[संगीत] 11 जून 2026 मुंबई के रीगल सिनेमा के बाहर लगी यह कतार किसी लेटेस्ट बॉलीवुड रिलीज के लिए नहीं है और ना ही किसी साउथर्न ब्लॉकबस्टर की रिमेक देखने के लिए। और दोस्तों ओटीटी के इस युग में जहां मल्टीप्लेक्स ताजा तरीन फिल्मों के लिए भी हाउसफुल को तरस जाते हैं। यहां सभी सीटें खचाखच भरी हैं। यह एक ऐसी फिल्म की स्क्रीनिंग के मौके पर उमड़ी दर्शकों की भीड़ है जिसमें ना तो आज की सिनेमाई चमकदमक थी और ना ही कोई बड़ी स्टार कास्ट, ना कोई बड़ा बजट और ना ही कोई प्रमोशन। लीड एक्टर तो ऐसा कि उसे कोई पहचानता ना था। जहां तब के सितारे किसी भी रेस्टोरा में चले जाएं तो ऑटोग्राफ लेने वालों की भीड़ टूट पड़ती थी। इस एक्टर को फिल्म में काम करने के दौरान ही एक होटल से धक्के मारकर निकाल दिया गया। लेकिन वही फिल्म जब पर्दे पर आई तो उसने बड़े-बड़े सितारों को बॉक्स ऑफिस से धक्के मारकर निकाल दिया। इसे ना केवल पहला फिल्म फेयर अवार्ड मिला था बल्कि देश विदेश में इतने अवार्ड जीते कि आज भी फिल्मकार उस शोहरत को तरसते हैं।
दोस्तों हम बात कर रहे हैं साल 1953 में आई फिल्म 2 बीघा जमीन की जिसे हाल ही में शोले की तरह ही 4K फॉर्मेट में रिस्टोर किया गया है और इटली लंदन होते हुए अब मुंबई में इसकी स्क्रीनिंग हुई जहां हॉल खचाखच लोगों से भरा था। फर्क सिर्फ इतना था कि 73 साल पहले इसके निर्देशक विमल रॉय दर्शकों की तालियों के गवाह थे। आज उनके तीनों बच्चे जो बूढ़े होने को हैं यहां मौजूद थे और फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन की ओर से उन्हें सम्मानित भी किया गया। भारत की पहली कल्ट क्लासिक फिल्म जिसने ना केवल देश और दुनिया में शोहरत और अवार्ड बटोरे बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी झंडे गाड़े। जग जग जग जग जग जगन गिन गिन रे उससे जुड़े कुछ दिलचस्प किस्सों में जाने से पहले आपको बताते चलें कि कुछ ही महीने पहले जब इस फिल्म को बेनिस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था तो वहां भी क्रिटिक्स यह देखकर अवाक थे कि यूरोप के नियो रियलिज्म को मात देती ऐसी कोई फिल्म सात दशक पहले भारत में बनाई गई होगी। साल 195152 में जब राज कपूर की आवारा देश और दुनिया में अपने रोमांटिक क्राइम ड्रामा कंटेंट के लिए ही नहीं बल्कि एक सोशल रिफॉर्मर फिल्म के रूप में खूब नाम कमा रही थी।
फिल्म डायरेक्टर विमल रॉय ने मुंबई फिल्म फेस्टिवल में इटालियन क्लासिकल और नियोरियलिस्टिक फिल्म द बिक थीफ देखी थी। उसमें भीषण गरीबी और बेरोजगारी से जूझता फिल्म का नायक अपनी पत्नी और बच्चों के भरण पोषण के लिए संघर्ष करता है। बड़ी मुश्किल से एक नौकरी मिलती है। जहां शर्त यह है कि उसके पास साइकिल होनी चाहिए। वो एक साइकिल चुरा लेता है और उसके बाद की कहानी तमाम विडंबनाओं और सस्पेंस रोमांच से भरी है। विमल रॉय इस फिल्म से इतना प्रभावित हुए कि अपने तमाम कमर्शियल प्रोजेक्ट छोड़ एक ऐसी फिल्म बनाने में जुट गए जिसमें देश और समाज का यथार्थ चित्रण हो। गुलामी से मुक्त हुए देश में किसानों और मजदूरों से बड़ी दुर्दशा किसकी थी? उन्होंने एक ऐसी पटकथा पर काम शुरू किया जिसे ना कोई फाइनेंसर हाथ लगाने को तैयार था और ना ही कोई डिस्ट्रीब्यूटर। पॉल, महेंद्र और ऋषिकेश मुखर्जी के साथ मिलकर उन्होंने स्क्रिप्ट तो पूरा कर लिया लेकिन तब के बड़े सितारों की नजर में एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म होने जा रही थी जिसे पर्दे पर तो कोई मुफ्त में भी देखने नहीं आएगा। लेकिन लीड एक्टर के तौर पर उन्होंने जिस पर भरोसा जताया वो फिल्मों में तो संघर्ष कर रहा था लेकिन काफी पढ़े लिखे जहीन माहौल से आया था। नाम था बलराज साहनी। विमल रॉय के करीबियों ने कहा कि इस अंग्रेजी एक्टर से ये रोल नहीं हो पाएगा। लेकिन बलराज साहनी ने जो किया वो अभिनय की दुनिया में एक मिसाल तो बनी ही एक दिलचस्प किस्सा भी जिसे थोड़ी देर बाद बताएंगे। विमल रॉय ने हीरोइन भी तब ऐसी ली जो भक्ति फिल्मों में ही चल रही थी।
