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3 लड़कियों के जाल में कैसे फंसे डोभाल? जानकर होश उड़ जाएंगे।

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15 मार्च 2019 की रात लाहौर दिल्ली के सबसे सुरक्षित दफ्तर की फाइलें उस रात लाहौर में खुल रही थी। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के सबसे काले डिवीजन यूनिट एक्स 7 ने एकऐसा जाल बिछाया था जो भारत की पूरी इंटेलिजेंस दुनिया को हिला देता अगर वो जाल काम कर जाता। तीन औरतें, तीन अलग शहर, तीन अलग पहचान और एक ही टारगेट अजीत कुमार डोभाल। वह आदमी जिसकी वजह से पिछले 11 सालों में पाकिस्तान के एक के बाद एक छह खुफिया नेटवर्क मिट्टी में मिल चुके थे।

ज़ारा दिल्ली में पत्रकार बनकर उसके करीब पहुंच रही थी। नादिया बेंगलुरु में उसका पूरा डिजिटल जीवन खंगाल रही थी और सारा मुंबई में उसके सबसे करीबी संपर्क पर नजर रख रही थी। यह मिशन नाकाम नहीं हो सकता था। क्योंकि ने इस पर सब कुछ दांव पर लगाया था। लेकिन उस रात लाहौर में जो जाल बिछाया जा रहा था उसी जाल में एक और जाल पहले से तैयार था।

अजीत दोभाल को पाकिस्तान भेजा नहीं गया था। वो खुद गया था। 2008 में रॉ ने एक ऐसा फैसला लिया जो दिल्ली की फाइलों में आज भी बंद है। एक अफसर को पूरी तरह मिटा दो। उसका नाम, उसकी पहचान और उसे लाहौर की गलियों में छोड़ दो।

अजीत दोभाल अगले 4 साल लाहौर में एक छोटे से किराए के कमरे में रह रहा था। एक स्थानीय व्यापारी की आड़ में और उस कमरे से उसने पाकिस्तान के खुफिया नेटवर्क की एक-एक नस पकड़ी।

उसने देखा कि कैसे आईएसआई भारत के सीमावर्ती इलाकों में बच्चों की तस्करी के नेटवर्क को फंडिंग दे रही थी। कैसे हथियारों की के रास्ते नेपाल और बांग्लादेश से होकर भारत में घुस रहे थे और कैसे एक के बाद एक टारगेट किलिंग के आदेश उसी इमारत से निकल रहे थे जहां से पाकिस्तान की विदेश नीति बनती थी।

4 साल में अजीत दोभाल ने 100 से ज्यादा नाम, 30 से ज्यादा नेटवर्क और पांच ऐसे ऑपरेशन के सबूत इकट्ठे किए जो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय अदालत में घसीटसकते थे। लेकिन 2012 में एक रात अचानक यूनिट एक्स 7 को उस कमरे की भनक पड़ी और डोभाल के पास सिर्फ 17 मिनट थे। उन 17 मिनटों में अजीत दोभाल ने जो किया वो रॉ की ट्रेनिंग फाइलों में आज भी एक मिसाल के तौर पर पढ़ाया जाता है। 4 साल के सबूत एक इंक्रिप्टेड ड्राइव में बंद करके उसने लाहौर की उस गली से निकलना शुरू किया जहां यूनिट एक साथ के तीन एजेंट पहले से तैनात थे।

वह बचकर निकल गया। लेकिन उस रात पाकिस्तान को पता चल गया था कि उनके बीच कोई था। दिल्ली वापस आने के बाद अजीत दोभाल ने जो रिपोर्ट सौंपी उसमें वह सब कुछ था जो भारत जानना चाहता था। लाहौर से चलने वाला बच्चों की तस्करी का नेटवर्क जो राजस्थान की सीमा से होकर भारत में घुसता था।

कराची से आने वाले हथियार जो नेपाल के रास्ते उत्तर भारत तक पहुंचते थे और वो लिस्ट जिसमें भारत के 15 बड़े शहरों में टारगेट के निशाने तय किए गए थे।

यह सिर्फ एक खुफिया रिपोर्ट नहीं थी। यह पाकिस्तान के पूरे भारत विरोधी ढांचे का नक्शा था। इसी नक्शे की वजह से अगले 3 सालों में पाकिस्तान के एक के बाद एक नेटवर्क टूटते कौक्वेस्ट टूटते चले गए और हर बार जब कोई नेटवर्क टूटता था यूनिट एक्स 7 के हैंडलर के दफ्तर में एक ही नाम आता था अजीत दोभाल। यही वो पल था जब यूनिट एक्स 7 ने फैसला किया कि इस बार वह अजीत दोभाल को खत्म नहीं करेंगे। उसे तोड़ेंगे। उसकी इज्जत मिटाएंगे।

उसे भारत की नजरसों में ही गद्दार साबित कर देंगे। और इस काम के लिए उन्होंने तीन ऐसी औरतें चुनी जिनके सामने दुनिया का कोई भी मर्द कभी टिक नहीं पाया था। ज़ारा, नादिया और सारा तीनों का निशाना अब तय था। ज़ारा दिल्ली में एक पत्रकार की आड़ में अजीत दोभाल के सबसे करीबी सूत्र तक पहुंच चुकी थी। नादिया ने बेंगलुरु से उसका पूरा डिजिटल नेटवर्क खंगाल लिया था और सारा मुंबई में उस एक इंसान पर नजर रख रही थी जो अजीत दोभाल की सबसे बड़ी कमजोरी था। तीनों एक साथ काम कर रही थी। तीन अलग शहर, तीन अलग पहचान, लेकिन एक ही जाल।

यूनिट एक7 का प्लान सीधा था। अजीत दोभाल को एक ऐसी स्थिति में धकेलो जहां वह खुद अपनेहाथों से अपनी इज्जत तोड़ ले। लेकिन वह तीन लड़कियां भूल गया था। अजीत दोभाल 4 साल लाहौर में रहा था। जाल कैसे बिछाया जाता है, यह वह किसी से बेहतर जानता था। ज़ारा ने दिल्ली में प्रिया शर्मा की पहचान इतनी सफाई से बनाई थी कि अजीत दोभाल के दफ्तर के तीन लोग उसे महीनों से जानते थे।

वह एक न्यूज़ चैनल के लिए रक्षा मामलों पर लिखती थी। रवि मेनन अजीत दोभाल का वह इंसान था जो हर फाइल सबसे पहले देखता था। इसी दौरान नादिया बैंगलोर में अजीत दोभाल के इंक्रिप्टेड सिस्टम की परतें एक-एक करके उठा रही थी। तीन हफ्ते की मेहनत के बाद उसे वो मिला जो यूनिट एक्स साथ चाहता था। एक फाइल जिसमें भारत के पांच अंडरकवर एजेंटों के असली नाम थे। अगर यह फाइल लाहौर पहुंच जाती तो पांच जिंदगियां एक रात में खत्म हो जाती और मुंबई में सारा उस इंसान के पीछे थी जिसका नाम किसी फाइल में नहीं था अजीत दोभाल का छोटा भाई अर्जुन तीनों चाले एक साथ चल रही थी| यूनिट एक्स 7 का हैंडलर लाहौर में बैठकर हर अपडेट देख रहा था और पहली बार उसे लग रहा था कि अजीत दोभाल इस बार बचकर नहीं निकलेगा लेकिन दिल्ली में अजीत दोभाल के दफ्तर में उस रात एक अलार्म बजा अजीत दोभाल के सिस्टम में जो अलार्म बजा था ।

वह कोई गलती नहीं थी वो वो एक जानबूझकर बिछाया गया ट्रैप था जो उसने खुद तैयार किया था। उसने महीनों पहले अपनी कुछ फाइलों में एक छुपा हुआ ट्रिगर लड़ाया था। अगर कोई भी उन्हें छुएगा तो दिल्ली में एक सिग्नल जाएगा और वह सिग्नल उस रात बजा था। अजीत दोभाल जानता था कि कोई अंदर है। उसने अगले 6 घंटों चुप रहकर बिताया। कोई हरकत नहीं। कोई बदलाव नहीं।

उसने नादिया को यह एहसास नहीं होने दिया कि वह पकड़ी जा चुकी है। क्योंकि अगर नादिया भागती तो बाकी दोनों भी गायब हो जाती। इसी दौरान दिल्ली में भारत सरकार के सबसे ऊपरी स्तर पर एक बैठक हुई जिसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। प्रधानमंत्री कार्यालय को अजीत दोभाल ने सिर्फ इतना बताया तीन ऑपरेटिव हैं, तीन शहरों में है और यूनिट एक साथ इस बार सीधे भारत की खुफिया पहचान चुराना चाहता है। प्रधानमंत्री सिर्फ इतना कहा, उन्हें वापस जाने मत देना। फिर अजीत डोभाल ने कहा, “इस ऑपरेशन में मेरी जान भी चली जाए फिर भी मैं उसे नहीं छोडूंगा।” आईबी और रॉ को एक साथ अलर्ट किया गया।

लेकिन ऑपरेशन की कमान सिर्फ अजीत दोभाल के हाथ में थी। उसने तीनों को एक साथ पकड़ने की योजना बनाई। इसलिए नहीं कि वह उन्हें गिरफ्तार करना चाहता था बल्कि इसलिए कि वह यूनिट एक्स सात तक पहुंचना चाहता था। तीनों सिर्फ मोहरे थी। असली खेल लाहौर में था। अजीत दोभाल ने एक काउंटर ट्रैप तैयार किया जो इतना सटीक था कि ज़ारा, नादिया और सारा तीनों को यह लगता रहे कि वह उनके जाल में फंस रहा है। लेकिन अफसोस शिकार खुद शिकारी बन चुका था। ज़ारा को लग रहा था कि रवि मेनन उसके हाथ में है। हफ्तों की मेहनत के बाद वह अजीत दोभाल के सबसे करीबी इंसान तक पहुंच गई थी और हर मुलाकात में रवि थोड़ा और खुलता जा रहा था।

लेकिन आप तो जानते हो अजीत दोभाल वो शिकारी हैं जो दूसरे शिकारी के मुंह से भी निवाला छीन लेता है। अजीत दोभाल ने रवि को 3 हफ्ते पहले ही एक काम सौंपा था। जो पूछे उसे जवाब दो लेकिन वही जवाब [संगीत] जो मैं लिख कर दूं। ज़ारा जो राज समझ रही थी वो अजीत दोभाल की लिखी हुई कहानी थी। बेंगलुरु में नादिया ने जो फाइल चुराई थी, उसमें पांच एजेंटों के नाम थे। वह नाम भी झूठे थे। वह पूरी फाइल उसी रात तैयार की गई थी जब अजीत दोभाल का अलार्म पहली बार बजा था। मुंबई में सारा जिस अर्जुन के पीछे महीने से लगी थी वो अजीत दोभाल का भाई नहीं था।

एक जूनियर एजेंट था। जिसे सिर्फ इसलिए वहां भेजा गया था कि सारा उलझी रहे। तीनों एक साथ एक नकली दुनिया में काम कर रही थी और लाहौर में यूनिट एक्स का हैंडलर जीत का जश्न मना रहा था। यह जाने बिना कि शिकार कब से शिकारी बन चुका था। ज़ारा को पहली बार शक उस रात हुआ जब रवि मेनन ने बिना पूछे एक फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी। उसने सोचा कि भला इतना आसानी से कौन देता है? कुछ तो गड़बड़ है। उसने नादिया को तुरंत मैसेज किया। हमारे साथ कुछ गलत हो रहा है। नादिया ने जवाब दिया, “मुझे भी 3 दिन से लग रहा है। बेंगलुरु में जो सिस्टम उसने तोड़ा था, वह इतना आसान था कि उसे खुद हैरानी हुई थी। एक सिस्टम जो भारत के सबसे खुफिया नेटवर्क की हिफाजत करता हो, वह इतनी आसानी से नहीं टूटता। मुंबई में सारा ने अर्जुन की रोज का काम देखी तो एक बात खटकी।

वह हर रोज उसी रास्ते से चलता था। उसी वक्त उसी जगह रुकता था। तीनों को एक साथ एहसास हुआ। लाहौर में हैंडलर को जब यह खबर मिली तो उसके [संगीत] माथे पर पसीना आ गया। तीनों को वापस बुलाने का आदेश दिया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। अजीत दोभाल ने तीनों के फोन, तीनों के ठिकाने और तीनों के लाहौर से आने वाले हर सिग्नल को पहले से ट्रैक कर लिया था। ज़ारा ने दिल्ली छोड़ने की कोशिश की। एयरपोर्ट पर उसका नाम वॉच लिस्ट में था। ज़ारा एयरपोर्ट से वापस मुड़ी, लेकिन दिल्ली की हर गली में अब उसके लिए रास्ता बंद हो रहा था।

नादिया ने बैंगलोर से निकलने की कोशिश की तो उसका लैपटॉप अचानक बंद हो गया। पूरा सिस्टम एक झटके में लॉक। तीनों समझ गई। जीत दोभाल ने उन्हें पकड़ा नहीं था। उसने उन्हें घेरा था। तीन अलग शहरों में तीन अलग जाल और तीनों उसमें इतनी गहराई से फंसी थी कि हिलना भी मुश्किल था। मुंबई में सारा ने एक आखिरी दांव चला। अर्जुन के घर में छुपा वो डिवाइस एक्टिव किया जो सीधे लाहौर को सिग्नल भेजता। लेकिन जैसे ही सिग्नल गया दूसरी तरफ से आवाज आई जो यूनिट एक्स [संगीत] 7 की नहीं थी अजीत डोबाल की थी। उसने सिर्फ इतना कहा। खेल खत्म हुआ। लाहौर में हैंडलर के दफ्तर में उस रात सन्नाटा था।

तीनों ऑपरेटिव पकड़ी जा चुकी थी। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह थी कि जीत डोभाल के पास अब वो सब कुछ था जो वो चाहता था। यूनिट x7 का पूरा नेटवर्क। डोबाल साहब के हाथ में अब यूनिट एक्स7 का पूरा [संगीत] ढांचा था। नाम, फतेह, नेटवर्क और वो कोड जिससे लाहौर अपने एजेंटोंको आदेश भेजता था।

लेकिन उसने तीनों को गिरफ्तार नहीं किया। ज़ारा, नादिया और सारा तीनों अभी भी आजाद थी। अपने-अपने शहरों में अपनी-अपनी जगहों पर। जीत डोभाल ने जानबूझकर उन्हें छोड़ा था। क्योंकि वह जानता था कि घबराई हुई ऑपरेटिव लाहौर को वही बताती है जो वो सुनना चाहता था और लाहौर जो सुनेगा वही अजीत डोभाल चाहता था कि वह सुने।

तीनों ने हैंडलर को रिपोर्ट दी। मिशन खतरे में है वापस बुलाओ। लाहौर ने फैसला किया कि एक आखिरी दांव चला जाए। यूनिट एक्स 7 का सबसे सीनियर ऑपरेटिव खुद मैदान में उतरेगा।

इस काम का अंजाम देने के [संगीत] लिए वह दिल्ली आने वाला था। यह चाल अजीत डोभाल की थी। जानबूझकर उसे मजबूर करा दिल्ली आने के लिए। यूनिट X7 का सबसे खतरनाक ऑपरेटिव कोड नेम अलमीज़ान 14 नवंबर 2019 की रात दिल्ली में उतरा। नेपाल के रास्ते एक बिजनेसमैन की आर्मी है।

अजीत दोभाल एयरपोर्ट पर उसे हर जगह से ट्रैक कर रहा था। अलमीज़ान दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में रुका और उसी रात ज़ारा से मिला। जीत दोभाल को यही चाहिए था क्योंकि अलमीज़ान और ज़ारा की उस मुलाकात में यूनिट एक्स 7 का पूरा बैकअप प्लान सामने आने वाला था। उस होटल के हर कमरे में रॉ केएजेंट थे। हर बातचीत रिकॉर्ड हो रही थी।

अलमीज़ान ने ज़ारा को एक नई फाइल दी। भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचने का एक और रास्ता। यूनिट एक्स 7 का आखिरी दांत और तभी होटल की लिफ्ट का दरवाजा खुला। जीत दोभालlसामने खड़ा था। ज़ारा और अलमीज़ान दोनों का पसीना छूट गया। अजीत दोभाल ने एक कदम आगे बढ़ाया। ना ना हरबड़ी। बस एक नजर जो कह रही थी कि यह पल वह महीनों पहले जानता था।

उसी वक्त दिल्ली, बोर और मुंबई में एक साथ जाजे खुले। नादिया अपने लैपटॉपके सामने बैठी थी जब रॉ के एजेंट कमरे में दाखिल हुए। सारा मुंबई में उस इमारत से निकलने की कोशिश कर रही थी जहां से वह महीनों से काम कर रही थी। तीनों एक साथ एक ही रात एक ही मिनट में।

अलमीज़ान ने भागने की कोशिश की। वह दरवाजे तक भी नहीं पहुंचा। लाहौर में यूनिट x7 के हैंडलर का फोन उस रात बंद हो गया हमेशा के लिए। भारत के पास अब यूनिट X7 का पूरा नेटवर्क, उनके कोड, उनके रास्ते और वह सबूत थे जो पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर घेर सकते थे। अजीत डोभाल ने वह रात दिल्ली के उसी दफ्तर में बिताई जहां से यह सब शुरू हुआ था।

बस एक फाइल बंद हुई और एक नई फाइल खुली। क्योंकि अजीत डोभाल जानता था यूनिट एक्स साथ खत्म नहीं हुई थी। बस अगला दांव अभी बाकी था।

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