Cli

नहीं मिल रहा था हीरो, हीरोइन भी छोड़ गई, डायरेक्टर बना एक्टर और फिल्म ने इतिहास रच दिया

Uncategorized

बीएमटी12 यह महज एक कार का नंबर नहीं बल्कि उस फिल्म का नाम था जिसके मुहूर्त पर यह तस्वीर ली गई थी। सबसे आगे हैं फिल्म की हीरोइन गीता बाली साथ में बहन हरदर्शन जो फिल्म को प्रोड्यूस कर रही थी और दूसरी तरफ गीता दत्त और फिल्म के एक्टर डायरेक्टर गुरुदत्त। लेकिन यह तस्वीर पर्दे पर मुकम्मल नहीं हो पाई और सिरिल्मी पत्रिकाओं में छप कर रह गई। जा जा जा बेवफा। दो रील शूट करने के बाद जब गुरुदत्त ने इस फिल्म के रशेस डिस्ट्रीब्यूटर्स को दिखाए तो कोई भी इसमें पैसा लगाने को तैयार नहीं हुआ। किसी को फिल्म की कहानी उठपटांग लग रही थी तो ज्यादातर को गुरुदत्त बतौर एक्टर रा नहीं आ रहे थे। गीता बाली उस दौर की शाइनिंग स्टार थी और गुरुदत्त उन्हें तीन फिल्मों में डायरेक्ट कर चुके थे। बाजी और जाल में तो गीता बाली के अगेंस्ट देवानंद हीरो थे। लेकिन साल 1953 में आई बाज में खुद गुरुदत्त ने ही एक्टिंग का मोर्चा संभाला था और यह फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हुई। किसी को उनकी शक्ल पसंद नहीं आई तो किसी को एक्टिंग।

अब इस फिल्म के लिए गुरुदत्त ने अपनी जगह कोई चर्चित एक्टर लेने का फैसला किया। लेकिन सबकी अपनी डिमांड और टर्म्स एंड कंडीशंस। किसी तरह उन्होंने शम्मी कपूर को मनाया और शूट की गई रीले दिखाई। अब शम्मी कपूर को या तो कहानी या रोल पसंद नहीं आया या उनकी अपनी कोई मजबूरी रही हो। उन्होंने यह कहकर फिल्म से कन्नी काट ली कि गुरु यह रोल तुम पर ही फिट लग रहा है। शायद मैं इसे जस्टिफाई नहीं कर पाऊंगा। मेरी मानो तो तुम्हें खुद यह रोल करना चाहिए। गीता बाली जो अगले साल ही शम्मी कपूर की होने वाली थी। इस फिल्म में इसलिए दिलचस्पी ले रही थी कि उनकी बड़ी बहन हरदर्शन इसे प्रोड्यूस कर रही थी जो बाज की भी प्रोड्यूसर थी। लेकिन बाज की नाकामयाबी और इस फिल्म से कई लोगों के कन्नी काटने के बाद दोनों बहनों का मन इस फिल्म से उजट गया।

गीता बाली अब खुद को गुरुदत्त की हीरोइन के रूप में कंफर्टेबल फील नहीं कर रही थी। उन्होंने फिल्म छोड़ दी। सुन सुन जालिमा गुरुदत्त जो रील और रियल में कुछ नया कुछ आर्टिस्टिक और कुछ एक्सपेरिमेंटल करने पर आमादा रहते तय किया कि कोई रहे या जाए फिल्म चले या फ्लॉप हो जाए अब यह फिल्म मैं ही प्रोड्यूस करूंगा और लीड रोल में भी मैं ही रहूंगा। उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी बनाई गुरुदत्त फिल्म्स। गीता बाली की जगह श्यामा को हीरोइन लिया और साथ में शकला भी। खुद गुरुदत्त के करीबियों ने सलाह दी थी कि क्यों सेंटीमेंटल होकर पैसा बर्बाद करते हो। कोई नया एक्टर ले लो। लेकिन गुरुदत्त को अपने प्लॉट और उस पर की जाने वाली सिनेमाई पेंटिंग पर इतना भरोसा था कि अब वो इसमें और आक्रामक प्रयोग करने लगे। सुन सुन सुन जालिमा प्यार हमको तुमसे हो गया। यह प्रयोग सिर्फ कहानी और ट्रीटमेंट में ही नहीं बल्कि गीत संगीत में भी हुआ और सबसे ज्यादा उन गानों को फिल्माने में। फिल्म का नाम BMT 112 जो कुछ ज्यादा ही कोडेड लग रहा था उसे बदलकर कर दिया गया आरपार। कभी यार कभी पार लगा तीरे नजर। कभी यार कभी पार।

