किसी घने जंगल में जहां साल भर बारिश होती है, एक चींटी अकेले पेड़ के तने पर चढ़ रही है। अब उसे ऐसा करना नहीं चाहिए। क्यों? चींटियां जमीन की मजदूर होती हैं। लाइन में चलती हैं।साथ रहती हैं। जबकि यह चींटी उसका बिल्कुल उल्टा कर रही है। अपने झुंड से अलग हो चुकी है।
अकेले एक पौधे के तने के ऊपर चढ़ती जा रही है। रुक-रुक कर लड़खड़ा रही है। जैसे उसके अपने पैर अब उसकी बात ना मानते हो। जमीन से थोड़ा ऊपर पहुंचकर यह चींटी रुकती है। एक पत्ती को अपने जबड़ों में दबाती है और काट लेती है। पूरी ताकत से इतनी ताकत से कि उसके जबड़ों की मांसपेशियां वहीं अकड़ जाती हैं और फिर कभी नहीं खुलती। यह पत्ती अब चींटी की कब्र बन चुकी है। कुछ घंटों में चींटी की जान निकल जाती है।
पर वह लटकी रहती है उसी पकड़ में। फिर कुछ दिन बीततेहैं और मरी हुई चींटी के सिर से चीजें उगने लगती है। एक पतली डंठल जैसी चीजजो धीरे-धीरे लंबी होती जाती है और फिर एक दिन उसका सिर फटता है और उसमें से बारीक धूल जैसे कण नीचे झड़ने लगते हैं। नीचे उसी पगडंडी पर बाकी चींटियां जहां अपने काम में लगी हैं। कुछ कण इन चीटियों पर भी गिरते हैं और अगली चींटी की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है।
चक्र एक बार फिर शुरू होता है। अब अगली चींटी पेड़ पर चढ़ेगी, पत्ती को काटेगी और वहीं इस चींटी की कब्र भी बन जाएगी। जाहिर है कि चींटी ने यह सब अपनी मर्जी से तो नहीं किया। उसे किसी ने ऐसा करने पर मजबूर किया लेकिन किसने? यह किसी जानवर का शिकार नहीं था। किसी कीड़े ने उसे डसा नहीं था। उसके शरीर के अंदर एक ऐसी चीज घुस गई थी जिसका ना दिमाग है, ना आंखें, ना हाथ और ना पैर। इसका मतलब यह चीज कोई जानवर नहीं थी।
देखने में पेड़-पौधों जैसी लगती थी लेकिन पौधा भी नहीं थी। यह थी फंगस। वही जिसे हम हिंदी में फफून कहते हैं। ब्रेड पर जो हरी तह जमती है वो फफूून। बारिश में दीवार पर जो काले धब्बे उभरते हैं वो फफूून। नमी पाकर जमीन फोड़कर जो बड्स निकलते हैं वो मशरूम। यह भी फफूंद है। हम इन्हें देखते हैं, भूल जाते हैं। मामूली मानते हैं। मशरूम तो खाते भी हैं।
लेकिन जिस ज़ॉम्बी बना देने वाली फंगस की बात हमने अभी की, उसका एक चेहरा शायद आप पहचानते हो। साल से की 2013 में एक वीडियो गेम आया था जिसका नाम था द लास्ट ऑफ अस। साल 2023 में इसी पर एक टीवी सीरीज बनी जो दुनिया भर में खूब देखी गई। कहानी ऐसी एक की है जो इंसानों के दिमाग पर कब्जा करके उन्हें बना देती है और पूरी दुनिया तबाह हो जाती है। अब यह जो डर है एक के दिमाग पर काबिज हो जाने का वो पूरी तरह बनावटी नहीं था। उस डर की जड़ यह जो असली कहानी हमने आपको सुनाईचींटी वाली उसमें निहित है। यह क्या है? ना पूरा पौधा ना जानवर। फिर भी जैसा हम आगे आपको बताएंगेयही चीज धरती के सबसे बड़े जीव भी बनाती है। जंगल की जमीन के नीचे एक ऐसा जाल बुनती है जिससे अलग-अलग पेड़ आपस में जुड़े रहते हैं, कम्युनिकेट करते हैं और जिस दवा ने पिछली सदी में करोड़ों लोगों की जान बचाई उसकी शुरुआत भी इसी फंगस से हुई थी। हैं ।
धरती के सबसे रहस्यमई जीव की।फंगस का एक बड़ा कॉमन रूप हम सबके किचन में पाया जाता है जो है मशरूम। कई प्रकार का मशरूम आता है। ₹50 का डिब्बा भी आता है। ₹00 किलो वाली किस्म भी आती है। कुछ लोग खाते हैं। इसे का एक बड़ा कॉमन रूप माना जाता है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। बाजार में मिलने वाला या बारिश के बाद जमीन से उगता मशरूम असल में फंगस का बस एक छोटा सा ऊपर दिखने वाला एक हिस्सा है। पूरा फंगस वो नहीं है।
वह पूरा शरीर उसका नहीं है। मशरूम का एक बहुत स्पेसिफिक काम होता है। अपने बीज यानी फंगस के जो बीज हैं दूर तक उसको फैलाना होता है और इन बीजों को विज्ञान में हम स्पोर कहते हैं। यानी मशरूम फंगस का वो अंग है जो अगली पीढ़ी पैदा करने के लिए कुछ दिनों को बाहर निकलता है और काम पूरा होते ही वो सूख भी जाता है। तो असली l कहां है? अगर मशरूम फंगस नहीं है तो। असली है आपके पैरों के नीचे मिट्टी के अंदर। वहां मिट्टी के भीतर बालों से भी पतले सफेद धागों का एक जाल फैला हुआ है और यह धागे मिट्टी के कण-कण के बीच में से रास्ता बनाते हैं।
हर दिशा में बढ़ रहे हैं। आपस में गुतते जाते हैं और इसी जाल को हम माइसीलियम कहते हैं। सही मायनों में यही माइसीलियम फंगस का शरीर है और यह इतना महीन होता है कि सिर्फ एक चम्मच भर अच्छी मिट्टी अगर आप उठा लें तो उसके अंदर छिपे इन कणों को सीधा करेंगे आप तो कई किलोमीटर लंबा यह हो जाएगा। एक चम्मच मिट्टी और उसमें छिपा कई किलोमीटर लंबा एक अकेला जीव। फंगस के बारे में हालांकि सबसे दिलचस्प बात यह भी नहीं थी जो हमने आपको बताई।
धरती में मौजूद जीवों के बारे में स्कूल में हमें दो ही बड़े खाने बताए जाते हैं। एक तरफ पेड़-पौधे होते हैं, प्लांट किंगडम और दूसरी तरफ जानवर एनिमल किंगडम। अब इनमें फर्क कैसे पहचाना जाए? तो उसके भी कुछ कॉमन तरीके आपको बताए हैं कि पौधे अपना खाना खुद बना लेते हैं। सूरज की रोशनी उन पर पड़ती है। हवा और पानी उनको मिलता है। जमीन से न्यूट्रिएंट्स लेते हैं। अपने ही अंदर वह फोटोसिंथेसिस करते हैं।
उनका खाना बन जाता है। इसके विपरीत जो जानवर हैं, वह अपना खाना खुद नहीं बना सकते। उन्हें बाहर से ढूंढकर खाना पड़ता है। पौधा चबा चबा करके वह खाएंगे। फिर उसके बाद वह ऑक्सीजन लेते हैं तो वह मॉलिक्यूल्स टूटते हैं। उससे उनको एनर्जी मिलती है। जो जानवर पौधे नहीं खाते वो दूसरे जानवरों को खाते हैं। खुद नहीं बना रहे हैं खाना। खाना पड़ रहा है। अब अगर आप फंगस को लेंगे तो आप इन दोनों प्लांट किंगडम एनिमल किंगडम दोनों में से कहां रखें? उसमें आपको यह कंफ्यूज करेगा। इन दोनों कसौटियों पर आप कस के देखिए कि खाना खाना पड़ता है या बनाना पड़ता है। फंगस सूरज से अपना खाना तो नहीं बना सकता ना। फोटोसिंथेसिस में नहीं होता। तो इस मामले में वो प्लांट किंगडम जैसा नहीं है। उसे को भी हमारी तरह खाना बाहर से लेना पड़ता है।
हम एनिमल किंगडम में आते हैं और भी ऑक्सीजन पर ही जीवित रहती है। उसको जीने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। तो यहां वो जानवरों के पाले में थोड़ा-थोड़ा आपको नजर आएगी। लेकिन उसके जो खाने का तरीका है वह आम जानवरों जैसा नहीं है। हम अपना खाना मुंह में डालते हैं। फिर पेट के अंदर उसको पचाते हैं। इसका उल्टा करती है। वो अपने पाचक रस सीधे बाहर अपने खाने पर उड़ेल देती है।
