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जब अमिताभ बच्चनने तोडा था अनिल कपूर का घमंड!

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…अभी बहुत दूर है। >> एक तरफ एक नया, तूफानी और महत्वाकांक्षी चेहरा था—अनिल कपूर, जिनकी ‘तेज़ाब’ और ‘राम लखन’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया था। उनका नाम हर तरफ गूँज रहा था। और दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन का विशाल साम्राज्य था, जिन्होंने दशकों तक बॉलीवुड पर राज किया था और जिन्हें हिलाना नामुमकिन माना जाता था। लेकिन अनिल कपूर के बढ़ते कद ने उस अजेय सिंहासन को सीधी चुनौती दे दी थी। हर गली, हर जुबान पर बस एक ही सवाल था—क्या सचमुच अमिताभ का दौर खत्म होने वाला है? और क्या अब अनिल कपूर बॉलीवुड के नए सम्राट के रूप में उस सिंहासन पर बैठने जा रहे हैं? दर्शक, ट्रेड एनालिस्ट और पूरी फिल्म इंडस्ट्री अपनी साँसें रोककर इस मेगा क्लैश के हर एक मूव पर कड़ी नज़र रखे हुए थे।अस्सी का दशक, जब बॉलीवुड के क्षितिज पर सिर्फ एक ही नाम सूरज की तरह चमकता था—अमिताभ बच्चन। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी किसी का साम्राज्य अमर लगने लगता है, समय एक नई चुनौती खड़ी कर देता है।

80 के दशक के आखिरी सालों में एक ऐसा अभिनेता आया जिसके चेहरे पर एक ज़िद्दी मुस्कान थी, कुछ कर दिखाने की आँखों में आग थी और चाल में एक लापरवाह अकड़ थी—वह नाम था अनिल कपूर। हाँ, अनिल कपूर, वही अभिनेता जिसने अमिताभ बच्चन के अजेय साम्राज्य की नींव हिला दी थी।एक समय ऐसा आया जब बॉलीवुड के गलियारों में सन्नाटा छा गया और ट्रेड एनालिस्ट्स यह दावा करने लगे कि ‘शहेनशाह’ का दौर अब खत्म हो चुका है। अब बॉलीवुड का नया राजा अनिल कपूर है। लेकिन फिर क्या हुआ? एक ऐसा बॉक्स ऑफिस युद्ध हुआ जहाँ अनिल कपूर का ओवरकॉन्फिडेंस और अहंकार एक ही झटके में चकनाचूर हो गया। एक ही प्रहार से अमिताभ बच्चन ने साबित कर दिया कि शेर भले ही कुछ देर शांत रहे, लेकिन वह जंगल का राजा ही रहता है।यह कहानी शुरू होती है करीब साल 1984 से 1985 के आसपास की। अमिताभ बच्चन अपने जीवन और करियर के एक बहुत ही अजीब दौर से गुजर रहे थे। फिल्म की शूटिंग के दौरान हुए दर्दनाक हादसे से अमिताभ उबर तो गए थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने राजनीति का रुख कर लिया था। जब अमिताभ बच्चन राजनीति में चले गए, तो बॉलीवुड का सिंहासन खाली-खाली सा लगने लगा था। उसी समय पर्दे के पीछे बी-टाउन में एक लड़का दिन-रात मेहनत कर रहा था। फिल्म ‘मशाल’ में दिलीप कुमार के सामने खड़े होकर संवाद बोलने वाले अनिल कपूर धीरे-धीरे अपनी एक अलग पहचान गढ़ रहे थे।साल 1985 में ‘मेरी जंग’ रिलीज़ हुई और अनिल कपूर ने दिखा दिया कि उनके भीतर कितना विस्फोटक स्टारडम छिपा है। और फिर आया साल 1988। 1988 में निर्देशक चंद्रा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘तेज़ाब’ रिलीज़ हुई। इस फिल्म में ‘मुन्ना’ के किरदार में अनिल कपूर ने जो असर छोड़ा, उसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। पूरा देश ‘एक दो तीन’ गाने पर झूम रहा था और अनिल कपूर का डायलॉग हर बच्चे की जुबान पर था। ‘तेज़ाब’ उस साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई।दूसरी तरफ, जब अमिताभ बच्चन राजनीति से लौटे, तो उनकी फिल्में ‘जादूगर’, ‘तूफ़ान’ और ‘मैं आज़ाद हूँ’ बॉक्स ऑफिस पर वैसी परफॉर्म नहीं कर रही थीं जैसी उम्मीद थी।

जहाँ अमिताभ की फिल्में फ्लॉप हो रही थीं, वहीं अनिल कपूर की सफलता का ग्राफ रॉकेट की तरह ऊपर जा रहा था। जब सुभाष घई ने 1989 में ‘राम लखन’ बनाई, तो अनिल कपूर को लेकर दीवानगी अपने चरम पर पहुँच गई। ’12 का फोर, फोर-टू का वन, माई नेम इज़ लखन!’ इस एक गाने ने अनिल कपूर को हर घर-محल्ले का चहेता बना दिया।इसके बाद अनिल कपूर ने ‘ईश्वर’, ‘परिंदा’ और ‘रखवाला’ जैसी फिल्मों के साथ बॉक्स ऑफिस पर हिट्स की झड़ी लगा दी। अनिल कपूर उस दौर की मशहूर फिल्मी पत्रिकाओं के कवर पेज पर छाए रहते थे। फिल्म समीक्षकों ने यह लिखना शुरू कर दिया था कि अमिताभ बच्चन का दौर खत्म हो चुका है और भारतीय सिनेमा को अपना नया नंबर वन सुपरस्टार—अनिल कपूर—मिल गया है।लगातार सफलता ने अनिल कपूर के अंदर जबरदस्त आत्मविश्वास भर दिया था। लेकिन कभी-कभी हद से ज़्यादा आत्मविश्वास अहंकार में बदल जाता है और इंसान को ज़मीन पर लाकर पटक देता है। अनिल कपूर को महसूस होने लगा था कि अब वह बॉलीवुड में उस मुकाम पर हैं जहाँ वह अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज को भी सीधी टक्कर दे सकते हैं। साल 1990 में अनिल कपूर के सामने प्रोजेक्ट्स की कतार लगी हुई थी।उसी दौरान मोहन कुमार के निर्देशन में एक बड़ी एक्शन ड्रामा फिल्म बन रही थी—’अम्बा’। अनिल कपूर के साथ इस फिल्म में मीनाक्षी शेषाद्रि, शबाना आज़मी और किरण कुमार जैसे बड़े सितारे थे। फिल्म का बजट भारी-भरकम था और इसके गानों का भारी प्रचार किया जा रहा था। अनिल कपूर और ‘अम्बा’ के निर्माताओं को अपनी फिल्म पर इतना अटूट भरोसा था कि वे किसी भी बड़ी रिलीज़ से भिड़ने के लिए तैयार थे।उसी समय निर्देशक के.सी. बोकाड़िया अमिताभ बच्चन को लेकर एक फिल्म बना रहे थे—’आज का अर्जुन’। लगातार असफलताओं के कारण उस समय अमिताभ बच्चन दबाव में थे। मीडिया उनके करियर को पहले ही खत्म घोषित कर चुका था। तभी अनिल कपूर और उनके कैंप ने एक बड़ा जुआ खेलने का फैसला किया। अनिल कपूर ने अपनी फिल्म ‘अम्बा’ को अमिताभ बच्चन की ‘आज का अर्जुन’ के सामने ठीक आमने-सामने (क्लैश) रिलीज़ करने की योजना बनाई। यह कोई इत्तेफाक नहीं था, बल्कि अनिल कपूर की तरफ से अमिताभ बच्चन को एक सीधा संदेश था कि अब यह उन्हीं का दौर है और वह शहेनशाह से डरते नहीं हैं।तारीख थी 10 अगस्त 1990, और पूरे भारत में सिनेमाघरों के बाहर भारी भीड़ जमा थी। एक तरफ अनिल कपूर की विस्फोटक एक्शन-फैमिली ड्रामा फिल्म ‘अम्बा’ थी, और दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन और जया प्रदा की ‘आज का अर्जुन’। ट्रेड पंडितों की नज़रें इस महामुकाबले पर टिकी हुई थीं। हर कोई देखना चाहता था कि नया खून पुराने शेर का शिकार कर पाता है या नहीं।फिल्में रिलीज़ हुईं। शुरुआती शो खत्म हुए और कुछ ही घंटों में सिनेमाघरों से जो खबरें बाहर आईं, उन्होंने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को सन्न कर दिया। जब दर्शक ‘आज का अर्जुन’ देखकर बाहर निकले, तो हर तरफ बस एक ही गूंज थी—”अमिताभ बच्चन इज़ बैक!” बप्पी लहरी के संगीत से सजा गाना सिनेमाघरों में तहलका मचा रहा था। अमिताभ बच्चन का वह ठेठ एक्शन अवतार, उनका रुतबा और उनकी आँखों की आग ने दर्शकों को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर दिया था।और दूसरी तरफ ‘अम्बा’ का क्या हाल था? जहाँ ‘आज का अर्जुन’ के टिकट के लिए सिनेमाघरों के बाहर लंबी कतारें थीं और टिकट ब्लैक में बिक रहे थे, वहीं अनिल कपूर की ‘अम्बा’ के सिनेमाघर खाली पड़े थे।

