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कैसे अमिताभ बच्चन ने बचाई थी अमजद खान की जा!न? हादसे में बाल-बाल बचे थे ‘गब्बर सिंह’!

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अरे ओ साभा कितने आदमी थे रे। भारतीय सिनेमा का इतिहास इस एक डायलॉग के बिना अधूरा है। और विलेन का जिक्र तब तक मुकम्मल नहीं होता जब तक आंखों में वो क्रूरता, वो भयानक हंसी और गब्बर सिंह का वो खौफनाक चेहरा सामने ना आ जाए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पर्दे पर मासूमों का खून बहाने वाला, गालियां बकने वाला और इंसानी खोपड़ियों से खेलने वाला यह खूंखार डाकू असल जिंदगी में मुंबई यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र यानी फिलॉसफी में गोल्ड मेडलिस्ट था। क्या आप जानते हैं कि एक वक्त ऐसा भी आया था जब इस सुपरस्टार के लिए चाय इतनी बड़ी कमजोरी बन गई थी कि सेठ पर चाय की कमी होने पर वो खुद दो असली भैंस खरीद कर ले आया था और सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाला वो सच जब मौत इस अभिनेता के फेफड़ों को चीर कर अंदर घुस चुकी थी और अस्पताल के डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे तब बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी जान की बाजी लगाकर अपने इस जिगरी दोस्त को मौत के मुंह से बाहर निकाला था। आज की इस महा में हम भारतीय सिनेमा के सबसे महान खलनायक अमजद खान की जिंदगी के सबसे बड़े सबसे सनसनीखेज और पूरी तरह से अनसुने अध्यायों को खोलेंगे जिन्हें सुनकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। यह कहानी सिर्फ एक अभिनेता की नहीं है। यह कहानी है एक ऐसे फरिश्ते की जिसने विलेन का मुखौटा पहनकर दुनिया को एंटरटेन किया लेकिन पीठ पीछे एक ऐसा जीवन जिया जो किसी सूफी संत से कम नहीं था। इस वीडियो को एक सेकंड के लिए भी मिस मत कीजिएगा और अंत तक हमारे साथ बने रहिएगा क्योंकि इस दास्तान का हर एक किस्सा आपके दिल को छू जाएगा और आपको हैरान कर देगा। शुरुआत करते हैं उस दौर से जब निर्देशक रमेश सिप्पी और लेखक सलीम जावेद की जोड़ी भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी फिल्म शोले की बुनियाद रख रही थी। फिल्म की कहानी तैयार थी। हीरो हीरोइन तय थे। लेकिन फिल्म की जो सबसे मजबूत रीड थी यानी गब्बर सिंह का किरदार उसके लिए मेकर्स एक ऐसे चेहरे की तलाश में थे जो स्क्रीन पर आते ही दर्शकों के पसीने छुड़ा दे। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस कालजे किरदार के लिए भी अमजद खान मेकर्स की पहली पसंद दूर-दूर तक नहीं थे। रमेश सिप्पी ने गब्बर सिंह का खूंखार रोल सबसे पहले उस दौर के बेहद स्टाइलिश और डरावने विलेन डनियल डनोंगपा यानी डेनी को ऑफर किया था। डेनी ने जब स्क्रिप्ट सुनी तो वे भी इस रोल को करने के लिए बेहद रोमांचित थे। सब कुछ लगभग तय हो चुका था। लेकिन ऐन वक्त पर तारीखों का एक ऐसा पेंच फंसा जिसने इतिहास का रुख ही बदल दिया। डेनी ने पहले से ही दिग्गज अभिनेता फिरोज़ खान कीत्वाकांक्षी फिल्म धर्मात्मा साइन कर रखी थी और उस फिल्म की शूटिंग के लिए पूरी यूनिट को अफगानिस्तान के सुदूर इलाकों में जाना था।