और वो फिल्म जो किसी के गले नहीं उतर रही थी। जब पर्दे पर उतरी तो बॉक्स ऑफिस ही नहीं हिंदी सिनेमा के इतिहास में भी एक मील का पत्थर गाड़ गई। बाबूजी धीरे चलना प्यार में जरा संभलना। कहानी एक टैक्सी ड्राइवर कालू के इर्द-गिर्द घूमती है। जिसे रैश ड्राइविंग के चलते जेल की सजा हुई थी। अच्छे बिहेवियर के चलते थोड़ा पहले ही रिहा हो जाता है। लेकिन अब काम की तलाश में भटकता है और आखिरकार एक गैरेज में टैक्सी ड्राइवर की नौकरी मिल जाती है। गराज मालिक की बेटी निक्की से कालू को प्यार हो जाता है। लेकिन निक्की के पिता इस रिश्ते के खिलाफ हैं क्योंकि कालू गरीब है और उसका कोई ठिकाना नहीं। गराज की नौकरी छूटने के बाद कालू अनजाने में ही बंबई के अंडरवर के जाल में फंस जाता है। वहीं एक डांसर कैट यानी शकला उसकी जिंदगी में आती है और उसके भोलेपन पर फिदा हो जाती है। लेकिन फिल्म का रोमांच इस बात पर टिका है कि कैसे कालू खुद को इस काली दुनिया से निकालेगा और कानून की नजरों में बेदाग होकर निकलेगा और क्या वो अपने सच्चे प्यार निक्की को हासिल कर पाएगा। खेलो मैं हारी पिया हुई तेरी जीत रे

काहे फिल्म पर पूरा कंट्रोल होने के चलते अब गुरुदत्त इसमें खूब प्रयोग कर रहे थे उन्होंने रोमांस थ्रिल एक्शन और कॉमेडी का एक बेहतरीन कॉकटेल तैयार किया और उसे बड़े करीने से फिल्माया संवाद लेखक अबरार अलवी पर जोर डाला कि हर किरदार वही भाषा बोलेगा जिस हालात और परिवेश में वह रहता आया है। फिल्म को ऊपर उठाने में सबसे बड़ा योगदान इसके गीत संगीत का भी था। ओपी नयर पर गुरुदत्त का भरोसा रंग लाया और उन्होंने ऐसी धुने बनाई जो पारंपरिक भारतीय संगीत से हटकर थोड़ा वेस्टर्न टोन लिए हुए थी। जा जा बेवफा कैसा प्यार कैसे प्रीत रे और कहते हैं कि ओपी नयर कई विदेशी एल्बम से भी इंस्पायर्ड थे। बाबूजी धीरे चलना प्यार में जरा संभलना मजरू सुल्तानपुरी ने आठ बेहतरीन गीत लिखे थे और गुरुदत्त ने एक-एक लिरिक्स को अपने कैमरे के लेंस से परखा था। मोहब्बत कर लो जी भर लो आज किसने रोका है पर बड़े गजब। उस दौर में जहां रोमांटिक गानों को फिल्माने के लिए स्टूडियो के भीतर खूबसूरत सेट बनाए जाते थे या नदियों पहाड़ों के बीच खुले में गाने फिल्माए जाते थे। किसी ने सोचा भी ना था कि एक टैक्सी ड्राइवर का रोमांस गैराज और कार के भीतर भी फिल्माया जा सकता है। गुरुदत्त के एक बायोग्राफी में मजरू सुल्तानपुरी के हवाले से लिखा है कि इस गाने के मुखड़े में मजरू ने लिखा था प्यार मुझको तुझसे हो गया। जबकि गुरुदत्त इसे प्यार हमको तुमसे हो गया करना चाहते थे। मजरू ने ऐतराज जताया कि यह तो ग्रामेटिकली गलत होगा। तब गुरुदत्त ने कहा छोड़ो ना यार गाना सुनने की चीज है। कौन वहां तुम्हारा ग्रामर लेकर बैठेगा और यह गाना गुरुदत्त के कहे के मुताबिक ही फिल्माया गया जो बहुत बड़ा हिट हुआ। सुन सुन जालिमा प्यार हमको तुमसे हो गया।

श्यामा एक प्यारी और चुलबुली नायिका के तौर पर तो उभरी ही थी। फिल्म ने शकीला को एक सनसनीखेज वैंप किरदार बना दिया। फिल्म के आठ में से सात गाने गीता दत्त ने गाए थे। जिनमें तीन मोहम्मद रफी के सात डुएट सॉन्ग थे और चार सोलो। अभी मैं जवान ऐ दिल अभी मैं जवान फिल्म के म्यूजिक ट्रैक ने संगीतकार ओपी नयर ही नहीं गीता दत्त और मोहम्मद रफी को भी पॉपुलरिटी की बुलंदी पर ला खड़ा किया। काहे का झगड़ा बालम नई नई प्रीत रे। बड़े गजब की बात है इसमें भी धोखा है। मोहब्बत कर लो जी भर लो। ये गुरुदत्त की एक खास कला थी कि वो कई गाने छोटे-मोटे किरदारों पर भी फिल्मा लिया करते थे। यहां फिल्म के टाइटल सॉन्ग पर तो मजदूर औरतें लिप्सिंग करती दिखाई देती हैं। कभी यार कभी पार लगाती रे नजर। जॉनी वॉकर जिन्हें गुरुदत्त की ही नायाब खोज कहा जाता है। इस फिल्म में अपनी छाप छोड़ते हुए आगे उनकी लगभग सभी फिल्मों में रहे। 1954 में आई यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी हिट साबित हुई। इसने जहां फिल्म इंडस्ट्री में गुरुदत्त फिल्म्स का सिक्का जमाया, वहीं बतौर एक्टर भी उन्हें ऐसी पहचान दिला दी कि अब कई दूसरे प्रोड्यूसर भी उन्हें अपनी फिल्म में लेने को आतुर रहते। हालांकि गुरुदत्त भीतर से एक डायरेक्टर थे और उस पहचान से कोई समझौता नहीं करना चाहते थे। आरपार केवल एक रोमांटिक थ्रिलर ड्रामा नहीं बल्कि 1950 के दशक में शहरी भारत के संघर्षों, बेरोजगारी और मानवीय मूल्यों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने वाली एक बेहतरीन कलाकृति है। और यह फिल्म दिखाती है कि गुरुदत्त अपने समय से आगे के फिल्मकार थे। जा जा बेवफा कैसा प्यार कैसे प्रीत रे। बड़े धोखे हैं इस राह में। बाबूजी धीरे चल। तो स्कल्ट क्लासिक फिल्म की यादों के साथ आज बस इतना ही। चलते-चलते वीडियो लाइक और शेयर तो कीजिए ही अगर चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो वो भी करते चलिए। कमेंट बॉक्स में आपकी हर राय का स्वागत है। शुक्रिया नमस्ते आभार। दिल से मिला ले दिल मेरा। तुझको मेरे प्यार की कसम। ए यू मैं हारी पिया बाबूजी धीरे चल प्यार में जरा संभल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *