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76 दिन तक समुद्र में फसे एक आम इंसान की मौत के मुंह से जिंदा लौटने की सच्ची कहानी!

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सोचो आप जख्मी हो और अटलांटिक ओशन के बीचोंबीच फ्लोट कर रहे हो। आपके चारों तरफ पानी है। दूर-दूर तक ना जमीन है ना जहाज और ना ही कोई बचाने वाला। आपके पास सिर्फ 6 फुट की एक राफ्ट है जो कि कभी ना खत्म होने वाली समुंदर की लहरों पर गोते खा रही है। आपकी स्किन धूप से जल चुकी है। होठों पे डिहाइड्रेशन की वजह से दरारें पड़ चुकी है और आपके चारों तरफ खूंखार मछलियां है जो कभी भी आप पर हमला कर सकती है। क्या इतना कुछ होते हुए भी आप 2 महीने अकेले समुंदर के बीचोंबीच जिंदा रह सकते हैं? नहीं ना। लेकिन यह हुआ था स्टीवन गैलवान के साथ जिसने अटलांटिक ओसियन के बेरहम माहौल में अपने आप को जिंदा रखा। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि वह बचा कैसे? सवाल यह है कि स्टीवन ने मैनेज कैसे किया? क्योंकि जब उसके पास मदद पहुंची तब तक उसने 76 दिन इस दुनिया के दूसरे सबसे बड़े समंदर के बीचों-बीच गुजार दिए थे। और इससे भी डरावनी बात यह थी कि उस वक्त कोई नहीं जानता था कि आखिर स्टीवन कहां है। स्टीवन कोई प्रोफेशनल एक्सप्लोरर नहीं था।

ना ही कोई वर्ल्ड रिकॉर्ड सेट करना चाहता था। स्टीवन एक डिजाइनर था और उसको कभी-कभी सेलिंग करना पसंद था क्योंकि उसको समुंदर अच्छा लगता था। 1982 की शुरुआती दौर में स्टीवन एक छोटी सी सेल बोट लेकर अकेले ही अटलांटिक ओसनियन के सफर पर निकल गया। इस नाव को उसने नाम दिया था नेपोलियन सोलो और यह उस सफर पर निकला था जिसके बारे में कई सालों से ख्वाब देखता था। शुरुआत में तो सब कुछ ठीक था। उसके चारों तरफ एक ऐसा समुंदर था जो कि एंडलेस था और हवाएं उसको आगे पुश कर रही थी। जैसा कि एक सीलिंग बोट का मैकेनिज्म होता है। सब कुछ अंडर कंट्रोल था। लेकिन आज अटलांटिक स्टीवन को याद दिलाने वाला था कि असलियत में इंसान कुदरत के सामने कितना छोटा है। कैनरी आइलैंड से सफर शुरू करने के बाद स्टीवन को एक हफ्ता हो चुका था और स्टीवन डेक के नीचे सो रहा था। लेकिन बाहर समंदर आज थोड़ा अग्रेसिव था। यह रात काफी अंधेरी थी और फिर अचानक उस बोट को एक जोरदार टक्कर लगती है। इस टक्कर के झटके से स्टीवन फौरन जागता है। वो देखता है कि कुछ तो उसके बोट के हल में फंस गया है और पानी उसकी नाव में भर रहा है। शुरुआत में तो उसको कुछ समझ नहीं आता कि बोट किससे टकराई है। क्या वो एक व्हेल है या तैरता हुआ मलबा या फिर पानी में डूबी हुई कोई चीज। यहां तक कि आज भी किसी को नहीं पता कि एग्जैक्टली वो क्या था। स्टीवन को उस वक्त बस इतना समझ आ रहा था कि उसकी बोट डूब रही है और पानी बढ़ते जा रहा है। हर बीतते वक्त के साथ सिचुएशन और बुरी होती जा रही अटलांटिक ओसन स्टीवन के एकमात्र ठिकाने को निगल रहा था और इस सिचुएशन में डरना लाजमी है और डिसीजन लेना बहुत मुश्किल है। अब स्टीवन के पास सिर्फ एक मिनट था अपनी जिंदगी को बचाने के लिए। उसने इमरजेंसी सप्लाई को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। एक स्पेयर गन, कुछ खाना, नेविगेशन इक्विपमेंट पीने का पानी बनाने के लिए सोलर स्टील और एक सर्वाइवल मैनुअल। इसके बाद वो फौरन एक इनफ्लेटेबल राफ्ट में चढ़ गया।

उसके पीछे नेपोलियन सोलो इस अंधकार में कहीं गायब हो गया। मानो जैसे वहां कुछ था ही नहीं। कुछ घंटों के बाद स्टीवन अपने आप को इस ना खत्म होने वाले समंदर में अकेला पाता है। ना तो अब बोट है ना दूर-दूर तक कोई किनारा। अकेला एक ऐसी राफ पर जो मुश्किल से किसी डाइनिंग टेबल जितनी है। जैसे ही समंदर की लहर आई उसे एहसास हुआ कि अब कोई नहीं आएगा। अगर आया भी तो एटलीस्ट इस वक्त नहीं आएगा। और उसका सबसे पहला चैलेंज था पानी। आमतौर पर इंसान बिना खाने के कई हफ्तों तक सर्वाइव कर सकता है। मगर पानी के बगैर सर्वाइव करना ऐसा है मानो जैसे वक्त के खिलाफ रेस कर रहे हो। उसने जो कुछ सप्लाई अपने साथ ली थी वो लिमिटेड थी और समंदर के बीच सूरज की गर्मी लगातार स्टीवन की स्किन को जला रही थी। स्टीवन के लिए पानी की हर एक बूंद मायने रखती थी। लेकिन खुशकिस्मती से उसने जो सामान बचाया था उसमें सोलर स्टील भी था। यह एक सिंपल डिवाइस है जो सी वाटर को एवापोरेट करके फ्रेश वाटर में कन्वर्ट करता है और बस यह डिवाइस उसकी जिंदगी और मौत के बीच में खड़ा था। लेकिन इस डिवाइस के होते हुए भी जितना पानी वो प्योर कर सकता था उसकी मात्रा बहुत कम थी। कई बार स्टीवन ने रेन वाटर भी कलेक्ट किया। कुछ दिन ऐसा भी रहा कि उसके पास कुछ ना था। हर गुंड उसके लिए बेहद कीमती थी। हर उड़ते काले बादल से स्टीवन को एक होप मिलती। लेकिन अब उसका सामना होने वाला था उसके दूसरे चैलेंज से। भूख स्टीवन के पास जो इमरजेंसी फूड था वो अब खत्म होने वाला था। हालांकि अटलांटिक ओशन में कई सारा खाना मौजूद है। मगर प्रॉब्लम यह है कि उसको पकड़ने के लिए स्टीवन के पास कुछ नहीं है। और इस सर्वाइवल जर्नी में स्टीवन को वो बनना पड़ा जिसका उसने कभी सोचा नहीं था। एक शिकारी जुगाड़ से बने औजार और स्पेयर गन का इस्तेमाल करके उसने मछली पकड़ना शुरू किया। कभी-कभी फ्लाइंग फिश उसके राफ्ट में आके गिरती। कई सारी माई-माई फिश उसके चारों तरफ तैरती। कभी कबभार ट्रिगर फिश दिख जाती है। स्टीवन का अब ब्रेकफास्ट से लेकर लंच और डिनर हर टाइम का खाना रॉ फिश बन चुका था। अब स्टीवन सर्वाइवल में काफी कुछ सीख चुका था। लेकिन अटलांटिक ओशन ने उसको एक और एनिमी से मिलाया जो कि स्टीवन की खुद की राफ्ट थी। राफ्ट में एक छोटा सा पंचर था। यह स्टीवन के लिए एक नाइट में था। क्योंकि अगर राफ्ट डूबती है तो उसके नीचे हजारों फीट गहरे अंधेरे समंदर के अलावा कुछ नहीं। स्टीवन दिन भर छेद को भरता रहा। अपने औजारों को रिपेयर करता रहा। उसके पास जो सप्लाई थी उसको बचाता रहा। स्टीवन ने कभी काम को नहीं रोका। अब यह सर्वाइवल उसकी नौकरी बन गई थी। ऊपर से सूरज की तपीश और अटलांटिक के बीच में सूरज इस हद तक बेरहम होता है। मानो आप किसी मैग्नीिफाइंग ग्लास के नीचे कई हफ्तों से खड़े हो। स्टीवन के स्किन पर छाले पड़ गए थे और समंदर का खारा पानी उसके छालों को और दर्द दे रहा था। उसके पैर कमजोर हो चुके थे।

उसकी मांसपेशियां सिकुड़ चुकी थी। हर पल एक दर्द भरी दास्तान सुना रहा था और अब तक स्टीवन कई 100 माइल्स [संगीत] तक तैर चुका था। लेकिन अभी तक कोई रेस्क्यू का नामोनिशान नहीं। कई बार उसको शिप नजर आती। बड़ी विशालकाय वेसल्स जो अटलांटिक क्रॉस कर रही है उसके अंदर उम्मीद की एक लेयर दौड़ पड़ती है। वो फौरन फ्लेयर गन चलाता है। बेचैन होकर चिल्लाने लगता है। लेकिन एक-एक करके सारे जहाज दूर होजन पर गायब हो जाते हैं। कोई स्टीवन को नोटिस नहीं करता। सोचो एक आखिरी उम्मीद आपकी आंखों के सामने गायब हो जाए। स्टीवन को तब रियलाइज हुआ कि कुदरत के सामने वो कितना छोटा है। इतना छोटा कि उसको कोई देख भी नहीं सकता। इस तरह की निराशा लोगों को बर्बाद कर देती है। लेकिन स्टीवन एक जरूरी बात समझ गया था। सिर्फ उम्मीद से कुछ हासिल नहीं होगा। उम्मीद सिर्फ इंसान को संभलने का मौका देती है। एक्सट्रीम आइसोलेशन ने स्टीवन के ब्रेन को पूरी तरह से बदल दिया था। कई साइकोलॉजिस्ट लंबे समय से इस टॉपिक को स्टडी कर रहे हैं कि जब इंसान एक मीनिंगफुल ह्यूमन कांटेक्ट से कट ऑफ हो जाए तब क्या होता है और आज उनको उसका जवाब मिलने वाला था। वक्त धुंधला होने लगता है। एक ही तरह के ख्याल बार-बार रिपीट होने लगते हैं। छोटी मुश्किल भी बहुत बड़ी लगती है। कई दूसरे सर्वाइवर्स ने बताया कि उन्हें आवाजें सुनाई देती है। जैसे कोई इंसान उससे बात कर रहा हो और कुछ मजबूत मनोबल वाले लोग मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए रूटीन बनाते हैं। स्टीवन ने भी वही किया। उसने एक स्ट्रक्चर बनाया जिसमें उसने डेली रूटीन फिक्स कर लिया। फिशिंग करना, इक्विपमेंट को रिपेयर करना, पानी को मॉनिटर करना, वेदर पैटर्न को ऑब्जर्व करना। इस रूटीन ने स्टीवन को एक पर्पस दिया। इस पर्पस ने उसे डायरेक्शन दिया और इस डायरेक्शन ने उसे रीजन दिया बढ़ते रहने का। स्टीवन इस बात से अनजान था कि वह सर्वाइवल के सबसे मुश्किल खतरे से लड़ रहा है। कई हफ्ते गुजर गए। अब अटलांटिक ही उसका पूरा यूनिवर्स बन चुका था। उसकी राफ्ट एक तैरता हुआ आइलैंड और उसके नीचे कई सारी मछलियां समंदर की जिंदगी अब स्टीवन को फॉलो कर रही थी। कभी-कभी बर्ड्स दिख जाते। सुनने में अजीब लग रहा है। लेकिन उसकी राफ्ट के अराउंड एक इकोसिस्टम बन चुका था। यह खूबसूरत था और डरावना भी क्योंकि हर गुजरता दिन उसको याद दिला रहा था कि वो कितना अकेला है।

अब बारी आती है शार्क्स की। शार्क्स हमेशा स्टीवन के सराउंडिंग थी। कभी दूर होती तो कभी इतना नजदीक कि उन्हें आसानी से छुआ जा सके। बड़ी-बड़ी परछाई उसकी राफ्ट के नीचे तैरती शांत घात लगाए। वो शार्क्स राफ्ट को देखती। कभी-कभी वो सामान को नुकसान पहुंचाती। कभी-कभी वो स्टीवन के चारों ओर चक्कर लगाती और उनकी मौजूदगी से सुकून से नींद लेना भी पॉसिबल नहीं था। दूसरे महीने में स्टीवन की फिजिकल कंडीशन तेजी से बिगड़ने लगी। उसका वजन बहुत ज्यादा कम हो गया था। उसका शरीर अंदर ही अंदर खत्म हो रहा था। एनर्जी मिलना काफी मुश्किल हो गया था। यहां तक कि आसान काम भी अब उसे बहुत थका रहे थे। लेकिन समंदर अब भी उससे खेल रहा था। समंदर में तूफान आया। एक बड़ी सी लेयर ने उसकी राफ्ट को ऊपर तक उठा लिया। फिर वापस से नीचे पटक दिया। बारिश ने सब कुछ भीगा दिया और तेज हवाओं ने उसके कमजोर शेल्टर को और ज्यादा कमजोर कर दिया। एक छोटी सी गलती भी उसकी कीमती सप्लाई को समंदर में फेंक सकती थी और एक छोटा सा पंचर भी इस पूरी जर्नी को खत्म कर सकता था। अब स्टीवन एक ऐसे मानसिक मोड़ पे था जो ना कि ड्रामेटिक था ना किसी मूवी के सीन जैसा। यह बहुत ज्यादा शांत था और उतना ही खतरनाक। इस मेंटल कंडीशन में स्टीवन लापरवाह हो गया था। उसने राफ्ट रिपेयर करना छोड़ दिया और साथ में कोशिश करना छोड़ दिया। कई सर्वाइवल एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंसान पहले मानसिक तौर पर मरता है। उसके बाद फिजिकली क्योंकि एक बार इच्छाशक्ति खत्म हो जाती है तो शरीर भी उसी दिशा में आगे बढ़ता है। स्टीवन को यह समझ आया। उसने फिर से अपने कामों पर फोकस करना शुरू कर दिया। उसने फिर से मछली पकड़ना शुरू किया। पंचर रिपेयर करने लगा। पानी इकट्ठा करने लगा और उसका बस एक ही मोटिव बन गया। कल तक जीना है और यह पैटर्न कई दिनों तक रिपीट हुआ। फाइनली अप्रैल 1982 स्टीवन अटलांटिक ओसियन में 1800 माइल्स जितना ड्रिफ्ट कर चुका था। उसको अटलांटिक ओशन में 76 डेज हो चुके थे। वो कमजोर था। उसके शरीर पर गांव थे और वो बेहद दुबला हो चुका था। लेकिन खुशकिस्मती से वो जिंदा था।

और फिर अचानक उसको महसूस होता है कि उसके नजदीक कोई किनारा है क्योंकि वहां पर बर्ड्स की एक्टिविटी बढ़ चुकी थी। एनवायरमेंट में बदलाव आ चुका था और ऐसे छोटे संकेत जिससे महसूस हो रहा था कि नजदीक में कोई सिविलाइजेशन मौजूद है। इतने दिन बीतने के बाद उसे महसूस हो रहा था कि रेस्क्यू पॉसिबल है। कुछ पल बीतते हैं और दूरदराज के कैरेबियन आइलैंड के ग्वाडा लेब के मछुआरों ने देखा कि पंछी किसी स्ट्रेंज ऑब्जेक्ट के इर्द-गिर्द चक्कर लगा रहे हैं जो पानी पर तैर रही है। वो उसके नजदीक जाते हैं। उन्हें पता चलता है कि यह कोई टूटे हुए जहाज का मलबा नहीं। यह एक इंसान है। यह इंसान सेलर कम और बहुत ज्यादा दिख रहा था। स्टीवन केलवान अब बच चुका था। उन मछुआरों ने स्टीवन को राफ से निकाला। 2 महीने से ज़्यादा अटलांटिक में अकेले सर्वाइव करने के बाद फाइनली स्टीवन दूसरे इंसानों को देख पाया। उसकी मुश्किलें अब खत्म होने वाली थी। लेकिन उसने जो देखा था उसका सदमा पूरी जिंदगी उसके साथ रहने वाला था। उन मछुआरों ने स्टीवन को फौरन नजदीकी अस्पताल में पहुंचाया। डॉक्टर्स ने स्टीवन की जांच की। स्टीवन ने ऑलमोस्ट 1/3 अपने बॉडी वेट को लूज़ कर दिया। उसकी स्किन डैमेज उसका शरीर पूरी तरह थक चुका था। लेकिन फिर भी जिस सिचुएशन में वह सर्वाइव करके आया था, उस हिसाब से उसकी कंडीशन किसी चमत्कार से कम नहीं स्टीवन के मिलने की खबरें पूरी दुनिया भर में तेजी से फैलने लगी। पूरी दुनिया के लोग इस बात से हैरान रह गए कि आखिर कैसे एक इंसान ने इस विशालकाय अटलांटिक ओशन को क्रॉस किया। वो भी एक छोटी सी राफ्ट में और जवाब बिल्कुल आसान था। यह कोई ट्रिक नहीं थी और ना ही कोई सर्वाइवल का जादुई नुस्खा। स्टीवन के बचने के पीछे तैयारी हालात के अनुसार ढलना डिसिप्लिन और अटूट संकल्प का एक कॉम्बिनेशन था। कुछ सालों के बाद स्टीवन ने इस एक्सपीरियंस के बारे में एक किताब लिखी।

उसने लिखा कि समुंदर बेहद सुंदर है और डरावना भी। उसने अपनी किताब में लिखा है कि यह ऐसा था जैसे जन्नत का नजारा हो। मगर जहां से वो नजारा देख रहा है वो जहन्नुम जैसा था और शायद यही जिंदा बचने की कहानियों का अजीब हिस्सा है। स्टीवन ने अपनी किताब में इंसानों के बारे में कुछ ऐसा बताया जो कि सामान्य नहीं है। स्टीवन ने बताया कि इंसान की बॉडी इतनी ज्यादा मजबूत है जितना हम सोच भी नहीं सकते और माइंड इतना स्ट्रांग कि हमें खुद नहीं पता। साथ ही में वो बताते हैं कि उम्मीद सिर्फ एक फीलिंग नहीं। कभी-कभी उम्मीद एक फैसला होता है। एक ऐसा फैसला जब बचना इंपॉसिबल लगे। जब लगे कि अब एक दिन बर्दाश्त के बाहर है। पूरे 76 दिनों तक स्टीवन केलवान एक छोटी सी राफ्ट में अटलांटिक ओशन में ड्रिफ्ट करता रहा। समुंदर ने उसे भूखा रखने की कोशिश की। प्यासा रखा। लोगों से अलग कर दिया। उसे तोड़ दिया। लेकिन स्टीवन ने हार नहीं मानी। और शायद यही बात सर्वाइवल कहानियों को इतना दिलचस्प बनाती है। इसलिए नहीं कि वो हमें कोई सुपरमैन या स्पाइडरमैन जैसे लोग दिखाते हैं। लेकिन इसलिए कि वो दिखाते हैं कि आखिर एक आम इंसान में कितनी सहनशक्ति होती है। जब उसके सामने कोई भी ऑप्शन मौजूद नहीं होता। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो इस वीडियो को लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब कर देना और आपको ऐसी कोई सर्वाइवल कहानी पता हो तो कमेंट करके जरूर बताना। तो मैं आपसे मिलता हूं अगले वीडियो में तब तक के लिए अलविदा।

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