उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा शहर है सहारनपुर। वहां एक लड़की ने 15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया। ना कोई डिग्री ना कोई कॉलेज। [संगीत] और अभी अप्रैल 2026 में वो लड़की दुनिया के सबसे पावरफुल स्टार्टअप इनक्यूबेटर की जनरल पार्टनर बन गई है। उसका नाम है हर्षिता अरोड़ा। और जिस ऑर्गेनाइजेशन की मैं बात कर रही [संगीत] हूं, उसका नाम है वाई कॉम्बिनेटर जिसे लोग शॉर्ट फॉर्म में वाईसी बोलते हैं। अब यह वाईसी क्या है? यह समझना जरूरी है क्योंकि इसके बिना इस खबर का [संगीत] वजन समझा ही नहीं जाएगा। वाईसी एक अमेरिकन स्टार्टअप एक्सलरेटर है। 2005 में पॉल ग्राम ने इसे शुरू किया था। इसका काम है नई-नई कंपनियों को शुरुआती फंडिंग देना, उन्हें गाइड करना और इन्वेस्टर्स [संगीत] से मिलवाना। वाईसी से निकली कंपनियों के नाम सुनेंगे तो अंदाजा लग जाएगा। एयर BNB ड्रॉप बॉक्स RedIT स्ट्राइप [संगीत] डोर डश instा कार्ड ये सब वाईसी से निकली हुई कंपनीज़ हैं। [संगीत] वाईसी में हर साल हजारों स्टार्टअप्स अप्लाई करते हैं लेकिन सिर्फ एक से 2% [संगीत] को ही एंट्री मिल पाती है और जो लोग वाईसी चलाते हैं उनको जनरल पार्टनर्स बोला जाता है। जनरल पार्टनर्स यानी कि [संगीत] जीपी।
ये वो लोग हैं जो फैसला करते हैं कि किस स्टार्टअप को फंडिंग मिलेगी। कौन सा आईडिया आगे जाएगा। [संगीत] ये वाईसी के सबसे सीनियर और सबसे ताकतवर पोजीशन में रहने वाले लोग होते हैं। तो अब सोचिए सहारनपुर [संगीत] की एक लड़की जिसने 15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया हो वो इस पोजीशन पर बैठ गई। यह [संगीत] कैसे हुआ? यह कहानी भी दिलचस्प है। हर्षदा को टेक्नोलॉजी में इंटरेस्ट तब आया जब वो 13 साल की थी। उनके स्कूल में सहारनपुर के पाइनवुड स्कूल में एक कंप्यूटर साइंस टीचर हुआ करते थे। जिन्होंने बच्चों को पोस्टर डिजाइन करना सिखाया था। डिजाइन के प्रिंसिपल्स बताए थे। बेसिक प्रोग्रामिंग सिखाई थी। हर्षिता को वो चीज बहुत भाग गई। उन्होंने आईटी मैगजीनंस पढ़ना शुरू किया। इंटरनेट पर खुद से कोडिंग सीखी और फिर एक पॉइंट आया जब उन्हें लगा कि स्कूल में जो पढ़ाया जा रहा है वो उनके काम का है ही नहीं। उन्होंने स्कूल [संगीत] छोड़ दिया। कुछ समय तक होम स्कूलिंग की फिर वो भी छोड़ दी और फिर पूरा का पूरा फोकस उन्होंने प्रोग्रामिंग में और प्रोजेक्ट्स पर लगा दिया और यह कोई ऐसा फैसला नहीं था जो उन्होंने अकेले लिया हो। उनके पिता रविंद्र सिंह अरोड़ा जो सहारनपुर में फाइनेंशियल ब्रोकर थे और उनकी [संगीत] मां इन दोनों ने इस फैसले का सपोर्ट किया। हर्षिता ने खुद एक इंटरव्यू में कहा था कि जब वो 15 साल की थी तब उनके पेरेंट्स ने उन्हें अकेले अमेरिका जाने [संगीत] भी दिया। 2016 में उन्हें बेंगलुरु में सेल्स फोर्स में इंटर्नशिप मिली और फिर एमआईटी लॉन्च प्रोग्राम में गई। यह एक तरह का एंटरप्रेन्योरशिप प्रोग्राम है। 15 से 19 [संगीत] साल के बच्चों के लिए होता है।
