भाड़ में गया ऐसा रिश्ता पिताजी जो राशन वाले का उधार चुकता नहीं कर सकते जिन्होंने दो साल से इस मकान का किराया नहीं दिया व इन्ह 00 कहां से देंगे कन तुम भारत भारत कुमार के नाम से मशहूर मनोज कुमार आज 85 यानी 85 इयर्स के हो गए हैं पद्मश्री नेशनल अवार्ड और सात बार फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित ये एक ऐसे एक्टर हैं जिन्होंने देशभक्ति की एक से एक बढ़कर फिल्में बनाई और उनका नाम ही इसीलिए मनोज कुमार से भारत कुमार पड़ गया मनोज कुमार ने इतनी बेहतरीन फिल्में दी हैं कि उन पर फिल्माए गए देशभक्ति के गाने आज भी याद किए जाते हैं जिंदगी की ना टूटे लड़ी चुप क्यों हो गए और सुनाओ भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हूं मनोज जितने एक्टिंग में हिट रहे उतने ही अच्छे वह राइटर डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी माने गए मनोज की कई फिल्मों ने गोल्डन जुबली और डायमंड जुबली तक मनाई है उनका जन्म गुलाम भारत में हुआ था फिर भी जब भारत पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो उनकी फैमिली ने भारत को चुना उन्होंने अपने करियर में 54 फिल्मों में काम किया इंदिरा गांधी के करीबी रहे मनोज कुमार को इमरजेंसी के समय खासा परेशान भी होना पड़ा था चलिए आज हम आपको उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे पन्नों के बारे में बताते हैं जिनका जिक्र कम ही होता है
ल तुम्हारा गला इसलिए नहीं घूंट सकता इस पाप में बलिदान है और पाव इसलिए नहीं छू सकता इस बलिदान में पाप है मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को गुलाम भारत के एबटाबाद में हुआ था उनके पेरेंट्स ने उनका नाम हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी रखा मनोज के जीवन में सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था लेकिन भारत पाक बंटवारे की बात ने उन्हें परेशान कर दिया इस बंटवारे में उनकी फैमिली ने भारत को चुन लिया और दिल्ली में आकर एक रिफ्यूजी कैंप में रहने लगे कुछ समय तक वह रिफ्यूजी कैंप में ही रहे फिर बाद में दिल्ली के राजेंद्र नगर में शिफ्ट हो गए मनोज कुमार उस वक्त के एक्टरस काफी इंस्पायर थे वो दिलीप कुमार अशोक कुमार और कामिनी कौशल के काफी बड़े फैन हुआ करते थे एक दिन उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शबनम देखी यह फिल्म उन्हें इतनी पसंद आई कि उन्होंने अपना नाम हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी से बदलकर मनोज कुमार रख लिया इसके बाद वो जहां भी जाते अपना नाम मनोज कुमार ही बताते 5525 लेकिन मेरे पास तो सिर्फ 25 हैं तो फिर ₹ की दवाई लो भाई मेरा वक्त क्यों बर्बाद किया देखिए मेरे मेरे पिताजी बहुत सख्त बीमार हैं एक दिन मेरे पिताजी भी बहुत सख्त बीमार थे मुझे गलत मत समझिए मनोज कुमार दिल्ली के हिंदू कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहे थे इसी बीच उन्हें उनकी गर्लफ्रेंड शशि के साथ थिएटर में फिल्में देखने का चस्का लग गया वह चस्का क हो या जुनून बस वहीं से मनोज ने एक्टिंग करने की बात ठान ली मनोज ने हिंदू कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और फिर मुंबई का रुख कर लिया मुंबई आने के बाद मनोज ने फिल्मों में एंट्री लेने की कोशिशें शुरू कर दी उनकी हेल्थ और हाइट काफी अच्छी थी साथ ही दिखने में भी मनोज किसी हीरो से कम नहीं लगते थे इसीलिए
उन्हें 1977 में आई फिल्म फैशन में काम मिल गया इस फिल्म में मनोज का रोल ज्यादा बड़ा नहीं था लेकिन उनकी एक्टिंग काफी दमदार थी इसके बाद 1960 में आई फिल्म कांच की गुड़िया में मनोज लीड एक्टर के तौर पर नजर आए और बस यहीं से उनका फिल्मी सफर शुरू हो गया इसके बाद उन्होंने कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया जिसमें हरि ली और आस्था वह कौन थी हिमालय की गोद में दो बदन उपकार पत्थर के सनम नील कमल पूरब और पश्चिम बेईमान रोटी कपड़ा और मकान 10 नंबरी सन्यासी और क्रांति जैसी फिल्में शामिल है मुझे गलत मत समझिए मैं मैं पढ़ा लिखा हूं डिग्री वाला आप ये डिग्री अपने पास रखकर मुझे ये दवाइयां दे दीजिए कल मैं हिसाब चुकता करके ये डिग्री वापस ले जाऊंगा डिग्री ए दोस्त नौकरी मिले तो डिग्री डिग्री नहीं तो बिगड़ी बिगड़ी मनोज कुमार फिल्म शहीद की शूटिंग में बिजी थे ऐसे में उन्हें इसी बीच शहीद भगत सिंह के परिवार से मिलने का मौका मिला इस दौरान उनकी मां अस्पताल में भर्ती थी तब मनोज कुमार भी अस्पताल पहुंचे और उनसे मिलने गए जब भगत सिंह की मां विद्यावती ने मनोज कुमार को देखा तब उन्होंने सीधे कह दिया कि यह तो मेरे भगत जैसा ही लग रहा है यह सुनते ही मनोज कुमार ने उनकी गोद में अपना सिर रख दिया फिर क्या था दोनों की आंखों में आंसू थे आपको याद होगा 1965 में शहीद भगत सिंह पर मनोज कुमार ने एक फिल्म बनाई थी नाम था शहीद इस फिल्म को लोगों का काफी प्यार मिला जिसने भी इस फिल्म को देखा मनोज कुमार की तारीफ किए बिना रुका नहीं 1965 का जो दौर था उस वक्त भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था उस समय प्रधानमंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री युद्ध जैसे ही खत्म हुआ तब लाल बहादुर शास्त्री ने मनोज कुमार से मुलाकात की और इस युद्ध के दौरान हुई परेशानियों पर एक फिल्म बनाने की बात कही यह बात मनोज के मन में घर कर गई फिर उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री के नारे जय जवान जय किसान से प्रेरित होकर फिल्म उपकार लिखी इस फिल्म के निर्देशन और डायरेक्शन का काम भी मनोज कुमार ने खुद ही किया फिल्म में लीड एक्टर भी मनोज ही थे फिर जब 1967 में ये फिल्म रिलीज हुई तो इस फिल्म को लोगों ने खूब प्यार दिया और ये फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई फिल्म के लिए मनोज कुमार को बेस्ट डायरेक्टर का फिल्म फेयर अवार्ड तो मिला ही साथ ही इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर के नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किया गया लोग ठीक ही तो कह रहे हैं
पिताजी और आप भी ठीक ही कहा करते थे यह डिग्री कर्ज है मुझ पर आपका मैं ना तो इसे चुका पाया और ना ही चुका पाऊंगा आप अपना कर्ज वापस ले लीजिए पिताजी जिस इंसान ने नौकरी की आखिरी उम्मीद को फाड़ के जला दिया उसका जिंदगी में कुछ नहीं हो सकता 1975 का वह दौर था जब देश में इमरजेंसी लगी हुई थी मनोज कुमार इंदिरा गांधी और उस वक्त के तमाम नेताओं से अच्छे संबंध रखते थे लेकिन बावजूद इसके वह इमरजेंसी के विरोध में थे ऐसे में एक दिन मनोज कुमार को सूचना और प्रसारण मंत्रालय से एक अधिकारी का फोन आया उन्होंने मनोज कुमार से एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री डायरेक्ट करने के लिए कहा जो इमरजेंसी के समर्थन में थी इसकी कहानी अमृता प्रीतम ने लिखी थी मनोज को स्क्रिप्ट भी भेजी गई लेकिन मनोज ने फोन पर ही इस ऑफर को ठुकरा दिया इसके तुरंत बाद मनोज कुमार ने अमृता प्रीतम को फोन किया और पूछा