लेकिन इस फिल्म में एक ऐसा किरदार जी गई जिसने उसे पर्दे की मां बना दिया। कहानी एक ऐसे गरीब किसान शंभू महतों के इर्द-गिर्द घूमती जो अपनी पत्नी पार्वती, बेटे कन्हैया और बूढ़े पिता के साथ गांव की दो बीघा पुश्तैनी जमीन पर खेती करता और परिवार पाल रहा था। वहां का जमींदार एक मिल बनाना चाहता था और शंभू की जमीन उसी में आ रही थी। शंभू अपने जीवन की डोर यानी यह जमीन बेचने को तैयार नहीं था। जमींदार ने शंभू की जमीन हड़पने के लिए चाल चली। ₹65 के एक पुराने कर्ज को खाते में बढ़ा चढ़ाकर ₹235 दिखा दिया। और इसी कर्ज को चुकाने और अपनी जमीन बचाने के लिए कैसे एक किसान शहर जाता है, रिक्शा चलाता है। उसके बीवी बच्चे भी उसी दोहन की चक्की में पिसते जाते हैं और आखिरकार वो अपनी जमीन खो देता है। पूरी फिल्म इसी यथार्थ को ऐसे दिखाती है मानो सब कुछ हमारे आसपास घटित हो रहा है। बलराज साहनी को इस फिल्म के एक ही किरदार में दो किरदारों को जीना था। किसान भी और मजदूर भी। वह शूटिंग और सेट से बाहर भी उसी भाव भंगिमा और पोशाकों में रहते थे। कहते हैं कि कई महीनों तक उन्होंने अपनी पुरानी जीवन शैली त्याग कर फटे चीटे कपड़ों में किसानों मजदूरों की तरह ही खाया पिया और रहे। लेकिन इस बीच एक दिलचस्प वाक्या हुआ जिसका जिक्र उनकी जीवनी में भी है। कोलकाता की सड़कों पर जब वो रिक्शा चलाते शंभू महतों के रोल को जीवंत करने में जुटे थे। वह सुबह से शाम तक उन्हीं फटे चिटे पुराने कपड़ों में रहते थे। एक दिन शूटिंग के दौरान कड़ी धूप में रिक्शा चलाते हुए उन्हें प्यास लगी। वैसे ही फटे पुराने कपड़ों में चौरंगी इलाके के एक आलीशान रेस्टोरेंट फिरो में घुस गए। वेटर ने उनकी हालत देखकर पहले तो उन्हें दुत्दकारा। वह अपनी सीट पर बैठे रहे तो मैनेजर्स के इशारे पर सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें जबरन धक्के देकर बाहर किया और विरोध करने पर
उठाकर फुटपाथ पर फेंक दिया। बलराज साहनी ने भी परिचय देने की कोशिश नहीं की क्योंकि उस शहर की त्रासदी को भरपूर महसूस करना चाहते थे और ऐसे एहसास ने ही उनके किरदार को इतना जीवंत बनाया कि तब के कई क्रिटिक्स ने उन्हें उस दौर का बेहतरीन एक्टर घोषित कर दिया था और उसके बाद तो उन्होंने एक से बढ़कर एक न जाने कितने किरदारों में ऐसी जान फूंकी कि दुनिया आज भी उनकी एक्टिंग की मुरीद है। 1953 में आई इस फिल्म ने अगले ही साल शुरू हुए पहले फिल्मफेयर अवार्ड जिसे तब द क्लेयर्स कहा जाता था। बेस्ट फिल्म का अवार्ड जीता और इसी फिल्म के लिए विमल रॉय को बेस्ट डायरेक्टर का नेशनल अवार्ड भी मिला। बेस्ट एक्टर के अवार्ड के लिए दिलीप कुमार और बलराज साहनी में कड़ी टक्कर थी।कि यह पहला ही अवार्ड था। ऐसे में तब जूरी और नामांकन की व्यवस्था नहीं थी। पाठकों और दर्शकों के पत्रों के आधार पर दिलीप कुमार को दाग फिल्म के लिए अवार्ड दे दिया गया। जबकि दाग फिल्म 1952 में आई थी। हालांकि तर्क यह दिया गया
कि दाग दिसंबर 52 में आई थी जो कि 53 में ही प्रदर्शित होती रही। ऐसे में 52 के उत्तरार्ध वाली सभी फिल्मों को कंसीडर किया गया। खैर जो भी हो लेकिन इस फिल्म ने जैसे-जैसे कैंस से लेकर मास्को तक अपनी धाक जमाई। विमल रॉय के साथ ही बलराज साहनी को भी दुनिया भर में सराहना मिली और उनके किरदार और अभिनय पर रिसर्च तक हुए। दोस्तों बलराज साहनी वैसे भी कमर्शियल चकाचौंध में नहीं पड़े और मनमाफिक रोल ही करते थे। तब भी अपनी एक्टिंग का सिक्का लंबे समय तक जमाए रखा। जैसे भी होगा ₹3 रोज पैदा कर लिया करूंगा। दिन रात मजदूरी करूंगा। दिन रात और हां दोस्तों इस फिल्म की कामयाबी में शैलेंद्र के गीतों और सलील चौधरी के संगीत को भी नहीं भुलाया जा सकता। उर तक तगिन तगिन गिन गिन रे मौसम बीता [संगीत] जाए मौसम बीता जाए [संगीत] नींद आरियाला सावन ढोल बजाता आया दिन तक मन के मोर नचाता ना खाने पीने से भला कब तक कटेगी आज दोस्त अनाज का एक दाना भी तुम्हारे मुंह में नहीं गया धरती कहे पुकार [संगीत][गाना गाने की आवाज़] के बीज बिछाले प्यार के जग जग जग जग जगन गिन गिन रे