वहीं उन्होंने पहली बार आईओएस ऐप बनाना सीखा। वापस आके उन्होंने अपनी पहली सीरियस ऐप बनाई क्रिप्टो प्राइस ट्रैकर। यह जनवरी 2018 की बात है। हर्षिता तब 16 साल की थी और उस वक्त क्रिप्टो करेंसी का क्रेज अपने पीठ पर था। लेकिन मार्केट में जो भी एप्स थे वो या तो बहुत कॉम्प्लिकेटेड हुआ करते थे या फिर वो इनकंप्लीट थे। हर्षिता ने एक सिंपल और क्लीन ऐप बनाई जो कि 1000 से ज्यादा क्रिप्टो करेंंसीज के रियल टाइम प्राइस को ट्रैक कर सकती [संगीत] थी। 32 करेंसीज में 18 से ज्यादा एक्सचेंजेस में डाटा लेकर वो पूरी ऐप उन्होंने अपने बेडरूम में बैठकर लैपटॉप पे 2 महीने में बनाई। [संगीत] Apple ने इस ऐप को फीचर भी किया था और यह अमेरिका और कनाडा के एप स्टोर पर [संगीत] फाइनेंस कैटेगरी में टॉप पेड एप्स में आ चुकी है। बाद में ये एप्स एक्वायर भी हो गई यानी कि किसी ने खरीद ली। लेकिन यह शुरुआत आसान [संगीत] नहीं थी। जब ऐप लॉन्च हुआ तो कई लोगों ने शक किया कि इतनी छोटी उम्र में कोई लड़की ये ऐप कैसे बना सकती है? कुछ ने प्लेजोरिज्म का आरोप भी लगाया। यानी कहा कि यह ऐप किसी और की कॉपी की हुई है।
रेडिट पर तो उन्हें धमकियां तक मिलने लगी लेकिन हर्षिता ने हिम्मत नहीं हारी। अपने परिवार के सपोर्ट से उन्होंने इन सभी मुसीबतों का सामना किया। इसी काम के लिए उन्होंने 2020 में भारत सरकार [संगीत] से बाल शक्ति पुरस्कार भी प्राप्त किया जो कि बच्चों और युवाओं के लिए देश के सबसे बड़े सम्मानों में से एक [संगीत] है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उनकी तारीफ करते हुए ट्वीट किया था। इसके अलावा फोब्स ने भी उन्हें 2023 में अंडर 30 की लिस्ट में जगह दी [संगीत] थी और फिर एक बड़ा कदम आया। हर्षिता को 01 वीजा मिला। ऐसा वीजा जो अमेरिका का एक स्पेशल वीजा है और वो उन लोगों को मिलता है जो अपने फील्ड में एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी टैलेंट रखते हैं। 16 साल की उम्र में वो अकेली सैन फ्रांसिस्को में शिफ्ट हो गई थी। सोचिए एक लड़की जो [संगीत] शायद सहारनपुर से बाहर निकलने का कभी सोच भी नहीं रही हो वो 16 साल की उम्र में अकेले अमेरिका जाकर रहने लगी। तो वहां जाकर 2019 में उन्होंने विगनन वेलीवेला और तुषार मिश्रा के साथ मिलकर एक नई कंपनी शुरू की। ए टू बी। शुरू में उनके पास एक और आईडिया था जो उन्होंने वाईसी के सामने रखा लेकिन कोविड ने उस आईडिया को मार दिया था। अब ज्यादातर लोग यहां आकर हार मान लेते हैं। लेकिन हर्षिता और उनकी टीम ने हार नहीं मानी। उन्होंने बिल्कुल नए सेक्टर में एक कदम रखा ट्रकिंग इंडस्ट्री। इन लोगों को ट्रकिंग का खास बैकग्राउंड नहीं था। पेमेंट का भी नहीं था। लेकिन इन्होंने हफ्तों तक ट्रैक स्टॉप्स पर जाके [संगीत] ट्रक ड्राइवर से बात करी। उनकी प्रॉब्लम्स को समझा और प्रॉब्लम बड़ी थी।
अमेरिका में ट्रैकिंग इंडस्ट्री करीब ₹790 अरब डॉलर मतलब लगभग ₹66 लाख करोड़ की है। लेकिन इस इंडस्ट्री का पेमेंट सिस्टम बिल्कुल पुराना है। फ्लट कार्ड्स में छुपी फीस, [संगीत] पेपर चेकक्स में पेमेंट, धोखाधड़ी का रिस्क और ड्राइवर्स को अपनी सैलरी के लिए दिनों तक [संगीत] इंतजार करना पड़ता था। ए टू बी ने इसी प्रॉब्लम को सॉल्व किया। ज़ीरो फी फ्लिट कार्ड, इंस्टेंट पे आउट्स, फ्रॉड प्रोटेक्शंस और मॉडर्न फाइनेंसियल टूल्स। लोग इसे ट्रैकिंग इंडस्ट्री का स्ट्राइक बोलते हैं। आज ए टू बी सीरीज सी स्टेज पर है। [संगीत] 300 से ज्यादा फ्लट को सर्वे करती है। करीब $80 करोड़ यानी कि लगभग [संगीत] ₹6700 करोड़ की वैल्यू्यूएशन पर है और $30 करोड़ से ज्यादा फंडिंग जुटा चुकी है। जनरल कैटलिस्ट ब्लूमबर्ग बीटा और मास्टर कार्ड जैसे बड़े नाम इनके इन्वेस्टर्स हैं।
तो यह वो ट्रैक रिकॉर्ड है जिसके दम पर वाईसी ने पहले हर्षिता को 2025 में समर बैच में विजिटिंग पार्टनर बनाया। उस वक्त वो वाईसी की हिस्ट्री में सबसे यंग विजिटिंग पार्टनर थी और एक साल बाद यानी कि 6 अप्रैल 2026 को वाईसी [संगीत] के सीईओ ने ऑफिशियल अनाउंसमेंट की कि हर्षिता अब जनरल पार्टनर है। अब वो सीधे [संगीत] वाईसी के फाउंडर्स के साथ काम करेंगी। नए स्टार्टअप्स को गाइड करेंगी और यह तय करने में हिस्सा लेंगी कि अगला एएनबी या स्ट्राइप कौन बनेगा। अब इस खबर [संगीत] को सिर्फ एक सक्सेस स्टोरी की तरह मत देखिए। इसमें कुछ बड़ी बातें हैं जो ध्यान देने लायक है। पहली बात कि हर्षिता ने कोई आईआईटी नहीं किया। कोई [संगीत] स्टैनफोर्ड नहीं गई। किसी बड़े बिजनेस फैमिली से बिलोंग नहीं करती। सहारनपुर में एक फाइनेंशियल ब्रोकर के घर में वो पैदा हुई। [संगीत] दूसरी बात उन्होंने ट्रेडिशनल एजुकेशन सिस्टम को रिजेक्ट किया और इंटरनेट से किताबों से और प्रोजेक्ट्स बनाकर खुद को तैयार किया। [संगीत] तीसरी बात 16 साल की उम्र में अकेले अमेरिका शिफ्ट हुई। और चौथी बात एक ऐसी इंडस्ट्री में कंपनी बनाई जिसके बारे में उन्हें पहले से कुछ नहीं पता था। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने जमीन पर जाकर प्रॉब्लम्स [संगीत] को समझा। ये कहानी इसलिए इंपॉर्टेंट है क्योंकि ये दिखाती है कि टेक की दुनिया में एंट्री का जो रास्ता है वो सिर्फ डिग्री के बेसिस पे नहीं होता। कभी-कभी एक अच्छा टीचर, एक अच्छा इंटरनेट कनेक्शन, सपोर्टिव पेरेंट्स और जिद भी काफी होती है। [संगीत] फिलहाल इस खबर में इतना ही। आपको इस पर क्या कहना है? कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा। नमस्कार।