कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जिन्हें सिर्फ सुनाया नहीं जाता, महसूस किया जाता है। कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें देखते ही किसी खास दौर की याद ताजा हो जाती है और हिंदी सिनेमा में अगर 90 के दशक के उन चेहरों की बात की जाए जिन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई तो एक नाम ऐसा है जिसे शायद ही कोई भूल सकता है। अजय देवगन एक ऐसा अभिनेता जिसकी शुरुआत ही इतनी अलग थी कि आज भी उसकी पहली फिल्म का सीन याद आते ही आंखों के सामने दो मोटरसाइकिलें और उनके बीच खड़ा एक नौजवान नजर आने लगता है। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह लड़का आने वाले वर्षों में कभी पुलिस अफसर बनकर भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होगा। कभी परिवार के लिए कानून से भिड़ जाएगा। कभी ऐतिहासिक योद्धा बनेगा, कभी गंभीर अपराधी का किरदार निभाएगा, कभी कॉमेडी से लोगों को हंसाएगा और कभी कैमरे के पीछे बैठकर फिल्म बनाने की कोशिश करेगा। लेकिन इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह नहीं है कि अजय देवगन ने कितनी फिल्म क्योंकि बॉलीवुड में सफलता मिलना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है सफलता खोने के बाद वापस उसी जगह तक पहुंचना। अजय के करियर में ऐसे कई मोड़ आए जब लोगों को लगा कि उनका दौर खत्म हो चुका है। कई फिल्में उम्मीद के मुताबिक नहीं चली। कुछ प्रोजेक्ट बुरी तरह असफल हुए। कभी उनकी पसंद सवाल उठे। कभी उनके अभिनय को लेकर आलोचना हुई और कभी ऐसा भी लगा कि वह अपनी चमक खो चुके हैं। लेकिन हर बार कुछ समय बाद वही चेहरा एक नए किरदार के साथ पर्दे पर लौटता रहा और शायद यही वजह है कि अजय देवगन को सिर्फ एक अभिनय कहना उनकी पूरी यात्रा को समझने के लिए काफी नहीं है। अजय देवगन का जन्म 2 अप्रैल 1967 को दिल्ली में एक पंजाबी परिवार में हुआ था। उनके पिता वीरू देवगन फिल्म इंडस्ट्री में जाने-माने स्टंट मैन और एक्शन डायरेक्टर थे। उस दौर में जब फिल्मों में खतरनाक स्टंट करने के लिए कलाकारों को अलग-अलग तरह की ट्रेनिंग की जरूरत पड़ती थी। वीरू देवगन का नाम एक खास पहचान रखता था। अजय बचपन से ही फिल्मी माहौल के आसपास रहे। उन्होंने शूटिंग सेट देखे, कैमरे देखे, कलाकारों को देखा और सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने फिल्म बनने की प्रक्रिया को बहुत करीब से महसूस किया। लेकिन मजेदार बात यह थी कि अजय शुरुआत में अभिनेता बनना ही नहीं चाहते थे। उनका झुकाव फिल्म बनाने की तरफ था। कॉलेज के दिनों में उन्हें निर्देशन और फिल्म मेकिंग में दिलचस्पी थी। उन्होंने असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया और डॉक्यूमेंट्री बनाने का अनुभव भी लिया। शायद उस समय अगर कोई उनसे पूछता कि आने वाले वर्षों में वह क्या बनना चाहते हैं
तो संभव है कि वह अभिनेता के बजाय निर्देशक का नाम लेते। लेकिन जिंदगी में कई बार रास्ता हमारी पसंद से नहीं किसी अचानक आए मौके से बदलता है। निर्देशक कुकू कोहली ने उन्हें अपनी फिल्म में काम करने का प्रस्ताव दिया। शुरुआत में अजय इस ऑफर को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। उन्हें एक्टिंग को लेकर वह जुनून नहीं था जो बाद में उनकी पहचान बना। लेकिन परिवार के प्रोत्साहन के बाद उन्होंने यह मौका स्वीकार कर लिया। फिर आया 1991। फिल्म थी फूल और कांटे। एक नए अभिनेता के लिए पहली फिल्म हमेशा परीक्षा की तरह होती है। दर्शक आपको नहीं जानते। इंडस्ट्री आपको नहीं जानती। आपकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पहली ही बार पर्दे पर आप कितनी मजबूती से अपनी जगह बना पाते हैं। अजय ने इस परीक्षा का जवाब संवादों से नहीं एक्शन से दिया। दो मोटरसाइकिलों पर खड़े होकर उनकी एंट्री ने सिनेमाघरों में बैठे दर्शकों को चौंका दिया। यह कोई सामान्य डेब्यू नहीं था। उस एक दृश्य ने अजय की ऐसी पहचान बना दी जो कई वर्षों तक उनके साथ चलती रही। फूल और कांटे सफल रही। अजय के पास फिल्मों के प्रस्ताव आने लगे। जिस लड़के ने कभी कैमरे के पीछे रहकर फिल्म बनाना चाहा था, वह अचानक कैमरे के सामने लाखों लोगों की नजरों में आ चुका था। उनकी अगली बड़ी फिल्म थी जिगर 1992 में आई इस फिल्म में मार्शल आर्ट्स और एक्शन का भरपूर इस्तेमाल हुआ। फिल्म ने अजय की उस छवि को और मजबूत कर दिया, जो उनकी पहली फिल्म से बन चुकी थी। अब बॉलीवुड को अपना नया एक्शन हीरो मिल चुका था, लेकिन स्टार बनना और स्टार बने रहना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। 1993 में अजय की कई फिल्में आई। कुछ फिल्मों को दर्शकों ने पसंद किया। कुछ ज्यादा असर नहीं छोड़ पाई। एक अभिनेता के रूप में यह वो समय था जब अजय धीरे-धीरे सीख रहे थे कि सिर्फ एक्शन के सहारे लंबे समय तक टिकना मुश्किल होगा। दर्शकों की पसंद बदलती रहती है। आज जिसे लोग पसंद करते हैं,
कल उसी अभिनेता से कुछ नया देखने की उम्मीद करने लगते हैं। इसलिए अजय ने अलग-अलग किरदारों की तरफ बढ़ना शुरू किया। कभी रोमांस, कभी एक्शन, कभी ड्रामा और कभी कॉमेडी। 1994 उनके करियर का एक महत्वपूर्ण साल बनकर सामने आया। दिल वाले ने अजय को और बड़ी पहचान दी। फिल्म के गाने लोकप्रिय हुए। कहानी को दर्शकों ने पसंद किया और अजय का गंभीर अंदाज लोगों के बीच चर्चा का विषय बना। उनका हेयर स्टाइल भी उस दौर में युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गया। उस समय अजय की एक खास स्क्रीन पर्सनालिटी बन रही थी। वह दूसरे हीरो की तरह लगातार मुस्कुराते हुए नजर नहीं आते थे। उनके चेहरे पर एक ठहराव था। उनकी आंखों में गंभीरता थी और यही गंभीरता बाद में उनकी अभिनय शैली की सबसे बड़ी पहचान बनी। इसके बाद विजय पथाई। इस फिल्म ने अजय को फिर से एक्शन की दुनिया में मजबूत किया। तब्बू के साथ उनकी जोड़ी दर्शकों को पसंद आई। फिल्म ने तब्बू के करियर को भी नई दिशा दी। इसी दौर में अजय ने अक्षय कुमार के साथ सुहाग में काम किया। दोनों की जोड़ी को दर्शकों ने पसंद किया और फिल्म सफल रही। अब अजय सिर्फ नया चेहरा नहीं थे। वह इंडस्ट्री के भरोसेमंद युवा सितारे बन चुके थे। लेकिन सफलता के साथ निजी जिंदगी की चर्चाएं भी शुरू हो चुकी थी। करिश्मा कपूर के साथ अजय की नजदीकियों की बातें सामने आई। दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया और उनके रिश्ते को लेकर काफी चर्चा हुई। लेकिन यह रिश्ता ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद रवीना टंडन के साथ भी अजय का नाम जोड़ा गया। दोनों की ऑन स्क्रीन जोड़ी लोकप्रिय थी और निजी जिंदगी में भी उनके रिश्ते की चर्चाएं होती रहीं। फिर अजय की जिंदगी में तब्बू का नाम आया। दोनों ने साथ में कई फिल्मों में काम किया और उनके बीच की दोस्ती और नजदीकियों को लेकर भी लंबे समय तक बातें होती रहीं। हालांकि इन निजी रिश्तों से जुड़ी कई बातें मीडिया रिपोर्ट्स और चर्चाओं पर आधारित रही हैं। इसलिए हर दावे को अंतिम सत्य मानना ठीक नहीं होगा। लेकिन एक रिश्ता ऐसा था जो सिर्फ चर्चाओं तक सीमित नहीं रहा। वह रिश्ता था काजोल के साथ।
अजय और काजोल की पहली मुलाकात फिल्म के सेट पर हुई। दोनों के व्यक्तित्व काफी अलग थे। काजोल खुलकर अपनी बात रखने वाली थी, जबकि अजय शांत और कम बोलने वाले माने जाते थे। शुरुआत में दोनों के बीच दोस्ती थी। दोनों अपनी-अपनी जिंदगी और रिश्तों के बारे में बातचीत करते थे। लेकिन धीरे-धीरे यही बातचीत दोनों को एक दूसरे के करीब ले आई। 1995 में दोनों ने साथ काम किया और समय के साथ उनका रिश्ता गहरा होता गया। फिर 1997 में इश्क आई। इस फिल्म में अजय, आमिर खान, काजोल और जूही चावला साथ नजर आए। फिल्म की कॉमेडी ने दर्शकों को खूब हंसाया। अजय ने इस फिल्म के जरिए यह भी दिखाया कि वह सिर्फ गंभीर एक्शन स्टार नहीं है। वह हल्की-फुल्की कॉमेडी को भी अच्छी तरह निभा सकते हैं। यही वर्सटालिटी आगे उनके करियर की सबसे बड़ी ताकत बनी। 1998 में प्यार तो होना ही था आई। इसी दौर में अजय और काजोल के रिश्ते की खबरें और मजबूत हुई। फिर 1999 में दोनों ने शादी कर ली। दोनों के रिश्ते को लेकर शुरुआत में लोगों की राय अलग-अलग थी। कई लोगों को उनकी जोड़ी अजीब लगती थी। लेकिन समय ने उन सभी सवालों का जवाब दे दिया। दोनों ने अपना परिवार बनाया और साथ-साथ अपने करियर को भी आगे बढ़ाया। उधर अजय की फिल्मों की दुनिया में भी एक बड़ा बदलाव आ रहा था। 1999 में हम दिल दे चुके सनम आई। इस फिल्म में अजय ने एक ऐसे पति का किरदार निभाया, जो अपनी पत्नी के पुराने प्यार को समझने की कोशिश करता है। यहां अजय की एक्टिंग में वह शांति थी, जो बिना ज्यादा शोर किए भावनाएं दिखा देती थी। फिल्म में सलमान खान और ऐश्वर्या राय की मौजूदगी के बावजूद अजय का किरदार दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ गया। यही वह समय था जब लोगों ने समझना शुरू किया कि अजय सिर्फ एक्शन स्टार नहीं है। वह अभिनय कर सकते हैं और गंभीर अभिनय कर सकते हैं। लेकिन 2000 आते-आते उनके सामने एक नया सवाल खड़ा हो गया। क्या वह सिर्फ अभिनय तक सीमित रहेंगे? अजय ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी शुरू की और राजू चाचा बनाई। यह प्रोजेक्ट उनके लिए बहुत महत्वाकांक्षी था। फिल्म का बजट बड़ा था और उम्मीदें भी काफी थी, लेकिन बॉक्स ऑफिस ने उनका साथ नहीं दिया। राजू चाचा की असफलता ने अजय को यह एहसास जरूर कराया कि निर्माता की कुर्सी अभिनेता की कुर्सी से कहीं ज्यादा कठिन है। अभिनेता के रूप में आप कैमरे के सामने अपना काम करते हैं। लेकिन निर्माता के तौर पर कहानी से लेकर बजट तक बहुत कुछ आपके कंधे पर होता है। इसके बाद अजय के करियर में एक मुश्किल दौर आया। 2001 में आई उनकी कई फिल्मों ने अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया। एक के बाद एक कमजोर नतीजे आने लगे। यह वही दौर था जब एक समय के सफल सितारे के लिए सवाल उठने लगते हैं। क्या अजय का समय खत्म हो रहा है? क्या वह अब पहले जैसे लोकप्रिय नहीं रहे? क्या नई पीढ़ी के कलाकार उनसे आगे निकल चुके हैं? लेकिन अजय के करियर की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि असली बदलाव यहीं से शुरू हुआ। 2002 में आई कंपनी रामगोपाल वर्मा की इस फिल्म ने अजय को एक बिल्कुल अलग रूप में पेश किया। यहां वह पारंपरिक हीरो नहीं थे। उनका किरदार शांत था, लेकिन उसके भीतर खतरनाक सोच थी। उनकी आंखों और चेहरे की गंभीरता ने किरदार को मजबूत बनाया। फिल्म सफल रही और अजय की अभिनय क्षमता को फिर से पहचान मिली। इसके बाद दीवानगी आई, जिसमें उन्होंने एक बेहद अलग तरह का किरदार निभाया, लेकिन उसी साल आई द लेजेंड ऑफ भगत सिंह ने अजय के करियर को नई ऊंचाई दी। भगत सिंह जैसे ऐतिहासिक किरदार को निभाना आसान नहीं था। यह सिर्फ संवाद बोलने का काम नहीं था। उस किरदार में विचार, संघर्ष, क्रांति और देश के लिए मर मिटने की भावना दिखानी थी। अजय ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उनके प्रदर्शन की सराहना हुई और उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अब वह वही अभिनेता नहीं थे जिसे लोग सिर्फ बाइक वाली एंट्री के लिए जानते थे। उनकी पहचान एक गंभीर अभिनेता के रूप में भी स्थापित हो चुकी थी। 2003 में गंगा जलाई एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में अजय ने व्यवस्था और अपराध की दुनिया के बीच संघर्ष को पर्दे पर उतारा। फिल्म की भाषा कड़ी थी। किरदार मजबूत था और अजय की बॉडी लैंग्वेज ने उसे विश्वसनीय बनाया। इसके बाद अजय ने लगातार अलग-अलग तरह की फिल्में की। कयामत, गंगाजल, परवाना, खाकी, युवा, रेनकोट। हर फिल्म में उनका अंदाज अलग था। रेनकोट में उनका शांत और भावनात्मक रूप सामने आया। यह वो समय लेकिन फिर एक और बदलाव हुआ रोहित शेट्टी और गोलमाल। अजय ने कॉमेडी को गंभीरता से लिया। गोलमाल रिटर्न्स के बाद यह साफ हो गया कि दर्शक अजय को सिर्फ एक्शन या गंभीर किरदारों में नहीं देखना चाहते। वह उन्हें हंसते हुए भी पसंद करते हैं। इसके बाद ऑल द बेस्ट और गोलमाल 3 जैसी फिल्मों ने इस जोड़ी को मजबूत किया।
रोहित शेट्टी और अजय देवगन की साझेदारी बॉलीवुड की सबसे सफल जोड़ियों में शामिल होने लगी। फिर आया 2011 और अजय के करियर का सबसे बड़ा ट्रांसफॉर्मेशन सिंघम। पुलिस की वर्दी में अजय का चेहरा जैसे उनकी पुरानी एक्शन पहचान को नए दौर में लेकर आया। लेकिन इस बार वह सिर्फ लड़ने वाला हीरो नहीं था। यह एक ईमानदार पुलिस अधिकारी था। जिसके लिए कानून सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि जिम्मेदारी थी। सिंघम की सफलता ने अजय की लोकप्रियता को नई पीढ़ी तक पहुंचा दिया। अब बच्चे भी उन्हें पहचानने लगे। युवा भी उनके संवाद दोहराने लगे और दर्शकों ने अजय को एक नए नाम से पहचानना शुरू कर दिया। सिंघम 2012 में सन ऑफ सरदार आई। इसमें अजय ने देसी कॉमेडी और एक्शन का मिश्रण पेश किया। फिल्म सफल रही। बोल बच्चन भी दर्शकों को पसंद आई। फिर 2013 में कुछ फिल्में अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई। हिम्मतवाला जैसी फिल्म ने निराश किया। अजय के करियर में एक बार फिर उतार-चढ़ाव आया। लेकिन 2014 में सिंघम रिटर्न्स ने फिर उनकी पकड़ मजबूत कर दी। सिंघम का किरदार अब सिर्फ फिल्म नहीं था। यह अजय देवगन की पहचान बन चुका था। लेकिन अगले साल जो किरदार आया उसने सिंघम को भी चुनौती दे दी। 2015 में दृश्यम रिलीज हुई। अजय ने विजय सालगांवकर का किरदार निभाया। विजय कोई पुलिस अधिकारी नहीं था। कोई सुपर हीरो नहीं था। कोई करोड़पति नहीं था। वह एक सामान्य परिवार का आदमी था। लेकिन जब उसके परिवार पर संकट आया तो उसकी सोच ने उसे असाधारण बना दिया। उस किरदार की सबसे खास बात थी उसकी सामान्यता। वह चिल्लाता नहीं बेवजह गुस्सा नहीं करता। वह परिस्थिति को समझता है, सोचता है, योजना बनाता है और फिर अपने परिवार को बचाने के लिए पूरी ताकत लगा देता है। अजय ने विजय सालगांवकर को इतने नियंत्रित अंदाज में निभाया कि दर्शकों को उसके डर और मजबूरी दोनों महसूस हुए। दृश्यम आज अजय देवगन के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में गिनी जाती है। इसी दौर में अजय ने अपने बच्चों के नाम से वीएफएक्स से जुड़ी कंपनी की शुरुआत भी की। यानी अभिनेता अब सिर्फ कैमरे के सामने नहीं था। वो फिल्म निर्माण की तकनीकी दुनिया में भी कदम बढ़ा रहा था। 2016 में शिवाय आई। इस फिल्म में अजय अभिनेता के साथ निर्देशक और निर्माता भी थे।
यह उनके लिए बहुत बड़ा जोखिम था। फिल्म का स्केल बड़ा था। एक्शन सीक्वेंसेस कठिन थे और विजुअल्स पर काफी मेहनत की गई। अजय ने यह दिखाया कि वह सिर्फ अभिनेता नहीं बल्कि फिल्म को दूसरे नजरिए से देखने वाला व्यक्ति भी है। फिर 2017 में बादशाहू आई। इसके बाद गोलमाल अगेन और गोलमाल की सफलता ने फिर साबित कर दिया कि अजय और रोहित शेट्टी की जोड़ी दर्शकों के बीच कितनी मजबूत है। 2018 में रेड आई। इस फिल्म में अजय ने अमय पटनायक नाम के ईमानदार इनकम टैक्स अधिकारी का किरदार निभाया। यह किरदार सिंघम से बिल्कुल अलग था। यहां कोई उड़ती हुई गाड़ी नहीं थी। कोई बड़े-बड़े एक्शन सीन नहीं थे। बस एक अधिकारी था जो अपने काम के सामने किसी दबाव को स्वीकार नहीं करता। अजय ने इस भूमिका को बेहद संयमित तरीके से निभाया। 2019 में दे दे प्यार दे आई। फिल्म ने उम्र के अंतर वाले रिश्ते को कहानी का आधार बनाया। अजय ने ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया जो अपने अतीत और नए रिश्ते के बीच उलझा हुआ था। इसी साल टोटल धमाल भी आई और कॉमेडी वाला अंदाज फिर दर्शकों को पसंद आया। 2020 में तानाजी आई। यह फिल्म अजय के करियर की बड़ी सफलताओं में शामिल हुई। ऐतिहासिक किरदार, बड़ी युद्ध दृश्य, भावनात्मक कहानी और अजय की दमदार मौजूदगी। फिल्म ने उन्हें एक और राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया। इस मुकाम तक पहुंचते-पहुंचते अजय देवगन का सफर बहुत लंबा हो चुका था, लेकिन वह रुकने वाले नहीं थे। कोरोना महामारी के दौरान फिल्म इंडस्ट्री का पूरा सिस्टम बदल गया। थिएटर बंद हुए। कई फिल्में ओटीटी पर चली गई। अजय की भुज द प्राइड ऑफ इंडिया भी डिजिटल माध्यम पर रिलीज हुई। फिल्म को अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद वह सूर्यवंशी में कैमियो करते नजर आए और रोहित शेट्टी का कॉप यूनिवर्स और बड़ा होता गया। 2022 में अजय ने रनवे 34 के जरिए निर्देशन की कमान फिर संभाली। कहानी एक विमान और उससे जुड़ी गंभीर परिस्थिति के आसपास घूमती थी। अजय ने इसमें अभिनेता के साथ निर्देशक की भूमिका भी निभाई। इसके बाद थैंक गॉड आई। लेकिन फिल्म दर्शकों को ज्यादा प्रभावित नहीं कर सकी। फिर आया दृश्यम 2 और विजय सालगांवकर एक बार फिर पर्दे पर लौट आया। जिस किरदार को दर्शक वर्षों बाद भी भूले नहीं थे, वह दूसरी बार भी लोगों को सिनेमाघरों तक खींचने में कामयाब रहा। फिल्म ने शानदार प्रदर्शन किया और अजय के करियर में एक और बड़ी सफलता जुड़ गई। 