क्या लेखक के रूप में आपने खुद से समझौता कर लिया है मनोज के इतना कहते ही अमृता प्रीतम शर्मिंदा हो गई और उन्होंने मनोज कुमार से कहा कि आप इस स्क्रिप्ट को फाड़कर फेंक दीजिए पत्रकार रंजन दास गुप्ता ने बाद में अपने एक लेख में इस किस्से का जिक्र भी किया है पहचाना मुझे ओ तुम दोस्त उस रात के लिए मैं माफी चाहता उस रात तुमने वही किया जो तुम्हें करना चाहिए था दोस्त किया तो तुमने भी वही था जो उस वक्त तुम्हें करना चाहिए था 1972 में रिलीज हुई शोर हिंदी सिनेमा की सुपरहिट फिल्म है इस फिल्म के राइटर डायरेक्टर प्रोड्यूसर मनोज कुमार ही थे फिल्म के गाने काफी पॉपुलर हुए थे इस फिल्म की पॉपुलर को देखते हुए मनोज कुमार ने इस फिल्म को दोबारा रिलीज करने की योजना भी बनाई और इसे रिलीज करने की तारीख की भी घोषणा कर दी थी लेकिन इससे पहले ही मनोज कुमार ने इमरजेंसी का विरोध करके संजय गांधी और उस वक्त के प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल को नाराज कर दिया था हालांकि मनोज कुमार की विद्याचरण शुक्ल से काफी अच्छी पहचान थी फिर भी संजय गांधी और शुक्ल की जोड़ी ने मनोज कुमार को सबक सिखाने के लिए पहले फिल्म शोर को दोबारा थिएटर में रिलीज होने से पहले ही दूरदर्शन पर रिलीज कर दिया नतीजा यह हुआ
कि जब फिल्म थिएटर में रिलीज हुई तो उसे कोई देखने ही नहीं आया इसी तरह उनकी 10 नंबरी भी इमरजेंसी के दौरान 1976 में रिलीज हुई लेकिन क्योंकि मनोज कुमार के संबंध सरकार से अच्छे नहीं थे इसलिए सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने इस फिल्म को भी प्रतिबंधित कर दिया फिर मनोज कुमार ने इस फिल्म को रिलीज करवाने के लिए कोर्ट में केस लड़ा लाखों रुपए खर्च हुए पर मनोज ने हार नहीं मानी कोर्ट में यह केस चल ही रहा था कि 1977 में बीजेपी की सरकार बन गई और नई सरकार आने पर लाल कृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री बने और फिर मनोज कुमार ने केस जीत लिया मनोज कुमार ने उपकार के बाद नौ और फिल्में लिखी जिनमें रोटी कपड़ा और मकान मेरा नाम जोकर पूरब और पश्चिम जैसी कई फिल्में शामिल थी उनकी लिखी हुई लगभग सभी फिल्में हिट और सुपरहिट रही तो यह लो हज रुप किसलिए अगर कोई मेरी तरह हालात का मारा असली चेहरा और असली मजबूरी लेकर आए तो उसके पीछे पुलिस मत दौड़ाना मेरा बाप तो नहीं बच सका शायद उसका बच जाए मनोज कुमार को 1992 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था उन्हें फिल्म उपकार के लिए बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवार्ड भी मिल चुका है साथ ही 2016 में मनोज कुमार को दादा साहब फालके पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है उन्हें सात फिल्मफेयर अवार्ड्स और एक लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका चुका है इसके अलावा भी इंडस्ट्री में अपने योगदान के लिए वह कई अवार्ड से सम्मानित हो चुके हैं मनोज कुमार की एक्टर के तौर पर आखिरी फिल्म 1995 में आई थी नाम था मैदान जंग मनोज कुमार भले ही फिल्मों में अब एक्टिव ना हो लेकिन उनकी बनाई फिल्में आज भी लोगों की रगों में देशभक्ति का जुनून भर देती हैं और जब भी स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस का मौका आता है तो ऐसा हो नहीं सकता कि उनकी फिल्मों के गाने सुनाई ना दें वाकई मनोज कुमार ने देश प्रेम का एक अलग ही पाठ हमारे देश के लोगों को पढ़ाया है हम उनके लंबे और स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं