बात उस दौर की है जब ही हुआ था। एशिया के कई देश अंग्रेजों और दूसरे यूरोपियन रूलर्स की से आजाद हो रहे थे। सब अपनी एक नई पहचान बनाने में लगे थे। एक नया एशिया उभर रहा था। लेकिन इस नए एशिया को आपस में कनेक्ट कौन करता? यहीं पर हमारे भारत ने दिखाई अपनी मेन कैरेक्टर एनर्जी।
1951 में दिल्ली में हुए पहले एशियन गेम्स सिर्फ कुछ गेम्स नहीं थे। बल्कि यह आजाद भारत का दुनिया के सामने एक कमबैक था। दुनिया को यह दिखाने का तरीका था कि देखो अब हम बदल चुके हैं और अपने पैरों पर खड़े हैं। उस समय के इंडियन स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन सिर्फ खेल के लिए नहीं भाग रहे थे।
उनके दिमाग में एक नया इंडिपेंडेंट और कॉन्फिडेंट भारत बनाने का सपना चल रहा था। वे चाहते थे कि पूरी दुनिया भारत को देखे और हमारी इस नई शुरुआत को महसूस करें। और दोस्तों ओलंपिक की तरह ही एक बड़े लेवल का इवेंट होस्ट करने से बेहतर तरीका और क्या ही हो सकता था। भारत ने वही किया। आइए जानते हैं कि आखिर भारत ने कैसे एशियन गेम्स जैसे मल्टी स्पोर्ट्स इवेंट्स को डिस्कवर किया और जानेंगे कि क्या है इसकी पूरी कहानी।
साल 1947 भारत अभी-अभी ब्रिटिश राज से आजाद हुआ है। देश के शहर-शहर में पार्टीशन के गहरे जख्म ताजे हैं। चारों तरफ रिफ्यूजी माइग्रेशन, भुखमरी और अनसर्टेनिटी का माहौल है। देश अपनी नई पहचान तलाश रहा है। और पूरी दुनिया, पूरी दुनिया एशिया को एक कमजोर, लाचार और बटे हुए कॉन्टिनेंट की नजर से देखती थी। एक ऐसी जगह जहां सिर्फ गरीबी और स्ट्रगल है। लेकिन उसी उथल-पुथल के बीच दिल्ली के एक हॉल में कुछ ऐसा हुआ जिसने इतिहास का रुख ही बदल दिया। साल 1947 में ही दिल्ली में हुई एशियन रिलेशंस कॉन्फ्रेंस।
एशिया भर के लीडर्स, थिंकर्स और रेबेल माइंड्स एक प्लेटफार्म पर आए। सब बात कर रहे थे आजादी की, सहयोग की और एक नए एशिया के सपनों की। लेकिन इसी भीड़भाड़ के बीच एक इंसान ऐसा था जिसके दिमाग में कुछ अलग ही खुराफात चल रही थी। एक ऐसा आईडिया जो आगे चलकर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मल्टी स्पोर्ट्स इवेंट बनने वाला था। यानी एशियन गेम्स की शुरुआत होने वाली थी। उस इंसान का नाम था गुरुदत्त सौधी।
यह भारतीय ओलंपिक आंदोलन के बड़े धुरंधर थे। सौधी साहब ने सोचा कि यार सिर्फ राजनेताओं के हाथ मिलाने और बड़ी-बड़ी स्पीच देने से देशों के रिश्ते नहीं मजबूत होंगे। दिलों की दूरियां मिटाने के लिए कुछ धमाकेदार चाहिए और उस धमाके का नाम था खेल। उन्होंने कहा कि सोचो अगर भारत, चीन, जापान,फिलीपींस, ईरान, एशिया के सारे देश एक मैदान पर उतरे जहां झंडे अलग हो, भाषाएं अलग हो। लेकिन दिल की धड़कन सिर्फ एक हो जीत और भाईचारे की। और गुलामी के जख्मों पर मरहम लगाने का इससे बेहतरीन तरीका और क्या ही हो सकता था।
आईडिया तो नेक्स्ट लेवल का था पर इसे जमीन पर उतारना दोस्तों माउंट एवरेस्ट चढ़ने जैसा था। ना जेब में पैसा ना ढंग की सुविधाएं और ना ही कोई इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन। अकेले सोधी साहब क्या-क्या करते? उन्होंने सीधा अप्रोच किया देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को। नेहरू जी विजनरी आदमी थे। उन्होंने तुरंत सौधी के कंधे पर हाथ रखा और बोले गो अहेड। उस वक्त देश के सामने भुखमरी और रिकंस्ट्रक्शन की भयंकर समस्या थी। लेकिन नेहरू जी को पता था कि दुनिया के सामने नया भारत कैसा दिखना चाहिए। भारत को सिर्फ अपने जख्म सहलाने वाला देश नहीं बल्कि पूरे एशिया को लीड करने वाला ग्लोबल लीडर बनाना था। और खेल खेल से बड़ा सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का हथियार कोई हो ही नहीं सकता था। मैदान पर खिलाड़ी पॉलिटिक्स की भाषा नहीं बोलते। वह तो अपनी मेहनत और गेम से बात करते हैं।
इंटरेस्टिंग बात आपको बताएं। शुरुआत में इस इवेंट का नाम एशियाटिक गेम्स रखने का प्लान था। तब नेहरू जी ने कहा दोस्तों नाम थोड़ा कैची और मॉडर्न होना चाहिए। और उन्होंने सजेस्ट किया एशियन गेम्स। नाम सेट हो गया पर असली ड्रामा तो अभी बाकी था। अगला साल आया 1948। लंदन में चल रहे थे समर ओलंपिक्स।
पूरी दुनिया की भीड़ वहां जुटी हुई थी। सो साहब रिसर्च करने लंदन पहुंच गए। लेकिन वह सिर्फ मैच देखने नहीं गए थे। वह मैदान के बाहर एशिया का सबसे बड़ा खेल महाकुंभ खड़ा करने की लॉबिंग कर रहे थे। उन्होंने होटल माउंट रॉयल में एशियाई देशों के डेलीगेट्स की मीटिंग बुलाई। कोरिया, चीन, फिलीपींस, बर्मा, सिलोन सब आए। किसी के पास पैसा नहीं। किसी की सरकारें अनस्टेबल पर सोी साहब ने सबको कन्विंस कर लिया और आखिरकार फरवरी 1949 में दिल्ली में ऐतिहासिक मीटिंग हुई और जन्म हुआ एशियन गेम्स फेडरेशन का। अब सवाल यह था कि पहले एशियन गेम्स होस्ट कौन करेगा? दोस्तों वहां भी उस गरीब हाल भारत ने सीना चौड़ा करके जिम्मेदारी ले ली। हम कराएंगे। अब दिल्ली रेडी हो रही थी इतिहास रचने के लिए। वो इतिहास जो हमेशा हमेशा के लिए अमर होने वाला था और फिर आ गया वो ऐतिहासिक दिन 4 मार्च 1951 नई दिल्ली का नया नवेला नेशनल स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था। करीब 300 ऑडियंस उस पल के गवाह बने जब प्रधानमंत्री नेहरू ने पहले एशियन गेम्स का ऑफिशियल इनोगेशन किया। जरा सोच कर देखिए।
उस माहौल को 11 देशों के एथलीट पहली बार इतने बड़े इंटरनेशनल मंच पर उतरे थे। उनके लिए यह सिर्फ मेडल की रेस नहीं थी। यह उनके नए नवेले आजाद देशों के सम्मान की लड़ाई थी। एथलेटिक्स, तैराकी, फुटबॉल, बास्केटबॉल, साइकिलिंग, वेटलिफ्टिंग सब जगह गजब का जोश। आज जैसी मॉडर्न स्पोर्ट्स, सिटी तो दिल्ली थी नहीं, रिसोर्सेज कम थे, लॉजिस्टिक्स के लाले थे, लेकिन जज्बा आसमान छू रहा था। वहां मौजूद हर इंसान जानता था, वो सिर्फ खेल नहीं देख रहा था। वो इतिहास बनते हुए देख रहा है। एक और गजब का किस्सा सुनिए।
इस पहले एशियाड में चाइना की टीम ने हिस्सा ही नहीं लिया। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक मजेदार बात दर्ज है कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने 10 स्पेशल ऑब्जर्वर्स को गुडविल एंबेसडर के तौर पर दिल्ली भेजा था। आजादी के बाद भारत आने वाले वो चीन के पहले ऑफिशियल रिप्रेजेंटेटिव्स थे। नेहरू जी ने भी बड़प्पन दिखाते हुए उन सभी मेहमानों को अपने घर नाश्ते पर बुलाया था। उस जमाने में दुनिया भर के पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स ने इसे सक्सेसफुल स्पोर्ट्स डिप्लोमेसी के नाम से खूब सराहा था। फिर दोबारा आया वो मौका जब फिर से भारत एशियन गेम्स को होस्ट कर रहा था। साल था 1982 और फिर से जगह वही थी नई दिल्ली। इंदिरा गांधी देश की पीएम थी।