2023 में भोला आई। अजय ने फिर अभिनय के साथ निर्देशन और निर्माण की जिम्मेदारी संभाली। फिल्म का एक्शन स्केल बड़ा था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर वैसी सफलता हासिल नहीं कर पाई जैसी उम्मीद की जा रही थी। 2024 में शैतान आई। अजय के सामने आर माधवन थे। कहानी में सुपर नेचुरल एलिमेंट्स थे और अजय का किरदार एक पिता का था जो अपनी बेटी अजय के अभिनय की तारीफ हुई। इसके बाद सिंघम अगेन ने फिर से अजय को उनके सबसे लोकप्रिय किरदार में वापस ला दिया। रोहित शेट्टी का कॉप यूनिवर्स अब बहुत बड़ा हो चुका था और अजय का सिंघम उसका महत्वपूर्ण चेहरा बना हुआ था। 2025 में रेड टू आई। अजय फिर अमय पटनायक के किरदार में लौटे। भ्रष्टाचार और सत्ता के खिलाफ लड़ने वाला वही सख्त अधिकारी एक बार फिर दर्शकों के सामने था। फिल्म ने अच्छा प्रदर्शन किया। इसके बाद सन ऑफ सरदार 2 आई जिसमें अजय फिर अपने देसी कॉमेडी वाले अंदाज में नजर आए लेकिन पहली फिल्म जैसा असर दोबारा देखने को नहीं मिला। इसके बाद दे दे प्यार दे टू आई। रिश्ते, उम्र का अंतर, परिवार और समाज की सोच कहानी में इन सबको मिलाया गया और फिर 2026 में अजय देवगन धमाल 4 के साथ कॉमेडी की दुनिया में वापस दिखाई दिए। उनके साथ कई बड़े कलाकार नजर आए। यह एक बार फिर दिखाता है
कि अजय देवगन किसी एक जॉनर के अभिनेता नहीं है। लेकिन अब सवाल यह है कि अजय देवगन की असली ताकत क्या है? या उनकी गंभीर स्क्रीन प्रेजेंस शायद इन सभी चीजों का जवाब एक साथ है। अजय की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि उन्होंने अपने करियर को एक ही दिशा में नहीं जाने दिया। जब एक्शन का दौर आया तो उन्होंने एक्शन किया। जब रोमांस की जरूरत हुई तो रोमांटिक फिल्में की। जब कॉमेडी का समय आया तो कॉमेडी की। जब गंभीर सिनेमा का मौका मिला तो खुद को उसके लिए बदला। जब ऐतिहासिक किरदार मिला तो उसमें उतर गए। जब निर्देशन का मन हुआ तो कैमरे के पीछे बैठ गए और जब फिल्म निर्माण का मौका मिला तो निर्माता की जिम्मेदारी उठाई। उनके करियर में असफलताएं कम नहीं थी, लेकिन उनकी वापसी भी कम नहीं थी। शायद यही वजह है कि तीन दशक से ज्यादा समय बाद भी उनका नाम इंडस्ट्री में मौजूद है। उनकी निजी जिंदगी में भी उतार-चढ़ाव की चर्चाएं रही हैं। करिश्मा कपूर, रवीना टंडन और तब्बू के साथ उनके नाम को लेकर अलग-अलग समय में चर्चाएं हुई। बाद के वर्षों में कंगना रनौत के साथ भी उनके रिश्ते को लेकर मीडिया में बातें सामने आई। लेकिन इन सभी निजी मामलों में कई दावे सार्वजनिक चर्चाओं और रिपोर्ट्स पर आधारित रहे हैं। इसलिए इन्हें निश्चित तथ्य के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। इन सारी चर्चाओं से अलग एक रिश्ता ऐसा रहा जो दशकों तक उनके साथ खड़ा रहा। काजोल 1999 में हुई शादी के बाद दोनों ने अपने परिवार को आगे बढ़ाया और अपनेपने करियर में सक्रिय रहे। फिल्म इंडस्ट्री में जहां रिश्तों को लेकर हमेशा अटकलें चलती रहती हैं। वहां दोनों ने अपनी निजी जिंदगी को काफी हद तक अपने तरीके से संभाला। अजय देवगन की एक और खास बात यह है कि उन्होंने कभी खुद को बहुत ज्यादा चमकदार बनाने की कोशिश नहीं की। वह उन कलाकारों में से नहीं है जिन्हें हर समय अपनी मौजूदगी साबित करनी हो। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस अक्सर शांत रहती है। वह ज्यादा बोलने के बजाय चेहरे से अभिनय करने की कोशिश करते हैं। उनका किरदार अगर गुस्से में है तो वह हर बार चिल्लाता नहीं। अगर दुखी है तो हर बार रोता नहीं। अगर प्यार में है तो हर बार बड़े-बड़े संवाद नहीं बोलता। शायद यही अंडरस्टेटेड एक्टिंग उनकी पहचान बन गई। और यही कारण है कि अजय का कोई किरदार कई बार फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक के दिमाग में बना रहता है। सिंघम का गुस्सा, विजय साल गांवकर की चालाकी, भगत सिंह का जुनून, तानाजी का साहस, रेट के अमय पटनायक की ईमानदारी, शैतान में एक पिता की बेबसी। इन सभी किरदारों में अभिनेता एक ही था। लेकिन हर बार चेहरा वही होते हुए भी इंसान अलग नजर आया। यही अभिनय की असली परीक्षा है। अजय देवगन ने अपने करियर में कई बार खुद को साबित किया। कभी आलोचकों के सामने, कभी बॉक्स ऑफिस के सामने, कभी नई पीढ़ी के कलाकारों के सामने और कभी खुद के सामने। शायद यही वजह है कि आज जब अजय देवगन का नाम लिया जाता है तो सिर्फ एक फिल्म या एक दौर याद नहीं आता।
एक पूरी यात्रा सामने आती है। दिल्ली से शुरू हुआ सफर वीरू देवगन के बेटे से मिली पहली पहचान। फूल और कांटे से मिली पहली बड़ी सफलता। 90 के दशक का एक्शन स्टार। फिर रोमांटिक अभिनेता। फिर गंभीर कलाकार। फिर राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिर कॉमेडी स्टार फिर सिंघम फिर विजय सालगांवकर फिर निर्देशक फिर निर्माता फिर तानाजी फिर अमय पटनायक फिर शैतान और आज भी कैमरे के सामने खड़ा वही अभिनेता जिसने 90 के दशक में दो मोटरसाइकिलों पर खड़े होकर शुरुआत की थी। समय बदल गया, सिनेमा बदल गया, तकनीक बदल गई, हीरो की परिभाषा बदल गई। लेकिन अजय देवगन का सफर अभी भी जारी है और शायद किसी अभिनेता की सबसे बड़ी उपलब्धि अब अगली बार वो कौन सा किरदार लेकर आने वाला है क्योंकि अजय देवगन की कहानी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने असफलताओं के बीच अपना रास्ता खोजा जिसने एक्शन से शुरुआत की लेकिन खुद को एक्शन तक सीमित नहीं किया। जिसने अभिनय किया लेकिन निर्देशन का सपना भी नहीं छोड़ा। जिसने बड़े बजट के प्रोजेक्ट में जोखिम लिया और असफलता भी देखी। जिसने गंभीर सिनेमा किया और उसी समय कॉमेडी में भी अपनी जगह बनाई और सबसे बड़ी बात जिसने हर दौर में खुद को दोबारा साबित किया। आज उनके नाम के साथ कई किरदार जुड़े हैं। लेकिन शायद अजय देवगन की सबसे बड़ी पहचान कोई एक किरदार में ही है। उनकी सबसे बड़ी पहचान है उनका सफर। एक ऐसा सफर जिसमें गिरावट भी है, वापसी भी है, जोखिम भी है, सफलता भी है और लगातार आगे बढ़ने की ज़िद भी है। शायद इसीलिए अजय देवगन सिर्फ 90 के दशक के एक्शन हीरो नहीं है। वह उस दौर की याद है। वह उस दौर से आगे निकल चुके अभिनेता हैं। और आज भी जब पर्दे पर उनका चेहरा दिखाई देता है तो एक बात साफ समझ आती है। कुछ सितारे समय के साथ पुराने हो जाते हैं। लेकिन कुछ सितारे समय के साथ इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। अजय देवगन उन्हीं सितारों में से एक हैं। अगर आपको अजय देवगन का यह सफर पसंद आया हो तो वीडियो को लाइक जरूर करें। कमेंट में बताइए कि उनका कौन सा किरदार आपको सबसे ज्यादा पसंद है और ऐसी ही लंबी, रोचक और अनसुनी बॉलीवुड कहानियों के लिए चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल मत भूलिए। लिए