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IAS दिव्या मित्तल ने क्यों दिया इस्तीफा?क्यों हो रही इतनी चर्चा? वजह चौंका देंगी।

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उत्तर प्रदेश की तेजतर्रार आईएएस अफसर दिव्या मित्तल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह उनका कोई प्रशासनिक फैसला या किसी अधिकारी को लगाई गई फटकार नहीं बल्कि उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया है।

दिव्या मित्तल ने रविवार को सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट लिखकर अपने इस्तीफे की जानकारी दी। इस्तीफे की वजह उन्होंने अपनी पोस्ट में क्या बताई वह आपको आगे बताएंगे। लेकिन इससे पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर दिव्या मित्तल है कौन जिनके इस्तीफे ने हर किसी को हैरान कर दिया है और वह कौन सी आईएएस अफसर हैं जिनके नाम की चर्चा उत्तर प्रदेश से लेकर सोशल मीडिया तक होती रही है और आखिर क्यों लोग उनके प्रशासनिक काम करने के तरीके को इतना अलग मानते हैं।

दरअसल दिव्या मित्तल मूल रूप से हरियाणा के रेवाड़ी की रहने वाली हैं। उन्होंने दिल्ली आईआईटी से बीटेक की पढ़ाई की और इसके बाद आईआईएम बेंगलुरु से एमबीए किया। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ पढ़ाई और सरकारी नौकरी तक सीमित नहीं है। आईएएस बनने से पहले दिव्या मित्तल लंदन में नौकरी कर चुकी हैं।

उनके पति गगनदीप सिंह भी उनके सहपाठी रहे हैं। दोनों ने पढ़ाई के बाद शादी की और विदेश में नौकरी करने चले गए। लेकिन कुछ समय बाद दोनों भारत लौट आए। इसके बाद दोनों ने साथ मिलकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। आज दोनों पति-पत्नी आईएएस अधिकारी हैं। यानी जिस विदेश में दोनों लाखों रुपए के सालाना पैकेज पर नौकरी कर रहे थे, उसे छोड़कर दोनों ने भारत लौटने और सिविल सेवा में जाने का फैसला किया।

देव्या मित्तल की पहचान सिर्फ उनकी शैक्षणिक योग्यता या सिविल सेवा परीक्षा की सफलता से नहीं बनी। उनकी पहचान बनी उनके काम करने के अंदाज से। उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालते हुए वह कई बार अपने सख्त और सीधे तेवरों की वजह से चर्चा में रही। लेकिन उनके समर्थक उन्हें सिर्फ सख्त अधिकारी नहीं बल्कि जमीन पर काम करने वाले अधिकारी के तौर पर देखते हैं। इसकी सबसे ज्यादा चर्चा तब हुई जब वह मिर्जापुर की जिलाधिकारी थी। मिर्जापुर का लहोरिया दाग गांव लंबे समय तक पानी की समस्या से जूझता रहा।

गांव में पानी के पीने का संकट इतना गंभीर था कि स्थानीय लोगों की जिंदगी पर इसका सीधा असर पड़ता था। दिव्या मित्तल के कार्यकाल में पाइप लाइन के जरिए गांव तक पीने का पानी पहुंचाने की दिशा में काम हुआ। जलजीवन मिशन के तहत अगस्त 2023 में गांव में पहली बार पाइप के जरिए पानी पहुंचने की बात सामने आई। इस काम की वजह से गांव के लोगों में दिव्या मित्तल को लेकर काफी सकारात्मक भावना देखने को मिली।

मिर्जापुर से उनके तबादले के समय भी लोगों ने भावुक होकर उन्हें विदाई दी थी। यानी एक तरफ उनकी पहचान सक्ता अधिकारी की रही तो दूसरी तरफ कुछ इलाकों में उनके काम की वजह से लोगों ने उन्हें याद भी रखा। दिव्या मित्तल का यही अंदाज उन्हें सोशल मीडिया पर चर्चा में रखता है। विकास कार्यों के निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को फटकार लगाना हो, तहसील दिवस में शिकायतों पर सीधे सवाल करना हो या फिर मौके पर जाकर व्यवस्थाओं की हकीकत देखना हो।

उनका काम करने का तरीका अक्सर सुर्खियों में रहा है। इसके बाद उन्होंने देवरिया की जिलाधिकारी के तौर पर भी जिम्मेदारी संभाली। देवरिया में भी उनके काम और प्रशासनिक शैली की चर्चा होती रही है। हालांकि बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़े स्तर पर प्रशासनिक फेरबदल करते हुए कई आईएएस अधिकारियों के तबादले किए। इसी फेरबदल में दिव्या मित्तल को जिलाधिकारी के पद से हटाकर शासन में विशेष सचिव की जिम्मेदारी दी गई। लेकिन अब कहानी ने एक नया मोड़ ले लिया है। दिव्या मित्तल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी। अब असली सवाल यही है कि आखिर एक ऐसे अधिकारी जिसने आईआईटी और आईआईएम से पढ़ाई की। लंदन में नौकरी की, विदेश की नौकरी छोड़कर भारत लौटकर सिविल सेवा में करियर बनाया और उत्तर प्रदेश में जिलाधिकारी जैसे अहम पदों पर काम किया। उन्होंने आईएएस की नौकरी छोड़ने का फैसला आखिर क्यों किया?

इस सवाल का जवाब दिव्या मित्तल ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में दिया है और अब उनकी वही पोस्ट दिव्या लिखती हैं, आज मैंने 13 वर्षों की अवस्मरणीय यात्रा को अपनी इच्छा से विराम देते हुए आईएस से त्यागपत्र दे दिया है। साधारण परिवेश में पलते हुए मैंने एक अच्छे सफल जीवन का सपना देखा था। दिन-रा एक कर आईआईटी दिल्ली और आईएम बोर से पढ़ने के बाद लंदन में नौकरी लग गई। पर सब कुछ पा लेने पर भी कुछ अधूरा था। अपने देश में ना होना खलता था। मेरी पढ़ाई, आत्मविश्वास, दुनिया में कहीं भी सिर उठाकर चलने की ताकत सब इस मिट्टी का कर्ज था मुझ पर। वो कर्ज चुकाना था। चाहती थी जिस भारत का सपना देखा था उसे बनाने वाली ईंटों पर मेरे भी हाथों के निशान हो। सो लौट आई और आईएएस अधिकारी बनने का सौभाग्य मिला। बहुत कुछ करने का मौका मिला। बहुत सीखा। देवरिया ने सिखाया कि सई के साथ खड़ा होना विकल्प नहीं कर्तव्य है। मिर्जापुर ने सिखाया कि असंभव कोई तथ्य नहीं बस एक राय है और मां विधवा वासनी के चरणों में बैठकर सीखा कि शक्ति किसी पद से नहीं उनकी कृपा और लोगों के विश्वास से आती है। सबसे बड़ी सीख यह थी कि अपने लिए देखे सपने तो पूरे हो चुके थे। अब अपने लोगों के लिए देखे सपनों को जीना था। जीवन का असली सुकून उन आंखों में देखा जिस परिवार को पहली बार जमीन का हक मिला। जिस दिव्यांग को सम्मान से जीने का अवसर मिला और जिस किसान के खेत को पानी मिला। उनके संघर्षों में साथ चलते हुए मैंने सीखा कि हर सरकारी फाइल के पीछे एक व्यक्ति है और उसकी गरिमा बनाए रखना ही न्याय है। मूर्ख थी जो सोचा था कि कुछ देने आई हूं। सच यह है कि सबसे ज्यादा मैंने ही पाया है और वह कर्ज और भी बढ़ता गया। लोग मेरी खुशी में मुझसे ज्यादा खुश हुए। उन्होंने मुझे तभी उसी विश्वास से देखा जब मैं खुद ही थकी या टूटी थी और इसी ने आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दी।

इतना प्यार, इतना सम्मान, इतना अपनापन मिला कि मेरी झोली पूरी भर गई और इसमें उन साथियों, अधिकारियों और कर्मचारियों का भी बहुत बड़ा श्रेय है जिन्होंने मेरे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और साथ डरे रहे। आज आभार से आंखें नम है। बस एक दृश्य इनमें बसा है। लहरिया दह की पहाड़ी की वह वृद्ध मां जो अपने गांव में पहली बार पानी पहुंचता देख कुछ नहीं बोली। बस कांपते हाथों से मेरा सिर छूकर आशीर्वाद दे गई। पद तो आज छूट गया पर वह स्पर्श जीवन भर नहीं छूटेगा और वह सपना भी नहीं छूटेगा जो देश की इस मिट्टी ने मुझे दिया है। आपकी अपनी दिव्या मित्तल।

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