भारतीय खेल इतिहास का वो दौर जिसने ना सिर्फ देश की राजधानी दिल्ली की सूरत बदल दी बल्कि हर घर में कलर टीवी और रिमोट कल्चर की एंट्री करा दी। जी हां, 19 नवंबर से 4 दिसंबर 1982 के बीच नई दिल्ली में नौवें एशियन गेम्स यानी एशियाड 82 की कहानी किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं है। जब भारत को इन खेलों की मेजबानी मिली तो देश के सामने सबसे बड़ा संकट समय और इंफ्रास्ट्रक्चर का था। पॉलिटिकल अनसर्टेनिटी के कारण काम बहुत देर से शुरू हुआ। लेकिन तब सरकार ने युद्ध स्तर पर तैयारी की। दिल्ली वासियों ने पहली बार शहर में भव्य फ्लाईओवर, मॉडर्न स्टेडियम जैसे जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम और इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम और शानदार होटल्स देखे। शहर की सड़कों पर दौड़ती डबल डेकर बसें और हाथों में आइसक्रीम लिए बच्चों का प्यारा मैस्कॉट अप्पू यानी एक नटखट हाथी आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है।
इन खेलों के जरिए भारत ने दुनिया के सामने अपनी टेक्नोलॉजी और एडमिनिस्ट्रेशन पावर का लोहा बनवाया। इसी इवेंट के साथ भारत में कलर्ड टीवी ब्रॉडकास्टिंग की धमाकेदार शुरुआत हुई क्योंकि पूरा देश इन खेलों को कलर स्क्रीन पर देखना चाहता था। मैदान के अंदर का रोमांच भी कम नहीं था। भारत ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 57 मेडल्स जीते और मेडल टैली में फिफ्थ पोजीशन हासिल किया। एमडी व्सम्मा ने एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा। वहीं एक युवा सनसनी पीटी उषा ने अपनी रफ्तार से पहली बार दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। यूं कहें कि 1982 का एशिया सिर्फ खेलकूद का महाकुंभ नहीं था। बल्कि यह तो मॉडर्न इंडिया के राइज और उसके कॉन्फिडेंस से भरी एक नई सुबह की कहानी थी। दोस्तों, अब बात करते हैं गेम और ग्लोरी की। इंडियन एथलीट्स के लिए एशियन गेम्स और कॉमनव्थ गेम्स हमेशा से ही वह प्लेटफॉर्म्स रहे हैं जहां से वह ओलंपिक के लिए तैयार होते हैं। जब भी हमारे खिलाड़ी इंटरनेशनल मंच पर तिरंगा लहराते हैं तो पूरा देश उन्हें अपना सुपर हीरो मान लेता है। दोस्तों दो बार एशियन गेम्स को सक्सेसफुल तरीके से होस्ट करने का यह इंपैक्ट पड़ा कि भारत को दो बार कॉमनवेल्थ गेम्स को भी होस्ट करने का मौका मिला है।
2010 में भारत ने पहली बार इसे होस्ट किया। जगह थी नई दिल्ली। अब 2030 में दूसरी बार भारत इसे अहमदाबाद में होस्ट करने जा रहा है। साथ ही भारत के लिए सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि 2036 के ओलंपिक गेम्स की होस्टिंग के लिए भारत सबसे मजबूत दावेदार बनकर उभरा है। भारत इसे अहमदाबाद में कराना चाहता है। अब आते हैं एशियन गेम्स की मेडल टैली पर। इसके इतिहास पर नजर डालें तो चाइना का तो एक छत्रराज ही रहा है। जापान और साउथ कोरिया दूसरे और तीसरे नंबर पर ऑलमोस्ट फिक्स ही रहते हैं। लेकिन हमारे लिए फ्रॉड मोमेंट क्या है? दोस्तों रैंकिंग के मामले में भारत का बेस्ट परफॉर्मेंस पहले ही वाले इवेंट साल 1951 में था। जब हम जापान के बाद सेकंड पोजीशन पर थे। और अगर मेडल विनिंग नंबर की बात करें तो चीन के हांगझाव में हुए एशियन गेम्स 2022 में भारत ने तहलका ही मचा दिया।
इतिहास में पहली बार भारत ने 100 का आंकड़ा पार करते हुए कुल 107 मेडल जीते और धमाकेदार तरीके से फोर्थ पोजीशन हासिल किया। तो दोस्तों कहानी बस इतनी सी नहीं है कि एशियन गेम्स शुरू हुआ। कुछ लोग मैदान पर उतरे और मेडल जीत गए। इस बड़े इवेंट की जड़े उस 1951 के भारत में है जिसने दुनिया को दिखा दिया कि खेल सिर्फ एक कंपटीशन नहीं है बल्कि टूटे हुए एशिया को आपस में जोड़ने का सबसे पावरफुल बॉन्ड है।
अब जब एशियन गेम्स का अगला चैप्टर जापान के नागोया में लिखा जा रहा है तो यह सिर्फ एक और टूर्नामेंट नहीं बल्कि उस ग्रेट जर्नी का नेक्स्ट स्टेज है जिसकी शुरुआत 75 साल पहले दिल्ली की सड़कों और होटलों में हुई थी। तो सीन यह है दोस्तों कि खेल कोई भी हो पैशन वही पुराना वाला होना चाहिए।