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जब फिल्मी दुनिया छोड़ दिल्ली में पिता के पास पहुंचे अमिताभ, फिर एक सलाह ने कैसे बदली जिंदगी?

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जिस हीरोइन को पर्दे पर देखकर किसी युवक में हीरो बनने की हसरत जमा हुई हो, अगर उसी हीरोइन की पार्टी में शरीक होने का मौका मिल जाए, तो उसकी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं। तू जहां जहां चलेगा मेरा साया। शिपिंग फर्म की नौकरी छोड़ फिल्मों में भाग्य आजमाने मुंबई आए। 26 साल के अमिताभ बच्चन ने तो सोचा भी नहीं था कि फिल्मी दुनिया में उनकी पहली सुबह जो बेहद मायूस करने वाली थी वो इतनी एक्साइटिंग शाम लेकर आएगी। हुआ यह था कि जिस नरगिस दत्त के भरोसे अमिताभ दिल्ली से मुंबई आए थे, उन्होंने एक असिस्टेंट डायरेक्टर राज ग्रोवर संग अमिताभ को रूपतारा स्टूडियो भेज दिया था एक फिल्म में स्क्रीन टेस्ट के लिए। पुकारू गलियों में। [संगीत] यह फिल्म मोहन सहगल बना रहे थे और मनोज कुमार लीड रोल में थे। अमिताभ का स्क्रीन टेस्ट हुआ। डायरेक्टर ने मुंह बिचकाया और बाद में उनके मुंह से यह निकला कि इस लड़के ने तो मेरा टाइम ही नहीं रील भी खराब कर दी। हताश निराश अमिताभ बच्चन शाम को नरगिस और सुनील दत्त के घर पहुंचे जो एक पार्टी में जा रहे थे। उन्होंने लड़के का मूड फ्रेश करने के लिए सोचा इसे भी अपने साथ ले चलें।

यह पार्टी उस दौर की बड़ी हीरोइन साधना की ओर से दी गई थी जिसमें फिल्मी दुनिया की तमाम हस्तियां मौजूद थी। अमिताभ भी एक कोने में खड़े पार्टी के शबाब तक जाने का इंतजार कर रहे थे। अभी खाना पीना चल ही रहा था कि एक पत्रकार और फिल्म मेकर में कुछ कहासनी हुई और झगड़ा बढ़ता ही चला गया। धीरे-धीरे झगड़े में कई और लोग शामिल हुए और थोड़ी ही देर बाद तू तूममे से बात जूतम पैजार तक पहुंची। एक दूसरे पर खाने की प्लेट और बोतलें भी फेंकी जाने लगी। एक किताब में खुद अमिताभ के हवाले से लिखा है कि एक तरह की फ्री फाइट बन गई थी और मैं थोड़ी देर के लिए बेहद परेशान हो गया। झगड़ा तो धीरे-धीरे खत्म हो गया लेकिन मैं सोचता रहा कि साधना जी पर क्या गुजरी होगी। फिर मैंने थोड़ी देर बाद देखा कि वो तो बिल्कुल नॉर्मल है। लोगों से हंस बोल रही थी और फिर वहां से काम पर निकल गई। मानो यहां कुछ हुआ ही नहीं। इस घटना ने अमिताभ के भीतर फिल्मी दुनिया और यहां के लोगों को लेकर एक तरह की घृणा भर दी और अगले ही सुबह वह सामान पैक कर मुंबई से दिल्ली रवाना हो गए जहां उनके माता-पिता रहते थे।

अमिताभ ने पिता हरिवंश राय बच्चन को पूरी घटना बताई और कहा कि मेरा तो उस दुनिया में अब लौटने का मन ही नहीं कर रहा। हरिवंश राय बच्चन जो उस समय विदेश मंत्रालय में हिंदी अधिकारी के पद पर काम कर रहे थे। उन्होंने बेटे से जो कुछ कहा वही हमारे आगे की कहानी बनने वाली है। [संगीत] हरिवंश राय बच्चन ने बेटे को हार नहीं मानने की नसीहत देते हुए कहा कि बलराज साहनी को देखा है? उन्होंने कहा यह भी कोई पूछने की बात है। पिता ने कहा कि बस तुम्हें बलराज साहनी बनना है। जैसे वो फिल्मी दुनिया में रहते हुए भी फिल्मी दुनिया से बाहर रहते हैं। और उनके जैसे एक्टर बन सको तो और भी बेहतर। और अमिताभ जब कुछ दिन दिल्ली में बिताने के बाद दोबारा मुंबई रवाना हुए तो उनके पिता ने उनसे कहा कि एक बार बलराज साहनी से जरूर मिलना। यह वही बलराज साहनी थे जिनकी एक्टिंग का लोहा पूरी इंडस्ट्री मानती थी। दो बीघा जमीन, काबली वाला, वक्त और गर्म हवा जैसी कल्ट क्लासिक फिल्मों ने उन्हें उस दौर के लीजन एक्टर्स में शुमार कर दिया था। हालांकि ग्लैमर और फिल्मी सियासी दुनिया से परे वह अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीते थे। फिल्में भी वही करते जिसमें दिल रम जाए।

तुझे सूरज कहूं या चंदा तुझे दीप कहूं। उनके बोलने का अंदाज उनकी अदाकारी को और ऊपर ले जाता था। तू पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बन जाए। जब हम फुटपाथों पे थोड़े सोया करेंगे हमारा अपना एक छोटा सा मकान। इंसान मेहनत करे तो क्या नहीं हो सकता। पंडित जी किस्मत हथेली में नहीं इंसान के बाजुओं में होती है। मैं पूछता हूं अचानक किस्मत [नाक से की जाने वाली आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] में मुझ पे रहम क्यों आ गया? मुझे इतनी खुशी देती जिससे मैं सह भी नहीं। असल में हरिवंश राय बच्चन और बलराज साहनी एक दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। दोनों परिवारों में साहित्यिक जुड़ाव के अलावा हरिवंश राय बच्चन ने इंग्लैंड से पीएचडी की थी। जबकि बलराज साहनी बीबीसी लंदन में काम करते थे। हरिवंश राय बच्चन ने तो अमिताभ से यहां तक कहा था कि फिल्मों में अपने करियर को लेकर बलराज से राय ले लेना। अगर वह कहे तो ठहरना वरना लौट आना। मेरा नाम करेगा रोशन। जग में मेरा खैर बलराज ने अमिताभ का पहली मुलाकात में हौसला बढ़ाया और कहा कि फिल्मी दुनिया में रहना है तो कमल के पत्ते की तरह रहो पानी गिरे या कीचड़ लगे इन सब से अछूता रहना होगा और दोस्तों शायद अमिताभ ने इस बात को ही मूल मंत्र बना लिया शुरू में तमाम नाकामी और तिरस्कार को सहते हुए अपना रास्ता बनाते रहे और एक दिन मंजिल भी तय किया। दर्जन भर फ्लॉप फिल्मों के बाद जिस साल अमिताभ बच्चन का सितारा चमका यानी जंजीर की रिलीज के साथ उससे 1 महीने पहले ही बलराज साहनी ये दुनिया छोड़ चले थे।

लेकिन जाते-जाते भी एक कालजई फिल्म गर्म हवा दे गए जिसने लंबे समय तक उनकी अदाकारी की याद दिलाई। ये उम्र वतन छोड़कर जाने की नहीं इस दुनिया से उस दुनिया में जाने की। अमिताभ ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 2 बीघा जमीन से मैंने सीखा कि बिना किसी बनावटी हावभाव के खुद को कैसे किरदार में पूरी तरह डुबोया जा सकता है। साथ ही यह भी कि संवाद अदायगी केवल चीखने चिल्लाने से नहीं बल्कि रुक ठहर कर साफ-साफ अपनी बात कहने का भी नाम है। इतनी रात क्या यहां क्या कर रहे हो? सिपाही जी मैं तो लौट गया। बर्बाद हो गया। मेरी सारी पूंजी चोरी हो गई। आज ही गांव से आए थे। आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है। आज की रात में फुटपाथ पर नींद आएगी। और दोस्तों जो बातें मैं बता रहा हूं वह खुद अमिताभ बच्चन ने ही लिखी है। बलराज साहनी की एक बायोग्राफी के फॉरवर्ड में जिसे उनके बेटे परीक्षित साहनी ने लिखा था और अमिताभ इस किताब के विमोचन पर भी मौजूद थे। परीक्षित साहनी जो वैसे तो अमिताभ बच्चन को दिल्ली में पढ़ाई के दिनों से जानते थे। लेकिन पिता बलराज साहनी के इतने नामो शोहरत के बावजूद फिल्मों में कोई बड़ी जगह नहीं बना सके। हालांकि उनकी एक्टिंग पर पिता की छाप दिखती है और उन्होंने अमिताभ के साथ भी कई फिल्में की हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस शख्स की नसीहत से अमिताभ ने अपने अभिनय का रास्ता बनाया, बाद में उसके बेटे की मदद को आगे आए। परीक्षित ने एक इंटरव्यू में बताया था कि मुझे फिल्मों में काम नहीं मिल रहा था, तब अमिताभ ने तमाम प्रोड्यूसर से बात करके काम दिलवाए। खैर साल 1973 जहां से अमिताभ का स्टारडम शुरू होता है, वहां तक आते-आते उस साधना का करियर भी ढल चुका था। हालांकि उन्होंने ताऊ उम्र अमिताभ के स्टारडम की चमक देखी और तब उन्हें याद भी ना रहा कि उनकी ही एक पार्टी सेक्टर के लिए टर्निंग पॉइंट बनी थी। अमिताभ की मानें तो उनके युवा दिनों में जो हीरोइनें आइडल हुआ करती थी उनमें से दो के साथ ही उन्हें बतौर हीरो काम करने का मौका मिला। एक वहीदा रहमान और दूसरी नूतन।

आशा पारिक जैसी कुछ हीरोइनें शुरू में उनकी हीरोइन बनने से कन्नी काटती रही। बाद में उनकी भाभी और मां तक बनी। लेकिन अमिताभ को बलराज साहनी संग काम नहीं कर पाने का ज्यादा मलाल रहा। उनकी एक्टिंग खासकर एंग्री यंग मैन के कई किरदारों पर भी बलराज साहनी का प्रभाव दिखाई देता है। हालांकि अमिताभ बच्चन दिलीप कुमार को भी अपना आइडल कहते रहे हैं और हालिया केबीसी में तो उन्होंने यहां तक कह डाला कि बॉलीवुड का इतिहास अगर दो भागों में बांटें तो एक दिलीप साहब से पहले और दूसरा उनके बाद का होगा। लेकिन खुद दिलीप कुमार साहब जब तक जीते रहे अमिताभ की एक्टिंग के कसीदे पढ़ते आए थे। बहरहाल यह एक्टर जिसने कई छोटे बड़े किरदारों को पर्दे पर ऐसे जीवंत किया मानो वो खुद उन्हें जी रहा हो। वो लंबे समय तक कई कलाकारों के लिए इंस्पिरेशन रहा। बलराज साहनी इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन से भी जुड़े रहे और उन्होंने ही हिंदी सिनेमा में यथार्थवादी अभिनय की नींव रखी थी। आज ही गांव से आए थे और कोई ठिकाना नहीं मिला तो यहीं पढ़ के सब। तो इस महान कलाकार की यादों के साथ आज बस इतना ही। चलते-चलते वीडियो लाइक और शेयर तो करें ही। अगर चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो वह भी करते चलें। कमेंट बॉक्स में आपकी हर राय का स्वागत है। शुक्रिया नमस्ते आभार। मेरा नाम करेगा रोशन जग

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