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जिसने अपनों से धोखा खाया और हुकूमत से टक्कर ली: जानिए करण जौहर के बड़े पापा की अनकही कहानी!

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जौहर खड़े हुए और बोले इंदिरा जी हमारी बात क्या सुनेंगी? हमारे मसले क्या सुलझाएंगी? यह तो सो रही हैं। किसी की जिंदगी की पूरी कहानी को केवल एक वीडियो में समेट देना मुश्किल है। मुश्किल है। नामुमकिन नहीं। आज मैं आपके लिए बॉलीवुड के कॉमेडी किंग के नाम से मशहूर आईएस जौहर की जिंदगी की पूरी कहानी लेकर आया हूं। आज तुम इज्जत के साथ जेल से छोड़ा जाता है। आप अपनी सोसाइटी का सोच रहे हैं। मगर मेरी सोसाइटी तो कैदियों की है। वो मेरे बारे में क्या सोचेंगे कि बाइ्जत निकाल दिया गया। मेरे मुंह पर थूकेंगे। ढाबे में बर्तन धोने वाला नौकर कैसे बना बॉलीवुड का कॉमेडी किंग? क्या है आईएस जौहर और पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का हैरतंगेज किस्सा कैसे साजिश कर उनके सगे भाई ने ही आईएस जौहर को भिजवा दिया जेल। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने क्यों आईएस जौहर को रुलाए खून के आंसू और कैसे पागल होकर गुमनामी में हुई आईएस जौहर की मौत। इन तमाम दिलचस्प सवालों के बेहद दिलचस्प जवाब आपको मिलेंगे सिर्फ इस एक वीडियो में। तो चलिए शुरू करते हैं। आईएस जौहर का जन्म 16 फरवरी सन 1920 को आज के पाकिस्तान यानी तब के हिंदुस्तान के पंजाब में तालगंग शहर में हुआ था। कुछ मानते हैं कि उनका पूरा नाम था इंद्रजीत सिंह जौहर और कुछ मानते हैं कि उनका पूरा नाम था इंद्रसेन जौहर। उनका नाम जो हो लेकिन उनके माता-पिता के नाम और काम दोनों ही के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। हां उनका एक जुड़वा भाई था जो बिल्कुल उन्हीं की तरह दिखता था। और 1957 में अपने एक इंटरव्यू में आईएस जौहर ने बताया था कि उनका भाई उनके हमशक्ल होने का नाजायज फायदा उठाता था। बचपन में शरारतें वो करता लेकिन गलती की सजा आईएस जौहर को मिलती। मेहनत से पढ़ाई कर कॉलेज में फर्स्ट आईएस जौहर आए लेकिन कन्वोकेशन के दिन डिग्री और प्राइज उसने ले लिया। एक बार तो उसने कोई जुर्म कर दिया और थाने में रपट दर्ज हो गई। लेकिन पुलिस ने उसकी जगह आईएस जौहर को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया। और हद तो उसने तब पार कर दी जब जिस लड़की से जौहर प्यार करते थे उससे जौहर बनकर उसने शादी कर ली। इसीलिए आईएस जौहर और उनके जोड़वा भाई के बीच रिश्ते बहुत बुरे थे। हां, उनका परिवार संपन्न था। आप इस बात से समझ सकते हैं क्योंकि आईएस जौहर ने डबल एमए किया था। पहले इकोनॉमिक्स में फिर पॉलिटिकल साइंस में। एमए पास करने के बाद उनकी शादी कर दी गई रम्मा बेंस नाम की लड़की से। इसके बाद जौहर एलएलबी करने लगे। एलएलबी के दौरान जौहर को दोस्तों के साथ फिल्म देखने का चसका लग गया। पर उनके और उनके दोस्तों के बीच एक फर्क था। उनके दोस्त फिल्म को एंटरटेनमेंट की तरह देखते फिर भूल जाते। लेकिन जौहर के दिल पर फिल्में बहुत गहरा असर छोड़ती।

यहां तक कि फिल्में देखकर उनका मन फिल्में बनाने को करता। इसीलिए उन्होंने गुप्त रूप से ऐसी कई कहानियां लिख डाली थी जिन पर उनके मुताबिक फिल्में बन सकती थी। 10 अगस्त सन 1947 जौहर परिवार के साथ एक शादी में शामिल होने पटियाला आए थे। उसी वक्त लाहौर में बंटवारे के दंगे भड़क उठे। दो दिन बाद जौहर ने अखबार में खबर पढ़ी लाहौर का मशहूर हिंदुवाई शाही आलम बाजार पूरा फूंक दिया गया है और जौहर का घर जलकर राख हो गया है। अफसोस जौहर फिर कभी अपने घर नहीं जा सकी। अब परिवार का पेट पालना था। जौहर की डिग्रियां तो आग में धूधू कर जल चुकी थी। इसीलिए जौहर ने परिवार को दिल्ली में छोड़ा और चले गए जलंधर। वहां एक फैक्ट्री में मजदूरी करने लगे। लेकिन दो चार महीनों में जौहर को लगा इस तरह जिंदगी नहीं चलेगी। क्यों ना वो काम किया जाए जिसमें उनका मन लगे। तो उन्होंने ट्रेन पकड़ी और पहुंच गए बंबई। दिन के वक्त काम की तलाश में फिल्म स्टूडियो दर स्टूडियो के चक्कर काटते और जौहर रात के वक्त पैसों की खातिर ढाबे में बर्तन माजते। एक दिन उनकी मुलाकात हुई डायरेक्टर रूप के शोरी से। वो जौहर की दर्द भरी कहानी से बहुत प्रभावित हुए। यह जान कि जौहर कहानी लिखते हैं। उन्होंने जौहर से उनकी एक कहानी सुनाने को कहा। जौहर ने जो उन्हें कहानी सुनाई वो रूप के शौरी को इतनी भाई कि उन्होंने उस पर एक फिल्म [गला साफ़ करने की आवाज़] बना दी। साल 1949 में एक फिल्म रिलीज हुई एक थी लड़की। इससे आईएस जौहर ने बतौर एक्टर अपना फिल्म डेब्यू किया। इस फिल्म का गाना लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रपदा लता मंगेशकर का पहला हिट सॉन्ग था। इससे जौहर की हिम्मत बढ़ी और 1952 में बतौर डायरेक्टर उन्होंने अपनी पहली फिल्म बनाई श्रीमती जी यह भी हिट हुई। 1953 में जौहर के दोस्त डायरेक्टर बी आर चोपड़ा ने जौहर से कहा उनकी पिछली कुछ फिल्में लगातार पिट चुकी हैं। इसीलिए वो अब निराश हो फिल्म मेकिंग छोड़ रहे हैं। जौहर ने उनके हाथ पकड़े और अपनी लिखी एक कहानी उन्हें थमा दी। जिस पर बी आर चोपड़ा ने एक फिल्म बनाई। साल 1953 में रिलीज फिल्म अफसाना जो सुपरहिट हुई। कहते हैं यह फिल्म जौहर और उनके दुष्ट जुड़वा भाई की कहानी पर आधारित थी। बंटवारे का दर्द जौहर के दिल से अब भी नहीं मिटा था। इसीलिए साल 1954 में उन्होंने विभाजन का दर्द दिखाती एक फिल्म बनाई नास्तिक। इसका गाना देखते हुए इंसान की हालत क्या हो गई भगवान। कितना बदल गया इंसान बड़ा मशहूर हुआ। इसके बाद तो जौहर ने 50 के दशक में गूंज उठी शहनाई एक गांव की कहानी शर्त बेवकूफ लॉरेंस ऑफ अरेबिया मिस्टर इंडिया दिल ने फिर याद किया माया भीगी रात अप्लम चपलम भीगी रात मां बेटियां तीन देवियां जैसी कई फिल्मों में काम किया आईएस जौहर एक बहुत ही वर्सटाइल आर्टिस्ट थे वो एक्टिंग िंग भी करते थे। वो राइटिंग भी करते थे। वो डायरेक्शन भी करते थे। लेकिन उनकी पहचान बनी सिर्फ एक कॉमेडियन की और इसके पीछे जिम्मेदार खुद जौहर ही थे। दरअसल यह उनकी फितरत थी कि चाहे कितनी भी गंभीर से गंभीर विषय पर बनी फिल्म हो लेकिन उसमें वो कॉमेडी का तड़का लगा ही देते थे। जैसे साल 1964 में आई एस जौहर ने एक फिल्म बनाई गोवा। गोवा में पुर्तगाल सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम और भारत में उसके विलय पर बनी एक बेहद सीरियस फिल्म। लेकिन इसमें भी उन्होंने जबरदस्त हास्य का तड़का लगा दिया। पहले तो इस नाम से ही सेंसर बोर्ड को आपत्ति हो गई। माना कि गोवा पुर्तगाल से आजाद हो भारत में मिल गया था। लेकिन फिर भी इससे भारत और पुर्तगाल के संबंध बिगड़ सकते थे। इसीलिए जौहर ने इसका नाम बदलकर जौहर महमूद क्योंकि इस फिल्म में उनके साथ महमूद भी थे तो जौहर महमूद इन गोवा कर दिया। यह फिल्म हिट हुई।

इसका गाना चले हैं ससुराल बड़ा मशहूर हुआ। इसी फिल्म से जौहर को चसका लग गया। अपने नाम वाली फिल्में बनाने का। इसके बाद तो धड़ाधड़ एक के बाद एक जौहर महमूद इन हांगकांग जौहर इन बॉम्बे जौहर इन कश्मीर माय नेम इज जौहर जौहर जौहर करके 810 फिल्में जौहर ने बना डाली हां ये है कि ये सभी फिल्में हिट हुई क्योंकि जौहर नाम वाली फिल्म का मतलब था कुप्रथाओं पर चोट करती कॉमेडी फिल्म की गारंटी। 1971 में भारतपाक युद्ध से जन्मे बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम पर आई एस जौहर ने एक फिल्म बनाई और आदत के मुताबिक इस गंभीर विषय फिल्म में उन्होंने भरपूर कॉमेडी लगाई। वैसे 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो शिमला समझौते की खातिर भारत आए थे और अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो को भी साथ लाए थे। वही बेनजीर भुट्टो जो आगे चलकर खुद पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी। समझौते पर दस्तखत के बाद वो मुंबई में बॉलीवुड के कलाकारों से मिलने लगे। इन्हीं में आईएस जौहर भी थे। जौहर ने बेनजीर से हाथ मिलाया और बोले आप बहुत खूबसूरत हैं। क्या आप मेरी अगली फिल्म की हीरोइन बनेंगी? जौहर की यह बात सुन भारतीय अधिकारी और पाकिस्तानी अधिकारी सन्न्य हो गए और साथ ही बेनजीर भुट्टो के भी होश उड़ गए। लेकिन फिर उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा मैं जिंदगी में एक्टिंग नहीं कुछ और करना चाहती हूं। 60 और 70 के दशक में फिल्मफेयर मैगजीन अपना एक क्वेश्चन बॉक्स नाम का कॉलम छापती थी जिसमें पाठक अपने मन के सवाल पूछते और जौहर अपने व्यंग भरे चुटकीले जवाब देते। कुछ उदाहरण पेशे खिदमत हैं। जैसे पाठक का सवाल। मैं पाकिस्तान जाना चाहता हूं। जौहर का जवाब हराम के काम से दूर नहीं। पाठक का सवाल। पुलिस हमेशा देवी से क्यों आती है? जौहर का जवाब क्योंकि पुलिस उसी की मदद करती है जो अपनी मदद खुद करता है। पाठक का सवाल लखनऊ में लोग गाली देने से पहले आप क्यों लगाते हैं? जौहर का जवाब इज्जत बढ़ाकर गिराने के लिए। पाठक का सवाल आशावादी किसे कहते हैं? जौहर का जवाब जो सिगरेट बुझने के पहले ही लाइटर मांग ले। पाठक का सवाल अच्छा नेता कौन होता है? जौहर का जवाब जो चुनाव के पहले आपसे हाथ मिलाए और जीतने के बाद आपका भरोसा हिलाए। नेताओं की बात हुई तो आपको बता दूं सिनेमा के बाद जौहर की जिस चीज में सबसे ज्यादा रुचि थी, वह थी राजनीति। अपनी फिल्मों में वह अक्सर राजनेताओं और सरकार के फैसलों पर व्यंग कटाक्ष किया करती थी और इसी सिलसिले में तो हुई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जौहर की जंग जिसकी शुरुआत हुई एक हैरतंगेज घटना से। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अली पीटर जॉन बताते हैं। एक दिन इंदिरा गांधी सिनेमा के कलाकारों की मीटिंग ले रही थी। सबको संबोधित कर रही थी।

बैठे-बैठे जौहर ने देखा इंदिरा जी उंघ रही हैं। जौहर खड़े हुए और बोले, इंदिरा जी हमारी बात क्या सुनेंगी, हमारे मसले क्या सुलझाएंगी? यह तो सो रही हैं। जहर की इस बात से हवाओं में हंसी फैल गई और इंदिरा जी शर्मिंदा हो गई। लेकिन उसी दिन से जौहर इंदिरा जी की आंखों में खटक गई। जल्दी ही जौहर को उनकी इस उददंडता की सजा मिली। अली पीटर जॉन बताते हैं कि इंदिरा जी ने ऐसा भुगतया उनको। ऐसा भुकताया उनको कि जौहर खून के आंसू रोई। लेकिन जौहर तो जौहर कैसे हार मानते? अपनी फिल्म फाइव राइफल्स में उन्होंने इंदिरा गांधी सरकार की शराब नीति का जमकर माखौल उड़ाया। इसमें किशोर कुमार का गाया गाना जब से सरकार ने नशाबंदी तोड़ दी। बहुत मशहूर हुआ। वैसे इस फिल्म में जौहर ने बड़ा अद्भुत कारनामा किया। राजेश खन्ना और शशि कपूर इन दो सुपरस्टार्स के डुप्लीकेट स्पूफ इस फिल्म में उन्होंने दिखाई। राजेश खन्ना के डुप्लीकेट का नाम बदलकर उन्होंने कर दिया राकेश खन्ना और शशि कपूर के डुप्लीकेट का नाम बदलकर उन्होंने कर दिया शाही कपूर। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इंदिरा गांधी की जौहर से चिढ़ का ही यह नतीजा था कि सेंसर बोर्ड जौहर की फिल्मों पर कैंची चलाने की खातिर कुछ ज्यादा ही मचलती रहती थी। 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया। जोहर इसके खिलाफ हो गए। उन्होंने इमरजेंसी की बुराई करती एक फिल्म बनाई नसबंदी। इसमें उन्होंने संजय गांधी द्वारा चलाए गए जबरन नसबंदी कार्यक्रम की खूब भदपीटी और खूब मजाक उड़ाया। मनन्ना डे का गाया गाना क्या मिला सरकार इमरजेंसी लगा के नसबंदी करा के हमारी बंसी बजा के बड़ा मशहूर हुआ लेकिन इस फिल्म पर सरकार ने बैन लगा दिया लेकिन जौहर तो जौहर वो कैसे हार मानते जब सरकार ने फिल्मों पर रोक लगा दी तो वो प्ले लिखने लगे और इमरजेंसी इंदिरा गांधी संजय गांधी की बुराई करते नुक्कड़ नाटक खेलने लगे। धीरे-धीरे एक-एक कर सरकार ने इन नाटकों और इनके मंचन पर पाबंदी लगा दी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आईएस जौहर के इन क्रांतिकारी कदमों से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनसे डरने लगी थी, खौफ खाने लगी थी और बेहद चिढ़ने लगी थी। अब 1980 का दशक शुरू हो गया था। और 1980 के बाद से ही सिनेमा में सियासत का प्रभाव बढ़ने लगा। अमिताभ बच्चन और सुनील दत्त जैसे कलाकार सिनेमा में खुलेआम सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर काम करने लगी। ऐसे में जौहर के जौहर पर संकट मंडराने लगा। वैसे भी अपने बिंदास, बेबाक और बेलसपन के कारण जौहर ने बॉलीवुड में दोस्तों से ज्यादा दुश्मन बना लिए थे और इस वक्त अब सब लोग उनके खिलाफ इकट्ठा हो गए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इंडस्ट्री में कई ऐसे कलाकार थे बड़े-बड़े कलाकार जिन्होंने एक प्लंड प्रोपेगेंडा के तहत जौहर के खिलाफ एक मुहिम शुरू की। जौहर को पागल साबित करने की कोशिश करने लगी। हालांकि यह भी दावा किया जाता है कि ऐसा इंदिरा गांधी के इशारे पर हो रहा था क्योंकि वह जौहर से बदला चाहती थी। खैर इन्हीं कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि 198283 आते-आते आईएस जौहर को फिल्म इंडस्ट्री से बाहर निकाल दिया गया और जौहर हमेशा हमेशा के लिए गुमनामी के गलियारे में गुम हो गई। जौहर के बेटे अनिल जौहर बताते हैं कि जौहर को इस बात का बहुत दुख था, अफसोस था कि जिस इंडस्ट्री में उन्होंने इतने साल काम किया, जिस इंडस्ट्री के लिए इन्होंने इतना कुछ किया, उस फिल्म इंडस्ट्री के एक कलाकार ने उनकी ओर एक नजर उठाकर नहीं देखा। गुमनामी के अंधेरे और दर्द से जूझते आईएस जौहर को 10 मार्च सन 1984 को अचानक एक जोर का हार्ट अटैक हुआ और इसी में वो इस दुनिया से रुखसत हो गई। जौहर की इस जानदार कहानी का जबरदस्त अंत मैं एक जबराट फैक्ट से करूंगा। N 18 को 2024 में दिए अपने इंटरव्यू में करण जौहर ने बताया कि आईएस जौहर उनके ताऊ यानी बड़े पापा थे जो उनके पापा यश जौहर और उनके लिए पिता तुल्य थे।

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