क्या हो अगर कॉफी लेवर से उनकी सुबह की कॉफी का कप छीन लिया जाए? ना कैप्रीचीनो, ना फिल्टर कॉफी और ना ही कोल्ड कॉफी। कई लोगों का दिल इससे टूट जाएगा ना। लाखों लोगों की सुबह अधूरी रह जाएगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में कॉफी की शुरुआत किसी बड़ी कंपनी, राजा या किसी व्यापारिक साम्राज्य ने नहीं की थी बल्कि इसकी शुरुआत हुई थी सिर्फ सात छोटी बीजों से। जी हां, सिर्फ सात कॉफी के बीज। अगर 400 साल पहले एक शख्स ने अपनी जान जोखिम में डालकर यह सात बीज भारत नहीं लाए होते, तो शायद आज भारत में ना फिल्टर कॉफी होती, ना कैफे कल्चर और ना ही अरबों रुपए का कॉफी कारोबार। लेकिन सवाल है कि आखिर वो शख्स था कौन? वो बीच कहां से आए थे और अरब देशों के सख्त पहरे के बीच वो भारत तक कैसे पहुंचे? यह कहानी है एक सूफी संत, एक साहसिक मिशन और भारत की कॉफी क्रांति की। और उन सात बीजों को भारत लाने के लिए एक सूफी संत ने कैसे अपनी जान जोखिम में डाल दी थी।
आज की इस वीडियो में हम जानेंगे बाबा बुधन के साहस की रास्ता। कॉफी भारत में कैसे आई और आखिर कैसे भारत दुनिया का एक बड़ा कॉफी निर्यातक देश बन गया। तो कहानी शुरू होती है 17वीं शताब्दी से। उस दौर में पूरी दुनिया में कॉफी के उत्पादन और व्यापार पर अरब देशों खासकर यमन का कब्जा था। यमन का प्रसिद्ध मोकापोट पूरी दुनिया की कॉफी का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र माना [संगीत] जाता था। अरब व्यापारियों ने कॉफी पर अपनी मोनोपोली बनाए रखने के लिए बेहद सख्त नियम बना रखे थे। वे कॉफी के पौधे या कच्चे बीज किसी भी हालत में देश से बाहर नहीं जाने देते थे। सिर्फ उबले हुए या भुने हुए बीज ही निर्यात के लिए जाते थे ताकि वे कहीं और जाकर अंकुरित ना हो सके। मतलब साफ था कॉफी सिर्फ अरब देशों की संपत्ति बनी रहे। यह उनकी मंशा थी। इसी बीच भारत के कर्नाटक के चिकमगलूर इलाके में रहने वाले सूफी संत हजरत बाबा बुधन हज यात्रा के लिए निकले। मक्का गए वो और वापसी के दौरान उनका पड़ाव यमन के मोका शहर पर पड़ा। वहां पर उन्होंने पहली बार कॉफी पी। कॉफी का स्वाद और उससे मिलने वाली ऊर्जा ने उन्हें हैरान कर दिया। बाबा बुध ने तय किया कि इस अद्भुत पेय को भारत भी ले आना चाहिए। उन्होंने कॉफी के सिर्फ सात बीज हरे बीज लिए और उन्हें अपनी लंबी दाढ़ी में छिपा लिया। कहा जाता है कि उन्होंने सात बीज इसलिए चुने क्योंकि इस्लाम में सात रंग को पवित्र माना जाता है।
सोचिए अगर उस समय वे पकड़े जाते तो शायद आज कॉफी भारत में नहीं होती या फिर उसकी कहानी कुछ और ही होती। अरब की सुरक्षा व्यवस्था को पार करके बाबा बोदन सुरक्षित भारत लौट आए। उन्होंने कर्नाटक के चिकमगलूर की चंद्रदोड़ पहाड़ियों में उन सात बीजों को रोपा। यहीं उगा भारत का पहला कॉफी पौधा या यूं कहें सात पौधे। चिकमगलूर की मिट्टी, जलवायु और पहाड़ी वातावरण कॉफी के लिए आदर्श साबित हुए। कुछ ही सालों में यह पौधे बढ़े और आसपास के इलाकों में फैलने लगे। बाबा बुधन के सम्मान में बाद में इन पहाड़ियों का नाम बाबा बुधनगिरी भी रख दिया गया। आज भी यह स्थान भारत की कॉफी इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। भारत में कॉफी उद्योग की शुरुआत हुई थी 18वीं शताब्दी में। कॉफी की व्यवसायिक खेती यहां पर उस वक्त तक शुरू हो चुकी थी और 19वीं सदी आते-आते यह एक संगठित उद्योग का रूप लेने लगी और धीरे-धीरे भारत दुनिया के प्रमुख कॉफी उत्पादक देशों में शामिल हो गया। भारतीय कॉफी की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसे सीधे धूप में नहीं बल्कि घने पेड़ों की छांव में उगाया [संगीत] जाता है। इसे शेड ग्रोन कॉफी कहा जाता है। यही वजह है कि भारतीय कॉफी को दुनिया भर में उसके अनोखे स्वाद और खुशबू के लिए जाना जाता है।
इसके साथ-साथ कॉफी के बागान बायोडायवर्सिटी को भी बढ़ावा देते हैं और पर्यावरण संरक्षण में योगदान देते हैं। आज भारत में उगने वाली लगभग 96% कॉफी सिर्फ तीन राज्यों से आती है। पहले नंबर पर है कर्नाटक। देश की लगभग 70% कॉफी अकेले कर्नाटक पैदा करता है। चिक मंगलूर, कुर्ग और हसन यहां के मुख्य कॉफी क्षेत्र हैं। दूसरे स्थान पर है केरल। देश की लगभग 20% कॉफी केरल में उगाई जाती है और खासकर वायनाड में। तीसरे नंबर पर है तमिलनाडु। यह कुल उत्पादन का लगभग 5 से 6% हिस्सा देता है। नीलगिरी, ईरका और डिंडीगुल यहां के प्रमुख कॉफी उगाने वाले इलाके हैं। [संगीत] भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार की कॉफी पैदा होती है। पहली अराबिका जो स्वाद और सुगंध के लिए प्रसिद्ध है और दूसरी है रोबस्टा जिसमें कैफीन ज्यादा होता है और जिसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कॉफी मिक्सचर्स में किया जाता है। भारतीय कॉफी [संगीत] की खास बात यह है कि इसकी क्वालिटी और टेस्ट ग्लोबल मार्केट में एक अलग पहचान रखते हैं। कॉफी सिर्फ एक पेय नहीं है। यह [संगीत] लाखों भारतीय परिवारों की आय का स्रोत भी है। भारत के कॉफी सेक्टर में 20 लाख से ज्यादा लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। खेती, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और व्यापार से जुड़े लाखों लोग इस उद्योग पर निर्भर हैं। इनमें ज्यादातर छोटे किसान हैं। देश की लगभग 99% कॉफी ज्योत छोटे किसानों के पास है और वे कुल उत्पादन का 70% हिस्सा पैदा करते हैं। आज भारत दुनिया का सातवां सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक देश बन चुका है और वैश्विक उत्पादन में भारत का योगदान लगभग 3.5% है। भारत हर साल करीब 3.6 लाख टन कॉफी का उत्पादन करता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां पैदा होने वाली लगभग 70% कॉफी 128 देशों में निर्यात की जाती है। वित्त वर्ष 204-25 में भारत का कॉफी निर्यात रिकॉर्ड लगभग 1.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। भारत दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा कॉफी निरातक देश बन चुका है। अब बात करते हैं कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया की। भारतीय कॉफी उद्योग को संगठित करने के लिए 1942 में कॉफी एक्ट लागू किया गया। इसके तहत कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया की स्थापना भी हुई। आज यह संस्था रिसर्च, किसानों की मदद, उत्पादन बढ़ाने और निर्यात को बढ़ावा देने पर काम करती है। यही संस्था भारतीय कॉफी को वैश्विक पहचान [संगीत] दिलाने में भी खास भूमिका निभा रही है। तो एक समय सिर्फ सात बीजों से शुरू हुआ यह सफर आज अरबों डॉलर की इंडस्ट्री में बदल चुका है। बाबा बुधन की बेहतरीन सोच और साहस ने भारत को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण कॉफी उत्पादक देशों में ला खड़ा किया है। तो अगली बार जब आप कॉफी का घूंट लें तो याद रखिएगा कि उस कप में सिर्फ स्वाद नहीं है बल्कि 400 साल पुराना इतिहास भी घुला हुआ है। अगर आपको यह जानकारी [संगीत] पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और कॉफी का आनंद उठाते रहें। यहां ताजा खबर के साथ हर दिन की शुरुआत [संगीत] कड़क है। आमने-सामने बैठ रखते हैं बात पूरे दम से आराम [संगीत] से। चर्चा होती है बेधड़क। यह किस्से, कहानियों में बोल सरल और अंदाज बेहद कड़क मिलता है। जीने में एक तेवर है जो आता है सही ज्ञान, [संगीत] जानकारी और उससे कमाई कड़क मुंह से। इधर मौके पर चौका नहीं लगा जलवा दिखाते हैं। कड़क क्रिकेट से अपने रोमांच को जो बढ़ाते हैं। यहां की हर बात का मिजाज एक है। मिजाज कड़क आपका [संगीत] अपना YouTube चैनल कड़क लाइव बेधड़क। [संगीत]