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गजल गायक जगजीत और चित्रा सिंह ने जब बेटे बेटी की मौत के बाद छोड़ दिया था गाना!

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भारतीय संगीत की दुनिया में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की जोड़ी सिर्फ एक मशहूर गजल जोड़ी नहीं थी। बल्कि दो ऐसी आवाजों का मिलन थी जिन्होंने लाखों दिलों को मोहब्बत, जुदाई और दर्द का एहसास कराया। लेकिन शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि इन दोनों की अपनी जिंदगी में दर्द इतना गहरा था कि उनकी आवाजों में महसूस होने वाली उदासी उनकी निजी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। जगजीत सिंह औरित्रा सिंह ने साथ मिलकर संगीत की दुनिया में एक अलग मुकाम बनाया। दोनों की आवाज जब एक साथ गूंजती थी तो श्रोता भावुक हो जाते थे। लेकिन 1990 में उनकी जिंदगी में ऐसा तूफान आया जिसने इस खूबसूरत जोड़ी को भीतर तक तोड़ दिया। उनका इकलौता बेटा विवेक सिंह एक सड़क दुर्घटना में दुनिया छोड़ गया। उस समय विवेक की उम्र करीब 20 साल थी। 27 जुलाई 1990 का दिन इस परिवार के लिए कभी ना भूल पाने वाला दिन बन गया। बेटी की मौत ने छीन ली चित्रा सिंह की आवाज। विवेक की मौत की खबर ने जगजीत और चित्रा सिंह को अंदर से हिला दिया। जिस घर में संगीत की आवाज गूंजती थी, वहां अचानक सन्नाटा छा गया। एक मां के लिए अपने जवान बेटे को खोना कितना बड़ा सदमा होता है। इसे शब्दों में बयां करना शायद संभव नहीं। चित्रा सिंह इस हादसे के बाद इतनी टूट गई कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से गाना लगभग पूरी तरह छोड़ दिया। उन्होंने संगीत और मंच से दूरी बना ली और धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से भी पीछे हट गई।

जगजीत सिंह भी इस सदमे से अछूते नहीं थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में अपने बेटे की मौत को ऐसी त्रासदी बताया था जिससे उभरना बेहद मुश्किल था। लेकिन उन्होंने अपने दर्द को संगीत में ढालने की कोशिश की। उनके लिए संगीत सिर्फ पेशा नहीं रहा बल्कि अपने दुख को सहने का एक माध्यम बन गया। चिट्ठी ना कोई संदेश और बेटे की याद। जब भी जगजीत सिंह का गीत चिट्ठी ना कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए सुनाई देता है तो बहुत से लोगों को विवेक की याद से जुड़ी उनकी कहानी याद आती है। यह गीत 1998 की फिल्म दुश्मन के लिए जगजीत सिंह ने गाया था। गीतकार आनंद बख्शी और संगीतकार उत्तम सिंह की इस रचना ने लोगों के दिलों में गहरी जगह बनाई। हालांकि यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है। कई वर्षों से यह कहा जाता है कि यह गीत जगजीत सिंह ने अपने बेटे विवेक की याद में गाया था। लेकिन उपलब्ध विश्वसनीय स्रोतों में इस बात की पुष्टि नहीं मिलती कि आनंद बख्शी ने गीत विशेष रूप से विवेक के लिए लिखा था या जगजीत सिंह ने इसे आधिकारिक रूप से अपने बेटे को समर्पित बताया था। यह गीत विवेक की मौत के लगभग 8 साल बाद आया था। फिर भी जगजीत सिंह की आवाज में मौजूद दर्द ने लोगों को इस गीत को उनके निजी दुख से जोड़ने पर मजबूर कर दिया। जब वह गाते थे चिट्ठी ना कोई संदेश तो ऐसा लगता था जैसे कोई पिता अपने उस बच्चे को पुकार रहा हो जो हमेशा के लिए दूर चला गया है। शायद यही वजह है कि यह गीत केवल एक फिल्मी गीत नहीं रहा।

यह उन तमाम लोगों की आवाज बन गया जिन्होंने अपने किसी प्रियजन को खोया था। जगजीत लौटे लेकिनित्रा कभी पहले जैसी नहीं हुई। विवेक की मौत के बाद दोनों ने कुछ समय के लिए संगीत से दूरी बना ली थी। जगजीत सिंह ने धीरे-धीरे खुद को संभाला और फिर संगीत की दुनिया में लौट आए। उन्होंने अपने दर्द को अपनी रचनात्मकता की ताकत बना लिया। लेकिन चित्रा सिंह के लिए यह वापसी आसान नहीं थी। उन्होंने गायकी से दूरी बनाए रखी। एक समय जो आवाज जगजीत सिंह के साथ मिलकर गजल की दुनिया में जादू पैदा करती थी, वह अचानक खामोश हो गई। दोनों के रिश्ते को लेकर भी इस दौरान कई तरह की अफवाहें सामने आई। लेकिनित्रा सिंह ने बाद में ऐसी बातों को खारिज कर दिया। असल समस्या उनके बीच प्रेम की कमी नहीं बल्कि एक ऐसी साझा त्रास सिद्धि थी जिसे दोनों अपने-अपने तरीके से झेल रहे थे। जगजीत ने खुद को संगीत में डुबो दिया जबकि आध्यात्मिकता और एकांत की तरफ चली गई। एक और बड़ा सदमा मोनिका की मौत। वक्त बीतता गया लेकिन परिवार का दर्द पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। चित्रा सिंह की पहली शादी से बेटी थी मोनिका चौधरी। जगजीत सिंह ने मोनिका को भी अपनी बेटी की तरह माना था। चित्रा और जगजीत के परिवार में मोनिका की भी अहम जगह थी। लेकिन वर्ष 2009 में परिवार पर एक बार फिर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। 19 मई 2009 को मोनिका की मौत हो गई। उस समय उनकी उम्र करीब 50 वर्ष बताई गई थी।

समाचार रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने अपने बांद्रा स्थित घर में आत्महत्या की थी। परिवार में उनके जीवन में लंबे समय से चल रही परेशानियों और मानसिक तनाव का जिक्र किया था। मोनिका की मौत ने चित्रा सिंह को एक बार फिर से तोड़ दिया। जिस मां ने पहले अपना जवान बेटा खोया था, अब उसे अपनी बेटी का भी असमय बिछड़ना देखना पड़ा और इस घटना का असर जगजीत सिंह पर भी गहरा पड़ा। उस समय वह अमेरिका के दौरे पर थे। चित्रा सिंह के अनुसार मोनिका की मौत की खबर सुनकर जगजीत ने अपने कार्यक्रम रद्द किए और जल्द से जल्द घर लौटने की कोशिश की। वो मोनिका को बचपन से जानते थे और उन्हें अपनी बेटी की तरह मानते थे। दो बच्चों को खोने का दर्द। एक तरफ 1990 में विवेक की मौत ने जगजीत और चित्रा की जिंदगी बदल दी। वहीं 2009 में मोनिका की मौत ने पुराने जख्म फिर से खोल दिए। चित्रा के लिए यह लगातार दूसरी बड़ी पारिवारिक त्रासदी थी। मोनिका अपने पीछे दो बेटों को छोड़ गई थी। उनकी मौत के बाद चित्रा ने अपने नाती पोतों की देखभाल में खुद को व्यस्त रखा। एक मां के लिए अपने बच्चों को खोने का दर्द शायद जिंदगी भर साथ चलता है। समय सिर्फ उस दर्द को छिपाना सिखाता है। मिटाना नहीं। फिर आया जगजीत सिंह के जीवन का अंतिम दौर। जगजीत सिंह ने तमाम दुखों के बावजूद संगीत का साथ नहीं छोड़ा। उनकी आवाज में उम्र के साथ और गहराई आती चली गई।

