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कैसे राजीव गांधी से दोस्ती अमिताभ बच्चन के करियर पर पड़ी भारी?

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सोचिए एक ऐसी फिल्म जिसमें अमिताभ बच्चन जैसा सुपरस्टार हो। कहानी में भ्रष्टाचार हो, राजनीति हो, मीडिया का खेल हो और आम आदमी की आवाज। ऊपर से फिल्म के डायलॉग इतने दमदार हो कि आज भी उन्हें सुनकर लगे कि इन्हें आज के दौर के लिए ही लिखा गया है। फिर भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर टिक ही ना पाए। ऐसा क्या था इस फिल्म में कि क्रिटिक्स ने तो तारीफ की लेकिन दर्शकों ने इसे ठुकरा दिया। यह कहानी है 1989 में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन की फिल्म मैं आजाद हूं। और दिलचस्प बात यह है कि फिल्म की असफलता सिर्फ इस कहानी से जुड़ी नहीं थी। इसके पीछे अमिताभ बच्चन की बदलती हुई जिंदगी, उनका गिरता हुआ स्टारडम और उस समय के दर्शकों की उनसे जुड़ी उम्मीदें भी थी। 80 के दशक के बीच तक अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे बन चुके थे। लेकिन 1984 में उन्होंने एक ऐसा फैसला

लिया जिसने उनकी जिंदगी और करियर दोनों की ही दिशा बदल दी। अपने करीबी दोस्त राजीव [संगीत] गांधी के आग्रह पर अमिताभ ने राजनीति में कदम रखा और इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा। उन्होंने चुनाव जीत भी लिया। लेकिन राजनीति में लोकप्रियता हमेशा ताकत नहीं होती। अमिताभ पर लगातार तरह-तरह के आरोप और खबरें सामने आने लगी। फिर वो फफोर्स विवाद में उनका नाम भी चर्चा में आया। बाद में उन्हें इस मामले में क्लीन चिट तो मिल गई लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था। 1987 में उन्होंने राजनीति छोड़ दी। अब अमिताभ को वापस वही करना था जिसमें वह सबसे मजबूत थे। फिल्में लेकिन एक समस्या थी। उनकी लोकप्रियता अभी भी बहुत बड़ी थी। मगर उनके बारे में जनता की धारणा पहले जैसी नहीं रही। और शायद इसी वजह से उन्हें एक ऐसी फिल्म की जरूरत महसूस [संगीत] हुई जो सिर्फ एक कमबैक ना हो बल्कि अमिताभ बच्चन की बदली हुई छवि का जवाब भी हो और फिर पैदा हुआ आजाद।

अमिताभ ने जावेद अख्तर से एक अलग तरह की कहानी लिखने को कहा। ना कोई साधारण बदला ना कोई गुंडों से लड़ता हुआ हीरो ना वही पुराना मसाला। इसके बजाय कहानी बनी एक ऐसे आदमी की जो शुरुआत में अस्तित्व में ही नहीं था। एक पत्रकार अपनी नौकरी और अखबार की बिक्री बचाने के लिए आजाद नाम के एक काल्पनिक व्यक्ति की कहानी लिख देती है। कहा जाता है यह आदमी देश की गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीति से इतना परेशान है कि वह आत्महत्या करने वाला है। लेकिन एक झूठी खबर धीरे-धीरे पूरे देश में सनसनी बन जाती है। अखबार को डर लगता है कि कहीं लोगों को सच्चाई पता ना चल जाए। इसीलिए एक बेरोजगार आदमी को पैसे देकर आजाद बना दिया जाता है। लेकिन यहां कहानी एक दिलचस्प मोड़ लेती है। जो आदमी शुरुआत में सिर्फ आजाद होने का नाटक कर रहा था, वह धीरे-धीरे सच में आजाद के विचारों पर विश्वास करने लगता है और फिर वह उसी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो जाता है

जिसने उसे पैदा किया था। कहानी शानदार थी, लेकिन यही समस्या बन गई। फिल्म अपने समय की आम अमिताभ फिल्मों से बिल्कुल अलग थी। उस दौर में अमिताभ बच्चन का मतलब था गुस्सा, एक्शन, बदला, [संगीत] हीरो का जीतना। दर्शक उन्हें पर्दे पर खलनायकों की धुनाई करते देखना चाहते थे। लेकिन यहां अमिताभ के हाथ में बंदूक से ज्यादा ताकत उनके शब्दों में थी। फिर सिस्टम से मुक्कों से नहीं सवाल पूछकर लड़ रहे थे। और शायद 1989 की मास ऑडियंस इसके लिए तैयार नहीं थी। दर्शक थिएटर में अमिताभ बच्चन को देखने गए थे। [संगीत] लेकिन उन्हें मिला एक गंभीर, विचारशील और राजनीतिक किरदार। फिल्म में वह पारंपरिक हीरो जैसा व्यवहार ही नहीं करता। वह किसी लड़की को गुंडों से बचाकर गाना नहीं गाता। वह दर्जनों लोगों को अकेले नहीं पीटता। उसका सबसे बड़ा हथियार है उसकी आवाज। और उस समय की कमर्शियल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में यह बहुत बड़ा रिस्क था। फिल्म दर्शकों को मनोरंजन से ज्यादा सवाल देती थी।

फिल्म के कई संवाद सीधे व्यवस्था पर चोट करते थे। गरीबों के नाम पर आने वाला पैसा रास्ते में ही खत्म हो जाना, चुनाव में जनता से किए जाने वाले वादे, राजनीति और मीडिया का गठजोड़ और आम आदमी को सिर्फ एक वोट समझने वाली व्यवस्था। आज ये विषय बेहद परिचित लगते हैं। लेकिन उस समय एक अमिताभ बच्चन फिल्म में इतने गंभीर राजनीतिक सवाल देखना दर्शकों के लिए असामान्य था। फिल्म का अंत भी पारंपरिक हिंदी फिल्मों जैसा नहीं था। आजाद अपने संघर्ष की कीमत अपनी जान देकर चुकाताता है। आज के नजरिए से देखें तो यह एक शक्तिशाली और भावनात्मक अंत है। लेकिन उस समय के दर्शकों के लिए अमिताभ बच्चन का मर जाना लगभग अस्वीकार्य था। जिस सुपरस्टार को उन्होंने वर्षों तक जीतते देखा था उसे हारते हुए देखना उन्हें पसंद नहीं आया। और फिर फिल्म पर लगा कॉपीराइट का ठब। फिल्म की कहानी अमेरिकी फिल्म मीट जॉन डो से प्रेरित थी। मूल कहानी में भी मीडिया द्वारा एक काल्पनिक आम आदमी को जनता का नायक बना देने का विचार था और फिल्म के खिलाफ यह धारणा बनने लगी कि अमिताभ अपनी छवि सुधारने के लिए किसी विदेशी फिल्म का सहारा ले रहे हैं। फिर भी फिल्म में कुछ ऐसा था जो आज भी याद रह गया।

फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हार गई लेकिन उसके विचार नहीं हारे। आज जब हम फेक नैरेटिव, मीडिया की ताकत, राजनीतिक प्रचार और भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो मैं आजाद हूं की कहानी कहीं ज्यादा समझ आती है। एक झूठी खबर से पैदा हुआ किरदार जनता का हीरो बन जाता है। मीडिया उसे बनाता है। राजनीति उसका इस्तेमाल करना चाहती है और जब वह सिस्टम के खिलाफ खड़ा होता है तो वही लोग उसे खत्म करने लगते हैं। जिस फिल्म को उसके दौर ने रिजेक्ट कर दिया वही फिल्म समय बीतने के साथ ज्यादा प्रासंगिक होती चली गई। हर फ्लॉप फिल्म खराब नहीं होती। कुछ फिल्में [संगीत] बस इतनी जल्दी आ जाती हैं कि उनका समय उन्हें समझ ही नहीं पाता। और मैं आजाद हूं शायद उन्हीं फिल्मों में से एक थी। आपने यह फिल्म देखी है? [संगीत] अगर देखी है तो बताइए क्या आपको भी लगता है कि मैं आजाद हूं अपने समय से आगे थी? और अगर अभी तक आपने यह फिल्म नहीं देखी तो शायद इस बार इसे अमिताभ बच्चन की फिल्म समझकर नहीं बल्कि एक ऐसे सवाल की तरह देखिए जो आज भी हमारे सामने खड़ा है।

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