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मुकेश जैसी ही आवाज़, मुकेश जयंती पर दूनिया छोड़ जाना! क्या बाबला मेहता सच में मुकेश का पुनर्जन्म थे?

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सदाएं भी है, मोहब्बत भी है, नजाकत भी है, मेरे महबूब में। दोस्तों, बॉलीवुड की चमकती दुनिया बाहर से जितनी हसीन और सुनहरी नजर आती है, भीतर से उतनी ही रहस्यमई, क्रूर और कभी-कभी बेहद धोखेबाज भी साबित होती है। यहां हर कोई अपने सपनों को पर्दे पर उतारने आता है। लेकिन हर सपने को पर्दे तक पहुंचने का मौका नहीं मिलता। आज हम आपको एक ऐसे फनकार की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसने अपनी आवाज से लाखों दिलों में मोहब्बत और दर्द दोनों को जगा दिया। तू प्यार है, किसी और का तुझे चाहता कोई और है। वो आवाज जिसमें एक ऐसा दर्द छुपा था कि सुनने वाला कह उठता यह तो हमारे दिल की कहानी गा रहा है। सदा सलामत रहे तुम्हारे प्यार की शोभा। 90 का वो दौर था जब हर गली हर मोहल्ले में उनकी गाई हुई धुनें बजा करती थी। लेकिन कहते हैं ना दोस्तों कभी-कभी किस्मत के एक धोखे से पूरा सफर बर्बाद हो जाता है। शोहरत के जिस मंच पर वह खड़े थे वहां से उन्हें अचानक ऐसे धकेला गया कि वह पर्दे के पीछे हमेशा के लिए गुम हो गए।

हम बात कर रहे हैं बाबला मेहता की। जी हां, वही बाबला मेहता जिनकी आवाज में आपको हमेशा मुकेश की झलक सुनाई देती थी। वो बाबला जिनकी गायकी ने लाखों दिलों को छुआ। मुझको यारों माफ करना मैं नशे में हूं। लेकिन जिनकी पहचान धीरे-धीरे भीड़ में कहीं खो गई। आज हम उसी गुमनाम सितारे की कहानी आपके सामने लाए हैं। एक ऐसी कहानी जिसमें सुर है, दर्द है, सपने हैं और साथ ही धोखे का वो कड़वा सच जिसने एक बेहतरीन गायक का करियर छीन लिया। तो जुड़े रहिए इस सफर में हमारे साथ क्योंकि यह कहानी सिर्फ एक गायक की नहीं बल्कि उन तमाम कलाकारों की दास्तान है जिन्हें इंडस्ट्री ने इस्तेमाल किया और फिर भुला दिया। और हां दोस्तों अगर आपको ऐसी अनसुनी और बेबाक कहानियां सुनना पसंद है तो हमारे चैनल बॉलीवुड का दम को जरूर लाइक, शेयर और सब्सक्राइब कीजिए। क्योंकि यहां आपको मिलेगी बॉलीवुड की हर वो सच्चाई जिसे दुनिया अक्सर छुपा लेती है। दिल्ली की गलियों में जन्मे और पले बड़े बाबला मेहता का जीवन संगीत से भरा हुआ था। उनके घर में जब भी रेडियो बजता तो पुराने हिंदी गीतों की महक पूरे माहौल को रुमानी बना देती। उनके पिता को मनन्ना डे और पुराने फनकारों को सुनने का खास शौक था। नन्हे बाबला उन्हीं धुनों में डूबते उतरते बड़े हुए। धीरे-धीरे गुनगुनाते हुए उन्होंने पाया कि उनकी आवाज में कुछ अलग ही मिठास और दर्द है। वह दर्द जो सीधे दिल के सबसे गहरे कोने को छू जाए।

लोग अक्सर उनकी तुलना मुकेश से करने लगे। और सोचिए दोस्तों उस दौर में अगर किसी की आवाज को मुकेश से मिलाया जाए तो यह अपने आप में सबसे बड़ी तारीफ होती थी। स्कूल और कॉलेज के दिनों में बाबला हर कार्यक्रम की शान बन जाते। मंच पर आते ही उनकी आवाज का जादू छा जाता। तालियां गूंजती और लोग कहते यह लड़का एक दिन बहुत बड़ा गायक बनेगा। तभी उन्हें एहसास हुआ कि उनकी मंजिल दिल्ली की गलियों में नहीं है बल्कि मुंबई की माया नगरी में है। दोस्तों और परिवार के प्रोत्साहन से बाबला ने अपना सामान बांधा और निकल पड़े उस सफर पर जिसे हर कलाकार सपनों की नगरी कहता है। मुंबई। 80 के दशक के आखिर में मुंबई आना आसान नहीं था। हर जगह मुकाबला था। हर कोना नए संघर्ष से भरा हुआ था। लेकिन बाबला का विश्वास उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। वो मानते थे कि अगर सुर सच्चे हो तो एक दिन मुकाम जरूर मिलेगा। 1987 में उनकी मेहनत रंग लाई। उनका पहला एल्बम रिलीज हुआ। जुबान पे दर्द भरी दास्तान। इस एल्बम ने संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया। जुबान पे दर्द भरी दास्तान चली। लोगों को लगा कि जैसे मुकेश फिर से रोट आए हो। बाबला की आवाज में वही सहजता, वही गहराई और वही दर्द था। इस एल्बम ने उन्हें पहचान दिलाई और म्यूजिक इंडस्ट्री ने उन्हें नोटिस करना शुरू कर दिया। 1988 में एक और बड़ा मौका उनके दरवाजे पर आया। रिलीज हुआ एल्बम मुकेश की यादें। इस एल्बम में बाबला मेहता ने मुकेश के अमर गीतों को अपनी आवाज में गाया। दोस्तों यह सिर्फ एक एल्बम नहीं था बल्कि उस दौर के लाखों संगीत प्रेमियों के लिए मुकेश की आत्मा को फिर से महसूस करने जैसा था। दोस्त दोस्त ना रहा जीना यहां मरना यहां। कभी-कभी मेरे दिल में जैसे सदाबहार गीत जब बाबला ने गाएं तो लोगों को लगा कि मानो मुकेश फिर से जिंदा हो गए हो। यह एल्बम इतना हिट हुआ कि बावला की पहचान सिर्फ एक गायक के तौर पर नहीं बल्कि मुकेश की याद दिलाने वाली आवाज के रूप में होने लगी। यही वो दौर था जब बावला मेहता ने इंडस्ट्री में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी। पर दोस्तों असली कहानी तो अब शुरू होती है जहां शोहरत, धोखा और गुमनामी सब साथ आते हैं। दोस्तों कहते हैं कि किस्मत अगर एक बार मुस्कुराए तो इंसान को आसमान तक पहुंचा देती है।