डेनी ने रमेश सिप्पी से तारीखें बदलने की गुजारिश की, लेकिन शोले का शेड्यूल इतना कड़ा था कि तारीखें बदलना मुमकिन नहीं था। भारी मन से डेनी ने गब्बर सिंह का रोल ठुकरा दिया। इसके बाद रमेश सिप्पी की नजर एक थिएटर नाटक के दौरान लंबे चौड़े और गठीले बदन वाले अमजद खान पर पड़ी। किस्मत का खेल देखिए डेनी का अफगानिस्तान जाना अमजद खान के लिए बॉलीवुड के सिंहासन पर बैठने का रास्ता साफ कर गया। अगर डेनी ने वह फिल्म ना छोड़ी होती तो शायद दुनिया कभी उस गब्बर सिंह को देख ही नहीं पाती जिसे आज बच्चा-बच्चा जानती है जानता है। लेकिन रोल मिलना जितना आसान दिख रहा था उसे अपने पास बनाए रखना अमजद खान के लिए उनके लिए उतना ही बड़ा इम्तिहान साबित हुआ। जब सलीम जावेद की जोड़ी खासकर जावेद अख्तर ने अमजद खान का पहला स्क्रीन टेस्ट देखा और उनकी आवाज सुनी तो वह बुरी तरह भड़क गए। जावेद अख्तर का मानना था कि एक डाकू जो चंबल के बीहड़ों में रहता है जो आदमियों को गाजर मूली की तरह काटता है। उसकी आवाज में एक भारीपन, एक दहाड़ और एक कड़कड़ाहट होनी चाहिए। इसके विपरीत अमजद खान की आवाज थोड़ी पतली थी जिसे अंग्रेजी में सक्वी की वॉइस कहा जाता है। उनकी आवाज में वह पारंपरिक विलेन जैसी भारी गूंज नहीं थी। जावेद अख्तर ने रमेश सिप्पी से साफ कह दिया कि इस लड़के की आवाज में वह दम नहीं है जो गब्बर सिंह के किरदार को अमर बना सके। इसे तुरंत फिल्म से बाहर करो और किसी दूसरे भारी आवाज़ वाले एक्टर को ढूंढो। अमजद खान को जब यह पता चला, तो उनका दिल टूट गया। उन्हें लगा कि बिना काम शुरू किए ही उन्हें रिजेक्ट किया जा रहा है। लेकिन निर्देशक रमेश सिप्पी को अमजद की आंखों में एक अजीब सा पागलपन और क्रूरता नजर आ चुकी थी। उन्होंने जावेद अख्तर के विरोध को दरकिनार करते हुए अमजद खान पर एक बहुत बड़ा जुआ खेला। रमेश तिप्पी ने अमजद से कहा, आवाज को अपनी ताकत बनाओ। अमजद ने चंबल के डाकुओं पर लिखी किताबें पढ़ी। उनकी भाषा शैली सीखी और जब फिल्म रिलीज हुई तो उसी पतली ठंडी और धीमी आवाज में जब उन्होंने कहा यह हाथ मुझे दे दे ठाकुर तो पूरे सिनेमाघर में सन्नाटा पसर गया। जिस आवाज की वजह से उन्हें निकाला जा रहा था उसी लीक से हटकर आवाज ने गब्बर सिंह को बॉलीवुड के इतिहास का सबसे अनोखा और खौफनाक विलेन बना दिया। अमजद खान के जीवन में किस्मत के सितारे किस कदर दिलचस्प तरीके से घूम रहे थे। इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उनके जीवन के दो सबसे बड़े मोड़ एक ही दिन आए। साल 1973 की 20 सितंबर का वह ऐतिहासिक दिन अमजद खान कभी नहीं भूल सकते थे। एक तरफ वे पिछले कई महीनों से तंगहाली और संघर्ष के दौर से गुजर रहे थे। जेब में पैसे नहीं थे और घर में उनकी पत्नी शहला खान गर्भवती थी। अस्पताल का खर्चा उठाने तक के पैसे अमजद के पास मुश्किल से जमा हो पा रहे थे। उसी दिन दोपहर में रमेश सिप्पी ने उन्हें अपने ऑफिस बुलाया और उनके सामने शोले फिल्म का आधिकारिक कॉन्ट्रैक्ट रखा। अमजद खान ने कांपते हाथों से उस कागज पर दस्तखत किए जिससे उन्हें