जिस शरीर को देखकर आज लोग शरद सक्सेना की तारीफ करते हैं। कभी यही शरीर उनके करियर की सबसे बड़ी मुश्किल बन गया था। साल 1970 के दशक में शरद सक्सेना एक्टर बनने का सपना लेकर मुंबई आए थे। वो इंजीनियर थे लेकिन सपना था फिल्मों में हीरो बनने का। लेकिन उस दौर में उनकी मस्कुलर और एथलेटिक बॉडी को देखकर फिल्म मेकर्स उन्हें हीरो नहीं बल्कि फाइटर या विलेन के आदमी के रोल देने लगे।
शरद ने खुद बताया था कि उनके करियर के पहले 25 से 30 सालों तक उन्हें ज्यादातर छोटे रोल्स और एक्शन वाले किरदार ही मिलते रहे। इतना ही नहीं उन्होंने करीब 40 साल में लगभग 600 एक्शन सीक्वेंसेस किए और बताया कि इनकी वजह से वह करीब 12 बार अस्पताल तक पहुंचे।
लेकिन असली कहानी यहां शुरू होती है। गुलाम में उन्होंने आमिर खान के सामने एक दमदार विलेन का किरदार निभाया और फिल्मफेयर में बेस्ट विलेन के लिए नॉमिनेट भी हुए। फिर आया साथिया शरद सक्सेना के मुताबिक इस फिल्म के बाद लोगों ने उन्हें सिर्फ फाइटर नहीं बल्कि एक एक्टर के तौर पर देखना शुरू किया।
उन्होंने इसे अपनी करियर रिकवरी की शुरुआत बताया और करीब 50 साल के करियर के बाद शेरनी में पिंटू भैया का किरदार आया जिसे उन्होंने अपने करियर का एक नया चैप्टर बताया। यानी जिस एक्टर को कभी सिर्फ मार खाने और मारने वाले किरदार मिलते थे, उसी शरद सक्सेना ने आखिरकार यह साबित कर दिया कि चेहरा या बॉडी किसी एक्टर की पूरी कहानी नहीं होती। और शायद यही वजह है कि आज भी उनकी कहानी सिर्फ बॉलीवुड की नहीं हार ना मानने की कहानी लगती है।