यानी जिसको कंज्यूम किया जाना है उसी पर डाइजेस्टिव जूसेस डाल दिए जाते हैं। शरीर के बाहर उसको गलाती है और फिर उस घुले हुए रस को अपने धागों से वह सोखती है। ऐसे आप समझिए एक क्रूड एग्जांपल लगेगा लेकिन आपको बात समझ में आएगी कि रोटी जैसे हमारे मुंह में जाती है तो हमारी लार उसमें मिलती है और यहीं से पाचन हमारे मुंह से शुरू होता है। फंगस के केस में उल्टा हो रहा है। फंगस में रोटी पर ही हम लार की लेप लगा दे रहे हैं।
उसको वहीं गलने का इंतजार कर रहे हैं और जब उसका पाचन शुरू हो जाए तो हम अपनी त्वचा के रास्ते उसको सोख लें। सुनने में आपको अजीब लगा होगा। लेकिन फंगस इसी तरह से किसी चीज को कंज्यूम करती है। इसी वजह से विज्ञान ने ना इसे प्लांट किंगडम में रखा ना एनिमल किंगडम में रखा। इसको एक बिल्कुल अलग टाइप का ही ऑर्गेनिज्म माना गया।
मॉडर्न साइंस की फाइंडिंग है ये। पहले कई सदियों तक फंगस को पौधों के साथ गिना भी गया और वजह बड़ी सिंपल थी कि ये एक जगह पर रहती है। चल फिर नहीं सकती है। लेकिन जब साइंटिस्ट ने फंगस के डीएनए को डिकोड किया। तब पता चला कि फंगस प्लांट किंगडम के नहीं एनिमल किंगडम के ज्यादा करीब है। वैज्ञानिकों ने अंदाजा लगाया कि करीब 1 अरब साल पहले यानी 100 करोड़ साल पहले एक कॉमन एनसेेस्टर था। [नाक से की जाने वाली आवाज़] यहां से दो लाइंस चली। एक लाइन चलते हुए जानवरों तक आती है और यह बहुत मैच्योर जब हो जाती है तो इंसान आते हैं पिक्चर में। [नाक से की जाने वाली आवाज़] इसी कॉमन एनसेेस्टर से जो दूसरी राह चली थी उस पर चलते हुए जीव ने फंगस का रूप लिया। यानी जो फंगस है आप जिसको फफूून अगर लगती है रोटी पर तो उसको कुरच कर आप कूड़े में फेंक देते हैं। उससे आपका रिश्ता उतना दूर का भी नहीं है जितना आपको लगता है। पर सालों रिसर्च करने वाले जीव वैज्ञानिक मलिन शेड्रेक ने अपनी किताब एंटेंगल लाइफ में लिखा है कि इसी रिशेदारी की वजह से फंगस से बनी दवाएं इंसानी शरीर पर इतना सटीक असर कर पाती हैं क्योंकि कॉमनैलिटी है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि फंगस की प्रजातियों की गिनती 22 लाख से 38 लाख तक हो सकती है। यानी कि पेड़-पौधों की जितनी कुल प्रजातियां मानी गई हैं, उससे ये नंबर छ से 10 गुना ज्यादा है। और इस नंबर में से हमने अभी तक बम मुश्किल 6% को पहचाना है। बाकी जो 90% से ऊपर लगभग 94% फंगस की जो किस्में हैं उनके नाम हम नहीं जानते हैं।
जबकि वह हमारे चारों ओर हैं। अभी हमें इनको समझना है, पहचानना है। और ऐसा भी नहीं है कि यह हमसे बहुत दूर कहीं बसती हैं। इसी इकोसिस्टम में इसी एनवायरमेंट में आपकी हर सांस के साथ फंगस आपके फेफड़ों तक पहुंचती है। कैसे? हमने आपको बताया था कि फंगस अपने स्पोर हवा में रिलीज करती है और इतने ज्यादा स्पोर रिलीज होते हैं हर साल कि दुनिया भर के फंगस को अगर आप मिला दें जो स्पोर्स रिलीज कर रही है तो 5 करोड़ टन स्पोर होते हैं वह बाय वेट। हवा में जितने जिंदा कण तैर रहे हैं पूरी दुनिया में पृथ्वी पर उसका सबसे बड़ा सोर्स है। के कण एटमॉस्फेयर में इतने ऊपर भी जाते हैं कि कई बार बादलों तक पहुंचते हैं। बारिश की बूंदे या बर्फ का जो टुकड़ा बनता है जो हेल नीचे गिरती है। कई बार इन स्पोर्स के इर्द-गिर्द भी झूमता है। क्योंकि उसके ऊपर प्रेसिपिटेट होते हैं। यानी मुमकिन है कि जिस बारिश में आप कभी भीगे हो उसकी कोई बूंद किसी l के बीज के सहारे बनी हो और इसी पल सांस लेते हुए आप इनमें से कई कण अपने अंदर खींच भी रहे हो। यही वो छिपा हुआ साम्राज्य है। पैरों के नीचे है, हवा में है, शरीर के अंदर है। हर तरफ किसी की भी नजर में आए बिना यह विशाल नेटवर्क टिका हुआ है। इतना बड़ा है कि धरती का सबसे बड़ा जीव कोई व्हेल नहीं है, कोई हाथी नहीं है।
वह भी एक फंगस ही है। हम हम यूएस के ऑर्गन स्टेट में एक जंगल है मालियर नेशनल फॉरेस्ट। आप की जाने ऊपर से देखेंगे तो आम पहाड़ी जंगल लगेगा। चीड़ के ऊंचेऊे पेड़ हैं यहां। सूखी मिट्टी है और जंगल में जो होती है साइलेंस। लेकिन कुछ जगहों पर पेड़ बेवजह यहां मरने लगे और एक नहीं दर्जनों पेड़ एक साथ मर रहे थे। वैज्ञानिक वजह ढूंढने आए और फिर उन्होंने एक मिट्टी खो दी कि भाई पेड़ को अगर बीमारी हो रही तो हो सकता है कि जमीन से कुछ गया हो। तो नीचे एक ही फंगस फैली उनको मिली।
उन्होंने एक जगह से सैंपल लिया। फिर 100 मीटर दूर से सैंपल लिया। फिर 1 किलोमीटर दूर से सैंपल लिया और हर सैंपल का डीएनए टेस्ट किया यह देखने के लिए कि क्या यह अलग-अलग फंगस है या फिर यह एक ही ऑर्गेनिज्म है। चौंकाने वाली बात सामने आई कि यह एक ही फंगस था जो पूरे एनवायरमेंट में वहां जंगल में फैला हुआ था। एक अकेला फंगस जो उस जंगल के नीचे लगभग 10 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ था इतनी जमीन में जिसमें हजार से ज्यादा फुटबॉल के मैदान आप बना सकते हैं और इस एक ऑर्गेनिज्म का इस एक फंगस का वजन हजारों टन में था। उम्र क्या थी? कम से कम 2000 साल से ये वहां था और कुछ अनुमानों के मुताबिक 8000 साल भी इसकी एज हो सकती है। यानी जब मिस्र के पिरामिड बन रहे थे उससे पहले से यह फंगस उस जमीन में था। एक ऑर्गेनिज्म। इसलिए हमने कहा कि व्हेल से भी बड़ा फंगस हो जाता है। और एक और कमाल की बात है इस पूरे फंगस के नेटवर्क को वैज्ञानिकों ने एक सिंगल जीव माना। क्यों? आपने ध्यान दिया होगा कि हमने बार-बार कहा कि ये जो पूरा नेटवर्क है 10 स्क्वायर कि.मी. में फैला हुआ ये एक ऑर्गेनिज्म है। अब इस पूरे के नेटवर्क को वैज्ञानिक ये भी मान सकते थे कि बंच ए, बी, सी है और इससे मिलकर ये नेटवर्क बना है।
तो ये कई है। इनको एक जीव क्यों माना गया? तो देखिए हम किसी जीव को एक कब मानते हैं? मैं [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो आपको दिख रहा हूं एक इंसान एक यूनिट है। कोई कुत्ता आप इमेजिन कर लीजिए एक यूनिट है। क्यों? क्योंकि ये जो बॉडी है हमारी उसकी एक हद है। लेकिन फंगस की कोई हद नहीं होती। कोई उसकी शक्ल भी नहीं होती है। एक देह नहीं उसकी होती। एक नेटवर्क के ही फॉर्म में वह जीवित रहती है। लगातार यह नेटवर्क बढ़ता है। लगातार फैलता रहता है और सिर्फ फैलता नहीं है। एक और काम करता है। इसका [नाक से की जाने वाली आवाज़] सबसे जरूरी काम है जो धरती पर जिंदगी की शक्ल तय करता है वो होता है पेड़ों के साथ। क्या काम?
जंगल में जो भी बड़ा पेड़ आप देखते हैं उसकी जड़े अकेली नहीं होती। उसकी जड़ों से लिपटी होती है फंगस। और इस जोड़ी को विज्ञान में माइकोराइजा हम कहते हैं। नाम आपको मुश्किल लग सकता है, लेकिन काम इसका बड़ा ईजी होता है। यह पेड़ और इस फंगस के बीच का एक एग्रीमेंट होता है जिसमें दोनों को ही फायदा होता है। सिंबायोटिक रिलेशनशिप। डील क्या है? पेड़ एटमॉस्फेयर में ऊपर तक के उठा हुआ है। उसके पास पत्ते हैं। ये जो पत्ते हैं सूरज की रोशनी से शुगर बना सकते हैं। खाना बना सकते हैं। लेकिन पेड़ को सिर्फ खाना तो नहीं चाहिए। उसको जमीन से पानी चाहिए।
मिट्टी में घुले वह खास तत्व चाहिए जिनके बिना वह बड़ा नहीं हो सकता। और पेड़ की मोटी-मोटी जड़ें इन्हें बहुत दूर से तो नहीं खींच सकती हैं। यही फंगस काम आती है। उसके जो बाल जैसे बारीक-बारीक स्ट्रैंड्स बारीक-बारीक धागे मिट्टी के कोनों कोनों तक पहुंचे हैं। जहां जड़े भी नहीं पेड़ की पहुंची हैं। वहां से पानी और जरूरी तत्व जो न्यूट्रिएंट्स होते हैं उनको वो इकट्ठा कर लेते हैं और पेड़ की जड़ तक के दे देते हैं। बदले में अब पेड़ को पानी मिला है। न्यूट्रिएंट्स मिले हैं।
बदले में पेड़ क्या देता है? अपना बनाया खाना यानी शुगर का एक हिस्सा वह फंगस को दे देता है। अब फंगस खुद खाना नहीं बना सकती। यह हम जानते हैं। तो उसे यह खुराक पेड़ से मिल रही है। एक हाथ से ले, एक हाथ से दे। आज धरती के लगभग 90% पौधे किसी ना किसी फंगस के साथ यही रिश्ता निभा रहे हैं। इसीलिए इतने बड़े हो पाए हैं। और अब इस रिश्ते का एक बड़ा दिलचस्प हिस्सा हम डिस्कस करेंगे। एक फंगस का जाल सिर्फ एक पेड़ तक सीमित नहीं रहता है।
वह फैलते-फैलते एक साथ कई पेड़ों की जड़ों से जुड़ता जाता है। छोटे पेड़ आते हैं। इसमें बड़े पेड़ होते हैं। अलग-अलग जाति प्रजाति के पेड़ होते हैं। सब एक ही अंडरग्राउंड नेटवर्क से लिंक्ड होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि एक पेड़ जमीन के नीचे दूसरे पेड़ से जुड़ा हुआ है। बीच में उसके फंगस है। कुछ [नाक से की जाने वाली आवाज़] वैज्ञानिकों ने इस अंडरग्राउंड नेटवर्क को एक नाम भी दिया है वुड वाइड वेब।
वर्ल्ड वाइड वेब के नाम पे यानी एक जंगल का इंटरनेट आप इमेजिन कर लीजिए। अब इस वुड वाइड वेब की पहचान के लिए जो सबसे पॉपुलर प्रयोग हुआ था वह कनाडा के जंगलों में हुआ था। सुजैन सिमार्ड नाम की एक वैज्ञानिक हैं। उन्होंने किया था। [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक्सपेरिमेंट उन्होंने कैसे किया? एक पेड़ को एक स्पेसिफिक सिग्नेचर वाली कार्बन गैस के बीच उन्होंने रखा। अब ऑब्वियसली पेड़ ने वही किया जिसके लिए वो बनाए। उसने कार्बन को सोखा। उस स्पेसिफिक मॉलिक्यूल को और अपना खाना बना लिया। की जाने कुछ टाइम बाद देखने को मिला कि इसी स्पेसिफिक सिग्नेचर वाला जो कार्बन मॉलिक्यूल था पास के दूसरे पेड़ों में मिलने लगा। जिन्हें यह गैस दी ही नहीं गई थी।
यानी एक पेड़ का बनाया खाना जमीन के नीचे के जाल से होकर दूसरे पेड़ों तक पहुंच रहा था। इस रिसर्च से यह बात सामने आई कि पेड़ इस जाल के जरिए आपस में रिसोर्सेज बांटते भी हैं और मुमकिन है कि मुसीबत के वक्त एक दूसरे को मैसेजेस भी भेजते हो। अब इस आईडिया ने कि एक जंगल में पेड़ आपस में बातें करते हैं। इसने लोगों को इतना चाम किया कि इसको किताबों में जगह मिली। पॉपुलर कल्चर में फिल्में आती हैं। अवतार को आप देख सकते हैं।
उसके अंदर भी कांसेप्ट यही है कि जो पूरी कुदरत है, जंगल है, जानवर हैं वो एक सोल में बंधे हुए हैं। एक दूसरे से कम्युनिकेट करते हैं। लेकिन सारे साइंटिस्ट इस बात से पूरी तरह से एग्री नहीं करते हैं। कुछ साइंटिस्ट का यह भी कहना है कि अब तक के जितना एविडेंस मिला है वह इतना डेफिनेट नहीं है कि पेड़ जानबूझकर डेलीबेटली एक दूसरे की मदद करते हो। इसको एस्टैब्लिश कर दे। हो सकता है कि इसमें फंगस अपना फायदा देख रहा हो और खाना इधर से उधर बस अपने आप फ्लो कर रहा हो। इतना वो मानते हैं कि एक नेटवर्क मौजूद है और उसमें से जो संसाधन है, जो रिसोर्सेज हैं, पानी है, न्यूट्रिएंट्स है, शुगर है वो एक तरफ से दूसरी तरफ जा रहे हैं। उसके पीछे क्या कोई इंटेंशन है इसको लेकर के अभी डिबेट चल रही है।
खैर, रिश्ता चाहे जैसा हो, एक बात पर किसी को शक नहीं है कि अगर यह अंडरग्राउंड नेटवर्क नहीं होता, तो जमीन पर इतनी हरियाली संभव नहीं थी और यह कोई अंदाजा नहीं है। यह धरती के इतिहास की सबसे पुरानी सच्चाइयों में से एक है। करोड़ों साल पहले धरती की जमीन वीरान थी। नंगी चट्टानें थी। मिट्टी थी नहीं। जिंदगी पानी में थी। सारे जीव पानी से आए हैं। पौधों के भी जो पुरखे थे वो भी पानी में थे। और उनके पास तब जड़े नहीं हुआ करती थी। जमीन पर आने में सबसे बड़ी प्रॉब्लम यही थी कि बिना जड़ों के वह सूखी चट्टान से पानी और खुराक कैसे लेते और यही ने उनके लिए एक रास्ता खोला। के जो स्ट्रैंड्स थे, जो धागे थे, फाइबर्स थे, चट्टानों के अंदर उन्होंने एंट्री ली।
धीरे-धीरे उन चट्टानों को गलाया। उनमें से न्यूट्रिएंट्स निकाले। वैज्ञानिकों का मानना है कि शुरुआती पौधों ने करोड़ों साल तक अपनी जड़े बनाने से पहले फंगस को ही अपनी जड़ों की तरह इस्तेमाल किया था। यह फंगस था जो उनके लिए जमीन से पानी और खुराक खींचता रहा और पौधे धीरे-धीरे जमीन पर फिर अपने पांव जमाते गए। उनकी रूट्स अंदर गई। यानी जमीन पर जितनी आपको हरियाली दिखती है, चाहे वह जंगल हो, चाहे वह घास के मैदान हो, चाहे वह फसलें हो जो हमारा पेट भरती हैं। इन सब की बुनियाद में कहीं ना कहीं फंगस के साथ जो पहली साझेदारी हुई थी, वही है। तो जैसे हमने बताया ये साम्राज्य बड़ा पुराना है, बहुत बड़ा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है कि जिस चीज का कोई एक दिमाग नहीं है, कोई दो आंखें उसकी नहीं है, ना कान है, वह डिसाइड कैसे करती है? क्या उसका कोई डेलीबेट एक्शन भी होता है? कौन सी दिशा में बढ़ना है? किस पेड़ से जुड़ना है?
खाना कहां से ढूंढना है? यह सब डिसाइड कैसे करता है? इसका जवाब ढूंढने के लिए वैज्ञानिकों ने फंगस के साथ एक छोटा सा टेस्ट किया। एक तरह की उन्होंने भूल भुलैया एक मेज बनाई। एक उन्होंने पेट्रिडिशली ट्रे लिया। उसमें फंगस को एक कोने में रखा गया और दूसरे कोने पर उसका खाना रखा गया और बीच में कई सारी रुकावटें थी। मोड़ थे। कुछ रास्ते बंद थे। कुछ रास्ते घुमावदार थे। के स्टैंड्स ने क्या किया? उसके जो धागे थे हर दिशा में धीरे-धीरे धीरे-धीरे फैलने लगे और प्रोब किया उन्होंने। जैसे अंधेरे में हम रास्ता अपना ढूंढते हैं। जो रास्ता बंद निकला उधर की ग्रोथ धीरे-धीरे रुक गई। और जो रास्ता खाने तक पहुंचा उधर का जाल जो नेटवर्क था एक स्टैंड से दूसरा स्टैंड से तीसरा आया और मजबूत नेटवर्क वहां बढ़ गया।
आखिर में फंगस ने खाने तक का सबसे छोटा रास्ता पहचान लिया और जो बाकी सारे रास्तों में उसने प्रोब किया था वहां से खुद को समेट लिया। यानी बिना दिमाग के बिना मैप के उसने एक सॉल्यूशन निकाला। एक और एक्सपेरिमेंट में यह भी देखा गया कि को एक डायरेक्शन में बढ़ने का अगर अनुभव एक बार एक्सपीरियंस हो जाए तो वह उस डायरेक्शन की एक तरह से मेमोरी को कैरी करती है और अगली बार उसी तरफ जाती है। यानी कोई एक ब्रेन जैसा ऑर्गन भले फंगस के पास ना हो फिर भी एक तरह की डिसीजन मेकिंग है। एक तरह की मेमोरी उसके पास में है।
अब यह हो कैसे रहा है? अगर दिमाग नहीं है तो यह अभी भी इंसान पूरी तरह समझ नहीं पाया है। इतना साफ है कि बुद्धि का मतलब इंटेलिजेंस का मतलब हमेशा दिमाग का एकिस्टेंस ही नहीं होता है। का जो पूरा नेटवर्क है वो मिलकर एक साथ इसी काम को अचीव कर लेता है। किसी एक जगह किसी एक ऑर्गन पे वो आश्रित नहीं है। हर स्ट्रैंड का हर धागा जो छोटा सा निकला हुआ है उसका वो अपने एनवायरमेंट को भांपता है और पूरा नेटवर्क उसी के हिसाब से अगला स्टेप लेता है ढलता है। यहीं से वह रास्ता खुलता है जो आपको उसी कहानी पर लेके जाएगा जहां से हमने यह एपिसोड शुरू किया था। चींटी वाला एग्जांपल कि अगर एक फंगस बिना किसी एक स्पेसिफिक ऑर्गन के जिसे हम दिमाग कहेंउसके बिना अपने लिए सबसे छोटा रास्ता ढूंढ सकता है तो कोई एक स्पेसिफिक यह भी कर सकता है कि किसी और की बॉडी को इस काम के लिए यूज कर ले। उसने रास्ता ढूंढना छोड़ा और एक जिंदा जानवर को अपना कैरियर बनाया।लेकिन उससे पहले एक और सवाल का हिसाब बाकी है कि यह साम्राज्य अगर इतना ताकतवर है, इतना पुराना है, हमसे जुड़ा है, तो हमारी अपनी जिंदगी में इसका सीधा-सीधा दखल क्या है? कितना है? जवाब है कि का दखल आपकी जिंदगी में रोज है। किचन से लेकर के हॉस्पिटल तक के है। और मुमकिन है कि ने कम से कम एक बार आपकी जान बचा ली हो। हम हम सन 1928 की बात है। लंदन की एक छोटी सी लैब थी। एक डॉक्टर छुट्टियां मनाकर लौटे और मेज पर रखे अपने पुराने जो एक्सपेरिमेंट्स थे उनको वो समेट रहे थे।
इसमें कुछ कांच की प्लेट्स थी जिनमें वो बैक्टीरिया कल्चर कर रहे थे। यानी सूक्ष्म जीव जो बीमारियां फैलाते हैं। उस टाइम पे ये एक्सपेरिमेंट्स खूब चल रहे थे। जब इंसान समझ रहा था कि बीमारियां कैसे होती हैं। से की इसी बीच एक प्लेट पर उनकी नजर अटकी और उसमें छुट्टियों के दौरान कुछ फफूंद उगाई प्लेट खराब हो गई थी। फेंकने लायक लगी। लेकिन उन्होंने गौर से देखा कि फंगस के चारों तरफ एक गोल घेरा था। जहां बैक्टीरिया पूरी तरह साफ था। यानी बैक्टीरिया को ने मार दिया था। ऐसा था जैसे फफू ने अपने चारों ओर एक लक्ष्मण रेखा खींच के रखी हो जिसके अंदर कोई बैक्टीरिया आ नहीं पा रहा था। जिस डॉक्टर ने इसे ऑब्जर्व किया उनका नाम था एलेग्जेंडर फ्लेमिंग। जीके का सवाल। उन्होंने समझा कि फफून कोई एक ऐसा केमिकल रिलीज कर रही होगी जो बैक्टीरिया को मार सकता है।
इस केमिकल को नाम मिला गेस कीजिए पेनिसिलिन। यहीदुनिया की पहली असली एंटीबायोटिक दवा बनी मॉडर्न मेडिसिन में यानी बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों को सीधे मारने वाली दवा। इस एक खोज ने पेनिसिलिन की डिस्कवरी ने दुनिया की जो ग्लोबल पपुलेशन है उस पर असर डाला। पेनिसिलिन की खोज से पहले और पेनिसिलिन की खोज के बाद जो मोटलिटी रेट है कम हुआ। इससे पहले एक मामूली सा जख्म अगर आपको हो जाए छोटा सा इंफेक्शन हो जाए।
इंसान की जान वो ले लिया करता था। पेनिसिलिन जब आया तब इस तरह की जो छोटी-छोटी चीजों से मौतें हो जाया करती थी, हो जाता था। यह मौतें थामी। आज तक इस दवा ने और इस दवा के बाद जो इसकी एक फैमिली ऑफ मेडिसिंस बनी उसने करोड़ों लोगों की जान बचाई है। फिर फंगस का फायदा सिर्फ मेडिसिन में नहीं है। आपके किचन में भी रोज काम आता है। ब्रेड, इडली, डोसा यह सब फूलते हैं। नरमन-नरम होते हैं।
की वजह से जिसको आप यीस्ट कहते हैं। यीस्ट आटे में मौजूद शक्कर को कंज्यूम करती है। बदले में गैसेस छोड़ती है। और यह जो गैसेस होती हैं आटे में यह बबल्स बनाती हैं और वह फूल जाता है। यानी जिस नरम-नरम ब्रेड को आप खाना पसंद करते हैं, उसका नरम होना, उसका फूलना एक फंगस की वजह से है। और सिर्फ ब्रेड की बात नहीं है। शराब में भी फंगस का रोल है। वहां पे यीस्ट शक्कर को ही खाती है। और जब उसको हवा नहीं मिलती है तो गैस की जगह फिर वो लिकर बनाती है, बनाती है। हर तरह के शराब के पीछे बेसिकली इसी प्रोसेस का काम है। और यही प्रोसेस होता है फंगस से संभव। तो हमको दवा दे रही है, खाना दे रही है, भी पीने के लिए दे रही है। जाने वाली लेकिन इसकी सबसे हैरतंगेज ताकत वो है जो शायद आने वाले सालों में हमारी बड़ी मुश्किल को हल करे।
क्या? याद कीजिए फंगस अपने जो डाइजेस्टिव जूसेस है उसको बाहर छोड़कर चीजों को गलाती है और फिर उनको कंज्यूम करती है। अब पूछने वाला यह सवाल पूछ सकता है कि क्या-क्या गला सकती है? और जवाब बहुत चौंकाने वाला है। कुछ लकड़ी का वह सबसे सख्त हिस्सा भी गला सकते हैं जिससे कोई और जीव नहीं तोड़ पाते हैं। जनरली सेलुलोज़ कंज्यूम करना कम लोगों के पस की बात होती है। उसको कंज्यूम कर सकता है। कच्चे तेल को खा सकते हैं। यानी समंदर में अगर तेल फैल जाए तो सही किस्म का फंगस उसको तोड़ के पानी को साफ कर सकता है। कुछ फंगस ऐसी हैं जो प्लास्टिक को भी गला सकती हैं।
वही प्लास्टिक जो सैकड़ों हजारों साल तक नहीं गलता है और कुछ फंगस ऐसी भी हैं जो एक्सप्लोसिव केमिकल्स तक को ब्रेक कर सकती हैं। इसी ताकत को इसी फिनोमिना को एक नाम मिला है माइक्रो रेमीडिएशन मतलब फंगस की भूख से जमीन और पानी का जहर साफ करना है। फंगस की इसी कैरेक्टरिस्टिक की सबसे बड़ी मिसाल चर्नोबिल में भी आपको देखने को मिल रही है। चर्नोबिल यानी जहां 1986 में दुनिया का जो सबसे बड़ा एक्सीडेंट है वो हुआ था। वहां पे रिएक्टर दग गया था। जो फटा हुआ रिएक्टर कोर है उसके अंदर जहां रेडिएशन इतना तेज है कि इंसान मिनटों में मर जाता है वहां भी वैज्ञानिकों ने उगती हुई देखी है और सिर्फ वो उग नहीं रही है थ्राइव कर रही है। कुछ फंगस ऐसी थी जो रेडिएशन की तरफ बढ़ रही थी। जैसे सूरज की रोशनी की तरफ बढ़ती है।
वैसे ही की तरफ झुक रही यानी जहां कोई जिंदगी नहीं टिक सकती है फंगस वहां भी पनपती है। अब इन सारी चीजों को अपने दिमाग में रखते हुए वापस वहां चलते हैं जहां से हमने कहानी शुरू की थी। वो अकेली चींटी जो जमीन से थोड़ा ऊपर एक पत्ती को अपने जबड़ों में दबाए मर ही गई है।