30 जनवरी 1948 नई दिल्ली बिरला हाउस सर्दियों की हल्की शाम घड़ी की सुइयां 5:00 बजाने को थी। बगीचे में सैकड़ों लोग कोई आशीर्वाद की आस में कोई अपने दुखों का बोझ लिए सब एक ही इंतजार में थे। महात्मा गांधी आज गांधी जी को थोड़ी देर हो गई थी। सरदार पटेल से मुलाकात कुछ लंबी खींच गई थी। 5:01 वे निकले। दोनों तरफ आभा और मनु कदम शांत चेहरे पर वही मुस्कान भीड़ ने हाथ जोड़े गांधी जी मुस्कुराए लेकिन उसी भीड़ में एक शख्स था शांत स्थिर बेचैन नहीं जैसे उसने कोई फैसला बहुत पहले ही कर लिया हो वो आगे बढ़ा झुक कर चरण छूने का नाटक किया आभा ने रोकने की कोशिश की लेकिन अगले ही पल तीन गोलियां चल गई एक पल की खामोशी फिर चीखें गांधी जी के होठों से सिर्फ दो शब्द निकले हे राम और वे गिर पड़े। उस शख्स का नाम था नाथूराम गोडसे। आखिर कौन थे नाथूराम गोडसे और उन्होंने ऐसा क्यों किया? यही जानेंगे इस टू डी डॉक्यूमेंट्री वीडियो में। इसलिए वीडियो को अंत तक जरूर देखें क्योंकि आज वो सच सामने आएगा जिसे सालों तक छिपाया गया। 19 मई 1910 महाराष्ट्र का पुणे जिला एक छोटा शांत गांव बारामती मई की तपती दोपहर में विनायक वामन राव घोड़से के घर एक बच्चे की किलकारी गूंजी नाम रखा रामचंद्र लेकिन इस जन्म के साथ खुशी कम थी डर ज्यादा दरअसल इस घर में एक अभिशाप था कम से कम परिवार को ऐसा लगता था रामचंद्र से पहले तीन बेटे बेटे पैदा हुए थे। तीनों बचपन में ही मर गए थे। मां और बाप के मन में एक गहरा अंधविश्वास घर कर गया कि उनके घर में बेटे जिंदा नहीं रहते।
तो उन्होंने एक अजीब फैसला किया। इस बच्चे को बेटे की तरह नहीं बेटी की तरह पालेंगे। रामचंद्र की नाक छेदी गई। उसे नथ पहनाई गई। वह लड़कियों के कपड़े पहनकर बड़ा होने लगा। गांव के लोग उसे एक नए नाम से पुकारने लगे। नाथूराम यानी वह राम जिसने नथ पहनी है। जरा सोचिए एक बच्चा जो ना पूरी तरह लड़का है ना लड़की जिसकी पहचान ही उसके माता-पिता ने एक भ्रम में लपेट दी। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बचपन की ऐसी उलझन इंसान के भीतर या तो गहरी टूटन पैदा करती है या एक बेहद आक्रामक और जिद्दी व्यक्तित्व। नाथूराम के साथ दूसरा हुआ। जब वह बड़ा हुआ तो उसकी एक छोटी बहन आई गोदावरी और उसके बाद एक भाई दत्तात्रेय घर में यह अंधविश्वास टूटा। नाथूराम को अब लड़कों जैसे कपड़े मिले। लेकिन वे शुरुआती साल वह दोहरी पहचान वह कशमकश वह नाथूराम के भीतर कहीं गहरे दब गई। स्कूल में उसका मन कभी नहीं लगा। 1928 में जब वह 10वीं की परीक्षा में फेल हुआ तो उसने स्कूल छोड़ दिया। लेकिन वह अनपढ़ नहीं था। उसके भीतर ज्ञान की एक ऐसी भूख थी जो साधारण स्कूल में शांत नहीं हो सकती थी। वह घंटों पुस्तकालय में बैठता, हिंदू धर्म ग्रंथ पढ़ता, मराठा इतिहास पढ़ता, वैश्विक राजनीति पढ़ता और एक नाम उसके दिल में उतरता जा रहा था वीर सावरकर। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले एक और नाम था जो नाथूराम के दिल पर राज करता था। महात्मा गांधी। यह सुनकर शायद आपको हैरानी हो। लेकिन यह सच है। 1930 के दशक की शुरुआत में नाथूराम गोडसे महात्मा गांधी का अनन्य भक्त था। जब गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का बिगुल फूंका तो नाथूराम उन हजारों युवाओं में था जो बापू के एक आह्वान पर सड़कों पर उतर आए। वह गांधी जी की अहिंसा पर विश्वास करता था। सत्याग्रह को वह भारत की मुक्ति का रास्ता मानता था। उसे लगता था कि गांधी जी ही वह मसीहा हैं जो भारत को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराएंगे। लेकिन फिर 1932 में एक मुलाकात हुई। एक ऐसी मुलाकात जिसने नाथूराम की पूरी दुनिया बदल दी। रत्नागिरी विनायक दामोदर सावरकर सावरकर उन दिनों नजरबंद थे। उनका घर से बाहर निकलना बंद था। लेकिन उनके विचार बंद नहीं थे। वे आग की तरह फैल रहे थे। नाथूराम जब पहली बार सावरकर के सामने बैठा तो उसने जो सुना वह गांधी जी से बिल्कुल अलग था। सावरकर ने कहा अहिंसा कायरता का दूसरा नाम हो सकती है। अगर वह राष्ट्र के हितों के खिलाफ हो। सावरकर ने कहा हिंदू इस देश की आत्मा है। और इस आत्मा की रक्षा के लिए हथियार उठाना पाप नहीं है। धर्म है। नाथूराम के भीतर जैसे कोई चिंगारी सुलग गई। उसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में नाम लिखवाया। फिर हिंदू महासभा से जुड़ गया। धीरे-धीरे गांधी जी की प्रार्थना, सभाओं में कुरान की आयतें पढ़ा जाना उसे खलने लगा। उसे लगने लगा कि गांधी जी मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदुओं के हितों की बलि दे रहे हैं। नाथूराम ने अपने दोस्त नारायण आपटे के साथ मिलकर अग्रणी नाम का एक अखबार शुरू किया। इस अखबार के जरिए, वह गांधी जी की नीतियों पर तीखे हमले करता था। वह एक कुशल वक्ता बन चुका था। भीड़ उसके शब्दों पर झूमती थी। लेकिन उसके लेखों में धीरे-धीरे तर्क कम होता जा रहा था और नफरत की आंच तेज होती जा रही थी। उसके लिए भारत अब सिर्फ एक देश नहीं था। वह एक हिंदू राष्ट्र था और इस राष्ट्र के साथ किसी भी समझौते को वह देशद्रोह मानता था। जो हाथ कभी गांधी जी की जय जयकार के लिए उठते थे। वे अब गुप्त ठिकानों पर पिस्तौल चलाने का अभ्यास कर रहे थे। 1946 भारत में आजादी की महक थी। लेकिन उसमें बारूद और खून की गंध भी घुल चुकी थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस का ऐलान किया। 16 अगस्त 1946 कोलकाता की गलियां श्मशान बन गई। तीन दिनों में 5000 से ज्यादा लोग मारे गए। हिंदू और मुसलमान दोनों। इतिहास इसे ग्रेट कोलकाता किलिंग्स के नाम से जानता है। फिर नोवाखली पूर्वी बंगाल हिंदुओं का नरसंहार।
जब यह खबरें महाराष्ट्र पहुंची तो नाथूराम गोडसे का खून खौल उठा। वह अपने अखबार के दफ्तर में बैठकर उन रिपोर्टों को पढ़ता और उसकी आंखों में आग आ जाती। लेकिन उसके लिए सबसे बड़ा झटका वह था जो गांधी जी ने कहा। गांधी जी ने कहा था अगर मुसलमान हिंदुओं को मारना चाहते हैं तो हिंदुओं को बहादुरी से मृत्यु स्वीकार करनी चाहिए। भागना नहीं चाहिए। घोड़से के लिए यह अहिंसा नहीं थी। यह आत्मघाती कायरता थी। उसके मन में एक सवाल जड़ पकड़ गया। गांधी जी की अहिंसा सिर्फ हिंदुओं के लिए क्यों है? जब दूसरी तरफ हथियार चल रहे हैं तब भी यहीं से घोड़से के मन में गांधी जी के प्रति जो थोड़ी बहुत श्रद्धा बची थी, वह भी खत्म हो गई और उसकी जगह एक ठंडी सदी हुई नफरत ने ले ली। 14 अगस्त 1947 की आधी रात भारत आजाद हुआ। लेकिन टूट कर विभाजन की लकीर ने लाखों परिवारों को दो टुकड़ों में काट दिया। पंजाब और बंगाल की सीमाओं पर इंसानी खून बह रहा था। नाथूराम ने दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर वे ट्रेनें देखी, जो लाशों से भरी आ रही थी, उसने शरणार्थी शिविरों में वे चीखें सुनी, जिनके घर, जिनके बच्चे, जिनकी जमीन सब उस लकीर के उस पार छूट गई थी। घोड़से के लिए अखंड भारत उसकी आत्मा थी और गांधी जी उस आत्मा के हत्यारे। लेकिन आग में घी का काम किया उस खबर ने जो जनवरी 1948 में आई। पाकिस्तान ने अभी-अभी कश्मीर पर हमला किया था। भारतीय सेना लड़ रही थी। ऐसे में भारत सरकार ने एक फैसला लिया। पाकिस्तान को दिए जाने वाले 55 करोड़ रोक दिए जाएंगे। यह पैसा विभाजन के समय की संपत्ति के बंटवारे का हिस्सा था। सरकार का तर्क था कि जब पाकिस्तान हम पर हमला कर रहा है तो हम उसे पैसे क्यों दें? तर्क ठीक लगता था। लेकिन गांधी जी अड़ गए। उन्होंने बिरला हाउस में आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनकी मांग थी कि पाकिस्तान को यह ₹55 करोड़ तुरंत दिए जाए। साथ ही दिल्ली की मस्जिदों में जो हिंदू शरणार्थी ठंड से बचने के लिए रुके थे, उन्हें वहां से निकाला जाए। घोड़से और उसके साथियों के लिए यह बर्दाश्त के बाहर था। जिस देश पर हमला हो रहा है, जिस देश के सैनिक सीमा पर मर रहे हैं, उसी देश के पैसे उस दुश्मन को दिए जा रहे हैं और यह एक बूढ़े आदमी के अनशन के दबाव में। घोड़से ने अपने अखबार में लिखा गांधी अब भारत के राष्ट्रपिता नहीं पाकिस्तान के रक्षक बन गए हैं। उसके मन में अब एक ही विचार था। जब तक गांधी जीवित हैं हिंदू राष्ट्र कभी सुरक्षित नहीं हो पाएगा। अब अखबार के लेख काफी नहीं थे। भाषण काफी नहीं थे। घोड़से ने अपने सबसे करीबी दोस्त नारायण आपटे से कहा अब कलम को रखना होगा। अब पिस्तौल बोलेगी। घोड़से और आपटे ने गुप्त बैठकें शुरू की। उनके साथ जुड़े मदद लाल पाहवा, विष्णु करकरे, शंकर किस्तैया और दिगंबर बड़े। हथियार का इंतजाम किया ग्वालियर के डॉक्टर दत्तात्रेय परचुरे ने। एक इतालवी पिस्तौल, बेरेटा, सात गोलियां। यह कोई जोश में लिया गया फैसला नहीं था। यह एक ठंडे दिमाग से बनाई गई योजना थी। 20 जनवरी 1948 पहला हमला मदन लाल पाहवा ने बिरला हाउस में प्रार्थना सभा के दौरान एक बम फोड़ा धमाका हुआ भगदड़ मची लेकिन गांधी जी बचे रहे मदन लाल पकड़ा गया घोड़से और आपटे भीड़ में गायब हो गए। पुलिस को मदन लाल से बहुत कुछ पता चल गया था।
साजिश के धागे साफ दिख रहे थे। लेकिन दिल्ली पुलिस उन मुख्य साजिशकर्ताओं को पकड़ नहीं पाई जो बिरला हाउस की दीवारों के साए में ही खड़े थे। यह चूक भारी पड़ने वाली थी। घोड़ से इस बार डरा नहीं बल्कि उसने सबक लिया। उसने समझा बड़ी भीड़ में धमाकों से काम नहीं बनेगा। अब उसे अकेला शिकारी बनना था। सीधा साफ बिना किसी ढाल के। अगले 10 दिन घोड़से और आपटे पुलिस की नजरों से बचते हुए कानपुर, बॉम्बे, पुणे और ग्वालियर के बीच घूमते रहे। ग्वालियर के जंगलों में एक सुनसान जगह निशाना लगाने का अभ्यास। हर गोली के साथ उसके मन में जो तूफान था, वह और घना होता जा रहा था। 29 जनवरी की शाम घोड़से और आपटे दिल्ली वापस लौटे। होटलों में पुलिस तलाशी कर रही थी। इसलिए दोनों ने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्रतीकलय में रात बिताई। उस रात दिल्ली में कड़ाके की ठंड थी। लेकिन घोड़से के भीतर एक आग जल रही थी जो उसे सोने नहीं दे रही थी। वह बार-बार अपनी पिस्तौल साफ करता गोलियां गिनता। आपटे सो गया। घोड़से जागता रहा। 