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जब इंदिरा गांधी के फैसले ने एक उभरते हीरो को विलेन बनने पर मजबूर कर दिया

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आज के बाद लोटिया पठान की जिंदगी का एक ही मकसद होगा। इस एक्टर को आपने फिल्मों में अक्सर खूंखार गुंडे के रूप में देखा होगा। यह अपने रोल को इतनी शिद्दत से निभाते थे कि दर्शकों के दिल में उस गुंडे का खौफ बैठ जाता था। इन्होंने अपनी यह पहचान तब बनाई जब बॉलीवुड में पहले से ही बड़े-बड़े विलेन मौजूद थे। दोस्तों आप समझ गए होंगे कि हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड में लोटिया पठान नाम से मशहूर किरण कुमार की। पर क्या आप जानते हैं कि किरण कुमार बेशक हिंदी फिल्मों के सबसे पॉपुलर खलनायकों में से एक रहे हैं। पर उन्होंने अपनी फिल्मों की शुरुआत हीरो के तौर पर की थी। लेकिन इंदिरा गांधी के एक फैसले ने अच्छे खासे हीरो

को एक विलेन बना दिया। यह सब कहां से शुरू हुआ और कैसे हुआ? आइए जानते हैं। फिल्मी रही बचपन की कहानी। किरण कुमार मशहूर कैरेक्टर, आर्टिस्ट और विलेन जीवन कुमार के बेटे हैं। किरण बचपन से ही बेहद शरारती थे। अधिक लाड़ प्यार से उनको बिगाड़ दिया गया था। अपने बेटे की शरारतों को देखते हुए पिता जीवन कुमार ने किरण को बोर्डिंग स्कूल में भेजने का फैसला कर लिया। एडमिशन करवाते समय पिता ने स्कूल के बाहर लगा एक बोर्ड दिखाया और कहा कि यहां मेधावी बच्चों के नाम लिखे जाते हैं। यहां तुम्हारा भी नाम होना चाहिए। पर किरण का कभी भी पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगा। लेकिन क्रिकेट और ड्रामे की वजह से स्कूल के पॉपुलर स्टूडेंट बन गए और एक दिन स्कूल के उस बोर्ड पर उनका भी नाम लिखा गया जब कॉलेज से निकाले गए किरण।

किरण स्कूली पढ़ाई पूरी करके लौटे तो एक दिन पिता जीवन कुमार ने नए-नए एफटीआईआई से पढ़कर आए एक एक्टर से उन्हें मिलवाया। उस एक्टर का नाम था शत्रुघ्न सिन्हा। किरण ने अपनी एक्टिंग में दिलचस्पी के बारे में उन्हें बताया तो शत्रुघ्न सिन्हा ने सलाह दी कि एफटीआईआई में दाखिला ले लो और एक्टिंग सीखो। उन्होंने यह सलाह मानी और एडमिशन ले लिया। पढ़ाई ठीक-ठाक चल रही थी कि एक दिन हंगामा मच गया। एक्टिंग डिपार्टमेंट के छात्रों की डायरेक्शन डिपार्टमेंट के छात्रों से किसी बात पर भिड़ंत हो गई। बात बढ़ते-बढ़ते मारापीटी तक पहुंच गई। हालात बेकाबू हुए तो पुलिस बुलाई गई। किरण कुमार समेत चार छात्रों को कॉलेज से निकाल दिया गया। इस फैसले से एक्टिंग डिपार्टमेंट के छात्र नाराज हो गए। उनका कहना था कि लड़ाई तो डायरेक्शन वालों ने भी की थी। फिर उन्हें क्यों नहीं निकाला गया? एक्टिंग डिपार्टमेंट के छात्र कॉलेज मैनेजमेंट के इस फैसले का खिलाफ धरने पर बैठ गए।

कहते हैं कि 45 दिन तक कॉलेज बंद रहा। फिर मामला सुलझाने के लिए एक कमेटी बनाई गई। फेमस फिल्म मेकर ख्वाजा अहमद अब्बास भी इस कमेटी का हिस्सा थे। जिन्हें धरती के लाल, परदेसी, सात हिंदुस्तानी, दो बूंद पानी जैसी पुरस्कार विजेता फिल्मों के निर्देशन के लिए जाना जाता है। जब वह कॉलेज पहुंचे और किरण को पहचान गए और उनकी खूब लताड़ लगाई। बोले कि तुम्हारे पिता इतने शरीफ हैं और तुम गुंडागर्दी करते हो। डांट लगाते हुए बोले कि कल मेरे गेस्ट हाउस आकर मिलो। किरण डरे सहमे थे कि यहां और डांट पड़ेगी। अगले दिन जब गेस्ट हाउस पहुंचे तो सारा पासा ही पलट गया। डांटने की बजाय अब्बास साहब बोले कि मैं एक फिल्म बना रहा हूं दो बूंद पानी। उसमें लंबू इंजीनियर की जरूरत है। रोल करना चाहोगे? तो किरण कुमार ने खुशी-खुशी में फिल्म के लिए हां कर दी। यह फिल्म साल 1971 में रिलीज हुई जो किरण के लिए खास बन गई और उन्हें हीरो के तौर पर देखा जाने लगा। किरण को दूसरी फिल्म जोगिंदर शैली ने दी बंदिया और बंदूक जो साल 1972 में आई। इसके बाद उनके फिल्म जंगल में मंगल आई जो हिट रही। किरण को अपना हीरो बनने का सपना पूरा होता दिख रहा था। कई फिल्म मेकर्स ने उन्हें अपनी फिल्म में साइन कर लिया था। किरण ने 1973 और 1974 के बीच एक साथ छह फिल्में साइन की। ये सभी फिल्में कुछ ही समय के अंतराल में बनकर तैयार भी हो गई थी। उनकी जिंदगी में सब सही चल रहा था। इन छह फिल्मों की रिलीज़ डेट भी

निश्चित हो गई थी। लेकिन इसी बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को इमरजेंसी की घोषणा कर दी और इस वजह से कई फिल्मों पर भी रोक लगा दी गई। इसमें किरण की वो छह फिल्में भी लपेटे में आ गई जो उन्हें इंडस्ट्री का सुपरस्टार हीरो बना सकती थी। बस यहीं से उनका हीरो बनने का सपना टूट गया। साथ ही साथ एक वक्त ऐसा आया कि किरण के पास कोई काम नहीं था। इंदिरा गांधी का यही फैसला था जिसने एक हीरो को विलेन बनने पर मजबूर कर दिया। पर कौन जानता था कि यही अब उनकी सबसे बड़ी पहचान होने वाली है। यह कहानी तब शुरू हुई जब आशा पारिक ने एक बार अपनी गुजराती फिल्म के लिए किरण को विलेन के किरदार का प्रस्ताव दिया। डूबते करियर के लिए किरण ने इसके लिए तुरंत हामी भर दी और यहीं से वे नकारात्मक भूमिका की तरफ मुड़ गए। इसके बाद वे बॉलीवुड में 1987 में आई खुदगर्ज में विलिलेन के तौर पर नजर आए। वहीं 1988 में

तेजाब में जब उन्होंने लोटिया पठान का किरदार किया तो यह किरदार बॉलीवुड के यादगार विलेन की फहरिस्त में शामिल हो गया। लोडिटिया का यकीन अपने कर्जदारों की जुबान का मोहताज नहीं श्यामलाल अपनी इस नई शुरुआत के बाद वो दरार काला बाजार आज का अर्जुन थानेदार पत्थर की फूल खून का कर्ज हिना बोल राधा बोल आग ही आग धड़कन एलओसी कारगिल और बॉबी जासूस जैसी बड़ी फिल्मों में दिखाई दिए। फिल्मों के अलावा टीवी पर भी किरण कुमार हिट साबित हुए। उन्होंने जिंदगी, घुटन, साहिल, मंजिल, कथासागर और फिर एक दिन आर्यमान, एहसास, मर्यादा, विरासत जैसे धारावाहिकों में भी बेजोड़ काम किया। उनके निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने गुजराती अभिनेत्री सुषमा शर्मा से शादी की है। किरण कुमार अब भी एक्टिव हैं और पिछले दिनों वह अजय देवगन की फिल्म भोला में नजर आए थे। [घंटी की आवाज़]

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