विवेक की मौत के बाद उन्होंने अपने संगीत को अपने दर्द का माध्यम बनाया। उनका एल्बम होप भी उस कठिन दौर के बाद उनकी संगीत यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। लेकिन जिंदगी ने उन्हें ज्यादा लंबा समय नहीं दिया। 23 सितंबर 2011 को जगजीत सिंह को ब्रेन हैमरेज हुआ। वह करीब 2 सप्ताह से अधिक समय तक कोमा में रहे और 10 अक्टूबर 2011 को मुंबई में उनका निधन हो गया। वह 70 साल के थे। चित्रा सिंह के लिए शायद जिंदगी का सबसे बड़ा अकेलापन था। पहले बेटा चला गया फिर बेटी चली गई और आखिर में जीवन साथी भी उन्हें छोड़कर चला गया। जगजीत और चित्रा की कहानी क्यों आज भी लोगों को रुलाती है। जगजीत सिंह की आवाज में जो दर्द लोग सुनते थे, वह केवल अभिनय या गायकी का कमाल नहीं था। उनकी जिंदगी ने उन्हें दर्द को बहुत करीब से महसूस कराया था। एक तरफ वह पिता थे जिन्होंने जवान बेटे को खोया था। दूसरी तरफ चित्रा सिंह थी जिनकी जिंदगी में बेटे और बेटी दोनों की असमय मौत का दर्द आया। शायद इसी वजह से जब जगजीत सिंह कोई दर्द भरी गजल गाते थे तो उनकी आवाज सीधे दिल तक पहुंचती थी। चिट्ठी ना कोई संदेश को सुनते हुए आज भी लोगों को लगता है कि कोई अपने उस प्रिय इंसान से बात कर रहा है जो वापस नहीं आ सकता। यह गीत विवेक की मौत के सीधे तौर पर उनके लिए लिखे जाने का प्रमाणित रिकॉर्ड नहीं रखता। लेकिन जगजीत की निजी त्रासदी के कारण इस गीत की भावनात्मक गूंज उनके बेटे की याद से हमेशा जुड़ गई। एक ऐसी कहानी जिसमें संगीत से ज्यादा दर्द था।

जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की कहानी सिर्फ सफलता, शोहरत और संगीत की कहानी नहीं है। यह दो ऐसे इंसानों की कहानी है जिन्होंने जिंदगी में अपार प्यार पाया। लेकिन उसी जिंदगी ने उन्हें असहनीय दर्द भी दिया। विवेक की मौत नेित्रा की आवाज छीन ली। मोनिका की मौत ने उनके बचे हुए सहारे को भी हिला दिया और जगजीत सिंह ने इन दोनों त्रासदिस्तियों के बीच संगीत को अपना सहारा बनाए रखा। आज जगजीत सिंह हमारे बीच नहीं है। चित्रा सिंह भी लंबे समय से सार्वजनिक संगीत जीवन से दूर है। लेकिन दोनों की आवाज और उनकी कहानी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। जब कभी चिट्ठी ना कोई संदेश बचता है तो उसके शब्द सिर्फ एक फिल्म की कहानी नहीं लगती। वे किसी बिछड़े हुए अपने की याद बन जाते हैं। किसी पिता की आंखों में अपने बेटे की तस्वीर, किसी मां के दिल में अपने बच्चे की कमी और किसी जीवन साथी के मन में उस इंसान की याद जिसके साथ पूरी जिंदगी बिताने का सपना देखा था। जगजीत सिंह ने दर्द को आवाज दी और चित्रा सिंह ने उसी दर्द को खामोशी में जिया। शायद यही इस कहानी की सबसे मामलिक बात है। कुछ रिश्ते मौत के बाद खत्म नहीं होते। वे यादों में बदल जाते हैं और कुछ आवाजें इतनी सच्ची होती है कि उनमें छिपा दर्द पीढ़ियों तक सुनाई देता रहता है। तो दोस्तों अभी के लिए बस इतना ही। मिलते हैं अगली वीडियो में। तब तक आप अपना ध्यान रखिए। बाय बाय।

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