50 के दशक की 50 का दशक अपने आखरी मोड़ पर था बंबई बदल रहा था और बदलाव की इस बयार में जतिन के सपने भी नई अंगड़ाइयां ले रहे थे व 16 साल का था कॉलेज की पढ़ाई के लिए उसके पिता ने उसे पुन भेजने का फैसला किया वहां का पंस कॉलेज बहुत मशहूर था और जतिन उसी कॉलेज में एडमिशन लेना चाहता था लेकिन जब तक व वहां पहुंचा दाखिले की तारीख निकल चुकी थी और इसके बाद पुना के कैंप एरिया में स्थित वाडिया कॉलेज में जतिन ने बीए में एडमिशन ले लिया।
कॉलेज के फॉर्म में जतिन ने अपना नाम भरा जतिंदर चुन्नीलाल खन्ना पुना में अपने शुरुआती दिनों में जतिन अपने एक पारिवारिक मित्र रमेश भाटकर के घर में रहा यह पहले मुंबई के गिरगाम में जतिन के पड़ोस में रहता था दोनों के परिवार आपस में बहुत करीब थे लेकिन बाद में भाट लेकर परिवार पुना में बस गया था वहां के डिकन जिमखाना के पास आपटे रोड पर रमेश भाट लेकर के बंगले में जतिन कुछ महीने मेहमान बनकर रहा 70 की उम्र पार कर चुके रमेश भाटकर को आज भी जतिन की बातें याद है हम बचपन में गिरगाम में साथ-साथ खेलते थे व शुरुआत में ही दिखने में अच्छा था और एक्टर बनना चाहता था।
मुझे याद है एक बार उसने मुझे शर्माते हुए अपनी एक तस्वीर दिखाई और बड़े मासूम अंदाज में मुस्कुरा कर बोला कि उसने यह तस्वीर राज कपूर को भेजी है ताकि उसे राज कपूर की फिल्म में रोल मिल जाए शुरुआती महीने रमेश भाटकर के घर बिताने के बाद जतिन ने वाडिया कॉलेज के पास एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया और वहीं पर हो गया लेकिन अब भी पढ़ाई से ज्यादा ध्यान नाटकों और थिएटर पर रहता था ।
उसे बंबई की बहुत याद आने लगी पुण में जतिन दो साल ही रुक पाया और साल 1961 में बीए कोर्स के दो साल पूरे करने के बाद वह वापस बंबई चला गया और यहां उसने बीए थर्ड ईयर में केसी कॉलेज में दाखिला लिया बंबई का समंदर देखते ही उसे एहसास हो गया कि वह वापस घर लौट आया है बंबई की हवाएं जतिन की जानी पहचानी थी उसे यूं महसूस होता था जैसे वो यहां पर खुलकर सांस ले सकता है सपनों की उड़ान की भी यहां कोई हद नहीं थी जतिन जवान था अमीर था और उसका चेहरा नई उम्मीदों से दमक रहा था वो अपनी जिंदगी खुलकर जी रहा था।
दिन भर कॉलेज और थिएटर के आसपास चक्कर काटने के बाद अक्सर शाम को वह समंदर किनारे पहुंच जाता मगर दिल ही दिल में वह जानता था कि उसके सपने और पिता की उम्मीदें एक दूसरे से टकरा रही पिता चुन्नीलाल को उम्मीद थी कि पढ़ाई के बाद वह उनका बिजनेस संभालेगा उसका ख्वाब एक्टर बनने का था मगर पिता को यह बताने की हिम्मत अभी तक नहीं थी लेकिन एक सुबह आखिरकार उम्मीदों और हकीकत का आमना सामना हो ही गया रोज की तरह जतिन तैयार होकर घर से निकलने की तैयारी कर रहा था कि तभी पिता सामने आ गए और उन्होंने जतिन से पूछा बाहर जा रहे हो जी जतिन ने जवाब दिया पिता आज पूरी तैयारी करके आए थे फिर कुछ सोचकर बोले ये अच्छी बात है कि तुम अपनी छुट्टियां इतने अच्छे तरीके से प्लान कर रहे हो मुझे उम्मीद है कि जब वक्त आएगा तो तुम अपना करियर भी ठीक से प्लान करोगे तुम्हें पता तो है ना एक दिन तुम्हें काम भी करना पड़ेगा जितन ने धीरे से हां में गर्दन हिलाई और घर से बाहर आ गया पिता ने उसे रोका नहीं बड़ी सफाई से उन्होंने अपनी बात कह दी थी।
अब जतिन को अपनी राह खोजनी थी एक्टिंग की शुरुआत कैसे हो कहां से हो जतिन के पास कोई जवाब नहीं था उसके कॉलेज का एक दोस्त उन दिनों बंबई की आई एनटी ड्रामा कंपनी से जुड़ा था उस कंपनी के डायरेक्टर वी के शर्मा नाम के एक शख्स हुआ करते थे और वी के शर्मा के दोस्त मशहूर लेखक निर्देशक सागर सरहदी थे सागर सरहदी ने बाद में कभी-कभी सिलसिला चांदनी जैसी मशहूर फिल्में लिखी और बाजार जैसी फिल्म निर्देशित भीगी बंबई के अंधेरी के अपने पुराने ऑफिस में चाय की चुस्कियां के साथ उन सुनहरे दिनों को याद करते हुए एक बार सागर सरहदी ने बताया हमारे ग्रुप के सबसे ज्यादा अहम सदस्य वीके शर्मा ही थे व उत्तर प्रदेश से थे और उनका कद छोटा था लेकिन टैलेंटेड थे और टैलेंट जबरदस्त था व मल्टी टैलेंटेड थे नाटक लिखते थे निर्देशित करते थे उनमें अभिनय भी करते थे जतिन उनको अपना गुरु मानता था सागर सरहदी मुस्कुराते हुए बताते हैं कि उस दौर में वह इस नए लड़के जतिन को सीरियसली नहीं लेते थे।
हर शाम आईटी ड्रामा कंपनी के रिहर्सल के वक्त जतिन वहां पहुंच जाता और एक कोने में बैठकर नाटक की तैयारी कर रहे एक्टर्स को घूरता रहता उसे उम्मीद रहती थी कि शायद किसी दिन वीके शर्मा की नजर उस पर पड़े और उसे पहला ब्रेक मिल जाए इस इंतजार में कई महीने बीत गए एक दिन मंडली का एक एक्टर बीमार पड़ गया और कुछ दिन तक रिहर्सल में नहीं आया जब शो का वक्त नजदीक आया तो वीके शर्मा को फिक्र होने लगी उन्हें इस छोटे से रोल के लिए कोई एक्टर चाहिए था इसी दौरान उनकी निगाह जतिन पर गई जो रोज की तरह एक कोने में खड़ा बड़े ध्यान से रिहर्सल देख रहा था उन्होंने जतिन को बुलाया और पूछा क्या तुम ये छोटा सा रोल करोगे जतिन ने फौरन हामी भर दी उसका दिल जोरों से धड़क रहा था इतने दिन से वह इसी मौके की तलाश में तो था और व मौका वह रोल आज उसे मिल रहा था।
कुछ पलों के अंदर ही यह सब हो गया उन पलों में मैंने जैसे एक सरहद को पार कर लिया और उस दुनिया का हिस्सा बन गया जिसके सपने में अब तक देखा करता था लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि यह सब इतना मुश्किल है बाद के दिनों में राजेश खन्ना ने कहा इस नाटक का नाम था मेरे दे के गांव कुछ दिन बाद ही इसका मंचन नागपुर में होने वाला था जहां पर राज्य स्तर की एक थिएटर प्रतियोगिता थी उन दिनों जतिन के एक करीबी दोस्त थे हरिदत्त पंजाब के रहने वाले हरिदत्त भी उन दिनों ड्रामा कंपनी आई एनटी में बतौर एक्टर काम कर रहे थे और नाटक में हरिदत्त की भूमिका थी हरिदत्त बताते हैं कि वह 3 मई 1961 का दिन था तारीख इसलिए याद है क्योंकि इस नाटक के लिए मुझे बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला था मैंने दिमागी रूप से एक कमजोर आदमी का किरदार निभाया था और जतिन का रोल बहुत ही छोटा था उन्होंने एक दरबान का रोल किया था और मुझे याद है कि वह इतने नर्वस थे कि कांप रहे थे हरिदत्त बताते हैं कि पूरे नाटक में जतिन को सिर्फ एक लाइन बोलनी थी जी हुजूर साहब घर में हैं और इस छोटे से डायलॉग के लिए भी जतिन ने जमकर रिहर्सल की थी लेकिन जैसे-जैसे शो शुरू होने का समय नजदीक आ रहा था जतिन के पसीने छूट रहे थे पहली बार स्टेज पर इतने लोगों के सामने डायलॉग बोलने का ख्याल ही उसे बहुत नर्वस कर रहा था ।
आखिरकार शो शुरू हुआ और जल्दी वह घड़ी आ गई जब जतिन को आगे बढ़कर अपना डायलॉग बोलना था पहला डायलॉग सैकड़ों लोगों की आंखों के सामने अपने ऊपर जमी होने का डरा देने वाला एहसास दिल धड़कने की आवाज अब जतिन को अपने कानों तक महसूस हो रही थी वह आगे आया और फिर ठीक उसी पल उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया सालों बाद एक इंटरव्यू में उन पलों को याद करते हुए राजेश खन्ना ने कहा मेरी सारी मेहनत के बावजूद शो के दौरान मैं घबरा गया और अपनी लाइने भूल गया मैं शो में एक दरबान का रोल कर रहा था और मुझे बस एक लाइन बोलनी थी जी हुजूर साहब घर में हैं लेकिन घबराहट में मैंने कह दिया जी हुजूर जी साहब हुजूर घर में है शो के डायरेक्टर मेरी गलती पर बेहद नाराज हुए शो के बाद मैं किसी से मिले बिना वहां से भाग गया मतलब डायलॉग एक तरीके से चेंज हो गया जो डायलॉग था जी हुजूर साहब घर में हैं हड़बड़ाहट में कह दिया।
जी साहब हुजूर घर में हैं हरि याद करते हैं कि स्टेज से जाते वक्त जतिन की आंखों में आंसू गिर रहे थे एक इंटरव्यू में उस वाक्य का जिक्र करते हुए राजेश खन्ना ने भी माना कि उस रात उन्होंने बेहद अपमानित महसूस किया घर पहुंचकर जतिन किसी से नजरें नहीं मिला पा रहा था सीधा अपने कमरे में गया और लेकिन वहां सामने दीवार पर जैसे ही शीशे में खुद से नजरें मिली तो फौरन झुप गई आज पहली कोशिश में वह हारा हुआ महसूस कर रहा था वह फूट फूट कर रो पड़ा फिर उसने एक बाद एक के बाद एक विस्की के कई पैग उड़े ले ताकि जल्दी होश होकर उसे नींद आ जाए लेकिन उस रात नींद कोसों दूर थी शराब के सुरूर में भी हार बेतहाशा चुभती रही सालों बाद अपने इंटरव्यू में राजेश खंडा ने कबूल किया कि इस वाक्य में उनके आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया था
अगले दिन जतिन ने कि जतिन के कुछ दोस्तों ने उसकी हिम्मत बढ़ाने की कोशिश की लेकिन वह अपनी हार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था उसे अपने आप पर इतनी शर्म आ रही थी कि उसने रसल पर जाना तक छोड़ दिया हरिदत्त उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि बहुत सेंसिटिव था और हर बात को दिल से लगा लेता था मैं उससे कहता था कि यह सब तो होता रहता है त इतना रोता क्यों है लेकिन वह सबसे ज्यादा परेशान इस बात से था कि उसके पिता उस पर बिजनेस जवाइन करने का बहुत दबाव डाल रहे हैं जतिन में अब अपने पिता से आंख मिलाने की हिम्मत भी नहीं बची थी व क्या सोचेंगे सपने के लिए उनके काम को ठुकराया था अब एक लाइन भी ठीक से नहीं बोल पा रहा था कुछ दिन तक मुह छिपाने के बाद आखिरकार जतिन रिहर्सल पर वापस लौटा उसी थिएटर की दुनिया में अपने अहम को ताक पर रखकर बाद में यही नाटक मेरे देश के गांव कंपनी के सबसे कामयाब नाटकों में से एक रहा जतिन का आत्मविश्वास भी धीरे-धीरे वापस लौटने लगा सागर सरहदी उन दिनों को याद करते हुए एक बार बताते हैं कि हम उसे एक सीधे साधे लड़के के रूप में जानते थे जिसे एक्टिंग का बहुत शौक है उसने मेरे लिखे दो नाटकों में काम किया था पहला था मेरे देश के गांव और दूसरा नाटक था और शाम गुजर गई लेकिन इस एक्टर के तौर पर एक एक्टर के तौर पर न वके शर्मा गंभीरता से लेते थे और नहीं ही मैं मगर इसके बावजूद जतिन का हर एक दिन बस इसी कोशिश में गुजर रहा था कि थिएटर की दुनिया के लोग उसे एक गंभीर एक्टर के रूप में पह जाने देर रात तक वह एक थिएटर की मंडली के साथ वक्त बिताता यहां के माहौल में को एक अजीब सी कोशिश महसूस करता था ।
हर शाम थिएटर से जुड़े जानेमाने लोग यहां जमाते बैठक और इस महफिल में नई कहानियों खबरों और किरदारों पर चर्चा होती सिगरेट के धुए से भरे कमरों में न जाने कितने नए विचार रचनाएं और सपने जन्म लेते रचनात्मकता जगाने वाली ऐसी महफिलों से वो एक एक जुड़ाव सा महसूस करने लगा था इन शामों को वह कभी भूल नहीं पाया उसकी मेहनत भी अब रंग लाने लगी थी उसने इंटर कॉलेज थिएटर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया फिल्म निर्देशक रमेश तलवार बताते हैं कि हालांकि नाटकों में उसे बड़ा रोल नहीं मिल रहा था मगर वह किसी रोल के लिए ना नहीं करते थे वह कहते हैं कि मेरे चाचा सागर सरहदी के लिखे नाटक और डीए बुझ गए उन्होंने बड़े भाई का किरदार निभाया इस नाटक को वके ने निर्देशित किया था और यह पहला रोल था जिसमें उनके अभिनय की तारीफ हुई और एक कॉलेज फेस्टिवल में उन्हें अवार्ड भी मिला अवार्ड लेते समय उनके चेहरे पर खुशी देखने लायक थी इसके अलावा जतिन ने धर्मवीर भारती के मशहूर नाटक अंधा युग में भी एक छोटा सा रोल किया इस नाटक को बाद में थिएटर जगत की मशहूर शख्सियत सत्यदेव दुबे ने निर्देशित भी किया संघर्ष के उन दिनों में जतिन को करीब से जानने वाले लोग आज भी उनकी जाद मुस्कान को नहीं भूले सागर सरहदी तो एक इंटरव्यू में हंसते हुए कहते हैं कि उस लड़के में अजीब सा चांद था।
मुझे याद है कि हमारे ग्रुप में खूबसूरत लड़की थी गौरी हम सब उस पर लाइन मारते थे हमें तो कभी भाव नहीं मिलता था लेकिन राजेश खन्ना बस मुस्कुरा दे तो वह उसी से बात करने लगती थी उसकी जो मुस्कान थी उस बड़ी मासूमियत थी थिएटर के मंच पर तो हमें उसका चार्म नजर नहीं आता था मगर सिनेमा के पर्दे पर व मुस्कान उभर कर सामने आई और उसने कमाल कर दिया थिएटर ग्रुप में जतिन की पहचान अब धीरे-धीरे बनने लगी थी उसका आत्मविश्वास बढ़ता ही जा रहा था सपनों को पंख लग गए थे अब वह थिएटर में एक तरीके से थिएटर की जिंदगी से आगे बढ़कर फिल्मों के आसमान में उड़ना चाहता था और इस उड़ान की तैयारी में उसने अपनी तस्वीरों के साथ फिल्म निर्माताओं के दफ्तर के चक्कर लगाने शुरू कर दिए थे अब शामे थिएटर के रिहर्सल में और दिन फिल्मों में काम पाने की कोशिश में बीतने लगे तकरीबन इसी समय जतिन के पास थिएटर डायरेक्टर बी एस थापा का बुलावा आया थापा जतिन को लीड रोल में लेकर एक नाटक निर्देशित करना चाहते थे जतिन की खुशी का ठिकाना नहीं था अगले ही दिन बीएस थापा ने जतिन को गट्स रेस्टोरेंट में मिलने के लिए बुला लिया बंबई के चर्च गेट के पास बना गेलर्ड्स रेस्टोरेंट उन दिनों काफी मशहूर था ये एक महंगा रेस्टोरेंट था और जहां फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े जानेमाने नाम अक्सर नेटवर्किंग या मीटिंग करते नजर आते थे ।
इनमें कई निर्माता निर्देशक भी होते थे और यही वजह थी कि फिल्मों में काम पाने का अरमान लिए बहुत से स्ट्रगलर गैलस के आसपास फुटपाथ पर चक्कर लगाते पाए जाते एक स्ट्रगलर के तौर पर जतिन भी यहां अक्सर आता था और वह अक्सर अभिनेता सुनील दत्त निर्माता निर्देशक जे ओम प्रकाश जैसी शख्सियतों को उम्मीद भरी नजरों से देखता मगर कभी इन लोगों से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता ।
उस दिन जब जतिन बीएस थापा से मिलने गैलस पहुंचने ही वाला था कि उसकी नजर रेस्टोरेंट के बाहर खड़ी एक बेहद खूबसूरत लड़की पर पड़ी जतिन ने उस लड़की खासतौर पर उसके घने लहरदार बालों को बड़े ध्यान से देखा फिर ये लड़की रेस्टोरेंट के अंदर चली गई कुछ देर बाद जब वह खुद गैलस रेस्टोरेंट के अंदर दाखिल हुआ तो उसने देखा कि बीएस थापा के साथ वही लड़की बैठी है थापा ने उसे देखकर कहा आओ जतिन आओ इनसे मिलो यह इस नाटक में तुम्हारे हीरोइन अंजू महेंद्रु जतिन शर्मा ने एक तरीके से शर्मा करर शर्मा करर अपने खास अंदाज में व मुस्कुरा दिया नया नाटक था नई कहानी थी नई शुरुआत थी और अंजू महेंद्रु जो कि सालों तक राजेश खन्ना के आने वाले भविष्य का हिस्सा थी l