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बंगाल में मचा बवाल! TMC छोड़ अलग पार्टी बनाएंगी ममता बनर्जी?

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में बहुत बड़ा उलटफेर हो चुका है। ममता बनर्जी के हाथ से पहले तो मुख्यमंत्री की कुर्सी गई और अब उनके हाथ से लीडर ऑफ अपोजिशन यानी विपक्षी नेता की कुर्सी भी जा चुकी है। कल ही टीएमसी में फूट हो गई थी और 58 विधायकों ने एक अपना अलग गुट बना लिया।

नेता थे ऋतुव्रत बनर्जी। ऋतु बनर्जी आज स्पीकर के पास पहुंचे और स्पीकर ने उन्हें लीडर ऑफ अपोजिशन से नवाज दिया है। हैं। ममता बनर्जी के लिए क्या स्थिति है और बंगाल की राजनीति में क्या भूचाल आया? जिस तरह से जो बंगाल के में जो अब घटनाक्रम देखने को मिल रहा है इससे साफ है कि भारतीय जनता पार्टी बंगाल में ममता बनर्जी को कोई भी स्पेस देने की मतलब फिराक में नहीं है और खासतौर पर तब जब ममता बनर्जी की तरफ से या अभिषेक बनर्जी की तरफ से लगातार कोशिशें की जा रही है कि एक मजबूत विपक्ष बनने की कोशिश वो करेंगे।

तो इसमें जो सबसे बड़ी बात है कि टीएमसी की पार्टी के भीतर जो इनफाइटिंग की स्थिति है वो बहुत ही विकराल होती हुई नजर आ रही है। खासकर जो विधानसभा चुनाव के जो परिणाम थे उसमें 80 विधायक जीत के आए जो टीएमसी पार्टी से थे।

उसमें से 58 जो है वो ऋतुव्रत बनर्जी के पक्ष में चले गए। बागी हो गए। बागी हो गए। और यह सब ममता बनर्जी के क्योंकि ममता बनर्जी चाह रही थी कि ममता बनर्जी के पास जो है या उनके जो क्योंकि ममता बनर्जी तो खुद चुनाव हार चुकी हैं और अभिषेक बनर्जी भी इस समय कोई विधानसभा के मेंबर तो है नहीं लेकिन वो चाह रही थी कोई उनका रबर स्टैंप हो जिसको ये पोजीशन मिले क्योंकि ऋतु बनर्जी की अगर बात करें तो पिछले दिनों जो हमने देखा कि जो चुनाव के नतीजे आए हैं तो कई सारे लोग जो टीएम ममता के बहुत ही राइट हैंड या लेफ्ट हैंड हुआ करते थे वो अचानक से बागी होने लगे। उन्हीं में से एक नाम ऋतुव्रत बनर्जी का भी था। लेकिन पार्टी के अंदर जो ताकत उन्होंने दिखाई है और ममता के खिलाफ जिस तरह से बगावत करके और लीडर ऑफ अपोजिशन का पोजीशन ले लेना जो वहां के जो विधानसभा के स्पीकर हैं रथिन बोस उन्होंने साफ तौर पे कहा कि हमारे पास अह ऋतुव्रत बनर्जी आए थे। उनके पास 58 समर्थन 58 विधायकों का समर्थन था।

तो उनके पास कोई ऐसी वजह नहीं थी कि वो मना कर सकते थे। लेकिन कहीं ना कहीं भारतीय जनता पार्टी पर्दे के पीछे से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को पूरी तरह से कमजोर करने की कोशिश में लगी है। जो कि एक राजनीति में होता भी है कि हर कोई चाहता है कि जो मजबूत नेता है जो विपक्षी मजबूत नेता है वो कमजोर हो। क्योंकि बंगाल वो राज्य है आप भी जानते हैं जयदीप जहां पे शुरुआत के 30 साल कांग्रेस की सरकार रही। उसके बाद 35 साल वामपंथियों की सरकार रही। लेफ्ट पार्टीज वहां पे उन्होंने रूल किया जिसमें ज्योति बसु बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री रहे।

फिर हमने देखा कि 15 साल जो है लगातार ममता बनर्जी रही। तो ऐसे में बीजेपी भी कोई यहां 5 साल का अपना भविष्य नहीं देख रही है। बीजेपी भी ये देख रही है कि हम लंबे वक्त तक हो सकता है कि दो डिकेड तक कम से कम यहां पे रूल करें। जैसे कि पिछली पार्टियां करती आई हैं तो बीजेपी वहां पे बिल्कुल ही विपक्ष को कमजोर तौर पे ही देखना चाहेगी जो बंगाल बीजेपी है। लेकिन कहीं ना कहीं जो एक सवाल पैदा हो रहा है कि लोगों को ऐसा लग रहा है कि यह सारी चीज़ें तो पहले भी हुई है क्योंकि आप देखें तो महाराष्ट्र में भी इसी तरह से देखने को मैं वही बात करना भी चाह रहा हूं कि जो शिवसेना में हमने देखा कि उद्धव गुट और ठाकरे गुट शिंद जो हमने बिहार में देखा कि रामविलास के जो बेटे हैं चिराग एलजेपी उनकी अलग थी और एक जो राम एक एलजेपी जो उनके जो भाई हैं पशुपति पारस पशुपति पारस हां उनके पास एक पार्टी चली गई तो कहीं ना कहीं यह सारी चीजें हैं।

खासकर उद्धव ठाकरे की अगर बात करें क्योंकि वह मुख्यमंत्री थे और जिस तरह से मुख्यमंत्री के पद से उनके हाथ से जो है पार्टी चली गई क्योंकि वहां पे पार्टी के अध्यक्ष जो थे वो शिंद थे और शिंद ने जो बैक डोर डील हुई और शिंद ने जो है कहा कि हम जो है बीजेपी के साथ सरकार बनाएंगे और शिंद मुख्यमंत्री बन गए। वहीं ठाकरे जो बाल ठाकरे की पार्टी थी शिवसेना वो शिंद गुट के पास चली गई और एक नई पार्टी बनानी पड़ गई उद्धव ठाकरे को तो ऐसे में सवाल पैदा हो रहा है क्या ममता बनर्जी के पास भी यही स्थिति है क्या उनके सामने भी सेम कंडीशन है कि उन्हें भी नई पार्टी बनानी पड़ सकती है तो इसमें थोड़ा सा मैं साफ कर देना चाहूंगा कि वो स्थिति इसमें नहीं है। अच्छा क्योंकि पार्टी जो है पार्टी की कमान अभी भी ममता बनर्जी के पास है। वो पार्टी के चेयर पर्सन अभी भी हैं। तो वो पार्टी अध्यक्ष जो होता है उसके पास बहुत सारे निर्णय होते हैं .

पार्टी से रिलेटेड। तो पार्टी तो उनके हाथ से नहीं जाएगी। हां लेकिन ये है जो विधायक दल है वो उनके हाथ से निकल चुका है। अच्छा आदित्य क्या ऐसा हो सकता है कि जो ऋतुभव्रत बनर्जी हैं क्या इनको एक अलग गुट बनाना पड़ सकता है और अलग सिंबल लेना। ऋतु बनर्जी जिस कोशिश में हैं वो तमाम तरह की अभी आने वाले समय में हमें देखने को मिलेगा कि वो क्या करते हैं? क्योंकि वह ऐसे तो नहीं छोड़ने वाले हैं ममता बनर्जी को। वह कहीं ना कहीं लीगल में जाएंगे, दिखाएंगे कि पार्टी पे उनका दावा होना चाहिए, क्लेम होना चाहिए।

और ऋतुवर्त बनर्जी अगर जाते हैं अलग पार्टी बनाते हैं क्योंकि उनके पास बहुसंख्या है। मतलब कहीं ना कहीं मेजॉरिटी है उनके पास। 58 पार्टी के अंदर जो 80 विधायक हैं उसमें 58 और हो सकता है कि आने वाले समय में वह 60 का आंकड़ा भी हो सकता है और 70 का भी आंकड़ा हो सकता है। तो ऐसे कंडीशन में अगर अलग पार्टी बनाते हैं तो उनकी विधायकी नहीं जाएगी क्योंकि जो चुनाव इलेक्शन कमीशन का जो अभी फिलहाल कानून है उसके मुताबिक अगर आपके पास मेजॉरिटी से ज्यादा सीटें हैं एक निश्चित सीटें तय की गई हैं। वो उतनी है तो आपका कोई वो विधायकी नहीं जाएगी। ये है कि टीएमसी के पास फिर 10 20 विधायक रह जाएंगे और जो नई पार्टी बनेगी उसके पास सारे वो अपोजिशन में भी टीएमसी नहीं रहेगी फिर तो ये भी हो सकता है। अच्छा जैसी स्थिति बन रही है क्या आपको लगता है कि आने वाले कुछ ही सालों में हो सकता है कि टीएमसी को मतलब जैसे विधायक नहीं बचे उनके पास चुनाव में क्या स्थिति थी आपने देखा?

तो क्या हम यह मान सकते हैं कि आने वाले दिनों में टीएमसी शायद बंगाल से जो है बिल्कुल ही बिल्कुल देखिए ऐसा बंगाल में हमेशा हुआ कोई नई बात नहीं है जयदीप आप जब देखेंगे कि कांग्रेस पार्टी जो तीन डेेड तक रही वो सडनली आप देखते हो 2000 के आसपास कहीं वजूद में नहीं थी वो कांग्रेस पार्टी जो लड़ाई हाल देख वो 90 से अभी अभी तो आपने देखा ही हम तो कह रहे हैं कि 90 से ही कांग्रेस का पत्ता साफ हो गया और 90 से ही ये कंडीशन हो गया कि लेफ्ट वर्सेस टीएमसी फिर हमने देखा कि टीएमसी जैसी सरकार में आई लेफ्ट धीरे-धीरे गायब हो गई।

टीएमसी वर्सेस बीजेपी की कंडीशन हो गई। अब आने वाले समय में बीजेपी वर्सेस कौन सी पार्टी होगी वो तो भविष्य में देखने को मिलेगा। और यह जो आपका सवाल था बहुत ही वैलिड और मौजू है कि हो सकता है कि भविष्य में टीएमसी नाम की कोई पार्टी मतलब प्रासंगिक ना रहे। पार्टी तो रह ही सकती है कोई भी। लेकिन एक ताकतवर पार्टी के तौर पे नहीं रहे। ऐसी भी कंडीशंस ऐसी कंडीशंस बन सकते हैं। और एक चीज़ मैं और ऐड करना चाहूंगा जो हमने इसकी पृष्ठभूमि की बात की कि इस तरह की चीजें महाराष्ट्र में देखने को मिली। इस तरह की चीजें और भी बहुत सारे राज्यों में देखने को मिली है। हम इस तरह की चीज़ कई लोग मैं देख रहा था जो सोशल मीडिया पे कई जानकार टिप्पणी भी कर रहे थे कि सेम कंडीशन हो सकता है कि नीतीश कुमार फिर से ये सोचे कि हम आरजेडी के साथ जाकर और किसी तरह का समझौता करें। तो वो कह रहे थे कि जानकार का का कहना है कि आज के समय में जो जेडीयू है उसमें भारतीय जनता पार्टी की दखल इतनी है कि अगर नीतीश कुमार चाहेंगे भी तो हो सकता है कि उनके पैर के नीचे से पार्टी चली जाए।

बिल्कुल जानकारी बता देंगे कई आधिकारिक फैसलों में जो है भाजपा के उसमें बिल्कुल भाजपा के बड़े नेता हैं और इस समय जो पार्टी के अध्यक्ष हैं संजय झा जेडीयू के वो खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता रहे हैं और कहीं ना कहीं अभी जितनी भी डीलिंग मतलब जो भी बातचीत होती है या बिहार से रिलेटेड फैसले फैसले ली जाती हैं लिए जाते हैं उसमें खासतौर पर संजय झा को बुलाया जाता है अमित शाह के साथ मीटिंग होती है तो ये बहुत ही अहम हो जाता है लेकिन अभी हम जो जिस टॉपिक पे बात कर रहे हैं वो है कि बंगाल में ममता ममता बनर्जी लगातार कमजोर होती हुई दिख रही है और जिस तरह से हमने देखा अभिषेक बनर्जी पे भी हमला हुआ सड़कों पे तो वह कहीं ना कहीं दिखाया जा रहा है कि अब वो बिल्कुल भी मजबूत नहीं है जितनी ताकतवर वो दिखाई देती थी चुनाव से पहले और पार्टी भी बिल्कुल कमजोर होती नजर आ रही है अब बाकी चीजें भविष्य में हमें देखने को मिलेगा बिल्कुल हम लोगों ने बंगाल चुनाव पे तो बात किया ही किया .

बिहार में भी बात कर लिया कि नीतीश कुमार की पार्टी और नीतीश कुमार की क्या का क्या भविष्य हो सकता है आने वाले दिनों में खैर बंगाल का चुनाव या बंगाल चुनाव के बाद जो भी अब जो परिदृश्य हमारे सामने है भले ही हमारे लिए आपके लिए बहुत दिलचस्प हो लेकिन ममता बनर्जी के लिए बिल्कुल भी दिलचस्प नहीं है क्योंकि उनकी स्थिति लगातार बहुत खराब होती जा रही है .

लेकिन आने वाले दिनों में तय होगा कि भाजपा के सामने कौन सी ताकत नया उभरती है या फिर जो विधायक अलग होके अलग गुट बनाते हैं अपना पार्टी बनाते हैं ये भी देखने वाली बात होगी

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