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क्यों इंदिरा गांधी की जुड़वा बहन कहलाती थीं शोले की ‘मौसी’? वजह चौंका देगी

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पूरे सेट के साथ-साथ खुद राजेश खन्ना दंग थे क्योंकि लीला मिश्रा उन्हें किसी की जिंदगी की पूरी कहानी को केवल एक वीडियो में समेट देना मुश्किल है। मुश्किल है? नामुमकिन नहीं। आज मैं आपके लिए बॉलीवुड की मौसी के नाम से मशहूर एक्ट्रेस लीला मिश्रा की जिंदगी की पूरी कहानी लेकर आया हूं। इंदिरा गांधी की बहन कैसे बनी शोले फिल्म की मशहूर मौसी। लीला मिश्रा ने कैसे सुपरस्टार राजेश खन्ना के घमंड का सिर कुचला। और महान डायरेक्टर सई परंजप के मुताबिक क्यों करी लीला मिश्रा ने आत्महत्या? इन तीन दिलचस्प सवालों के बेहद दिलचस्प जवाब आपको मिलेंगे सिर्फ इस एक वीडियो में। तो चलिए शुरू करते हैं। वैसे एबीपी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक लीला मिश्रा का जन्म आगरा में हुआ। मगर अधिकतर भरोसेमंद स्रोत कहते हैं कि लीला मिश्रा का जन्म 1 जनवरी सन 1908 को रायबरेली के छोटे से कस्बे जायस में हुआ था। जो तब यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ आगरा एंड अवध का हिस्सा था। यह वही जायस है जहां के मलिक मोहम्मद जायसी ने महाग्रंथ पद्मावत की रचना की जिस पर संजय लीला भंसाली ने एक फिल्म बनाई दीपिका पादुकोण वाली पद्मावत लीला के घरवाले जमींदार थे। मिश्रा परिवार बेहद रूढ़िवादी था। इसीलिए तो लीला के स्कूल या पढ़ाई लिखाई की कोई व्यवस्था नहीं की गई। बल्कि 12 साल की होते ही लीला की शादी कर दी गई। एक दूसरे जमींदार मिश्रा परिवार में लीला के पति का नाम था राम प्रसाद मिश्र।

12 की उम्र में शादी हो गई तो 17 साल की होते-होते लीला दो बेटियों की मां बन गई। जाने कितनी लड़कियों की तरह लीला ने भी बाल विवाह से बुढ़ापे तक की जिंदगी यूं ही काट दी होती। लेकिन लीला की जिंदगी बदली उनके पति के कारण। भले ही मिश्रा परिवार बेहद रूढ़िवादी हो लेकिन राम प्रसाद मिश्र बहुत आजाद ख्यालों के थे। उनका अक्सर बंबई आना जाना होता रहता था और वो फिल्में देखने के शौकीन थे। यहां तक कि चुपके-चपके वो बंबई की साइलेंट फिल्मों में काम भी करते थे। साल था 1934, महीना था जून। इस बार राम प्रसाद मिश्र जब बंबई गए तो अपने साथ लीला को भी ले गए और यही था लीला मिश्रा की जिंदगी का टर्निंग पॉइंट। मामा शिंद दादा साहब फाल्के की फिल्म कंपनी नासिक सिनेटोन में काम करते थे और लीला के पति राम प्रसाद मिश्र के जिगरी दोस्त थे। एक दिन वो अपने जिगरी दोस्त से मिलने उसके घर पहुंचे। तो लीला उनके लिए चाय पानी लेकर आई। उन्होंने लीला को देखा तो दंग हो गए और रामप्रसाद से बोले इन्हें तो फिल्मों में काम करना चाहिए। भले ही राम प्रसाद के ख्याल बहुत आजाद थे लेकिन लीला प्रथाओं की पुजारन थी और फिल्मों से तो घिन खाती थी। टुक से टोका उन्होंने कभी नहीं।

भले ही राम प्रसाद बड़े आजाद ख्यालों के थे लेकिन अपनी पत्नी के फिल्म में काम करने की बात से उनकी भी त्योरियां चढ़ गई। लेकिन मामा शिंद के समझाने से वो मान गई और उनके समझाने से लीला मान गई। फिर दोनों पतिप नासिक सिनेटोन की फिल्म में काम करने नासिक चली गई। फिल्म सती सुलोचना में राम प्रसाद को रावण का रोल और लीला को मंदोदरी का किरदार मिला। उस जमाने में फिल्मों के अंदर अदाकाराओं का कैसा अकाल था यह आप इस फैक्ट से समझ सकते हैं कि रावण का रोल करने वाले एक्टर राम प्रसाद मिश्र को ₹150 मिले और उसी फिल्म में मंदोदरी का रोल करने वाली उनकी पत्नी अदाकारा लीला मिश्रा को ₹500 मिले लेकिन ठीक ढंग से एक्टिंग ना कर पाने के कारण दोनों को ही फिल्म से निकाल दिया गया। इसके बाद कोल्हापुर सिनेटोन कोल्हापुर के महाराज जिसके मालिक थे के साथ इन दोनों का एक कॉन्ट्रैक्ट हुआ। जिसके तहत लीला मिश्रा को फिल्म भिखारिन में बतौर हीरोइन कास्ट किया गया। लेकिन बहुत बड़ा बलवा हो गया। दरअसल लीला को पता लगा कि डायलॉग बोलने के दौरान उन्हें अपने हीरों के चारों ओर बाहें डालनी है। छी वो उनका पति नहीं है। ऐसे गैर मर्द को वो कैसे छू सकती हैं? उनका पतिवत धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।

उनके संस्कार उन्हें इसकी इजाजत नहीं देते। उनसे ऐसा महापाप नहीं होगा। ऐसा कहकर उन्होंने मना कर दिया। इसीलिए उन्हें फिल्म से निकाल दिया गया। लेकिन फिर अगली फिल्म में भी यही हुआ। फिल्म होनहार की शूटिंग के दौरान लीला को पता चला कि उन्हें अपने हीरो शाहू मोदक के गले लगना है और फिर उन्हें गले लगाना है। लीला फिर अड़ गई। उन्होंने फिर इंकार कर दिया। डायरेक्टर को बहुत गुस्सा आया। मन किया कि लेकिन दोनों के साथ कॉन्ट्रैक्ट हुआ था और कंपनी के हाल बुरे थे। ऐसे में वह किसी कानूनी शिकंजे में नहीं फंसना चाहती थी। इसीलिए उसी फिल्म में लीला को शाहू मोदक की मां का रोल ऑफर कर दिया गया। जिसे लीला ने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। और यहीं से खुला मात्र 24-25 साल की छोटी उम्र में लीला मिश्रा के फिल्मों में मां का किरदार निभाने का रास्ता। 1937 में रिलीज हुई फिल्म गंगा अवतरण लीला मिश्रा की पहली बड़ी हिट थी। जिसमें उन्होंने माता पार्वती का किरदार निभाया। 1940 में लीला कोलकाता चली गई और वहां उन्होंने तीन फिल्मों में काम किया। आरसी तलवार की खामोशी, फाजिल ब्रदर्स की कैदी और केदार शर्मा की चित्रलेखा। 1941 में लीला बंबई लौट आई। और 1942 में उनकी फिल्म किसी से ना कहना सुपर डुपर हिट हुई। जिसके बाद लीला मिश्रा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हां, यह अलग बात है कि उनके पति करियर में उनसे पीछे रह गई। 1940, 1950 और 60 के पूरे दशक में लीला मिश्रा ने पृथ्वी वल्लभ महाकवि कालिदास जीनत अनमोल घड़ी पन्नादाई ऐलान दौलत आराम शीश महल शहनाई आवारा पटरानी प्यासा लाजवंती उम्मीद दोस्ती राम और श्याम लीडर मझली दीदी तुमसे अच्छा कौन है धरती कहे पुकार के और पतिप जैसी कई फिल्मों में मैटरनल फिगर के किरदार निभाए यानी मां मामी मौसी चाची ताई फूफी बुआ के रोल्स मगर पांच दशक के अपने लंबे करियर में लीला ने कभी भी वो दो कसमें नहीं तोड़ी जो उन्होंने करियर की शुरुआत में खाई थी। पहली उनके सिर से पल्लू कभी नहीं उतरेगा। शुरू शुरू में जब वो सेट पर पल्लू ओढ़ कर जाती थी तब उनका मजाक उड़ाया जाता था। लेकिन आप देख लीजिए किसी भी फिल्म में लीला का सिर बिना पल्लू के नहीं मिलता। और दूसरा वो कभी किसी फिल्म में रोमांटिक रोल नहीं करेंगी। इसीलिए आप देख लीजिए हर फिल्म में लीला ने सफेद साड़ी ही पहनी। भले ही लीला ने अपने 50 साल के फिल्म करियर में अनगिनत फिल्मों में काम किया लेकिन उनका नाम सिर्फ एक फिल्म से हुआ। पूरे हिंदुस्तान में वो शोले की मौसी के रूप में याद की जाती हैं। और सच ही तो है जब भी हिंदी सिनेमा की कालजई फिल्म शोले का जिक्र होता है तो बसंती की मौसी याद आती है। मौसी के बोलने का अंदाज बसंती को डांट लगाने का अंदाज। जय वी के साथ मौसी की मस्ती भरी बातें। इनके बिना वो जिक्र कहां पूरा होता है?

एक दिलचस्प बात बताऊं। एबीपी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक लीला मिश्रा से फिल्म इंडस्ट्री में लोग डरते थे। उनके हम है सिर्फ हम बाकी सारे पानी कम वाले एटीट्यूड के कारण। वो किसी को अपने सामने कुछ समझती ही नहीं थी। और इसकी सबसे बड़ी मिसाल है एक बार वो राजेश खन्ना के साथ फिल्म में काम कर रही थी। पूरे सेट के साथ-साथ खुद राजेश खन्ना दंग थे क्योंकि लीला मिश्रा उन्हें सुपरस्टार राजेश खन्ना की तरह नहीं एक आम एक्टर की तरह ट्रीट कर रही थी। अमर प्रेम, आंचल, महबूबा, पलकों की छांव में जैसी राजेश खन्ना की बहुत सारी फिल्मों में वो राजेश खन्ना के साथ थी और हर फिल्म की शूटिंग के दौरान इसी तरह से काका के सुपरस्टारडम के घमंड को चूर किया करती थी। सत्यजीत रे यह नाम हर फिल्म कलाकार या हर सिनेमा प्रेमी भी जब लेता है ना तो कान पर उंगली रख लेता है। वर्ल्ड क्लास फिल्म मेकर ने लीला मिश्रा को अपनी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में एक रोल ऑफर किया। कलाकार इसी बात पर खुशी से उछलने लगता है। फूला नहीं समाता है। और लीला उनकी आंखों में आंखें डालकर बोली पैसा दोगे कि नहीं? सत्यजीत वे की आंखें फटी की फटी रह गई। लेकिन कमाल की बात जानते हैं क्या? लीला ने इस फिल्म में एक भी पैसा नहीं लिया। मुफ्त में काम किया। अपनी शर्तों के मुताबिक काम करना, अपने आगे किसी को कुछ ना समझना, अपने मन मुताबिक फैसले लेना। यह वो बातें थी जिस कारण आज की यूथिय लैंग्वेज में कहें तो लीला में एक ठरक थी। ठरकी व्यक्तित्व था उनका औरकि वो रायबरेली से आती थी। इसीलिए आईएस जौहर, असरानी, सत्यजीत रे जैसे इंडस्ट्री में लोग उन्हें इंदिरा गांधी की जुड़वा बहन कहा करते थे। आप चौंक जाएंगे जानकर कि 50 साल के अपने करियर में 400 से ज्यादा फिल्में करने वाली लीला मिश्रा ने अपनी जिंदगी में एक फिल्म नहीं देखी।

फिल्में देखती ही नहीं थी वो। लोग चौंकते थे कि फिल्म में काम करती हैं लेकिन फिल्म देखती नहीं। एक बार उनसे यही सवाल पूछ लिया गया तो लीला ने जवाब दिया फिल्म का टिकट खरीदो। फिर टैक्सी करके वहां पहुंचो। खचाखच भरे सिनेमाघर में फिल्म देखो। मुझे तो यह पैसों की बर्बादी लगती है। इससे अच्छा मैं अपना वक्त और पैसा अच्छे खाने, अच्छे पड़ोसियों और अच्छी पुस्तकों पर लगाना पसंद करती हूं। जैसे रामायण सई परंजप बॉलीवुड की वन ऑफ द ग्रेट फिल्म डायरेक्टर कही जाती हैं। क्योंकि उन्होंने 70ज 80ज के उस दौर में बतौर डायरेक्टर हिंदी सिनेमा में अपना सिक्का जमाया जब फिल्म इंडस्ट्री में मर्दों का अटूट राज था। सई परंजप बताती हैं कि लीला मिश्रा भले पढ़ी लिखी नहीं थी। उनकी पढ़ाई लिखाई तो हुई नहीं थी लेकिन फिर भी इतने सालों के अनुभव से उनके अंदर एक गजब का फिल्म सेंस था। उनका अपना फिल्म सेंस। सई ने उनके साथ कल्ट क्लासिक फिल्म चश्मे बद्दू में काम किया। और सई बताती हैं कि हर सीन को लीला अपने अनोखे इंप्रोवाइजेशन से और सुंदर बना देती थी। मगर इसी प्रोफेशनलिज्म ने लीला को खत्म कर दिया या यूं कहें कि उनकी जान ले ली। दरअसल सई पंजपाई बताती हैं कि लीला दाता फिल्म की शूटिंग कर रही थी। शूटिंग के दौरान उन्हें लकवा मार गया। सेट पर हड़कंप हो गया। लीला की बॉडी पैरालाइज्ड हो गई। चारों ओर बातें होने लगी कि उन्हें जल्द से जल्द मुंबई कैसे ले जाया जाए। तभी लीला बोली हमें कुछ और सीन शूट करने हैं और मैं उन्हें पूरा करके ही जाऊंगी। सब लोगों ने कहा लीला जी आप कैसे शूट कर सकती हैं? आपको लकवा मारा है।

लीला ने डायरेक्टर को कहा कि उनके शरीर के उस हिस्से को शूट किया जाए जो ठीक है। लीला के अपने काम के प्रति ऐसा समर्पण ऐसी शिद्दत देख वहां मौजूद सब लोगों ने अपने दांतों तले उंगली दबा ली। लेकिन सई परंजपय के मुताबिक ये एक तरह की आत्महत्या थी। लीला का एक आत्मघाती फैसला क्योंकि शायद इसी कारण लीला को वक्त पर सही इलाज नहीं मिल सका जिस कारण दाता लीला मिश्रा की आखिरी फिल्म बन गई और 17 जनवरी सन 1988 को लीला मिश्रा हम सबको छोड़कर हिंदी सिनेमा को छोड़कर इस दुनिया से हमेशा हमेशा के लिए विदा हो गई। बड़े-बड़े फिल्म पत्रकार कहते हैं कि लीला मिश्रा का यूं चले जाना बॉलीवुड के दिल में एक छेद कर देता है। जो जब उन्हें याद करो तब दिखाई देता है। वीडियो को खत्म मैं एक दिलचस्प फैक्ट से करूंगा। मैंने बताया था ना कि 17 साल की उम्र में लीला मिश्रा दो बेटियों की मां बन गई थी। उनकी बड़ी बेटी का नाम था माधुरी मिश्रा जो अपनी मां के नक्शे कदम पर चलते हुए फिल्मों में अदाकारा बनी। चमकू, हसीना डकैत, देहातीती बाबू जैसी 101 फिल्मों में उन्होंने काम किया। लेकिन अपनी मां लीला मिश्रा जैसा मुकाम वह हासिल नहीं कर पाई।

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