अगर कल आपके हाथ में ₹10 का नोट आए और वह पानी में भीगने के बाद भी बिल्कुल ठीक निकले तो डोंट बी सरप्राइज़्ड। भारत एक बार फिर प्लास्टिक नोट्स की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन इस बार खबर सिर्फ इतनी नहीं है कि नोट कागज की जगह प्लास्टिक का होगा। जिस कंपनी को भारत के लिए प्लास्टिक बनाना है उससे क्या कहा गया है कि चीन या पाकिस्तान में आपका कोई काम है तो भारत वाला काम उससे पूरी तरह अलग रखिए।
वहां से कच्चा माल मत लाइए और जो पॉलीमर आप हमें देंगे उसमें जानवरों की चर्बी यानी एनिमल टैलो या उसका डीएनए तक नहीं होना चाहिए। ₹10 के नोट की कहानी चीन पाकिस्तान और जानवरों की चर्बी तक कैसे पहुंच गई? इंडियन एक्सप्रेस की ऋतू सरन की रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई की सब्सिडियरी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड यानी बीआरबी एन एमपीएलने जुलाई में ग्लोबल एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट निकाला था। मतलब अभी यह देखा जा रहा है कि कौन-कौन सी कंपनियां भारत को सिक्योरिटी फीचर वाला पॉलीमर दे सकती हैं।
पॉलीमर एक तरह का प्लास्टिक होता है जिससे वो नोट बनते हैं। 18 अगस्त तक बड मांगी गई थी और कम से कम तीन खिलाड़ी सामने आए हैं। भारत की कॉस्मो फर्स्ट जिसने ब्रिटेन की डी लार रू को टेक्निकल पार्टनर बताया है। ऑस्ट्रेलिया की सीसीएल सिक्योर और वियतनाम की क्यू एंड टी हाईटेक पॉलीमर कंपनी। अभी किसी को फाइनल कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिला है। पहले सैंपल टेस्ट होंगे फिर पास होने वाली कंपनियां फाइनल टेंडर की रेस में जाएंगी। इतनी कड़ी शर्तें इसलिए क्योंकि कंपनी कोई नॉर्मल प्लास्टिक नहीं दे रही। जो आप और हम पेन में या शैंपू के बॉर्डर में देखते हैं.
वैसा नहीं होगा। वह नोट किसी डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड की तरह सख्त भी नहीं होगा। वो पूरी तरह मुड़ जाएगा जैसे कागज के नोट मुड़ जाते हैं। यही पॉलीमर भारतीय करेंसी का बेस बनेगा और इसमें क्लियर विंडो, मैटेलिक नंबर, मैग्नेटिक फीचर, शैडो इमेज जैसे सिक्योरिटी एलिमेंट्स होंगे। इसलिए कंपनियों से इंटीग्रिटी पैक्ट, कॉन्फिडेंशियलिटी कॉन्ट्रैक्ट और यह सब अंडरटेिंग्स मांगी गई हैं कि चीन और पाकिस्तान वाला ऑपरेशन भारत के काम से फायर वॉल रहे। मतलब भारतीय नोट से जुड़ा डाटा, लोग और सप्लाई चेन वहां के सिस्टम से एकदम अलग रहे अब एनिमल टैलो वाली शर्त सुनकर लगेगा कि नोट में जानवरों की चर्बी कौन डालता है। ब्रिटेन में 2016 में इसी बात पर विवाद हुआ था।
पता चला कि वहां के 5 पाउंड्स पॉलीमर नोट के बेस मटेरियल की शुरुआती मैन्युफैक्चरिंग में बहुत थोड़ी मात्रा में टैलो से निकला पदार्थ इस्तेमाल किया गया था। धार्मिक और नैतिक आपत्तियां हुई थी। भारत इसलिए शुरुआत में ही सर्टिफिकेशन मांग रहा है कि उसके पॉलीमर में एनिमल टैलो या उसका डीएनए नहीं होना चाहिए और प्लास्टिक नोट कोई नया आईडिया नहीं है। ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में पहला पॉलीमर बैक नोट जारी किया था।
1996 तक उसकी पूरी नोट सीरीज पॉलीमर पर आ गई। [संगीत] आज 50 से ज्यादा देश किसी ना किसी रूप में पॉलीमर नोट इस्तेमाल कर चुके हैं। ब्रिटेन, कनाडा, न्यूजीलैंड। उसमें ये सब चीजें बहुत नॉर्मल हैं। एशिया में देखें तो सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम, थाईलैंड भी अलग-अलग डिनोमिनेशंस में पॉलीमर करेंसी का इस्तेमाल करते हैं। यानी भारत इस टेक्नोलॉजी में जल्दी नहीं काफी देर से आ रहा है। पर फायदा क्या है? सबसे बड़ा फायदा है लाइफ। पॉलीमर नोट पानी और गंदगी को कागज की तरह सोखता नहीं है। जल्दी फटता नहीं है। पेपर नोट से कई गुना ज्यादा चल सकता है। नकली नोट बनाना भी मुश्किल होता है क्योंकि पारदर्शी विंडो और दूसरे सिक्योरिटी फीचर कॉपी करना आसान नहीं होते।
शायद इसीलिए शुरुआत ₹500 से नहीं हो रही है। ₹10 और ₹20 के नोट से भारत में यह एक्सपेरिमेंट शुरू हो रहा है। छोटे नोट सबसे ज्यादा हाथ बदलते हैं और जल्दी खराब भी होते हैं। सरकार लोकसभा में बता चुकी है कि ट्रायल के लिए ₹10 के 100 करोड़ और ₹20 के 100 करोड़ पॉलीमर नोट्स का प्रस्ताव मंजूर किया गया है। यानी फेस वैल्यू में ₹3000 करोड़। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कागज के नोट बंद होने वाले हैं। अभी सिर्फ फील्ड ट्रायल है और सरकार ने साफ कहा है कि पेपर करेंसी को पूरी तरह बदलने का कोई फैसला नहीं हुआ है और भारत ये कोशिश पहली बार नहीं कर रहा है। 2009 के आसपास भी आरबीआई ने ₹10 के प्लास्टिक नोट्स के लिए एक बड मांगी थी।
इन्हें कोच्ची, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर में टेस्ट करना था ताकि अलग-अलग मौसम में देखा जा सके कि नोट टिकता कितना है। लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा था। आरबीआई ने बाद में कहा कि कुछ टेक्निकल दिक्कतें सामने आ रही थी। अब फिर से एक्सपेरिमेंट शुरू होने जा रहा है। तो असली कहानी सिर्फ प्लास्टिक नोट आ रहा है या नहीं है।
कहानी यह है कि ₹10 के एक छोटे नोट के पीछे कितनी बड़ी सिक्योरिटी चेन है? मटेरियल कौन बनाएगा? उसका चाइना पाकिस्तान से क्या कनेक्शन है? उसमें कौन सा मटेरियल यूज़ हुआ है? भारत के मौसम में टिकेगा या नहीं? और क्या वो कागज के नोट से बेहतर साबित होगा? इन टेस्ट्स में पास हुआ तब अगली बार छुट्टे में मिला 10 का नोट शायद कागज का नहीं पॉलीमर