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पाकिस्तान ने क्यों वापस मांगी 4500 साल पुरानी मूर्ति? वजह जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे

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साल 1947 एक तरफ देश की सीमाएं खींची जा रही थी। दूसरी तरफ सदियों पुरानी यादें, रिश्ते और घर छूट रहे थे। लेकिन बंटवारे की कहानी सिर्फ जमीन की नहीं थी। उस समय सवाल यह भी था कि जो चीजें सदियों से इस भूगोल की साझा विरासत रही है, उनका मालिक कौन होगा?

सरकारी इमारतें किसे मिलेंगी? रेलवे का सामान किसके हिस्से जाएगा? पैसा कितना बांटा जाएगा? कितनी बंदूकें, कितनी गाड़ियां, कितने दफ्तर और कितनी फाइलें किस देश को मिलेंगी? लेकिन इसी बंटवारे में एक और सवाल था। हजारों साल पुरानी सभ्यता की निशानियां किसे मिलेंगी? और इसी सवाल के बीच दो छोटी सी मूर्तियां अचानक बहुत बड़ी हो गई।

एक पत्थर की छोटी सी पुरुष आकृति जिसे बाद में प्रीस्ट किंग कहा गया और दूसरी सिर्फ 10 1/2 सेंटीमीटर की कांस्य प्रतिमा एक युवती हाथ में कंगन गले में आभूषण शरीर का आत्मविश्वास भरा हुआ अंदाज और एक ऐसी मुद्रा जिसे देखकर पुरातत्वविदों ने उसका नाम रख दिया डांसिंग यानी नाचती हुई लड़की। आज यह प्रतिमा दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में है।

लेकिन इसकी कहानी दिल्ली से शुरू नहीं होती। इसकी कहानी जाती है मोहनजोदड़ो तक। उस मोहनजोदड़ो तक जो आज पाकिस्तान के सिंध प्रांत में है। और फिर यह कहानी पहुंचती है 1947 की उस मेज तक जहां भारत और पाकिस्तान सिर्फ भविष्य नहीं बांट रहे थे। वो अतीत भी बांट रहे थे।

मोहनजोदाड़ो के एचआर क्षेत्र में ब्रिटिश पुरातत्वविद अर्नेनेस्ट मेके की टीम काम कर रही थी और इसी खुदाई में कांसे की यह छोटी सी आकृति मिली। आकार में बेहद छोटी लेकिन कला की दृष्टि से असाधारण। आज राष्ट्रीय संग्रहालय के रिकॉर्ड में इसका आकार 10.5 सें.मी. लंबा, 5 सें.मी. चौड़ा और 2.5 सें.मी. मोटा दर्ज है। यह कांसे की बनी है और इसे लॉस्ट वैक्स यानी मोम को गलाकर ढलाई करने की प्राचीन तकनीक से बनाया गया है।

राष्ट्रीय संग्रहालय इसे लगभग 2700 से 2100 ईसा पूर्व के हड़प्पाई काल से जोड़ता है। यानी जिस समय दुनिया के कई हिस्सों में शुरुआती नगर सभ्यताएं विकसित हो रही थी, उस समय सिंधु सभ्यता के कारीगर धातु को इतनी बारीकी से ढाल रहे थे कि हजारों साल बाद भी उसकी बनाई हुई आकृति लोगों को हैरान कर रही है।

प्रतिमा की एक बा में कंगनों की भरमार है। दूसरा हाथ कमर पर है। सिर थोड़ा पीछे की ओर उठा हुआ है। पैरों की मुद्रा ऐसी है कि उसे देखकर नृत्य का आभास होता है। इसलिए इसे डांसिंग गर्ल कहा गया। राष्ट्रीय संग्रहालय भी इसे नृत्य करती हुई महिला की आकृति के रूप में प्रस्तुत करता है।

लेकिन यहां एक दिलचस्प बात है। हम यह निश्चित रूप से नहीं जानते कि यह महिला कौन थी? वो सचमुच नृतकी थी या फिर नहीं। उसकी सामाजिक स्थिति क्या थी? उस प्रतिमा का इस्तेमाल किस उद्देश्य से होता था? इन सवालों के पक्के जवाब हमारेपास नहीं है।

इतिहास में कई बार नाम बाद में मिलते हैं और उस नाम के पीछे एक पूरी कहानी खड़ी हो जाती है। डांसिंग गर्ल भी ऐसी ही एक नाम है। फिर आया 1947। 1947 से पहले मोहनजोदड़ो से मिली अनेक वस्तुएं ब्रिटिश भारत की पुरातात्विक व्यवस्था के तहत लाहौर और फिर दिल्ली तक पहुंची। लेकिन जब भारत का विभाजन हुआ तो मोहनजोदड़ो पाकिस्तान में चला गया। वहीं से एक बेहद पेचीदा सवाल खड़ा हुआ।

पाकिस्तान का तर्क सीधा था कि जिस जमीन से यह चीजें मिली हैं, वह अब पाकिस्तान में है। तो फिर इन चीजों का अधिकार भारत के पास कैसे रह सकता है? नई पाकिस्तानी सरकार ने मोहनजोदड़ो से मिली पुरातात्विक वस्तुओं को वापस लेने की मांग की।

भारत ने इन्हें वापस करने से इंकार किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच पुरातात्विक वस्तुओं के बंटवारे पर बातचीत हुई और यहां कहानी और भी दिलचस्प हो जाती है। कहा जाता है कि मोहनजोदड़ो से मिली लगभग 12,000 वस्तुओं के बंटवारे पर समझौता हुआ। यह संख्या सुनने में बहुत बड़ी लगती है।

लेकिन इसमें बड़ी संख्या मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों और दूसरी छोटी वस्तुओं की थी। और कुछ मामलों में बंटवारा इतना शाब्दिक था कि एक ही आभूषण के मोती तक दोनों देशों के बीच अलग-अलग कर दिए गए। यानी जिस विरासत को हजारों साल पहले किसी कारीगर ने एक साथ बनाया था उसे आधुनिक राष्ट्र राज्यों ने दो हिस्सों में बांट दिया। और फिर सामने आई दो सबसे मशहूर आकृतियां।मोहनजोदड़ो से मिली हजारों वस्तुओं में दो आकृतियां सबसे ज्यादा चर्चित थी। पहली प्रीस्ट किंग और दूसरी डांसिंग गर्ल।

प्रीस्ट किंग पत्थर की एक छोटी सी पुरुष आकृति है। सिर पर बंधा हुआ वस्त्र, चेहरे पर दाढ़ी और शरीर पर एक ऐसा परिधान जिस पर बारीक डिजाइन दिखाई देती है। हालांकि एक बात यहां भी याद रखनी चाहिए। प्रीस्ट किंग नाम भी कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक पद भी नहीं है। यह आधुनिक पुरातत्व की दी हुई पहचान है। हम वास्तव में यह नहीं जानते कि यह व्यक्ति पुजारी था, राजा था या कोई और महत्वपूर्ण व्यक्ति था। यानी जिसे हम आज प्रीस्ट किंग कहते हैं वो नाम भी एक अनुमान है और डांसिंग गर्ल भी एक व्याख्या है। इतिहास की खूबसूरती शायद यही है कि हजारों साल पुरानी वस्तुएं हमारे सामने हैं। लेकिन उसके पीछे की आवाजें हमेशा हमारे पास नहीं है। अब सवाल आता है कि बंटवारे में किसे क्या मिला?

जब इन दोनों प्रसिद्ध आकृतियों की बात आई तो मामला और संवेदनशील हो गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक पाकिस्तान को प्रीस्ट किंग मिला जबकि भारत के पास डांसिंग गर्ल रही। यानी मोहनजोदड़ो की दो चर्चित मानवीय आकृतियों में से एक पाकिस्तान चली गई और दूसरी भारत के पास रही। यही वो बिंदु है जहां 1947 का बंटवारा सिर्फ नक्शे का बंटवारा नहीं रह जाता। यह सांस्कृतिक स्मृति का बंटवारा भी बन जाता है।

एक ऐसी सभ्यता जिसकी सीमाएं आज भारत और पाकिस्तान की सीमाओं से कहीं पुरानी है। उसकी निशानियां दो अलग-अलग देशों की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा बन गई। आज प्रीस्ट किंग पाकिस्तान की विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक है और डांसिंग गर्ल भारत में हड़प्पा सभ्यता की सबसे पहचानी जाने वाली कलाकृतियों में से एक है। लेकिन पाकिस्तान ने डांसिंग गर्ल को कभी भुलाया नहीं और ना ही बंटवारे के बाद कहानी खत्म हुई। समय बीतता गया। भारत और पाकिस्तान के बीच कई युद्ध हुए। राजनीतिक संबंध बदलते रहे। सरकारें आती जाती रही।

लेकिन मोहनजोदड़ो की कुछ वस्तुओं का सवाल बीच-बीच में उठता रहा। डांसिंग गर्ल को वापस पाकिस्तान ले जाने की मांग भी सामने आई। 2016 में पाकिस्तान में एक याचिका के जरिए भी इस प्रतिमा को वापस लाने की मांग उठी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि प्रतिमा मोहनजोदड़ो से मिली थी जो अब पाकिस्तान में है। लेकिन यह मांग कोई नई नहीं थी।

यह उस पुराने विवाद की ही अगली कड़ी थी जो 1947 में शुरू हुआ था। और यही बात इस छोटी सी प्रतिमा को असाधारण बना देती है। क्योंकि यहां सवाल सिर्फ कांसी की 10.5 सेंटीमीटर की मूर्ति का नहीं है। सवाल है कि क्या किसी सभ्यता की विरासत को आधुनिक सीमा रेखाओं के आधार पर बांटा जा सकता है।

लेकिन कहानी में एक और दिलचस्प विवाद है। डांसिंग गर्ल को लेकर सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच ही सवाल नहीं उठे। इसके नाम और उसकी पहचान को लेकर के भी बहस होती रही है। कुछ पुरातत्वविदों ने इस बात पर सवाल उठाया है कि आखिर इसे डांसिंग गर्ल क्यों कहा गया? पूर्व एएसआई निदेशक धर्मवीर शर्मा ने इस प्रतिमा की एक अलग व्याख्या प्रस्तुत की है।

उनके मुताबिक यह नृत्य करती हुई लड़की नहीं है। उनकी व्याख्या में यह महिला एक पारंपरिक औषधीय संदर्भ से जुड़ी हुई आकृति है और वो शिवलिंग के बीजों की और संकेत करती है। लेकिन इस व्याख्या को सर्वमान्य पुरातात्विक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। राष्ट्रीय संग्रहालय की आधिकारिक व्याख्या अब भी इसे डांसिंग गर्ल ही बताती है और उसकी मुद्रा को नृत्य से जोड़ती है। यानी मूर्ति एक है लेकिन उसे देखने की आंखें वो अलग-अलग है। किसी के लिए वह प्राचीन नृतकी है।

किसी के लिए वह किसी दूसरे सांस्कृतिक या औषधीय प्रतीक की आकृति हो सकती है। और शायद यही पुरातत्व का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। पत्थर और कांसा चुप रहते हैं और इतिहासकार उनकी भाषा समझने की कोशिश करते हैं। और अब सवाल है कि 2026 में यह कहानी फिर चर्चा में क्यों आई? हाल ही में एनसीआरटी की कक्षा नौ की किताब में डांसिंग गर्ल की तस्वीर को उसके मूल रूप से अलग तरीके से प्रस्तुत किया जाने पर विवाद हुआ।

किताब में प्रतिमा के शरीर के उस हिस्से को ढका हुआ दिखाया गया था जिसे मूल प्रतिमा में खुला दिखाया जाता है। इस पर सवाल उठा कि अगर इतिहास पढ़ाया जा रहा है तो क्या ऐतिहासिक कलाकृति को आधुनिक सामाजिक नजरिए के मुताबिक बदला जा सकता है?

विवाद बढ़ा तो एनसीआरटी ने समीक्षा के बाद मूल तस्वीर को वापस शामिल करने का फैसला किया और यहीं से एक बार फिर लोगों का ध्यान उस छोटी सी प्रतिमा पर गया जिसकी कहानी सिर्फ किताब के एक पन्ने की कहानी नहीं है। यह कहानी 1926 की खुदाई से निकलती है। 1947 के बंटवारे से गुजरती है और भारत और पाकिस्तान की सांस्कृतिक राजनीति तक पहुंचती है और फिर 2026 की पाठ्यपुस्तक तक वापस आ जाती है। अब आखिर में इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल क्या है?

4500 साल पुरानी एक छोटी सी कांसे प्रतिमा जिसका आकार इंसान की हथेली से भी छोटा है। वो दो आधुनिक देशों के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? इसका जवाब शायद प्रतिमा के आकार में नहीं उसकी स्मृति में छिपा है।

सिंधु घाटी सभ्यता आज के भारत और पाकिस्तान की राजनीतिक सीमाओं से हजारों साल पहले अस्तित्व में थी। उसके शहर आज की सीमाओं को नहीं जानते थे। उसकी नदियां पासपोर्ट नहीं मांगती थी। उसके कारीगर यह नहीं जानते थे कि हजारों साल बाद जिस जमीन पर वो काम कर रहे हैं वो दो देशों में बट जाएगी। मोहनजोदाड़ो आज पाकिस्तान में है। डांसिंग गर्ल आज भारत में है।

प्रिस्ट किंग पाकिस्तान में है। और इन दोनों को बनाने वाली सभ्यता दोनों देशों के अतीत का हिस्सा है। शायद इसलिए डांसिंग गर्ल की कहानी हमें सिर्फ यह नहीं बताती कि 1947 में क्या बांटा गया था। यह हमें यह भी बताती है कि इतिहास को बांटना कितना मुश्किल है। जमीन की सीमा खींची जा सकती है। नदी का किनारा तय किया जा सकता है।सरकारी संपत्ति का हिसाब लगाया जा सकता है।

खजाने [संगीत] की कीमत लगाई जा सकती है। लेकिन किसी सभ्यता की स्मृति की सीमा कहां खींचेंगे? डांसिंग गर्ल आज दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है। वो भारत की हड़प्पा विरासत की एक महत्वपूर्ण पहचान है। और मोहनजोदाड़ो जिस जमीन से वो निकली थी आज पाकिस्तान में है। दोनों सच एक साथ मौजूद है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी जटिलता है और शायद इतिहास का सबसे बड़ा सबक भी।

अतीत किसी एक तारीख को पैदा नहीं होता और किसी एक तारीख को खत्म भी नहीं होता। 1947 में एक देश दो हिस्सों में बटा था। लेकिन हजारों साल पुरानी सभ्यता का अतीत आज भी दोनों तरफ मौजूद है। और उन दोनों के बीच सिर्फ कुछ किलोमीटर की सीमा नहीं एक 10.5 सेंटीमीटर की कांसे प्रतिमा भी खड़ी है। नाम है डांसिंग। एक छोटी सी मूर्ति लेकिन उसके भीतर छिपी कहानी पूरे उपमहाद्वीप के इतिहास जितनी बड़ी है

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