एडवांस के तौर पर कुछ रकम मिली। वे राहत की सांस लेकर अस्पताल पहुंचे ही थे कि कुछ ही घंटों बाद डॉक्टरों ने उन्हें खुशखबरी दी कि उनकी पत्नी ने एक बेहद स्वस्थ सुंदर बेटे को जन्म दिया है जिसका नाम बाद में शादाब खान रखा गया। अमजद खान अक्सर अपनी निजी महफिलों में मुस्कुराते हुए कहा करते थे कि मेरा बेटा शादाब अपने साथ साक्षात लक्ष्मी लेकर आया था। जिस दिन उसने इस दुनिया में कदम रखा, ठीक उसी दिन गब्बर सिंह का जन्म भी कागजों पर हो चुका था। एक पिता के लिए इससे बड़ी खुशी और इत्तेफाक क्या हो सकता है

कि उसके करियर की सबसे बड़ी कामयाबी और उसके जीवन की सबसे बड़ी व्यक्तिगत खुशी दोनों एक ही तारीख को भगवान ने उनकी झोली में डाल दी थी। फिल्म की शूटिंग शुरू हुई और सेट पर अमजद खान के कई रंग देखने को मिले। लेकिन उनकी एक आदत ऐसी थी जिससे पूरी यूनिट वाकिफ थी और वह थी उनकी चाय के प्रति बेइंतहा दीवानगी। अमजद खान आम इंसानों की तरह चाय नहीं पीते थे। वे एक तरह से टीहोलिक थे। शूटिंग के दौरान सुबह से लेकर रात तक उनके हाथ में चाय का कुल्हड़िया कप हमेशा नजर आता था। वे एक दिन में कम से कम 30 से 40 कप कड़क चाय पी जाते थे। एक बार का किस्सा है जब वे मुंबई के मशहूर पृथ्वी थिएटर में एक बहुत बड़े नाटक की रिहर्सल कर रहे थे। उस दौरान मुंबई में अचानक दूध की भारी किल्लत हो गई। हड़ताल और सप्लाई रुकने की वजह से थिएटर के कैंटीन वाले ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि दूध ना होने के कारण अब सेट पर चाय नहीं बन पाएगी। यह सुनते ही अमजद खान का मूड पूरी तरह खराब हो गया। वे रिहर्सल पर ध्यान नहीं दे पा रहे थे और उनका सिर फटने लगा था। उन्होंने कैंटीन वाले से कहा कि इसका क्या समाधान है? एक कैंटीन वाले ने मजाक में कह दिया कि सर अगर अपनी भैंस हो तो बात अलग है। बाजार में तो दूध नहीं मिलेगा। अमजद खान ने इस बात को इतनी संजीदगी से लिया कि उन्होंने अगले ही दिन अपने पैसों से दो तंदुरुस्त और दुधारू भैंसें खरीदी और उन्हें पृथ्वी थिएटर के पीछे बने तबेले जैसी जगह पर लाकर बंधवा दिया। उन्होंने साफ निर्देश दिए कि जब तक यहां शूटिंग और रिहर्सल चलेगी इन भैंसों का दूध सिर्फ और सिर्फ पूरी यूनिट की चाय के लिए इस्तेमाल होगा। सेठ पर मौजूद लोग हैरान थे कि एक कप चाय की खातिर कोई इंसान पूरी की पूरी भैंस खरीद सकता है। यह सिर्फ अमजद खान के ही बस की बात थी। लेकिन जिंदगी हमेशा इतनी खुशनुमा और मजेदार नहीं रहती। वक्त का एक क्रूर थपेड़ा अमजद खान का इंतजार कर रहा था। साल 1976 में जब शोले की सफलता के बाद अमजद खान का स्टारडम चरम पर था। वे प्रमोद चक्रवर्ती की फिल्म द ग्रेट गैंबलर की शूटिंग के लिए अपनी गाड़ी से मुंबई गोवा हाईवे के रास्ते गोवा जा रहे थे। रास्ते में उनकी गाड़ी का संतुलन बिगड़ा और एक बेहद दर्दनाक भयंकर कार एक्सीडेंट हो गया। टक्कर इतनी जोरदार थी कि गाड़ी के परखच्चे उड़ गए और स्टीयरिंग व्हील सीधे अमजद खान के सीने को चीरता हुआ उनके फेफड़े के अंदर घुस गया। उनकी छाती की 13 पसलियां टूट चुकी थी और वे खून से लथपथ बेहोशी की हालत में सड़क पर पड़े थे। उन्हें तुरंत गोवा के एक स्थानीय सरकारी अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने देखा कि उनके फेफड़ों में खून भर चुका है और अगर तुरंत ट्रैकियोस्टोमी नाम का एक बेहद जटिल सर्जिकल ऑपरेशन नहीं किया गया तो वे दम तोड़ देंगे। लेकिन कानूनन इतने बड़े और जानलेवा ऑपरेशन के लिए अमजद का कोई सगा संबंधी मौजूद नहीं था। ऐसे नाजुक और खौफनाक वक्त में उनके सबसे पक्के दोस्त और बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन जो दूसरी गाड़ी से वहीं से गुजर रहे थे, मसीहा बनकर अस्पताल पहुंचे। अमिताभ ने जब अपने दोस्त की ये हालत देखी, तो उनकी आंखें भर आईं। डॉक्टरों ने कहा कि अगर साइन करने में देर हुई तो अमजद नहीं बचेंगे। अमिताभ बच्चन ने बिना एक पल गवाए अपनी कानूनी जिम्मेदारी पर खुद को अमजद का भाई बताते हुए उन ऑपरेशन पेपर्स पर अपने सिग्नेचर कर दिए और डॉक्टरों से कहा कि चाहे जितने पैसे लगे मेरे भाई की जान बचनी चाहिए। अमिताभ के उस एक साहसी फैसले और दस्तखत ने अमजद खान को मौत के चंगुल से खींच निकाला था। इस एक्सीडेंट से अमजद खान की जान तो बच गई लेकिन इसने उनके शरीर और उनके आने वाले करियर को एक ऐसा जख्म दिया जिससे वे ताम्र उभर नहीं पाए। फिल्म शोले में जब आपने गब्बर सिंह को देखा होगा तो उनका शरीर काफी गठीला, फिट और एक फौजी की तरह मजबूत था। लेकिन इस भीषण एक्सीडेंट के बाद अमजद खान महीनों तक व्हीलचेयर और बेड पर रहे। उनके शरीर के अंदरूनी जख्मों को भरने के लिए डॉक्टरों को मजबूरन भारी मात्रा में स्टेरॉइड, पेनकिलर और तरह-तरह की हैवी दवाइयां देनी पड़ी। इन दवाओं का सीधा असर अमजद खान के मेटाबॉलिज्म पर पड़ा। उनका शरीर धीरे-धीरे फूलने लगा और पानी जमा होने के कारण उनका वजन बेकाबू तरीके से बढ़ने लगा। वे चाहकर भी कसरत नहीं कर सकते थे क्योंकि पसलियां और फेफड़े अभी भी कमजोर थे। कुछ ही सालों में वे बेहद भारी-भरकम और मोटे हो गए। इस मोटापे की वजह से उन्हें चलने फिरने और सांस लेने में तकलीफ होने लगी, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वे इसी भारी शरीर के साथ सेट पर आते थे और उसी दमदार आवाज में एक्टिंग करते थे। हालांकि दवाओं के इस भयानक साइड इफेक्ट ने उनकी उम्र को बहुत कम कर दिया था और वे चाहकर भी कभी अपने पुराने फिट स्वरूप में वापस नहीं लौट पाए जो उनके फैंस के लिए एक बेहद दुखद बात थी। प्यारे दोस्तों, अमजद खान की वह कौन सी फिल्म है

जिसे आप सबसे ज्यादा पसंद करते हैं? कमेंट में आपकी पसंदीदा फिल्म का नाम जरूर बताएं। साथ ही वह किरदार भी बताएं जिसमें आप उन्हें सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। अमजद खान को पर्दे पर देखकर लोग सोचते थे कि यह आदमी असल जिंदगी में भी अनपढ़, गवार और गुस्सैल स्वभाव का होगा क्योंकि उनका अभिनय इतना जीवंत होता था लेकिन आपको यह जानकर बेहद फक्र होगा कि अमजद खान बॉलीवुड के उस दौर के सबसे ज्यादा पढ़े लिखे और विद्वान अभिनेताओं में से एक थे। उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र यानी फिलॉसफी विषय में प्रथम श्रेणी से पोस्ट ग्रेजुएशन एमए की डिग्री हासिल की थी। वे सुकरात, प्लेटो, अरस्तु और शेक्सपियर जैसे दुनिया के महान विचारकों और लेखकों की थ्योरीज को जुबानी याद रखते थे। जब भी शूटिंग के बीच में उन्हें खाली समय मिलता था तो वे बाकी स्टार्स की तरह गसिप करने या ताश खेलने के बजाय सेट के एक कोने में बैठकर अंग्रेजी साहित्य, उर्दू शायरी या फारसी की कोई गंभीर किताब पढ़ते हुए नजर आते थे। उनकी अंग्रेजी, उर्दू और फारसी भाषा पर इतनी जबरदस्त पकड़ थी कि जब वे बोलना शुरू करते थे तो बड़े-बड़े डायरेक्टर्स और राइटर्स उनके ज्ञान के सामने पानी भरते नजर आते थे। वे अक्सर सेट पर जूनियर आर्टिस्ट और गरीब मजदूरों की आर्थिक मदद करते थे और उन्हें जीवन का दर्शन समझाते थे। पर्दे का क्रूर डाकू असल जिंदगी में एक बेहद शांत समझदार और संस्कारी फिलॉसफर था जो हर इंसान को बराबरी का सम्मान देता था। गब्बर सिंह के किरदार की दीवानगी का आलम इस कदर बढ़ चुका था कि इसने विज्ञापन की दुनिया के सारे पुराने नियम और कायदे तोड़ कर रख दिए। आज तक के इतिहास में हमेशा देखा गया है कि किसी भी प्रोडक्ट खासकर बच्चों के खानेपीने की चीजों के विज्ञापन के लिए हमेशा किसी संस्कारी हीरो, चुलबुली हीरोइन या किसी प्यारे कार्टून का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन गब्बर सिंह की लोकप्रियता इतनी व्यापक थी कि भारत की सबसे बड़ी बिस्कुट कंपनी Parle जी ने एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी दांव खेला। उन्होंने इतिहास में पहली बार एक खूंखार विलेन को बच्चों के बिस्कुट के विज्ञापन के लिए साइन किया। अमजद खान ने बाकायदा गब्बर सिंह के उसी डरावने गेटअप में हाथ में कोड़ा लेकर Parleg बिस्कुट का टीवी और अखबारों के लिए विज्ञापन शूट किया। विज्ञापन का जो मुख्य पंच लाइन डायलॉग था वो बेहद मजेदार और सुपरहिट रहा। अरे ओ साभा गब्बर की असली पसंद। Parleg बिस्कुट जब देश के बच्चों ने अपने सबसे पसंदीदा बिस्कुट के पैकेट पर और टीवी पर उस डाकू को बिस्कुट खाते और उसकी तारीफ करते देखा तो Parle जी की बिक्री ने आसमान छू लिया। किसी विलेन का बच्चों के ब्रांड का चेहरा बनना उस दौर की सबसे बड़ी सबसे ज्यादा चर्चित और आज तक की सबसे अनोखी कहानी मानी जाती है। जिसने साबित कर दिया कि अमजद खान का गब्बर सिंह सिर्फ एक किरदार नहीं ब

ल्कि एक संस्कृति बन चुका था। अमजद खान आज भले ही हमारे बीच नहीं है। साल 1992 में महज 51 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका आकस्मिक निधन हो गया था। लेकिन उनकी अदाकारी, उनका वो गब्बर सिंह का अंदाज, उनकी चाय के प्रति वह दीवानगी और अमिताभ बच्चन के साथ उनकी वो अटूट और बेमिसाल दोस्ती आज भी बॉलीवुड के गलियारों में जिंदा है। वे एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने विलेन के किरदार को नायक से भी बड़ा बना दिया और अपनी असल जिंदगी को बेहद सादगी और ज्ञान के साथ जिया। कम लोग जानते हैं कि अमजद खान को अभिनय की यह बेमिसाल कला असल में विरासत में मिली थी। उनके पिता जकारिया खान जिन्हें सिनेमा की दुनिया में लोग जयंत के नाम से जानते थे। अपने जमाने के बेहद मशहूर और कद्दावर अभिनेता थे। जयंत साहब ने अमर, मधुमती, सन ऑफ इंडिया और लीडर जैसी कई क्लासिक फिल्मों में अपनी कड़क आवाज और दमदार अभिनय से विलेन और चरित्र अभिनेताओं के किरदारों को हमेशा के लिए जीवंत किया था। अमजद खान बचपन से ही अपने पिता को फिल्मों के सेट पर काम करते, संवाद बोलते और निर्देशकों के साथ शॉट की बारीकियों पर चर्चा करते हुए देखा करते थे। पिता का यही गहरा प्रभाव था कि अमजद खान के भीतर बचपन से ही न केवल एक महान अभिनेता बल्कि एक बेहतरीन फिल्म निर्देशक बनने का सपना भी धीरे-धीरे पल रहा था। उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों से ही थिएटर की ओर रुख कर लिया था और वहां कई नाटकों का सफल निर्देशन करना शुरू कर दिया था। यही वजह थी कि फिल्मों में कदम रखने से बहुत पहले ही वे कैमरे के पीछे की तकनीकी भाषा, लाइट्स और फ्रेमिंग को पूरी तरह से समझ चुके थे। जब साल 1975 में वे शोले के गब्बर सिंह बनकर रातों-रात पूरे देश के सबसे बड़े सुपरस्टार बने, तब भी उनके अंदर छुपा हुआ

वह फिल्म मेकर कभी शांत नहीं बैठा। वे अक्सर फिल्म की शूटिंग के दौरान सेट पर डायरेक्टर रमेश सिप्पी के शॉर्ट कंपोजिशन और लाइटिंग के तरीकों को बहुत ध्यान से देखा करते थे। आखिरकार अभिनय के शिखर पर पहुंचने के बाद उन्होंने अपने इसी पुराने और अधूरे सपने को पूरा करने का पक्का फैसला किया और कैमरे के पीछे की असली कमान संभाल ली। उन्होंने साल 1983 में आई फिल्म चोर पुलिस हिस्से बॉलीवुड में बतौर निर्देशक कदम रखा जिसमें उन्होंने अपने जिगरी दोस्त अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे दिग्गज सितारों को डायरेक्ट किया था। इसके बाद साल 1985 में उन्होंने अमीर आदमी गरीब आदमी नाम की एक बेहद संजीदा और सामाजिक फिल्म का निर्देशन भी किया था। दिलचस्प बात यह है कि जब वे किसी फिल्म का निर्देशन करते थे तो वे पर्दे वाले गब्बर सिंह के रौब और गुस्से को पूरी तरह से भूल जाते थे। सेठ पर मौजूद तमाम क्रू मेंबर्स बताते थे कि वे बेहद शांत मददगार, मिलनसार और एक अनुशासित निर्देशक के रूप में काम संभालते थे। वे हर कलाकार को कैमरे के सामने खुलकर परफॉर्म करने की पूरी आजादी देते थे क्योंकि वे खुद एक बेहतरीन अभिनेता थे और कलाकारों की मानसिक स्थिति को बहुत अच्छी तरह समझते थे। इस तरह अमजद खान ने न सिर्फ अपने पिता जयंत साहब के अभिनय की शानदार विरासत को आगे बढ़ाया और उसे भारतीय सिनेमा में एक नए मुकाम पर पहुंचाया बल्कि निर्देशन के मैदान में उतर कर दुनिया को यह भी साबित कर दिया कि वे सिर्फ एक शानदार विलेन ही नहीं थे बल्कि सिनेमा की बेहद गहरी समझ रखने वाले एक उम्दा और दूरदर्शी फिल्मकार भी थे। दोस्तों अमजद खान का कौन सा किरदार है जो आपका सबसे ज्यादा पसंदीदा है? कमेंट में आप जरूर बताएं जो आपका सबसे ज्यादा पसंदीदा है। हमारे YouTube चैनल माय मेमोरी से जुड़ने के लिए आप सभी दोस्तों का दिल से धन्यवाद। मिलेंगे। अगले कलाकार की नई अनसुनी कहानी के साथ सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।

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