बाबला मेहता के जीवन में वह पल आया यश चोपड़ा की फिल्म चांदनी से। यश चोपड़ा अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट के लिए एक ऐसी नई आवाज तलाश रहे थे, जो लता मंगेशकर जैसी सुरों की मल्लिका के साथ गा सके। सैकड़ों आवाजों के बीच बाबला की आवाज ने सबका दिल जीत लिया और फिर हुआ चमत्कार। उन्हें मिला गाना तेरे मेरे होठों पे। दोस्तों जब यह गाना रिलीज हुआ तो जैसे जादू छा गया। पूरे देश में बाबला की आवाज गूंज उठी। लोगों को लगा कि हिंदी सिनेमा को नया मुकेश मिल गया है। रातोंरात बाबला मशहूर हो गए। संगीतकार, गीतकार और निर्देशक उनकी आवाज के कायल हो गए थे। वो गाना सिर्फ फिल्म का नहीं बल्कि बाबला के करियर का टर्निंग पॉइंट बन गया। संगीत के जादूगर आर डी बर्मन भी बाबला की आवाज से प्रभावित हुए। उन्होंने बाबला को अपनी फिल्म जीने बो में गाने का मौका दिया। सोचिए दोस्तों उस दौर में जब कुमार सानू, उदित नारायण और मोहम्मद अजीज जैसे सितारे छाए हुए थे। वहां आर डी बर्मन जैसा दिग्गज बाबला पर भरोसा करता है तो इसका मतलब था कि बाबला वाकई इंडस्ट्री में अपनी एक अलग जगह बनाने लगे थे। लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। साल 1991 महेश भट्ट अपनी फिल्म दिल है कि मानता नहीं बना रहे थे। संगीतकार नदीम श्रवण थे और गानों का जादू पहले से ही तैयार हो रहा था। महेश भट्ट और नदीम श्रवण ने मिलकर फैसला किया कि फिल्म के सारे गाने बाबला मेहता की आवाज में रिकॉर्ड किए जाएंगे। दोस्तों जरा सोचिए पूरी फिल्म के गाने एक नए गायक को मिलना यह किसी भी सिंगर के लिए सपनों से बढ़कर होता है। बाबला ने फिल्म के सारे गाने रिकॉर्ड किए। कैसेट्स भी मार्केट में लॉन्च हो गई। उनके दोस्तों और फैंस ने जब कैसेट खरीदी और सुनी तो यकीन हो गया कि बाबला अब बॉलीवुड के अगले सुपरस्टार सिंगर बनने जा रहे हैं। चारों तरफ यही चर्चा थी कि दिल है कि मानता नहीं से एक नया गायक इंडस्ट्री को मिल गया है। लोग कहते थे अब बाबला मेहता का वक्त आ गया है। लेकिन दोस्तों कहते हैं कि जब किस्मत ऊंचाइयों पर ले जाती है तो अक्सर अचानक गिरा भी देती है। बाबला की जिंदगी में भी एक ऐसा ही तूफान आने वाला था जिसने उनके पूरे करियर को हिला दिया। दोस्तों कहते हैं कि कला और किस्मत का रिश्ता बड़ा अजीब होता है। कभी एक सुर इंसान को आसमान पर पहुंचा देता है और कभी एक फैसला उसे जमीन पर पटक देता है। बाबला मेहता की जिंदगी में भी यही हुआ। जैसे ही दिल है कि मानता नहीं के गाने पूरे देश में चर्चा में आने लगे, ठीक उसी समय अचानक एक ऐसा तूफान आया जिसने बाबला की जिंदगी की दिशा बदल दी। अचानक खबर आई कि नदीम सैफी यानी नदीम श्रवण जोड़ी का हिस्सा ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया। उन्होंने आदेश दिया कि बाजार में जो भी कैसेट्स बाबला मेहता की आवाज में रिलीज हुई थी, उन्हें तुरंत वापस मंगा लिया जाए। पूरा संगीत जगत हैरान था कि आखिर ऐसा क्यों? क्या बाबला की आवाज में कमी थी या फिर इसके पीछे कोई और खेल चल रहा था। धीरे-धीरे अंदर की बातें बाहर आने लगी। कहा गया कि 1990 में फिल्म आशिकी की ऐतिहासिक सफलता ने कुमार सानू को रातोंरात देश का नंबर वन गायक बना दिया था।

उनकी आवाज मार्केट की डिमांड बन गई थी। रिकॉर्ड कंपनियां, म्यूजिक डायरेक्टर्स और फिल्म मेकर्स सब सिर्फ कुमार सानू के नाम पर दांव लगाना चाहते थे। इसी वजह से नदीम ने व्यावसायिक लाभ को देखते हुए अचानक फैसला लिया कि दिल है कि मानता नहीं में बाबला की जगह कुमार सानू को लिया जाए। दोस्तों जरा सोचिए जिस इंसान ने अपने पूरे दिल से गाने रिकॉर्ड किए हों, जिसे लगा हो कि अब उसका वक्त आ गया है, वही गाने किसी और की आवाज में रिकॉर्ड करा दिए जाएं, तो उस गायक पर क्या बीतेगी। यही हुआ बाबला मेहता के साथ। उनके सारे गाने दोबारा कुमार सानू से गवाए गए और फिल्म रिलीज होने पर नतीजा सबके सामने था। कुमार सानू रातोंरात सुपरस्टार बन गए। उनके गाए गाने जैसे दिल है कि मानता नहीं। तू प्यार है किसी और का और ओ मेरे सपनों के सौदागर चाट बस्टर बन गए। उनकी आवाज सिर्फ एक गाने में छोड़ दी गई। वह भी ऐसा गाना जो सबसे कम सुना गया। यह एक ऐसा धोखा था जिसने बाबला का करियर वहीं खत्म कर दिया। बाबला मेहता इस सदमे से कभी उबर नहीं पाए। सोचिए अगर वही गाने उनकी आवाज में रिलीज होते तो शायद आज कुमार सानू की जगह हम बाबला मेहता का नाम लेते। लेकिन किस्मत ने उनसे उनका सबसे बड़ा मौका छीन लिया। धीरे-धीरे उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली। निर्माता निर्देशक अब उन्हें साइन करने से कतराने लगे और आखिरकार बाबला बॉलीवुड की चकाचौंध से कटकर गुमनामी की अंधेरी गलियों में खो गए। फिल्मी दुनिया से हटकर बाबला ने अपना रुख आध्यात्मिक संगीत की ओर कर लिया। उन्होंने भजनों को गाकर अपनी रोजी-रोटी चलाई। लोग मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में उनकी आवाज सुनकर प्रभावित होते। लेकिन वो शोहरत, वो पहचान जो फिल्मों से मिल सकती थी वो उन्हें कभी नहीं मिली। उनका सपना था कि बड़े पर्दे पर उनकी आवाज अमर हो। लेकिन किस्मत ने उन्हें छोटे मंचों और भक्ति गीतों तक सीमित कर दिया। बाबला मेहता की कहानी हमें सिखाती है कि सिर्फ टैलेंट ही काफी नहीं होता। फिल्म इंडस्ट्री में कभी-कभी नेपोटिज्म, मार्केट की डिमांड और पैसे का खेल असली टैलेंट को दबा देता है। आज भी जब तेरे मेरे होंठों पर गाना बजता है तो लोग बाबला की आवाज को याद करते हैं। लेकिन अफसोस उनका नाम इतिहास के पन्नों में गुम हो चुका है। दोस्तों क्या आपको लगता है कि अगर बाबला मेहता से वो मौका नहीं छीना जाता, तो आज उनका नाम भी कुमार सानू, उदित नारायण और सोनू निगम जैसे महान गायकों की लिस्ट में होता। कभी-कभी जिंदगी ऐसे मोड़ लेती है कि इंसान सोच में पड़ जाता है। क्या यह सच है या कोई किस्मत का लिखा हुआ खेल? बाबला मेहता के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 22 जुलाई 2024 की सुबह जब उनके निधन की खबर आई तो पूरे संगीत जगत में सन्नाटा छा गया।

लोगों को यकीन नहीं हो रहा था कि जिस आवाज ने कभी मुकेश की याद दिलाई थी वो अब हमेशा के लिए खामोश हो गई। लेकिन दोस्तों सबसे बड़ा इत्तेफाक तो यही था कि जिस दिन बाबला मेहता ने इस दुनिया को अलविदा कहा वो तारीख थी 22 जुलाई और यही दिन है महान गायक मुकेश की जयंती का। मुकेश जिनकी आवाज को बाबला मेहता का दूसरा रूप माना जाता था। मुकेश जिनकी छवि उनके गानों में बार-बार झलकती थी और मुकेश ही जिनसे बाबला को नए मुकेश का खिताब मिला था। क्या यह सिर्फ एक संयोग था? या फिर किस्मत ने एक बार फिर बाबला की कहानी को दर्द और रहस्य से जोड़ दिया। बाबला मेहता ने अपने करियर में भले ही बहुत कम फिल्मी गाने गाए हो लेकिन उनकी आवाज की मिठास ने उन्हें हमेशा अलग पहचान दी। उन्होंने सैकड़ों भजन और एल्बम गाए लाखों श्रोताओं के दिल को छुआ। लेकिन बॉलीवुड में उनका सपना अधूरा रह गया। सोचिए जिस इंसान की आवाज को कभी मुकेश का पुनर्जन्म कहा जाता था वो इंसान गुमनामी में दुनिया छोड़ जाए। यह कितनी बड़ी ट्रेजडी है। बाबला मेहता की मौत हमें यही याद दिलाती है कि सिर्फ टैलेंट और मेहनत काफी नहीं होते। कभी-कभी किस्मत, कभी सियासत और कभी किसी एक इंसान का फैसला किसी कलाकार की पूरी जिंदगी बदल सकता है। उनकी कहानी एक आईना है जिसमें हम बॉलीवुड की सच्चाई देख सकते हैं। यहां कई बार मार्केटिंग और बिजनेस असली टैलेंट पर भारी पड़ जाते हैं और यही वजह है कि बाबरा जैसे गायक इतिहास के पन्नों से मिट जाते हैं। लेकिन दोस्तों सच यही है कि किसी कलाकार का नाम भले भुला दिया जाए लेकिन उसकी आवाज कभी नहीं मरती। आज भी जब कोई उनका गाया तेरे मेरे होठों पर या कोई भजन सुनता है तो लगता है जैसे बाबला मेहता हमारे आसपास ही हैं। उनकी आवाज एक एहसास बनकर जिंदा

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