हमारा यह दृढ़ मत है कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंडित करने वाले कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। ऐसे कानून का अधिकार यानी कि बढ़ती आबादी का डर पिछले कुछ दशकों में आए जन सांख्यिकी बदलावों यानी कि डेमोग्राफिक चेंजेस के कारण कमजोर हो चुका है। यह मैं नहीं कह रहा। यह कहना [संगीत] है सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी एस नरसिम्हा का। जिन्होंने दो से ज्यादा बच्चे होने पर व्यक्ति के स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं लड़ पाने के नियम पर सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनों की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े करते हुए पूछा कि भारत में प्रजनन दर लगातार गिर रही है? तो ऐसे में बढ़ती आबादी का डर दिखाकर दो से ज्यादा बच्चे रखने वालों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर फिर से सोचने की जरूरत है। तो क्या दो से ज्यादा बच्चे होने पर किसी व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर एक अहम कानूनी बहस शुरू कर दी है। अदालत ने कहा कि भारत में फर्टिलिटी रेट यानी कि प्रजनन दर घटकर 1.9 हो चुकी है। इसीलिए जनसंख्या नियंत्रण के पुराने तर्क पर बने कानूनों की फिर से जांच जरूरी है।
दरअसल यह मामला महाराष्ट्र के पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका से जुड़ा हुआ है। जिन्हें तीसरे बच्चे [संगीत] के जन्म के आधार पर पद से अयोग्य घोषित कर दिया गया। इससे जुड़े पुराने केस 2003 के जावेद वर्सेस स्टेट ऑफ हरियाणा फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने मामला बड़ी बेंच को भेज दिया है। साथ ही कोर्ट ने महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की अयोग्यता से जुड़ी कारवाही पर भी रोक लगा दी। अब मैं आपको बताता हूं कि पूरा मामला क्या है। तीसरे बच्चे के चलते सरपंच की कुर्सी चली गई। यह मामला महाराष्ट्र के बुलढाना जिले के काकोड़ा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले से जुड़ा हुआ है।
उनके खिलाफ शिकायत की गई थी कि उनके तीन बच्चे हैं। जबकि महाराष्ट्र में दो बच्चों से ज्यादा होने पर पंचायत पद पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जाती। अक्टूबर 204 में अतिरिक्त कलेक्टर ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था। इसके बाद अतिरिक्त आयुक्त और बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी उनके खिलाफ फैसले को बरकरार रखा था। तो अब सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपना नजरिया क्यों बदल दिया?
दरअसल महाराष्ट्र के पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंची तो जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने मामले की सुनवाई की। पुराने कानूनों को नए जमाने की जरूरतों के हिसाब से तोला। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2003 में जब अदालत ने दो बच्चों की शर्त को सही माना था तब भारत की कुल प्रजनन दर लगभग तीन थी और यह फर्टिलिटी रेट अब घटकर 1.9 रह गया है।
जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए 2.1 की दर को रिप्लेसमेंट लेवल माना जाता है। अदालत के मुताबिक अब देश के सामने बढ़ती आबादी के बजाय बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और काम करने वाली आबादी में कमी जैसी चुनौतियां आ सकती है। इसीलिए जनसंख्या नियंत्रण के पुराने तर्क पर बने कानूनों की दोबारा समीक्षा जरूरी है।
अब 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बदलती जनसंख्या स्थिति को देखते हुए साल 2003 के जावेद वर्सेस स्टेट ऑफ हरियाणा मामले के पुराने फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत बताई। सवाल यह है कि बड़ी बेंच को मामला चला गया तो क्या यह सभी राज्यों में लागू होगा? तो फिलहाल तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है ताकि दो बच्चों की शर्त की संवैधानिक वैधता पर फिर से विचार किया जा सके। अदालत ने मंगला इंगले के मामले में अयोग्यता से जुड़ी कारवाई पर रोक लगा दी। ऐसे में इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि देश के सभी राज्यों में दो बच्चों वाला नियम तुरंत खत्म हो जाएगा। अलग राज्यों के कानूनों पर अंतिम असर बड़ी बेंच के फैसले और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा।