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जिसे पूरी दुनिया ने ‘मां’ माना, उसके अपने बेटों ने ही उसे क्यों दे दी ऐसी दर्दनाक मौत?

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कहां गया मेरा बच्चा? कहां गया मेरा बच्चा? तू कितनी अच्छी है। [संगीत] तू कितनी भोली है। आज ये कहानी है एक ऐसी एक्ट्रेस की जिसे 50 और 60 के दशक में ब्यूटी क्वीन कहा जाता था। ऐ दिल [संगीत] मचल मचल के मेरे आ रहे हैं वो। मेरे आ रहे हैं वो। वो हीरोइन जिसके गाने सुनकर आज भी लोग पुराने दौर में पहुंच जाते हैं। क्या बोले क्या बोले क्या बोले वो जाने क्या बोले जब वो मां बनी तो ऐसी बनी कि उसे बॉलीवुड की मां कहा जाने लगा। उसने हर किरदार ऐसे निभाया कि लोग उसमें खो गए। तूने अपनी मां के माथे पर कैसे लिख दिया? कि उसका बेटा एक चोर है। वो हीरो की हीरोइन भी बनी। उसने रोमांस भी किया। वह देवी भी बनी और लोगों ने उसकी पूजा भी की और उसने हीरो की मां बनकर ममता भी लुटाई। तो हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड की सबसे बेहतरीन एक्ट्रेस में से एक रही निरूपा रॉय की। मैं हमेशा की तरह मार खाकर बेहोश हो जाऊंगी। लेकिन मरूंगी नहीं। बेटा बेटा। तो कहां गया मेरा बच्चा? कौन ले गया मेरे बच्चे को? साला ये दुख काहे खत्म नहीं होता बे? क्यों उसे बॉलीवुड की पहली सुपरमैन कहा गया? कैसे जिसे बॉलीवुड की मां कहा गया, उसके खुद के बेटों ने उसे नर्क दिखाया और क्या सच में निरूपा रॉय की लाश को कुत्ते खा गए थे? जानेंगे निरूपा रॉय की वो कहानी जिसे सुनकर आपका दिल बैठ जाएगा। तो चलिए शुरू करते हैं। प्यारीप्यारी है [संगीत] ओ मां। निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 को गुजरात में हुआ था। उनके पिता का नाम था किशोर चंद्र चौहान। वो अलग बात है कि वह राजा नहीं थे बल्कि रेलवे कर्मचारी थे। भाई निरूपा रॉय के बचपन का नाम था कांता चौहान। परिवार थोड़ा रूढ़िवादी था जो लड़कियां की पढ़ाई लिखाई के खिलाफ था। तो निरूपा रॉय केवल चौथी क्लास तक ही पढ़ पाई और उनके पिता ने केवल 15 साल की उम्र में निरूपा रॉय की शादी कर दी थी। निरूपा रॉय के पति का नाम था कमल रॉय और वह भी एक सरकारी नौकरी वाले इंसान थे। शादी के बाद कांता का नाम कोकिला रख दिया गया और फिर वो अपने पति के साथ बंबई आकर बस गई। मनोरमा क्या हुआ? अरे छोड़ ये सब ये क्या पागल हो गए? मनोरमा अब फटे पुराने कपड़ों के दिन गए। मुझे नौकरी मिल गई। उनके पति पुलिस की नौकरी करते थे। लेकिन उनके मन में एक्टिंग के कीड़े उछल कूद करते रहते थे। एक दिन उन्होंने अखबार में एक ऐड देखा जिसमें गुजराती फिल्मों में ऑडिशन का ऐड था। कमल रॉय तो जैसे तैयार ही बैठे थे तो वह तुरंत अपनी पत्नी कोकिला के साथ गुजराती फिल्मों का ऑडिशन देने के लिए चले गए। वहां उनका सिलेक्शन तो नहीं हुआ

लेकिन एक डायरेक्टर की नजर उनकी पत्नी यानी कि कोकिला पर पड़ी। उसने कमल रॉय से कोकिला का ऑडिशन करवाने के लिए भी कहा। कमल रॉय खुद ऑडिशन देने गए थे। लेकिन जब उनका सिलेक्शन नहीं हुआ तो उन्होंने सोचा कि पत्नी का ही ऑडिशन करवा लेते हैं। कोकिला ने यह ऑडिशन दिया और वह ना सिर्फ सिलेक्ट हुई बल्कि उसे मूवी भी मिल गई और कोकिला ने अपना नाम बदलकर निरूपा रॉय कर लिया। इस तरह कोकिला रॉय बन गई निरूपा रॉय। मन के चमन की बहार बोल कोयल की मीठी पुकार। और 1946 में निरूपा की पहली मूवी आई रनक देवी जो एक गुजराती मूवी थी और एक हीरोइन बनकर उन्होंने फिल्मों में कदम रख दिया। यह मूवी बड़ी हिट हुई तो उन्हें हिंदी मूवीज में भी काम मिलने लगा। 1946 में ही निरूपा रॉय की पहली हिंदी मूवी आई जिसका नाम था अमर राज और निरूपा ने बॉलीवुड में भी कदम रख दिया। इसके बाद निरूपा रॉय की उद्धार और राम जन्म जैसी मूवीज भी आई। 1953 में आई मूवी 2 बीघा जमीन जिसने रातोंरात निलूपा रॉय को देश भर में चर्चित कर दिया। यह मूवी इतनी बड़ी हिट हुई जिसे आज भी बॉलीवुड की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक माना जाता है। कलकत्ते में आएंगे, वाले ना कराएंगे, चले नहीं जाना। नीलाम कराओगे। [हंसी] मां, वह देखो। जहां से धुआं उठ रहा है ना ठीक वहीं पर अपना मकान था और वहां मेरी रसोई थी। यह पहली मूवी थी जिसे नेशनल अवार्ड मिला था और इसने बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट एक्टर और बेस्ट स्टोरी के कई अवार्ड जीते थे और यहां तक कि इसने कांस फिल्म फेस्टिवल में भी अवार्ड जीते थे। दो बीघा जमीन रिसीव्ड इंटरनेशनल एकट्स विमल रॉय अकंप्लीड द फिल्म टू र अलोंग वि बलराज साहनी एंड निरूपा रॉय। इस मूवी से निरूपा रॉय भी सबकी नजरों में आ गई और रातोंरात वो स्टार बन गई। इसके बाद निरूपा रॉय को काम मिलने लगा। 1954 में आई मूवी गरम कोट और यह मूवी भी बड़ी चर्चित रही जिसमें हीरोइन बनकर निरूपा रॉय ने हर किसी का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया था। मेरी आत्मा की ये [संगीत] आवाज है। और अपनी एक्टिंग का जलवा भी बिखेरा। इसके बाद तांगे वाली आई और यह मूवी भी बड़ी हिट हुई। 1956 में निरूपा रॉय अशोक कुमार की हीरोइन बनी। मूवी आई भाई-भाई। [संगीत] मेरा छोटा सा देखो यह संसार है मेरा छोटा। जिसमें अशोक कुमार और किशोर कुमार भाई-भाई बने। मतलब मूवी में यह मूवी बड़ी खास रही। जिसमें निरूपा रॉय की गंभीर एक्टिंग ने लोगों का दिल जीत लिया था। थी। इन पर हाथ उठाने से पहले तुम्हें [हंसी] मेरा खात्मा करना होगा। हट जाओ भाभी।

हां मैं इतने महीनों तुमने मेरी इस तरह रक्षा की जैसे कि कोई अपनी मां की रक्षा करता हो। 1957 में आई मूवी मोहिनी और सच में इस मूवी में निरूपा रॉय ने हर तरीके से लोगों को मोहित कर लिया। मतलब अपनी खूबसूरती से भी। छुप छुप [संगीत] के दिल की धड़कनों में गा रहे हैं वो। ऐ दिल मचल मचल के मेरे गंभीर अभिनय से भी और सीरियस कहानी से भी। और अब हर कोई उन्हें टॉप की हीरोइन कहने लगा था। [संगीत] से तू मेरा इंतहा इसके बाद निरूपा रॉय ने मुसाफिर दो रोटी और चालबाज जैसी कई बेहतरीन मूवीज में काम किया। 1958 में निरूपा रॉय ने राजकुमार के साथ काम किया। मूवी आई दुल्हन और यह मूवी सच में कमाल की थी। कैसे जाऊं मैं पिया [संगीत] मोरा माने ना जिया तूने मुझ पे ना जाने कैसा जादू किया जिसे देखकर दिल खुश हो जाता है। 1959 में आई मूवी कंगन और निरूपा एक बार फिर से अशोक कुमार की हीरोइन बनी और इस मूवी ने भी सफलता के झंडे गाड़ दिए। ना जाने तुम मेरे मन की बात कब समझोगे। क्या है तुम्हारे मन की बात? मेरा मन चाहता है। तू समझा? अशोक कुमार वो एक्टर थे जिसके साथ काम करना हीरोइन अपनी किस्मत समझती थी और निरूपा रॉय उनके साथ रोमांस करके दुगना चमक रही थी। आज के समय पर निरूपा रॉय को लोग सिर्फ एक मां के तौर पर ही जानते हैं। लेकिन शायद ही कोई जानता होगा कि निरूपा रॉय बॉलीवुड की पहली सुपरमैन थी। क्या बात कर रहे हैं? 1960 में एक मूवी आई थी सुपरमैन जिसमें निरूपा रॉय सुपरमैन बनी थी और सच में यह चौंकाने वाली बात है कि जिस औरत को लोग सिर्फ एक दुखियारी मां के रूप में जानते हैं उसने बॉलीवुड की पहली ऐसी मूवी में काम किया और वो एक सुपर हीरो थी। निरूपा रॉय एक ऐसी हीरोइन बन चुकी थी जो मैच्योर दिखती थी। मतलब वह एक संस्कारी भारतीय नारी की छवि को बेहतरीन तरीके से पर्दे पर उतार रही थी। जिसमें एक अच्छी पत्नी, अच्छी मां और एक अच्छी औरत की झलक दिखती थी। मेरी दुनिया है कदमों की आह तेरी मुस्कुरा [संगीत] के जी नहीं लगता। इसके बाद भी छाया, धर्मपुत्र वे जुजुबान, मां बेटा मुझे जीने दो। गृहस्ती जैसी कई बेहतरीन मूवीज में निरूपा रॉय ने काम किया और वह एक टॉप की हीरोइन बन गई थी। दूर गगन पर चमके [संगीत] सितारे आजा रे दीवाने लगी दिल के बुझाने आजा ओ परदे बोल ना जाना बड़ा उलझन में है इंसान तू है या नहीं भगवान यह वो समय था जब धार्मिक फिल्मों में कोई भी हीरोइन काम नहीं करना चाहती थी

क्योंकि सभी को लगता था कि अगर वह धार्मिक मूवीज में काम करेंगी तो फिर लोग उन्हें हीरोइन नहीं मानेंगे। लेकिन निरूपा रॉय ने इन किरदारों को ही अपनी पहचान बनाया और ऐसी ही मूवीज में काम करने लगी। निरूपा रॉय वो हीरोइन बनी जिसने 40 और 50 के दशक में जो मानसान कमाया वो दूसरी किसी हीरोइन ने नहीं कमाया जिसका कारण यह था कि निरूपा रॉय ने लगभग 16 फिल्मों में देवी के किरदार निभाए और लगभग 40 धार्मिक फिल्मों में काम किया जो अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गया। किसकी रसीली तरंगों ने मेरे दिल को किया डावा डोर रे। यूं छुप ना सकेगा परमात्मा [संगीत] मेरी आत्मा की ये एक देवी के किरदार में वो इतनी पसंद की गई कि लोग उन्हें सच में देवी मानने लगे थे। यहां तक कि कुछ लोग उनके पैर छूते, उनका आशीर्वाद लेने के लिए उनके घर पर आ जाते थे। उन्होंने दुर्गा, चक्रधारी जैसी मूवीज में ऐसे किरदार निभाए कि लोग उनके भक्त बन गए और हर-हर महादेव में जब वो माता पार्वती बनी तो लोगों ने उन्हें सच में देवी का अवतार मान लिया था और उन्हें इतना मानसान मिलने लगा कि लोग उन्हें देखकर झुककर प्रणाम करने लगे थे और यह सब 50 के दशक में हो रहा था और एक हीरोइन के लिए इससे बड़े सम्मान की बात और क्या हो सकती है? तेरे सोचे बिना जब होता है सब तो समझ ले कहीं है भगवान इसके बाद भी निरूपा रॉय ने एक से बढ़कर एक मूवीज में काम किया। वह हीरोइन भी बनती थी और सपोर्टिंग किरदार भी निभा लेती थी। जल्दी से आए जिनका मुझे इंतजार है। मुझे इंतजार है। 1967 में एक मूवी आई राजा और रंक जिसमें पहली बार निरूपा रॉय ने एक दुखियारी मां का किरदार निभाया और वो मां के किरदार में ऐसी जचीं कि फिर उनके करियर की दिशा ही बदल गई। इसी मूवी का गाना था तू कितनी अच्छी है। तू कितनी भोली है। [संगीत] जो मां बेटे के प्यार की पहचान ही बन गया था। प्यारी प्यारी है। ओ मां और निरूपा रॉय भी हीरोइन से मां बन गई। इसके बाद निरूपा रॉय हर एक्टर की मां बनने लगी। 1970 में जब आशा पारिक ने राजेश खन्ना से यह कहा अच्छा तो हम चलते हैं और मूवी आई आन मिलो सजना तो इस मूवी में निरूपा रॉय विनोद खन्ना की मां बनी। इसके बाद भी एक से बढ़कर एक मूवीज में निरूपा रॉय ने काम किया और अब वो पूरी तरह से एक मां के किरदार में जम गई थी। मेरे राजा [संगीत] मेरे लाल लेकिन अभी उनका बॉलीवुड की मां बनना बाकी था। फिर 1975 में आई एक ऐसी मूवी जिसने पूरे बॉलीवुड की दिशा ही बदल दी। मूवी का नाम था दीवार जिसने बॉलीवुड को एक एंग्री यंग मैन दिया। इस मूवी में निरूपा रॉय ने अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की मां का किरदार निभाया। तुम जाना चाहते हो तो जाओ लेकिन मां नहीं जाएगी। मां मेरे साथ चलो। कहा मैंने कि मां नहीं जाएगी। मां जाएगी। अपनी मां को खरीदने की कोशिश मत कर। तू अभी इतना अमीर नहीं होगा बेटा कि अपनी मां को खरीद सके। और इसी मूवी का डायलॉग था मेरे पास बिल्डिंग है, प्रॉपर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है, क्या है तुम्हारा? मेरे पास। [संगीत] जो अब कल्ट बन चुका है और आज भी लोग इसे मीम्स के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। क्या है तेरे पास? मेरे पास मोहर है। आज मेरे पास इतनी ताकत है कि मैं दो मिनट में मां को उठवा सकता हूं। लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा। बाप का इंतजार करूंगा। एक बार बाप मुझे मिल जाए ना तो मांओं की लाइन लगा दूंगा मैं। दीवार में मां बनकर निरूपा रॉय ने अपनी छवि ही बदल ली। और अब वो हर फिल्म मेकर की मां के किरदार के लिए पहली पसंद बनने लगी। इसके बाद एक और ब्लॉकबस्टर मूवी आई जिसका नाम था अकबर [संगीत] और इस मूवी में भी निरूपा रॉय, अमर, अकबर, एंथनी तीनों की मां बनी और इतनी लापरवाह मां बनी कि उसने एक साथ तीनों बेटों को एक ही मेले में खो दिया। इस मूवी में भी एक रोती गिड़गिड़ाती दुखियारी मां बनकर उसने दुनिया भर के दुखों का पहाड़ खड़ा कर दिया। ये तुमने अपनी क्या हालत बनाई है। कंगू कह रही है कि तुम्हें टीबी होनी चाहिए। मुझे कोई दिखाई नहीं देता। मैं कुछ देख नहीं सकती। आपके पति और आपके बच्चे एक्सीडेंट में मारे गए। तो साला ये दुख काहे खत्म नहीं होता बे? इसके बाद मुकद्दर का सिकंदर आई और इसमें भी वो अमिताभ बच्चन की मां बनी और ऐसी मां बनी कि लोगों ने बस यही कहा। माता जी 1979 में जब शशि कपूर और शत्रुघन सिन्हा गौतम गोविंदा बने, तो इसमें निरूपा रॉय दोनों की मां बनी और फिर से एक दुखियारी मां बनी। बेटा बेटा हम कर ले। बेटा हम कर ले। तुम्हारा बेटा हम कर लेते। तो हमारा दिल चीर चीर हो जाता है। हमारी हिम्मत हमारी शक्ति 50 गुना बढ़ जात है। बंद करो हाथ जोड़ के मैं फिर धर्मेंद्र की बेहतरीन मूवी आई कर्तव्य और इस मूवी में निरूपा रॉय धर्मेंद्र की मां बनी और हां फिर से दुखियारी मां बनी। आज मैंने उसके साथ अपने बिछड़े हुए बेटे को भी देखा है। वो वो तेरा छोटा भाई है। फिर खानदान मूवी में वो जितेंद्र की मां बनी।

इसके बाद अमिताभ बच्चन और शशि कपूर सुहाग लेकर आए मतलब अपनी मां का और इस मूवी में भी उनकी मां निरूपा रॉय ही बनी। ये मंगलसूत्र मेरे सुहाग की निशानी है। मैं इसे किसी कीमत में भी अपने से जुदा नहीं होने दूंगी। तेरा सुहाग मैं भी हूं। ये सोने के टुकड़े और ये ये कच्चे धागे नहीं। बात तो सही है। क्योंकि किरदार वही था रोने-धोने वाला। और अब तो मानो रोने-धोने वाले किरदार की वो पहली पहचान ही बन गई थी। निरूपा रॉय को फिल्मों में इतना इमोशनल दिखाया जाता था कि लोग अपनी हंसती हुई मां को भी दुखी मानने लगे थे और अगर गलती से भी किसी सीन में वो हंस दे तो लोगों को भरोसा नहीं होता था कि यह निरूपा रॉय है। 1981 में हेमा मालिनी ने बारिश के पानी वाली मछली बनकर यह कहा जिंदगी की ना टूटे लड़ी। मूवी आई क्रांति जो मनोज कुमार की थी और एक बेहतरीन मूवी थी। तो इस मूवी में भी निरूपा रॉय मनोज कुमार की मां बन गई। लो बेटी पानी पियो। लो मैं हमेशा की तरह मार खाकर बेहोश हो जाऊंगी। और सच में निरूपा रॉय अब एक गरीब, लाचार, बेबस और दुखियारी मां का चेहरा ही बन चुकी थी। जो बिना डायलॉग बोले भी दुखी मां की कहानी कह देती थी। 1985 में अमिताभ बच्चन मर्द बने। मतलब वो मर्द ही हैं। मूवी का नाम था मर्द। और शायद ही कोई होगा जिसने यह मूवी ना देखी हो। मतलब कई तरीके से यह मूवी खास थी। एक तो दारा सिंह की एक्टिंग। मेरी जिंदगी की भीख मांगकर अच्छा नहीं किया लेडी हेलना। आज एक आजाद सिंह मरता तो कल भारत माता को आजाद कराने के लिए हजारों आजाद सिंह पैदा होते। दूसरा अमृता सिंह की खूबसूरती। तीसरा मूवी के गाने और चौथा और सबसे जरूरी निरूपा रॉय की एक्टिंग। और वह भी सैड एक्टिंग। मतलब जिसने भी यह मूवी देखी होगी, वह निरूपा रॉय का दुखी और हताश चेहरा कई दिनों तक भूला नहीं होगा। [संगीत] जिसे देखने के बाद करोड़पति आदमी को भी यह लगने लगता है कि उसकी मां दुनिया की सबसे दुखी और गरीब बेबस मां है। [संगीत] [संगीत] जब अमिताभ बच्चन ने उनके लिए यह गाया मां मेरी मां से मिला दे मुझे ममता का मैं तो बची खुची कसर भी पूरी हो गई [संगीत] [संगीत] इसके बाद संजय दत्त के नामोनिशान में भी वो एक गंभीर किरदार निभाते हुए नजर आई। [संगीत] फिर गंगा जमुना सरस्वती में वह फिर से अमिताभ बच्चन की मां बनी और ये किरदार भी बॉलीवुड की सबसे दुखियारी मां वाली किरदारों में से एक बन गया। ऐसी नीच हरकत करके तूने राखी के पवित्र ढाके से अपनी बहन का गला काटा है। अगर तुझ जैसे भाई और पैदा हो जाए तो इस दुनिया से राखी का त्यौहार मिट जाएगा। 1988 में मूवी आई प्यार का मंदिर और निरूपा रॉय मिथुन दा की मां बनी और अब उनकी उम्र ढल चुकी थी जो सच में मां की उम्र भी पार कर चुकी थी। इसके बाद भी निरूपा रॉय ने कई मूवीज में काम किया। वो हर बड़े एक्टर की मां बनी। मां का किरदार इतना ज्यादा निभाया कि उन्हें बॉलीवुड की ही मां कहा जाने लगा था। निरूपा रॉय ने सबसे ज्यादा अमिताभ बच्चन की मां का किरदार निभाया। वह पर्दे पर अमिताभ बच्चन की इतनी बार मां बनी कि निरूपा रॉय सच में अमिताभ बच्चन को अपना बेटा समझने लगी थी और कई बार वह शूटिंग के समय ही इतनी इमोशनल हो जाती थी कि डायरेक्टर को कट बोलकर समझाना पड़ता था कि यह शूटिंग है और अमिताभ बच्चन आपका सच में बेटा नहीं है और आप सच में इतनी दुखी नहीं हैं। निरूपा रॉय ने अपनी आखिरी मूवी में भी अमिताभ बच्चन की मां का ही किरदार निभाया था। 1999 में जब अमिताभ बच्चन लाल बादशाह बने तो इसमें उनकी मां निरूपा रॉय ही बनी। मतलब निरूपा रॉय ने अपने करियर का अंत भी अमिताभ बच्चन की मां बनकर ही किया। है कोई माई का लाल जो इस मां से अपने लाडले को छीन कर ले जाने की ताकत रखता हो। और यह मूवी निरूपा रॉय की आखिरी मूवी थी। निरूपा रॉय ने मां के किरदार को पर्दे पर अमर कर दिया और मां की ऐसी छवि बनाई जिसे सिनेमा के शौकीन कभी नहीं भूलेंगे। लेकिन दुख की बात यह रही कि जो औरत पर्दे पर सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली मां थी जिसे बॉलीवुड की मां कहा जाता था। उसे असल जिंदगी में नर्क जैसा जीवन जीना पड़ा और उसकी खुद की जिंदगी में कुछ ऐसा हुआ जिसके बारे में सोचकर भी दिल भर आता है। तो अब हम बात करेंगे निरूपा रॉय की पर्सनल लाइफ की। तुझे मेरे गीत बुलाते हैं। निरूपा रॉय की जिंदगी जैसी पर्दे पर दिखती थी। मतलब दुखी बेबस वैसी ही असल जिंदगी भी रही। छोटी सी उम्र में ही पिता ने शादी कर दी थी। वह ना तो बचपन ठीक से खेल पाई और ना ही जवानी ठीक से देख पाई और जब पति के कहने पर फिल्मों में काम करना शुरू किया तो पिता रूठ गए। पिता को फिल्मों में काम करने वाले लोगों से नफरत थी। तो जैसे ही निरूपा रॉय हीरोइन बनी तो पिता ने उनसे ऐसे मुंह फेरा कि उसकी शक्ल देखने से भी परहेज करने लगी। निरूपा रॉय जिंदगी भर अपने पिता और परिवार के प्यार के लिए तरसती रही। लेकिन पिता ने उसे ऐसे नकारा कि फिर जिंदगी भर ना तो कभी उसे घर बुलाया ना ही परिवार के किसी सदस्य को उससे मिलने दिया। यहां तक कि निरूपा रॉय को अपने पिता का चेहरा मरते दम तक नसीब नहीं हुआ और वह पूरी उम्र इस दुख से पल-पल मरती रही। प्रभु तुम्हें प्रकाश दो। एक पल है हंसना एक पल है रोना। मतलब कोई पिता कितना कठोर हो सकता है इसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। सिर्फ फिल्म में काम करने के लिए ऐसी सजा कि पिता मर गया लेकिन लौट कर उसने अपनी बेटी का चेहरा नहीं देखा और ना ही कभी उसे अपना चेहरा दिखाया। शादी के बाद निरूपा रॉय के दो बेटे हुए। योगेश और किरण और दोनों ही बेटे अपने जीवन में सफल हुए। उन्होंने एक्टिंग से हटकर अपना करियर चुना। दोनों की शादी हुई और दोनों खुशहाल जिंदगी जीने लगे। लेकिन हंगामा तब हुआ जब 2001 में अचानक से निरूपा रॉय की छोटी बहू ने निरूपा रॉय पर दहेज प्रताड़ना का केस कर दिया।

वह खुद एक पढ़ी लिखी और एयरलाइंस में काम करने वाली महिला थी। लेकिन उसने आरोप लगाया कि उसकी सास यानी कि निरूपा रॉय ने उसे मारा पीटा है। उसे दहेज के लिए सताया है और उस पर अत्याचार किए हैं और निरूपा रॉय को जेल की हवा भी खानी पड़ी। निरूपा रॉय अब उम्र के उस पड़ाव में थी जब उन्हें आराम की जरूरत थी। उनकी उम्र ढल चुकी थी, लेकिन अपने बेटे और बहू के कारण वह फिल्मों की तरह कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने को मजबूर हो गई थी। उनके दिन अदालतों के चक्कर काटने में निकल रहे थे। वो बेबस और लाचार होकर भटक रही थी। हमार बेटवा हमें छोड़ गवा है ना तो तुम लोग भी मुझे छोड़ दो। ये गंगा किसी का साथ नहीं मांगेगी। किसी से भीख नहीं मांगेगी। मैं लेकिन दुख यहीं खत्म नहीं हुआ। निरूपा रॉय ने 1963 में एक बंगला खरीदा था। जिसकी कीमत सन 2000 आते-आते लगभग ₹100 करोड़ हो गई थी और उनके बेटे और बहुओं में उनकी जायदाद को लेकर ऐसा लालच बढ़ा कि उन्होंने निरूपा रॉय पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। बड़ा बेटा उसे मारने लगा। बहू टॉर्चर करने लगी। छोटा बेटा कई कई दिनों तक उन्हें भूखा रखता था। उनके खुद के बच्चों ने उनकी जिंदगी नर्क से भी बदतर बना दी थी। और यह सब इसलिए था ताकि वह अपनी जायदाद अपने किसी एक बेटे के नाम कर दें। दोनों बेटों में आपस में ही लड़ाई होती थी। झगड़े होते थे। दोनों निरूपा रॉय को मजबूर करते थे कि वह अपनी जायदाद उनके नाम लिख दे और इसके लिए अत्याचार इतने बढ़ गए कि वो निरूपा रॉय के साथ मारपीट तक करने लगे। वो उसे कई कई दिनों तक भूखा रखकर खाने के लिए तरसाते थे। उसके सामने शर्त रखते थे कि तुम अपना सब कुछ मेरे नाम कर दो। नहीं तो हम तुम्हें मार देंगे। और अपने बच्चों का ऐसा रूप तो निरूपा रॉय ने किसी मूवी में भी नहीं देखा था। मैं अपनी ममता का गला घोट लूंगी। लेकिन ये कभी नहीं कहूंगी कि मैं तुम्हारी मां हूं। मरते हुए भी ये नहीं कहूंगी कि मेरे में मुंह गंदा जल डालो। जो जायदाद के लिए भूखे भेड़िए बन चुके थे और अपनी ही मां को खा रहे थे। निरूपा रॉय अपने पति के रहते हुए भी निसहाय और बेसहारा हो चुकी थी। क्योंकि उनके पति की उम्र भी ढल चुकी थी और उनकी हालत भी बदतर हो चुकी थी। और जब यह प्रताड़ना हद से ज्यादा बढ़ गई तो निरूपा रॉय ने मजबूर होकर अपनी सारी जायदाद अपने छोटे बेटे किरण के नाम कर दी। हालांकि उनके दुखों का अंत अभी भी नहीं हुआ बल्कि उनके दुख और ज्यादा बढ़ गए। दोनों बेटों ने उन्हें वह नर्क दिखाया जिसकी कल्पना करना भी कठिन है और ऐसे ही दिन रात घुट-घुट कर मरते हुए 13 अक्टूबर 2004 को निरूपा रॉय की मौत हो गई। उन्हें दिल का दौरा पड़ा और तड़पते-तड़पते उन्होंने यह दुनिया छोड़ दी। लेकिन इससे भी बड़े दुख की बात यह थी कि निरूपा रॉय की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार नहीं हुआ। उनके दरिंदे बेटों ने ना तो उन्हें अग्नि दी और ना ही उनका अंतिम संस्कार किया और उनके अंतिम संस्कार की किसी को भनक तक नहीं लगी। बल्कि लोगों के पैरों के नीचे से जमीन तब खिसक गई जब लोगों को पता चला कि निरूपा रॉय की मौत के बाद उनके बेटों ने उनकी लाश को एक बोरे में भरकर कचरे में फेंक दिया था और उस लाश को कई आवारा कुत्ते नोचन-नोच कर खा गए। लोगों ने उनके मृत शरीर को कुत्तों को खाते हुए देखा। यह ना सिर्फ इंसानियत को शर्मसार करने वाला था

बल्कि मां बेटे के रिश्ते को कलंक लगाने जैसा भी था। और ऐसे हैवान बेटे जो बेटों के नाम पर धब्बा थे जिन्हें समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। मतलब का है [संगीत] प्यार। लोगों मतलब का लेकिन अभी कहानी खत्म नहीं हुई थी। निरूपा रॉय की मौत के बाद दोनों भाइयों में उनकी प्रॉपर्टी को लेकर झगड़ा अदालत तक पहुंच गया। जहां यह सारी कहानी दोनों भाइयों ने एक दूसरे पर इल्जाम लगाकर कबूल की कि कैसे उन्होंने अपनी मां को जिंदा मौत दी। एक ने दूसरे पर इल्जाम लगाए कि इसने मेरी मां पर अत्याचार किए हैं और दूसरे ने पहले पर दोनों ने अपनी ही मां की इज्जत अदालत में खूब उछाली और मरने के बाद भी अपनी मां की आत्मा को शांति नहीं मिलने दी। अदालत ने पूरी जायदाद के दो हिस्से करके दोनों में बांटने का आदेश दे दिया। लेकिन दोनों बेटों का तब भी मन नहीं भरा। दोनों बेटों में अपनी मां के एक कमरे को लेकर आज भी लड़ाई चल रही है और दोनों आज भी अदालत के चक्कर काट रहे हैं। मांवारी जाए बलिहारी जाए मांवारी जाए। मतलब ऐसे बेटे भगवान किसी दुश्मन को भी ना दे। निरूपा रॉय अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन जो दुख और दर्द उन्होंने झेला है वो ना सिर्फ इंसानियत को शर्मसार करने वाला है बल्कि रिश्तों पर कालिक जैसा भी है। 2015 में उनके पति की भी मौत हो चुकी है। मैंने अब तक सैकड़ों कहानियां पढ़ी हैं। सैकड़ों हीरो हीरोइन पर वीडियो बनाए हैं। लेकिन ऐसी कहानी और ऐसी हालत किसी दूसरी हीरोइन की नहीं देखी। जिंदगी बहुत अजीब है। कोई मजदूरी करके भी अपनी पूरी जिंदगी खुशी-खुशी जी लेता है और चैन से मरता भी है तो वहीं कोई 100 करोड़ की संपत्ति का मालिक होकर भी उसकी लाश को कुत्ते खा जाते हैं। किस्मत ने [संगीत] लिखी आंसुओं से तेरी कहानी ओ महलों की रानी। आशा है आपको यह वीडियो पसंद आया होगा। अगर आपको हमारी मेहनत पसंद आती है तो वीडियो शेयर कीजिए, लाइक कीजिए और फिल्मी विचार को सब्सक्राइब कीजिए। धन्यवाद।

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