‘अम्बा’ की कहानी दर्शकों का ध्यान खींचने में नाकामयाब रही। फिल्म की पटकथा कमज़ोर साबित हुई और अनिल कपूर का स्टारडम अमिताभ बच्चन के बुलंद हौसले और मौजूदगी के आगे टिक नहीं सका।’आज का अर्जुन’ बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट और ब्लॉकबस्टर साबित हुई। इस फिल्म ने 1990 में कमाई के कई नए रिकॉर्ड बनाए और अमिताभ बच्चन के डूबते करियर को एक नई ज़िंदगी दी। दूसरी तरफ, ‘अम्बा’ बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर पड़ी और पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई। जिस अनिल कपूर ने अमिताभ बच्चन के साम्राज्य को हिलाने और उन्हें सीधी चुनौती देने की सोची थी—किसी को पता ही नहीं चला कि उनकी फिल्म कब सिनेमाघरों में आई और कब गायब हो गई।बिना किसी बयानबाज़ी या विवाद के, अमिताभ बच्चन ने सिर्फ अपने काम और अपनी फिल्म की सफलता के दम पर अनिल कपूर के बढ़ते हुए अहंकार को एक ही झटके में तोड़ दिया।> > “रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं… नाम है शहेनशाह!”> > > 1990 की इस बॉक्स ऑफिस की लड़ाई ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को एक बहुत बड़ा सबक सिखाया—शहेनशाह को कभी कम मत समझिए, क्योंकि अमिताभ बच्चन सिर्फ एक दौर का नाम नहीं, बल्कि अपने आप में एक युग थे। जब भी मीडिया या उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उन्हें ख़त्म मान लिया, अमिताभ ने ‘आज का अर्जुन’ और ‘हम’ जैसी फिल्मों से एक धमाकेदार वापसी की।सफलता में विनम्रता बहुत ज़रूरी है। अनिल कपूर निस्संदेह 80 और 90 के दशक के सबसे महान और बेहद प्रतिभाशाली कलाकारों में से एक हैं। लेकिन ‘अम्बा’ की हार ने उन्हें यह सिखा दिया कि सफलता की चोटी पर पहुँचने के बाद भी अपने से बड़े दिग्गजों को कम आंकने की गलती कभी नहीं करनी चाहिए।इस हार के बाद अनिल कपूर ने अपनी रणनीति भी बदली। उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ किसी भी सीधे टकराव से परहेज किया और अपने अभिनय की विविधता (Versatility) पर ध्यान केंद्रित किया। बाद में अनिल कपूर ने ‘लम्हे’, ‘ बेटा’, ‘विरासत’ और ‘नायक’ जैसी कालजयी फिल्में देकर बॉलीवुड के इतिहास में खुद को अमर कर लिया।य

ह थी 1990 की उस ऐतिहासिक टक्कर की कहानी, जहाँ अनिल कपूर के जोश का मुकाबला अमिताभ बच्चन के अनुभव और रुतबे से हुआ था। आज भी जब 90 के दशक के सबसे बड़े बॉक्स ऑफिस क्लैश की बात होती है, तो ‘अम्बा’ बनाम ‘आज का अर्जुन’ का नाम बहुत सम्मान और उत्सुकता के साथ लिया जाता है। अमिताभ बच्चन ने साबित कर दिया कि स्टारडम पाना शायद आसान हो, लेकिन एक लीजेंड का दर्जा बनाए रखना सिर्फ अमिताभ बच्चन का ही काम है।आपको क्या लगता है? क्या अनिल कपूर के लिए अपनी फिल्म ‘अम्बा’ को ‘आज का अर्जुन’ के खिलाफ रिलीज़ करना सही फैसला था? और अमिताभ बच्चन और अनिल कपूर में से आपकी 90 के दशक की पसंदीदा फिल्म कौन सी थी और आपने उसे किस शहर में देखा था? हमें कमेंट सेक्शन में लिखकर ज़रूर बताएं। अगर आपको बॉलीवुड इतिहास का यह अनसुना और दिलचस्प किस्सा पसंद आया हो, तो इस वीडियो को लाइक करना और चैनल ‘अविनाश ऑफिशियल’ को सब्सक्राइब करना न भूलें। धन्यवाद।

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