वो कर्म करेगा तो हम कर्म करेंगे। वो सितम करेगा तो हम सितम करेंगे। 80 के दशक बॉलीवुड का वो दौर जब पर्दे पर हीरो की एंट्री पर सिनेमाघरों में तालियों से गूंज उठता था। दोस्तों एक तरफ थे डिस्को डांसर गरीबों के मसीहा और नेशनल अवार्ड विनर मिथुन चक्रवर्ती। ए जूली जली जॉनी का दिल तुम पे आया जून [संगीत] तू ही तो मेरी जान है जान है जान है जान। तो दूसरी तरफ थे बॉलीवुड के शहंशाह सुनील दत्त के बेटे एक एंग्री यंग मैन संजू बाबा यानी संजय दत्त। आज हम दो ऐसे सुपरस्टार्स को एक साथ इलाका या जीते हैं एहसान से जैसे सुपरहिट फिल्मों में देखते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक वक्त ऐसा भी था जब इन दोनों स्टार्स के बीच अपनी फिल्म के पोस्टर पर नाम पहले छपवाने के लेकर ऐसी जंग छिड़ी कि एक पूरी फिल्म ही डिब्बा बंद हो गई। हमारे जैसा इंसान है वो भी। वो जो करेगा हम वो करेंगे। [संगीत] जी हां दोस्तों सुनील दत्त द्वारा बनाई जा रही फिल्म जब प्यार हुआ ए सिगरेट [संगीत] मांगता है तो मांगता है। सच एक तरफ सीनियरिटी का गुरूर था तो दूसरी तरफ नैन हवेली स्टार का जलवा। आखिर इस ईगो क्लैश में कौन झुका? कैसे मिथुन दा ने बाजी मारी? क्यों यही विवाद 80 के दशक की सबसे बड़ी हेडलाइन बन गया दोस्तों। खुद को तराजू में [संगीत] तो तूने बोला नहीं। इसलिए अपुन दूसरा स्कूल चला गया। भट्टी में बहुत बड़ा स्कूल है मास्टर जी। वहां आदमी को अक्सर पहचानना नहीं सिखाया जाता है। लेकिन आदमी पहचाना जरूर सीखा।
नमस्कार दोस्तों, आज की इस एपिसोड में हम बॉलीवुड के उस अनसुनी जंग के पन्ने खोलने जा रहे हैं जिसके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। तो वीडियो को अंत तक जरूर देखिएगा क्योंकि कहानी में हर मोड़ पर एक नया ट्विस्ट है दोस्तों। ऐ जब भीड़ की मौत आती है ना वो शहर की तरफ भागता है। जब तेरी मौत आएगी तू मोहल्ले में आ। इस जंग की जड़ को समझने के लिए हमें 80 के दशक की शुरुआत में जाना होगा। एक तरफ थे मिथुन चक्रवर्ती। मिथुन दा ने बिना किसी गॉड फादर के अपनी मेहनत और अभिनय के दम पर इंडस्ट्री में कदम रखा था। अपनी पहली फिल्म मृग्या के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड फिल्म मिला। तुझ पे जमाना तेरा हो जो शिखर [संगीत] दिल दीवाना तेरा हो। नेशनल अवार्ड मिला। लेकिन असली धमाका हुआ 1982 में आई फिल्म डिस्को डांसर से। मिथुन चक्रवर्ती रातोंरात भारत ही नहीं बल्कि सोवियत संघ तक के एक ग्लोबल आइकॉन बन चुके थे। मिथुन का नाम ही फिल्म को हिट कराने की गारंटी माना जाता था। [संगीत] दूसरी तरफ थे संजय दत्त। 1981 में आई फिल्म राखी से उन्होंने धमाकेदार डेब्यू किया। संजय दत्त सिर्फ एक एक्टर नहीं थे। वह दिग्गज अभिनेता और निर्देशक सुनील दत्त और ट्रेजडी क्वीन नरगिस के बेटे भी थे। सलाम [संगीत] रॉकी मेरा नाम रॉकी मेरा नाम। संजय दत्त के पास यूथ आइकॉन वाली इमेज थी। लंबा चौड़ा कद हैंडसम लुक और एक जबरदस्त फैन फ्लोइंग। जब सुनील दत्त ने इन दोनों बड़े नामों को एक साथ लाने का फैसला किया तो पूरी इंडस्ट्री में तहलकाम मच गया। हर किसी को लगा कि यह जोड़ी बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। माल कहां है राजा? मेरे बापों के खूनी की तरह गायब हो गया होगा। सीधी तरह मेरी बात का जवाब दो।
इस दुनिया में सीधी बात कोई नहीं समझता साहब। पुलिस वालों से मजाक बहुत महंगा पड़ता है राजा। और पुलिस वालों से दोस्ती उससे भी ज्यादा महंगी पड़ती है। लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था कि फिल्म शुरू होने से पहले ही इसका अंत लिखा जा चुका है। तुम सब ने मुझे धक्का दे देकर आशिक करवाया। मैं कह रहा था वेद मत करवाओ। और तुम तुम तो लव के एक्सपर्ट हो ना? सुनील दत्त एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट की प्लानिंग कर रहे थे जिसका नाम रखा गया था जब प्यार हुआ। सुनील दत्त की विज़न साफ था। फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती का सीरियस और पावरफुल अंदाज होगा। जबकि संजय दत्त का यंग और एंग्री लुक होगा। स्टार कास्ट फाइनल हो चुकी थी। म्यूजिक की तैयारी चल रही थी और मीडिया में फिल्म का काफी प्रमोशन हो रहा था। लेकिन जैसे ही फिल्म के प्री प्रोडक्शन का काम आगे बढ़ा असली समस्या सामने आई और वह समस्या थी क्रेडिट्स और नाम की जगह। फिल्म इंडस्ट्री [गला साफ़ करने की आवाज़] में यह नियम काफी समय से चला आ रहा था कि जो एक्टर ज्यादा सीनियर होता है या जिसका स्टारम बड़ा होता है उसका नाम फिल्म के पोस्टर टाइटल और क्रेडिट में सबसे पहले आता है। मिथुन चक्रवर्ती का कहना बहुत सीधा था मैं संजय से सीनियर हूं। मैंने नेशनल अवार्ड जीता है। मेरी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर राज कर रही है। इसीलिए फिल्म के पोस्टर्स और टाइटल क्रेडिट्स में मेरा नाम संजय दत्त से पहले आना चाहिए। तेरे नाम का कुत्ता पालू साले भगने को आता नहीं और काटने को आ गया। लेकिन मामला इतना सीधा नहीं था क्योंकि दूसरी तरफ खड़े थे संजय द सारा [संगीत] समंदर मेरे पास ही मेरी प्यास है। मेरी संजय दत्त का पक्ष भी अपनी जगह बहुत मजबूत था। संजय दत्त भले ही मिथुन से जूनियर थे, लेकिन जब प्यार हुआ में उनका किरदार मुख्य हीरो के रूप में ज्यादा प्रोजेक्ट किया जा रहा था। इसके अलावा यह फिल्म उनके पिता सुनील दत्त का ड्रीम प्रोजेक्ट भी था। संजय दत्त का मानना थाकि वे फिल्म में मुख्य लीड के तौर पर काम कर रहे हैं। इसलिए पोस्टर पर उनका नाम पहले होना चाहिए या कम से कम उन्हें बराबर का क्रेडिट मिलना चाहिए। अरे यह तो मुन्ना है सरकार। मेरा मुन्ना है सरकार। हीरो में काम करता है। [संगीत] ये तुम्हारे लीडर को नहीं। अरे मुन्ना तू सच बता दिया रे। अरे ओ मुन्ना अरे सरकारी जमा बन के आया तू। अब यहां दो स्थिति बन गई दोस्तों। पहला मिथुन चक्रवर्ती अपनी सीनियरिटी और स्टारडम से समझौता करने को तैयार नहीं हो रहे थे। और वहीं संजय दत्त अपने मुख्य हीरो वाले स्टेटस को पीछे नहीं धकेलना चाहते थे। देवा ने कभी पीछे मुड़कर देखना सिखा ही नहीं। मैं अपने दुश्मन की चाल का नक्शा हाथ में लेकर घूमता हूं। सुनील दत्त साहब पूरी स्थिति के बीच में फंस चुके थे।
वे एक तरफ अपनी फिल्म के निर्देशक थे तो दूसरी तरफ एक पिता और इंडस्ट्री के वरिष्ठ कलाकार भी थे। उन्होंने दोनों एक्टर्स को समझाने की काफी कोशिश की। उन्होंने बीच का रास्ता निकालने का प्रस्ताव भी रखा। जैसे कि दोनों का नाम एक साथ स्क्रीन पर लाया जाए या फिर अल्टरनेट पोस्टर बनाया जाए। लेकिन 80 के दशक का वो दौर ऐसा था जहां एक्टर्स के लिए उनकी छवि और सेल्फ रिस्पेक्ट से बढ़कर कुछ नहीं था। नहीं जॉनी बहुत हो गया। अब छोड़ दे ये बोतल। ए जुली मुझे पीने दे। तुमको ऐसा कौन सा दुख है जॉनी? जिसको भुलाने के लिए तुम्हें जहर पीता रहता है। अरे ये ज़हर नहीं दवा है। अकेलापन भुलाने का टॉनिक। कोई भी झुकने को तैयार नहीं था। तनाव इतना बढ़ गया था कि सेट का माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका था। [रोने की आवाज़] जिसने भी अपनी मां का दूध पिया है वो बैग यहां से ले जाए। अबे ओ दडियाल तेरे नाम का कुत्ता पालू। कितनी बार मेरे हाथ से मार खाएगा हां। तेरी धुलाई देख देख के पब्लिक भी बोर होने लगी है। डायलॉग बंद कर बैग उधर रख और शुरू हो जा। जब बात स्वाभिमान पर आ गई तो मिथुन चक्रवर्ती ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाया। दोस्तों मिथुन दा ने साफ कर दिया कि अगर उनके अनुभव और सीनियरिटी का सम्मान नहीं किया जा सकता तो वो इस फिल्म का हिस्सा नहीं रहेंगे। बिना किसी झिझक के मिथुन चक्रवर्ती ने जब प्यार हुआ फिल्म को छोड़ दिया। दोस्तों अब अगर आप मेरे रास्ते में पहाड़ भी लाकर खड़ा कर देंगे ना तो मैं ज्वालामुखी बनकर पहाड़ों का सीना चीर कर अपना रास्ता बना दूंगा। मिथुन के फिल्म छोड़ते ही पूरे प्रोजेक्ट का ढांचा बिखर गया। सुनील दत्त के पास दो ही रास्ते थे। या तो मिथुन की जगह किसी और को कास्ट करें या फिर फिल्म को बंद करें। लेकिन मिथुन जिस किरदार को निभाने वाले थे, उसके लिए कोई दूसरा विकल्प खोजना मुश्किल था। नतीजा भारी नुकसान और महीनों की मेहनत के बावजूद सुनील दत्त को जब प्यार हुआ को हमेशा हमेशा के लिए डिब्बा बंद करना पड़ा। यह बॉलीवुड इतिहास की उन दुर्लभ घटनाओं में से एक थी जहां नाम के क्रेडिट की लड़ाई ने एक बड़े प्रोजेक्ट और बड़े बजट की फिल्म का अंत कर दिया। मैं 100 साल तक जिंदा रहूंगा। 