में दुनिया के सामने फूट-फूट कर रोते हुए उन्होंने यह खौफनाक सच कबूला कि इस लगातार हो रहे चरित्र हनन ने उन्हें अंदर से इस कदर तोड़ दिया था कि कई बार उनके मन में अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेने तक के ख्याल आने लगे थे [संगीत] और अंत में 2019 के चुनाव में उन्हें आजम खान के हाथों हार का सामना करना पड़ा। लेकिन दुखों का अंत यहां नहीं हुआ। चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के पुराने मामलों में कोर्ट के समन की अनदेखी पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें फरार घोषित कर दिया और फिर आया उनकी जिंदगी का सबसे खौफनाक मंजर। उनके चेन्नई स्थित एक पुराने थिएटर के कर्मचारियों के ईएसआई फंड के विवाद में उनके घर और संपत्तियों पर इनकम टैक्स और पुलिस की रेट पड़ी। 300 से अधिक हथियारों से लैस पुलिसकर्मियों ने उनके घर को पूरी तरह से घेर लिया [संगीत] और उन्हें उनके ही घर में उन्हें बंधक जैसी स्थिति में डाल दिया। चेन्नई की एक अदालत ने इस मामले में उन्हें 6 महीने जेल की सजा और ₹5000 का जुर्माना भी सुना दिया।
एक भावुक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि इस [संगीत] पूरी व्यवस्था, मुकदमों और राजनीति ने उन्हें शारीरिक, आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह खोखला कर दिया है। सत्यजीत रे द्वारा भारतीय स्क्रीन का सबसे खूबसूरत चेहरा कहलाने वाली मासूम ललिता रानी अदालतों के चक्कर काटती। पुलिस छापों का सामना करती और राजनीतिक मंचों पर सरेआम गालियां सुनती। उनकी जिंदगी किसी भी सुपरहिट फिल्म की तरह प्यार, शोहरत, धोखों, आंसुओं और एकाकीपन से भरी रही है। लेकिन इन सबके बावजूद वो एक ऐसी मजबूत और जिद्दी महिला है जिसने तमाम तूफानों के आगे कभी हमेशा के लिए घुटने नहीं टेके। शोहरत की कीमत असल में कितनी भारी होती है। जया प्रदा की जिंदगी इसका सबसे दर्दनाक और जीता जागता सबूत है। कभी-कभी जिंदगी हमें वो सब दे देती है जिसका हम सपना देखते हैं। नाम, शोहरत, दौलत। लेकिन फिर चुपचाप हमसे वो सब छीन भी लेती है जो सबसे ज्यादा मायने रखता है। इस कहानी में भी एक चेहरा था जो हमेशा मुस्कुराता रहा। लेकिन उसकी आंखों [संगीत] में छिपा दर्द शायद ही किसी ने सच में देखा। कितनी अजीब बात है ना। भीड़ में घिरे रहने वाला इंसान अंदर से सबसे ज्यादा अकेला होता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि हर चमक सोना नहीं होती और हर जीत सुकून नहीं देती। कभी-कभी सबसे बड़ी हार वही होती है जिसे दुनिया जीत समझती है। और शायद जिंदगी का सबसे कड़वा सच यही है कि कुछ जख्म [संगीत] वक्त के साथ नहीं भरते। बस हम उन्हें छुपाना सीख जाते हैं। आज भी कहीं ना कहीं वो खामोशी, वो खालीपन अब भी वही है। क्योंकि कुछ कहानियां खत्म नहीं होती। वो बस हमारे अंदर गूंजती रहती हैं। अगर यह कहानी आपको सच में कुछ महसूस करवा पाई हो, तो वीडियो को [संगीत] लाइक करें, शेयर करें, और चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें।