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अजीत डोभाल ने अचानक PMO में क्यों बुलाई मुस्लिमों की बैठक? क्या कुछ बड़ा होने वाला है ?

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नमस्कार आप देख रहे हैं एनएमएफ न्यूज़। मैं आपके साथ शबन। पीएमओ के बंद कमरे की खामोशी में जब देश के सबसे ताकतवर शख्सियतों में शुमार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोबाल ने कुर्सी संभाली तो किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले डेढ़ घंटे में भारत की आंतरिक सुरक्षा की एक नई इबारत लिखी जाने वाली है। 18 अप्रैल की तारीख जब पूरा देश बंगाल के चुनावी शोर और प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों पर टिका हुआ था। रैलियों में उलझा हुआ था। उस दौरान अजीत डोबाल की बैठक की एक खबर सामने आती है और यह बैठक भी पीएमओ की बिल्डिंग में बुलाई जाती है और इस बैठक के बारे में आप सुनेंगे तो हैरान हो जाएंगे।

दरअसल अजीत डोभाल ने सेना या किसी अधिकारी के साथ बैठक नहीं की बल्कि यह बैठक बुलाई गई एक खास वर्ग के साथ। अजीत डोभाल ने मुस्लिम समुदाय के साथ बैठक की। डोबाल की इस बैठक ने सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया क्योंकि यह एक ऐसा मिशन है जिसे मिशन यूनिटी कहा जा सकता है और सुनिए इस बैठक में कौन-कौन शामिल हुआ। बैठक में देश के जानेमाने मुस्लिम चेहरे मौजूद थे। जिसमें शिक्षावि जफर सरेशवाला, केपी ग्रुप के चेयरमैन फारूक पटेल, मीडिया जगत की कद्दावर हस्ती, समीना शेख और हज कमेटी के अध्यक्ष कौसर जहां जैसे दिग्गज शामिल थे। डोबाल ने करीब 90 मिनट तक बिना पलक झपकाए इन दिग्गजों के साथ एक-एक बात की और उनकी एक-एक बात सुनी। उनके डर, उनकी उम्मीदें और उनके सुझावों को गौर से समझा गया। जब बोलने की बारी डोभाल की आई तो उन्होंने अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों को ऐसे पिरोया कि वहां मौजूद हर शख्स हैरान रह गया।

डोभाल ने सीधे शब्दों में चेतावनी और भरोसे का मिलाजुला संदेश देते हुए कहा भारत एक ऐसी कश्ती है जिसमें हम सब सवार हैं। अगर यह डूबी तो हम सब साथ डूबेंगे और अगर हम संभलेंगे तो साथ में तरक्की करेंगे। डोबाल का यह बयान डूबेंगे तो साथ में डूबेंगे। दरअसल उन बाहरी लोगों के लिए एक सीधा वार है जो सरहद पार बैठकर भारत के मुस्लिम समुदाय को मोहरे की तरह इस्तेमाल करने का सपना देखते हैं। जो हमेशा देखते हैं कि मुसलमानों को भड़काया जाए मोदी सरकार के खिलाफ कर दिया जाए। लेकिन अजीत डोभाल ने इसका तोड़ निकाल लिया है। यह संदेश उन कट्टरपंथियों के लिए था जो भारत में रहकर भारत के मुस्लिमों में भड़काकर उन्हें तोड़ने का ख्वाब देखते हैं। तो डोभाल ने इस बात को गहराई से महसूस किया है कि दुश्मन देश अब गरीब और पिछड़े मुसलमानों को टारगेट कर देश में अस्थिरता फैलाना चाहते हैं। और इसलिए उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ सीमाओं पर सेना तैनात करने से नहीं बल्कि हर मुसलमान के भीतर आत्मविश्वास भरने से आती है।

उन्होंने याद दिलाया कि 2023 में जब वे मुस्लिम वर्ल्ड लीग के महासचिव डॉ. मोहम्मद बिन अब्दुल करीम अल इस्लाह से मिले थे। तब भी उन्होंने इसी बात पर जोर दिया था। भारत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। जो इस्लामिक सहयोग संगठन के 33 देशों के बराबर है। डोभाल का तर्क साफ था। भारत के मुसलमानों को अब वोट बैंक के चश्मे से नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत के एक सक्रिय हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने उन पुरानी सियासी गलियों पर भी तंज कसा जहां संसाधनों पर पहला हक जैसे जुमले उछाले गए। लेकिन व बोर्ड की संपत्तियों को करोड़ों की जमीन होने के बावजूद आम गरीब मुसलमान वहीं खड़ा रहा जहां वह दशकों पहले था। डोबाल ने बैठक में इस बात को रेखांकित किया कि अब समय बदल चुका है। अब चर्चा पसमांदा मुसलमानों के विकास की होती है। अब योजनाएं धर्म देखकर नहीं बल्कि जरूरत देखकर हर घर तक पहुंचाई जाती है। आप समझिए अजीत डोबाल कोई राजनेता नहीं है। वो एनएसए हैं।

वो एक रणनीतकार हैं। उनका इस तरह मुस्लिम समुदाय के दिग्गजों के साथ बैठना यह साफ करता है कि उन्हें किसी गहरे खतरे का आभास है। जो समाज को तोड़कर मुसलमानों को बरगलाकर कुछ बड़ा कर सकता है। जिसे वो हथियारों से नहीं संवाद की ढाल से रोकना चाहते हैं। उन्होंने साफ कर दिया कि या तो हम एकता के साथ जहाज को पार लगाएंगे या फिर दुश्मनों की साजिशों में आकर सब बर्बाद हो जाएंगे। डोबाल का यह नया मिशन पूरी तरह से आंतरिक सुरक्षा को अभेद बनाने का है। जहां संवाद ही सबसे बड़ा हथियार है। उनकी इस नई पहल ने यह साबित कर दिया है कि भारत की सुरक्षा का मतलब अब केवल हथियारों की ताकत नहीं बल्कि समाज के हर तबके का एकजुट होकर तिरंगे के नीचे खड़ा होना है। इस बैठक के बाद चर्चाओं का बाजार गर्म है। लेकिन एक बात पत्थर की लकीर बन चुकी है कि डोबाल का हर कदम राष्ट्रहित की ऐसी बिसात है

जिस पर दुश्मन को मात मिलना तय है। डोबाल की बैठक का संदेश घर-घर तक पहुंचा दिया गया है। धर्म अलग हो सकते हैं लेकिन देश की कश्ती एक ही है और इस कश्ती को डूबने से बचाने की जिम्मेदारियां भी हम सबकी साझा ही हैं। कुल मिलाकर अजीत डोबाल की यह पहल दर्शाती है। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है। बल्कि देश के भीतर हर समुदाय को सशक्त और आत्मविश्वास से भरपूर बनाना भी इसका हिस्सा है। ऐसे में उद्योग जगत से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक फैले इस प्रतिनिधि मंडल ने यह संदेश दे दिया है कि भारतीय मुसलमान अब केवल राजनीतिक मोहरे से इस्तेमाल नहीं है बल्कि आत्मनिर्भर भारत के सक्रिय भागीदार के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। तो फिलहाल जिस तरीके से अजीत डोबाल ने मुस्लिम समुदाय को इकट्ठा किया। उनके साथ बैठक की और जो जो बातें कही उसको लेकर आप क्या कुछ राय रखते हैं कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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