30 जनवरी 1948 की सुबह। बिरला हाउस में गांधी जी सुबह 3:30 बजे उठे। हमेशा की तरह प्रार्थना की। शहद नींबू का पानी पिया। लिखने बैठ गए। वे उस दिन भारत के नए संविधान पर अपने विचार लिख रहे थे। अहिंसा के बारे में, सत्य के बारे में, एक बेहतर भारत के बारे में। उसी वक्त पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर घोट से उठा। उसने एक फलवाले से कुछ संतरे खरीदे। खाए, चाय पी, चेहरे पर कोई बेचैनी नहीं, कोई घबराहट नहीं। जैसे वह किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए तैयार हो रहा हो। शाम 4:00 बजे गांधी जी के कमरे में सरदार पटेल पहुंचे। बैठक शुरू हुई। उधर बिरला हाउस के बाहर घोड़ से भीड़ में मिल गया खाकी जैकेट, नीली पतलूून। जैकेट के भीतर वह पिस्तौल, सात गोलियां, आपटे और करकरे थोड़े फासले पर खड़े थे। अगर घोड़ से चूका तो वे मोर्चा संभालेंगे। लेकिन घोड़ से चूकने वाला नहीं था। वह जानता था कि आज का काम वह खुद करेगा। अकेला सबके सामने कोई भेष नहीं, कोई नकाब नहीं। 5:01 पर गांधी जी निकले। आभा और मनु के साथ भीड़ ने हाथ जोड़े। गांधी जी मुस्कुराए घोड़ से आगे बढ़ा। वह पल घोड़ से गांधी जी के ठीक सामने था। उसने दोनों हाथ जोड़े। कहा नमस्ते गांधी जी। मनु ने उसे किनारे हटाने की कोशिश की। बापू को पहले ही देर हो चुकी है।
आप हटिए। घोड़से ने बाएं हाथ से मनु को धकेला। दाहिने हाथ ने जैकेट के भीतर से पिस्तौल निकाली। समय जैसे रुक गया। तीन गोलियां पहली जांघ में दूसरी पेट में तीसरी सीधे सीने को चीरती हुई निकली गांधी जी के सफेद वस्त्र लाल हो गए उनके हाथ प्रार्थना की मुद्रा में उठे होठों से दो शब्द निकले हे राम और वे जमीन पर गिर पड़े पूरे परिसर में एक पल की खामोशी फिर चीखें घोड़ से वहां से भागा नहीं उसने पिस्तौल ऊपर उठाई और खुद ही आवाज लगाई पुलिस पुलिस वो पकड़ पकड़ा जाना चाहता था। वह चाहता था कि दुनिया उसे देखे। उसकी बात सुने। उसे गिरफ्तार कर लिया गया। उसी शाम जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो पर देश को संबोधित किया। उनकी आवाज कांप रही थी। उन्होंने कहा दोस्तों हमारे जीवन से रोशनी चली गई है। पूरा देश रो रहा था। लाल किले के भीतर एक विशेष अदालत बनाई गई। नाथूराम गोडसे, नारायण आपटे और उनके साथियों पर मुकदमा चला। घोड़से ने वकील लेने से मना कर दिया। उसने खुद अपना बचाव किया। अदालत में उसने लगभग 300 पन्नों का एक बयान पढ़ा। जब वह घंटों बोलता रहा तो कहते हैं कि सुनने वाले कई लोगों की आंखें नम हो गई। उसने कहा मैंने गांधी को इसलिए नहीं मारा क्योंकि वह बुरे थे। मैंने इसलिए मारा क्योंकि उनके विचार भारत की अखंडता के लिए खतरनाक थे।
उसने खुद की तुलना अर्जुन से की। गांधी जी को उसने भीष्म पितामह की तरह देखा जो गलत पक्ष की रक्षा कर रहे थे। उसने विभाजन को 55 करोड़ को नोवाखली को सब कुछ एक के बाद एक रखा। उसका तर्क था मेरी गोलियां नफरत से नहीं एक राष्ट्रवादी की पीड़ा से निकली थी। 15 नवंबर 1949 अंबाला जेल नाथूराम घोड़से और नारायण आपटे को फांसी दी गई। फांसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले घोड़से के हाथों में दो चीजें थी। अखंड भारत का नक्शा और भगवत गीता। उसके अंतिम शब्द थे अखंड भारत अमर रहे। घोड़से ने सोचा था कि गांधी जी को मारकर वह उनके विचारों को खत्म कर देगा। लेकिन हुआ उल्टा। गांधी जी अपनी मृत्यु के बाद और भी बड़े हो गए। पूरी दुनिया में उनके नाम पर सड़कें बनी। उनकी तस्वीरें लगी। उनके विचारों पर किताबें लिखी गई। और घोटसे वह आज भी एक सवाल है। किसी के लिए हत्यारा, किसी के लिए भटका हुआ देशभक्त। 76 साल बाद भी यह बहस जारी है। लेकिन एक बात तय है। उन तीन गोलियों ने सिर्फ एक शरीर को नहीं मारा। उन तीन गोलियों ने भारत की आत्मा पर एक ऐसा घाव किया जो आज तक नहीं भरा। हे राम। दोस्तों, यह कहानी आपका दिल छू गई हो तो वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और वीडियो शेयर जरूर करें। भारत माता की जय।