[संगीत] सिर्फ ₹3000 के लिए कोई इतनी मुश्किल दौड़ क्यों लगाएगा? क्योंकि इस मां के लिए ₹3000 उसकी बेटियों की पढ़ाई का जुगाड़ है। इस मां के पैरों में जूते नहीं थे, लेकिन रुकने का कोई ऑप्शन भी नहीं था। चप्पल फिसल रही थी, लेकिन उसकी बेटियों के सपने नहीं फिसलने चाहिए थे। इसलिए उसने चप्पल हाथ में ली और नंगे पैर दौड़ पड़ी। यह कोई फिल्म का सीन नहीं है। यह महाराष्ट्र के बीड़ जिले के [संगीत] अंबाजोगाई की रहने वाली 47 साल की रमाबाई रणवीर हैं। और यह जो दौड़ आप देख रहे हैं, यह सिर्फ एक मैराथन नहीं थी।
यह एक मां की दौड़ थी [संगीत] अपनी बेटियों के भविष्य के लिए। रमाबाई के सामने युवा रनर्स थे। कई लोग ट्रैक सूट और स्पोर्ट शूज पहन कर आए [संगीत] थे और दूसरी तरफ थी रमाबाई साधारण सी साड़ी में पैरों में चप्पल। लेकिन शायद वहां मौजूद किसी को अंदाजा नहीं था कि [संगीत] कुछ देर बाद यही महिला सबको पीछे छोड़ने वाली है।
मैथन शुरू हुई रमाबाई भी दौड़ने लगी लेकिन कुछ दूरी के बाद उनकी चप्पलें फिसलने लगी। अब उनके पास दो रास्ते थे। या तो रुक जाएं या फिर चप्पल उतार दें। रमाबाई ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने चप्पल हाथ में ली और नंगे पैर दौड़ने लगी। साड़ी संभालते हुए, सड़क पर दौड़ते हुए और एक-एक करके बाकी लोगों को पीछे छोड़ते हुए रमाबाई फिनिशिंग लाइन तक पहुंच गई और उन्होंने मैराथन जीत ली। [संगीत] इस जीत के लिए उन्हें मिले ₹3000 मात्र 3000। किसी के लिए शायद यह रकम बहुत बड़ी ना हो लेकिन रमाबाई के लिए यह
[संगीत] सिर्फ ₹3000 नहीं थे। यह उनकी बेटियों की पढ़ाई के लिए थे। उनके सपनों के लिए थे। उनके भविष्य के लिए थे। रमाबाई की जिंदगी आसान नहीं रही। रिपोर्ट्स के मुताबिक पति के निधन के बाद दोनों बेटियों [संगीत] की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। वह अंबा जोगाई की एक एकेडमी में खाना बनाने का काम करती हैं। [संगीत] दिन भर मेहनत घर की जिम्मेदारी और सबसे बड़ी चिंता दो बेटियों का भविष्य। उनकी एक बेटी बैंकिंग एग्जाम्स की [संगीत] तैयारी कर रही है। जबकि दूसरी बेटी पुलिस भर्ती की तैयारी में लगी है। यानी मां के सामने सिर्फ आज का खर्च नहीं था।
उसे अपनी बेटियों का आने वाला कल भी बनाना था। और शायद यही वो चीज थी जो रमाबाई को बाकी रनर से अलग बना रही थी। बाकी लोग शायद एक रेस दौड़ रहे थे। लेकिन रमाबाई अपने बच्चों के लिए दौड़ रही थी। बाकी लोगों के पैरों में जूते थे। रमाबाई के पैरों में मजबूरी थी। बाकी लोगों के सामने फिनिशिंग लाइन थी। रमाबाई के सामने बेटियों का भविष्य था। और शायद इसलिए जब चप्पल ने उनका साथ छोड़ा तो उन्होंने चप्पल छोड़ दी [संगीत] लेकिन दौड़ना नहीं छोड़ा। महाराष्ट्र के अंबा जोगाई में हुई इस रेस [संगीत] में रमाबाई ने फर्स्ट पोजीशन हासिल की और उनकी यह कहानी अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। लेकिन इस वीडियो की सबसे बड़ी बात शायद [संगीत] उनकी जीत नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि एक मां अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकती है। लेकिन कभी-कभी कोई कहानी सामने आती है जो इस बात को सिर्फ एक लाइन नहीं रहने देती उसे सच साबित कर देती है। इस वीडियो पर आपकी राय क्या है? हमें कमेंट करके बताइए। बाकी अपडेट्स के लिए आप खबर गांव देखते रहिए।