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आनंद बख्शी के गाने ने कैसे बचाई एक आदमी की जान?

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कर दो कि मैं अंधेरों को मिटा दूंगा चराग़ों की तरह आंखें सीने में लगा लूंगा मैं जल्द जाऊंगा जादूगर शब्दों की जादूगरी जिसका फल जिसकी गीत नाव की तरह मन में तैरते इसकी कलम से गानों का झरना फूटा करता था जिसने एक बार झाड़ने का पानी पिया वह बार-बार कई बार इसकी तरफ लौटा उसने अपने कलम से ऐसी आग लगाई जो सिर्फ और सिर्फ उसी की कलम से बुझाई जा सकती है जो कहता है जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा उस गली में हमें तो गुर्जर ना नहीं फिल्म इंडस्ट्री भी उसके बारे में बेशक यही राय रखती है जहां आनंद बक्शी ना

हों वहां कैसे गीत कैसा संकेत कैसे सुपरस्टार उन्होंने उसको जमीन से उठाया सीधे आसमान पर बिठा दिया पर खुद हमेशा जमीन पर रहे जावेद अख्तर के शब्दों में कहें हिंदुस्तान खूबी तो कम लोग कहते हैं इसलिए यहां की अनगिनत जवान हों ज़ख्मों के के लिए अनगिनत लोकगीत मुझे कभी-कभी लगता है अनगिनत गीत ना भी होते तो भी हिंदुस्तान होगी तो का मु कहने के लिए अकेले आनंद बक्शी साहब काफी थे ऐसे बक्शी साहब के कुछ चुनिंदा इससे आपके सामने प्रतिशत मत 1929 रावलपिंडी में जन्मे आनंद बख्शी को से बड़ा प्रेम था उन्होंने जो कुछ भी लिखा है उसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ 17 सालों को पाकिस्तान में सब्सक्राइब करें वहीं पूरे जीवन उसी के सहारे चार दशकों का लंबा करिए

और 4000 से ज्यादा गाने बड़ी सहजता से रावलपिंडी के लिए वह कहते हैं कि अब किस लिए मिट्टी थी वह गई रास्ते में खड़ी हो गई सरहदों पर खड़ी रह गई थी अजय को कि आज से लगभग 75 साल पहले कराची के साहिल पर खड़े व्यक्ति ने मुंबई जाने का सपना देखा और एनएवी सर्विस ली जाएंगी क्योंकि वह सोचते कि कराची के डॉग से एक पुष्प देख लेगा और उन्हें मुंबई के डॉग पर ला पटकेगा बदकिस्मती से यह नहीं हो सका शुक्राचार्य डॉग पर ही बना रहा देश का बंटवारा हो गया परिवार भारत आ गया भारत आकर आर्मी जॉइन कि दुबई जाने का सपना आप भी उनके मन में था नौकरी छोड़ दी एक दिन मुंबई के लिए निकल पड़े घर वालों ने धमकी भी अच्छे हाथ से नौकरी छोड़कर जा तो रहे हुए होकर तो लौटकर माता ना अ कि बक्शी साहब वृद्धि ठहरे घरवालों की एक नहीं सुनी सिंह ने मुंबई पहुंचकर सही सुना अपने सिंह और मुकेश शाहरुख सिंगर बनना चाहते थे मुंबई में हमारे सारे पैसे खत्म हो गए फिल्मों में काम किया गैराज मालिक ने कामना आने के कारण हौसले पस्त हो गए टूट गई घरवालों ने दोबारा आर्मी ज्वाइन करवा दी उसके बाद छह साल तक आर्मी की नौकरी [संगीत] के दौरान ही उन्हें फिल्म बनने का सपना देख रहे हैं आनंद के अंदर अब एक गीत पनपने लगा दो पिछला गाना मैं लिखता तो क्या लिखता ऐसा करते-करते 19 60 से 65 कविताएं लिख डाली एक इंटरव्यू में कहते हैं रात को मारे फील्ड एरिया में दूर-दूर तक लाउडस्पीकर लगे हुए थे उनके नीचे खड़ा हो जाता था जब लाउडस्पीकर

पर किसी गीतकार प्रदीप बचता था तो बोलते थे आप सुनने वाला नहीं प्रकार की रचना मेरे दिल में एक हूक सी उठती क्या कभी ऐसा भी दिन आएगा कि किसी स्पीकर से मेरा नाम भी लिया जाएगा कि अब सुनिए आनंद बक्षी की रचनाएं दोस्तों ने हौसला बढ़ाया और दोबारा नौकरी छोड़कर मुंबई पहुंच गए फिर तो जो हुआ उससे आप भली-भांति परिचित है इधर से कहानी डाल उधर से गाने निकलते बक्शी साहब की कहानी किरदार सिचुएशन पर बहुत अच्छी पकड़ थी यह सब आदमी में विटामिन के दिनों की देन है उस फिल्म देखकर आने पर वापस आते तो उसके सारे गाने फिल्म की कहानी और परिस्थिति के अकॉर्डिंग अपने लक्ष्यों में लिखते फिल्मों के गाने लिखने के दौरान भी उसे सिचुएशन नहीं पूरी कहानी सुनते तब जाकर गाने लिखते कुछ डा आपके साथ ज्यादा सफल होने पर वह कहते थे इनडायरेक्ट मुझे अच्छी कहानी मुझे उस पर की एक रिसर्च सेंटर के पास कभी की तरह सोचने के लिए स्वतंत्रता नहीं होती उसे एक्सप्रेशन की जरूरत होती है जो सिर्फ देते हैं डायरेक्टर और स्क्रीनराइटर उनको यह नॉलेज ठीक की स्टोरी में ही गाना है स्टोरी में ही लिरिक्स है उनके बेटे राकेश वशिष्ठ कहते हैं मुझे सुभाष घई साहब बोलते थे कि मैं जब भी बक्शी साहब को फिल्म की कहानी सुनाने आता था 67 गाने लिखने के लिए छह-सात महीने लग जाते थे एक शूटिंग फिर दूसरी शूटिंग शिड्यूल तो हमेशा हर तरह के गाने के लिए पूरी कहानी नरेंद्र करवाते थे महेश भट्ट ने आखिरी व्यक्ति की कहानी कि उनकी मां की कहानी और सिचुएशन गाना लिखने को कहा साहब ने पूछा तुम्हारे पिता से कितने दिनों में मिलने आते थे तो महेश भट्ट ने कहा कि तुम आए तो आया मुझे याद गली में आज चांद निकला है [संगीत] इस तरह 5859 के करीब उनके पास फिल्में नहीं थी वह आर्मी छोड़कर आए थे उनके सेविंग खत्म हो रही थी एक बार म्यूजिक डायरेक्टर रोशन को मस्तान स्टूडियो में मिले उनसे अपने गीत सुनने का बहुत मन मनोबल के बाद रोशन शर्मा ने वृध्दि अपने घर चले गए वह समय के साथ में रहते थे मुंबई में बरसात हुई थी कि आप उसे पूरा पानी उन्हें अंदाजा लगाया अगर मैं यानि कि छह बजे से शुरू करूं तो 10:00 बजे तक घर पहुंच जाऊंगा

तो पैदल चलकर 10:00 के घर पहुंच गए और पूछा क्या कर रहे हो साहब ने जवाब दिया कि यह सुनने के लिए जरूरी नहीं था ने कहा कि यह जरूरी नहीं था पर मेरे भी बहुत जरूरी था आनंद बख्शी के गांवों में रहस्यवाद ज्यादा जीवन की सरलता है वह आम आदमी के हित कार्यों की खासियत इसकी पूंछ देखते और का घी बना देते उन्हें श्रोताओं के दिल में उतर जाता था साधारण परिस्थितियों से निकल आते थे एक बार उन्होंने सिकंदर और पोरस का नाटक और घी डालना सिकंदर को पूरे के सामने उन्होंने मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए संगीतकारों की रफ्तार का लोहा मानते थे कि गीत लिखने की स्पीड इतनी तेज थी कि लक्ष्मीकांत ने कहा था दूसरे लिए गीत लिखने के लिए सात आठ दिन लेते हैं वहीं नंदिश 8 मिनट के लिए यह कहते-कहते 2 घंटे में के बारे में कहते हैं कभी-कभी मेरी वजह से कभी बरसात की ऐसे तो कभी एक्ट्रेस की डेट न मिलने के कारण पर बक्शी साहब ने आज तक कभी भी एक गाना लेट नहीं मिलन लुथरिया ने एक फिल्म बनाई कच्चे धागे फिल्म में विद्या ने बॉलीवुड में फील गीत आनंद बक्षी पहली बार एक साथ काम कर रहे थे जब भारत को लगभग एक महीने में उनका वजन बहुत ज्यादा नहीं सकते थे उन्हें को सब्सक्राइब जरूर करें से 20 दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा एक दिन उसे उठाकर घर ले जाओ घर पहुंचे तो आनंद बक्शी कि साथ लिए मैंने कुछ और थी कि आप चलिए मैं आपके साथ होटल में ही रहूंगा फिर क्या इस जुगलबंदी ने इस शाने करम का क्या कहना जैसे गाने दिए आनंद बख्शी को फिल्मफरे नॉमिनेशंस मिले पर व्हाट्सएप चार उनके बेटे

राकेश पक्षी बताते हैं कि उन्हें मलाल है यह पूछने पर वह कहते यह जो चार अवार्ड है मेरे जाने के बाद तुम अपना घर सजाना चाहिए था वह मिल गया है और फिर एक साल पहले एक चिट्ठी लिखी थी जिंदगी से तंग आ गया था मेरे पास नहीं था नहीं थी मुझे पता नहीं कैसे जाऊं तो मैंने सोचा रेलवे ट्रैक पर रेल की पटरी पर ट्रेन का इंतजार करने लगा हो पर ऐसा हुआ कि रेलवे ट्रैक के किनारे बस्ती थी और मेरे गाड़ी का नाम बदनाम पटरी पर रखकर को हिम्मत न हार का इंतजार और घर लौट गया अनिल बख्शी कहते यह अवार्ड है जो मैं अपने अगले जन्म में लेकर जाऊंगा यह चार में तुम घर वालों के लिए छोड़ कर जाऊंगा आनंद बक्शी के गांवों में बहुत आर्टिस्ट का सुपरस्टार बनाया पर राजेश खन्ना को तो सफलता के पर लगा दिए आराध्यों फिल्म के गानों के चलते उन्हें अपना स्टारडम हासिल किया जब बक्शी साहब की डेड बॉडी घर में पड़ी थी तो उनसे किसी ने पूछा का का आप यहां क्या कर रहे हैं आप तो किसी डिफरेंशल पर नहीं जाते उन्होंने कहा कि आदमी लेता है ना इसने मेरी जिंदगी बनाती जब आनंद बक्शी साहब को दूसरी बार हार्ट अटैक आया हूं हॉस्पिटल में थे डॉक्टर ने कहा पेसमेकर लगाना पड़ेगा उन्हें सलाह दी कि सिगरेट पान तंबाकू व शराब छोड़ दें जब डॉक्टर चला गया तो आनंद बक्शी ने कहा कि डॉक्टर उल्लू का पट्ठा है बेवकूफ है कि नहीं जानता मेरी जान मेरी सिगरेट तंबाकू व शराब ने नहीं ली है मेरी जान रे जान ले ली है आपके लिए यह सारी जानकारी खटक यह हमारे अपने अनुभव ने मेरा नाम है दिव्यांश देखते रहिए लल्लनटॉप सिनेमा सक्रिय हैं हुआ है

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