100 साल साल जीऊंगा। काहे मर गए हैं? अब सवाल यह उठता है कि इस पूरी जंग में मिथुन चक्रवर्ती कैसे जीते? दोस्तों, पहली बात करें तो मिथुन चक्रवर्ती ने यह साबित कर दिया कि स्टारडम और सीनियरिटी के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने फिल्म खोना मंजूर किया लेकिन अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटे। मैं तो भगवान से सौदा करूं। [संगीत] उससे भी आधी दुनिया मांग लूं। बाय गॉड फिर तू क्या चीज है? गुस्सा नहीं लंकेश्वर। यह खोपड़ी बहुत सालों से बिगड़ी हुई है। कभी भी कुछ भी हो सकता है। वहीं दूसरी फैक्ट की बात करें तो इस घटना के बाद बॉलीवुड मेकर्स को यह समझ में आ गया कि बड़े सितारों की कास्टिंग के वक्त स्टार क्रेडिट्स को हल्के में नहीं लिया जा सकता। तीसरी फैक्ट की बात करें तो इसके बाद मिथुन चक्रवर्ती का करियर और भी तेजी से आगे बढ़ा। 80 के दशक के अंत तक वह एक साथ दर्जनों फिल्में साइन करने वाले सबसे व्यस्त स्टार बन चुके थे। मीठी मीठी बातगी दिल मेरा पंचर हो गया। ये कैसा चक्कर लेकिन कहानी के सबसे खूबसूरत मोड़ अभी बाकी था। समय बीता और दोनों एक्टर्स को अपनी गलती और परिपक्वता का एहसास हुआ। संजय दत्ता और मिथुन चक्रवर्ती ने समझा कि पेशेवर मतभेदों को व्यक्तिगत रिश्तों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। कुछ ही सालों बाद दोनों ने फिर एक साथ काम किया और हाथ मिलाया। 1988 में आई फिल्म जीते हैं शान से।
समझा? देख जॉनी बैठ जा इधर से। बढ़ जाऊं। मतलब मैं यहां से चला जाऊं। ठीक है। तू अपुन के भाई इकबाल का खिसे मारेला माल अपनी हथेली पे रख दे। मैं अपनी गाड़ी जहां मिथुन और संजय दत्त ने एक साथ स्क्रीन शेयर की। इस फिल्म का गाना झूली झूली। आज भी सबसे ज्यादा दमदार हिट गानों में से एक है दोस्तों। [संगीत] नहीं मांगता हमको ले नहीं मांगता हमको सरा कौन मांगता ए जली जली जॉनी का दिल तुमली तू [संगीत] ही तो मेरी जान है जान है इसके अलावा 1989 में आई सुपरहिट फिल्म इलाका इन फिल्मों में काम करते समय ना तो मिथुन के मन में कोई कड़वाहट थी और ना ही संजय दत्त के मन में तो कल से छोड़ दूंगा मैं मगर आज मुझे पीने दोनों के बीच एक बेहद पक्की और गहरी दोस्ती कायम हो गई जो आज भी कायम है। खाली बोतल की तरह हर तो दोस्तों यह थी कहानी 80 के दशक की उस मशहूर ईगो क्लैश की जिसने एक फिल्म को भले ही बंद करवा दिया लेकिन बाद में बॉलीवुड को दो सच्चे दोस्तों की जोड़ी भी दी। मिथुन चक्रवर्ती और संजय दत्त। इस घटना से हमें यह सीखने को मिलता है कि समय के साथ इंसान बदलता है, परिपक्व होता है और पुराने गीले सिक्के मिटाकर आगे बढ़ता है। आपको क्या लगता है उस दौर में मिथुन दा का अपनी सीनियर के लिए स्टैंड लेना सही था या संजय दत्त का मुख्य हीरो के तौर पर क्रेडिट मांगना। अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। अगर आपको बॉलीवुड इतिहास के अनसुना हिस्सा पसंद आया हो तो वीडियो को लाइक करें। अपने दोस्तों के साथ शेयर करें और ऐसे ही बेहतरीन कहानियों के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें।