जब भी हम किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह यानी किग्रेजुएशन सेरेमनी की तस्वीरें या वीडियो देखते हैं तो एक नजारा बहुत आम सा होता है। पास आउट होने वाले स्टूडेंट्स ने काले गाउन पहने होते हैं। सिर पर चौकोर टोपियां सजी होती हैं और डिग्री मिलते ही वे सब एक साथ खुशी में अपनी टोपियां हवा में उछाल देते हैं। यह रिवाज आज इतना कॉमन हो चुका है कि हमें लगता है कि यह तो बस एक नॉर्मल परंपरा है।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस परंपरा की शुरुआत कहां से हुई? डिग्री मिलने के बाद टोपी हवा में उछालने का यह चलन कब और कैसे शुरू हुआ? और इन गाउन और कैप्स के पीछे का 114 साल पुराना इतिहास क्या है। अगर नहीं तो आइए जानते हैं आज की इस वीडियो में। सबसे पहले बात करते हैं दीक्षांत समारोहों में गाउन और कैप पहनने की शुरुआत कैसे हुई? एक्सपर्ट्स की मानें तो इस परंपरा का इतिहास 12वीं और 13वीं शताब्दी यानी सैकड़ों साल पुराना है। उस वक्त यूरोप में पहले विश्वविद्यालयों की स्थापना हो रही थी।
वो लोगना यूनिवर्सिटी, [संगीत] पेरिस यूनिवर्सिटी और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे बड़े संस्थान उस दौर में हायर एजुकेशन के अहम केंद्र बन गए थे। [संगीत] अब उन दिनों दिक्कत यह थी कि विश्वविद्यालयों की इमारतें बहुत ठंडी होती थी और कमरों को गर्म रखने की कोई खास [संगीत] व्यवस्था नहीं होती थी। ऐसे में खुद को कड़ाके की ठंड से बचाने के लिए वहां के छात्र और प्रोफेसर पढ़ाई के दौरान लंबी-लंबी पोशाखें पहनते थे। इन कपड़ों से उनका गला, सिर और पैर ढके रहते थे और वे जूते भी पहनते थे ताकि ठंड ना लगे। उस दौर के कई विद्वान पादरियों से भी जुड़े हुए थे।
इसलिए उनके यह कपड़े चर्च के अधिकारियों की पोशाक से मिलते जुलते थे। धीरे-धीरे कपड़ों का यह व्यवहारिक यानी कि प्रैक्टिकल [संगीत] इस्तेमाल ग्रेजुएशन सेरेमनी के एक प्रतीक के रूप में बदल गया। आगे चलकर यूरोप के विश्वविद्यालयों ने इन पोशाकों को अनिवार्य बनाने के नियम बना दिए। दीक्षांत समारहरो की ड्रेस में हुड सबसे खास हिस्सा माना जाता है। यह गाउन के ऊपर गले में पहना जाने वाला एक विशेष कपड़ा या स्कफ होता है जो पीछे की तरफ पीठ पर लटकता है। इस हुड के अलग-अलग रंगों, डिजाइनों और आकारों से यह तय होता था कि छात्र ने किस शैक्षणिक क्षेत्र में पढ़ाई की है और उसकी डिग्री बैचलर्स, मास्टर्स या पीएचडी स्तर की है। समय के साथ यूरोपीय देशों ने दुनिया के दूसरे हिस्सों पर अपना असर डाला और शिक्षा प्रणाली को फैलाया जिसके साथ यह ड्रेस पूरी दुनिया में दीक्षांत समारोह की पहचान बन गई। अब बात करते हैं सिर पर पहने जाने वाली चौकोर टोपी की जिसे मोल्टार बोर्ड कहा जाता है।
इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि इसका चपटा आकार उस बोर्ड से मिलताजुलता है जिसका इस्तेमालराजमस्त्री सीमेंट या गहरा यानी कि मोटर रखने के लिए करते हैं। इतिहासकारों का यह भी मानना है कि इसका डिजाइनपुनर्जागरण काल के दौरान पादियों द्वारा पहनी जाने वाली चौकोर बिटेरा टोपियों से प्रेरित हो सकता है। साथ ही टोपी पर लटकने वाला टैसल यानी कि लटकन भी बहुत कुछ कहता है।
शुरुआत में इसे एक तरफ रखा जाता था और डिग्री मिलने के बाद इसे दूसरी तरफ घुमा दिया जाता था जो पढ़ाई पूरी होने का प्रतीक है। अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर। आखिर डिग्री मिलने के बाद टोपी हवा में क्यों उछाली जाती है? दोस्तों, यह कोई सदियों पुरानी परंपरा नहीं है बल्कि इसका इतिहास करीब 114 साल पुराना है। [संगीत] इस आधुनिक परंपरा की शुरुआत 1912 में यूनाइटेड स्टेट्स नेवल एकेडमी से हुई थी। उस वर्ष ग्रेजुएशन करने वाले नौसेना के कैंडिडेटों को उनकीपढ़ाई पूरी होने पर नई टोपियां सौंपी गई। क्योंकि अब उनके पास नई टोपियां थी और पुरानी टोपियों की उन्हें कोई भी जरूरत नहीं थी।
इसलिए उन छात्रों ने खुशी और जश्न के माहौल में अपनी पुरानी टोपियां हवा में उछाल दी। बस फिर [संगीत] क्या था? यह नया और रोमांचक तरीका धीरे-धीरे अमेरिका के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में फैल गया और देखते ही देखते यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया। आज के दौर में दुनिया भर के स्टूडेंट्स अपनी सफलता का जश्न मनाने के लिए इसी अंदाज में अपनी टोपियां हवा में उछालते हैं। हालांकि कई आधुनिक संस्थान टोपियों को खोने और टूटने से बचाने के लिए अब ऐसा करने से मना भी करते हैं।
वक्त के साथ कई देशों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार ग्रेजुएशन की पोशाकों में थोड़े बदलाव जरूर आए लेकिन कैप, गाउन और लटकन का यह जादू आज भीबरकरार है। अब यह सिर्फ ठंड से बचने का जरिया नहीं बल्कि दुनिया भर के छात्रों की कड़ी मेहनत और सफलता का एक वैश्विकप्रतीक बन चुका है। तो अगली बार जब आप किसी को ग्रेजुएशन कैप हवा में उछालते देखें तो आपको याद होगा कि इसके पीछे 114 साल पुराना यह दिलचस्प इतिहास क्या है? जो 1912 की नेवेल एकेडमी में शुरू हुआ था।