उड़ान भरने के करीब 1ढ़ घंटे बाद एयर इंडिया के विमान में तेज झटके लगने लगे। 4 अगस्त 2026 फुकेट थाईलैंड से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट AI2379 एक एयरबस A32 Neo विमान था। सुबह का वक्त था। ज्यादातर यात्री सो रहे थे। अचानक जो फ्लाइट थी वो जोर-जोर से हिलने लगी। 2 से 3 मिनट तक पलटी खाता रहा यह विमान। 70 से 80% लोगों को मामूली चोटें आई। फ्लाइट की तस्वीरें भी सामने आई जिसमें उसकी सीलिंग के पैनल में दरारें दिखी। लेकिन क्या यह वाला हादसा अहमदाबाद वाले हादसे जैसा हो सकता था? बिल्कुल हो सकता था। Air इंडिया का कहना है कि लोगों को मामूली चोटें आई हैं। लेकिन क्या उनकी भी चोटें मामूली हैं जिनके सिर फूट गए, कान फट गए, कंधे उतर गए और गर्दन टूट गई। गनीमत थी कि पायलट ने स्थिति संभाली और फ्लाइट को दिल्ली एयरपोर्ट पर सुबह
11:07 पर सुरक्षित लैंड करवा लिया। प्लेन में 137 यात्री थे और आठ क्रू मेंबर्स सवार थे। हालांकि यह जो विमान था वो एयरबस था। एयरबस के विमान बोन जितने ही सेफ माने जाते हैं। दुनिया भर में करोड़ों लोग इसमें यात्रा करते हैं। Air इंडिया का यह विमान एयरबस A320 Neo था। फिलहाल यह दुनिया का सबसे फेमस और एडवांस सिंगल आइजल यानी कम दूरी वाला कमर्शियल विमान है। इंडिगो और एयर इंडिया जैसे भारतीय एयरलाइंस के बेड़े में यह विमान सबसे बड़ी संख्या में है। A320 Neo एक बहुत सुरक्षित विमान माना जाता है जिसका सुरक्षा रिकॉर्ड विमानन इतिहास में सबसे बेहतरीन है। हालांकि पिछले कुछ सालों में इसको लेकर कुछ बड़ी चुनौतियां भी सामने आई जिसके बारे में आपको जान लेना चाहिए। हाल ही में 2026 में कॉकपिट के इंटीग्रेटेड कंट्रोल पैनल में एक पिन मुड़ जाने के कारण एयर न्यूजीलैंड के एक A320 न्यू का इंजन हवा में अनजाने में बंद हो गया था। इस पर सुरक्षा एजेंसियों ने तुरंत जांच और पैनल बदलने के कड़े निर्देश दिए। हालांकि इसके बाद भी छोटे-छोटे ऐसे ही मामले एयर बस के इस वाले
पर्टिकुलर जो विमान है उसको लेकर आते रहे। पायलट के रिपोर्ट के मुताबिक यह जो हादसा हुआ उस दौरान विमान अचानक करीब 300 फीट नीचे आ गया और इसकी वजह टर्बुलेंस या अप ड्राफ्ट डाउन ड्राफ्ट रहा होगा। लेकिन सवाल तो यह है कि ये टर्बुलेंस किस तरीके का था? सवाल यह भी है कि सिर्फ 300 फीट में इतनी चोट कैसे लग गई? फ्लाइट AI2379 यही हादसे का शिकार हुई थी। यही विमान फुकेट से दिल्ली आ रही थी। इसने फुकेट से सुबह 8:25 पर उड़ान भरी। 11 : 50 पर दिल्ली में इसकी सेफ लैंडिंग हुई। विमान एयरबस A320 Neo था जिसमें करीब 134 यात्री थे। सार्वजनिक ट्रैकिंग डाटा के हिसाब से विमान करीब 34,000 से 36,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था। यही वो हिस्सा होता है जब उड़ान सबसे ज्यादा स्थिर मानी जाती है। सीट बेल्ट की लाइट अक्सर बंद रहती है और लोग सो रहे होते हैं या खानापीना कर रहे होते हैं। इसी दौरान जब इस विमान में एक यात्री थे तो उन्होंने कहा कि सुबह का वक्त था। सब लोग सो रहे थे। अचानक विमान झुका दो से 3 मिनट तक ऐसे ही लगातार हिलता रहा। आम बोलचाल में लोग कहते हैं कि विमान हवा के गड्ढे में गिर गया या वैक्यूम में चला गया। हकीकत में आसमान में ना कोई गड्ढा होता है ना कोई खालीपन। ये शब्द पुराने तरीके से चले आ रहे हैं। लेकिन तकनीकी तौर पर यह गलत हैं। होता यह है कि विमान का जो पंख होता है वो हवा को काटता है और उससे ऊपर की तरफ एक लिफ्ट बनती है।
यह लिफ्ट इस बात पर टिकी होती है कि हवा पंख से किस कोण पर टकरा रही है। जब विमान अचानक ऐसी हवा में घुसता है जो नीचे की तरफ बह रही हो तो पंख से टकराने वाली हवा का कोण सेकंड में बदल जाता है। लिफ्ट कम हो जाती है और विमान नीचे बैठ जाता है। इसके ठीक उलट अगर हवा ऊपर की तरफ उठ रही हो तो लिफ्ट अचानक बढ़ जाती है और विमान ऊपर उछल जाता है। यहीं ऊपर उठती हवा अप ड्राफ्ट है और नीचे गिरती हवा डाउन ड्राफ्ट है। विमान गिरता नहीं है बल्कि विमान के नीचे से हवा का सहारा सेकंड भर के लिए बदल जाता है। बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि जहाज गिर गया। यही असली तकनीकी बात है जो ज्यादातर लोगों से छूट जाती है। नुकसान 300 फीट गिरने से नहीं होता। नुकसान इस बात से होता है कि वह 300 फीट कितनी तेजी से तय हुए। जब विमान अचानक नीचे बैठता है तो जो यात्री सीट बेल्ट लगाए बैठे हैं वह विमान के साथ नीचे आ जाता है। लेकिन जो यात्री बेल्ट नहीं लगाए हैं उनका शरीर उसी जगह हवा में रह जाता है। जहां वो था और विमान का फर्श उसके नीचे से खिसक जाता है। नतीजा यह होता है कि आदमी सीट से उठकर छत से जाकर टकराता है। यही हुआ जब यात्रियों को चोटें आई। यही वजह है कि AI2379 के यात्री ने कहा कि उसके पिता कॉफी पीते-पीते उछल गए और छत से टकरा गए। यही वजह है कि सिर की चोटें, गर्दन की चोटें सबसे ज्यादा आती हैं। इसी को इंजीनियरिंग की भाषा में नेगेटिव जी या कम ग्रेविटी वाला पल कहते हैं। कुछ सेकंड के लिए शरीर पर लगने वाला भार शून्य के करीब चला जाता है और आदमी सचमुच तैरने लगता है। इसमें ट्रॉली, गरम चाय, कॉफी, केबिन में रखा सामान और ऊपर के लॉकर से गिरने वाला बैग भी उतना ही खतरनाक हो जाता है। यही वजह है कि टर्बुलेंस में सबसे ज्यादा चोट केबिन क्रू को लगती है क्योंकि वहीं खड़े होकर काम कर रहे होते हैं। यही सबसे अहम एक अनसुलझा सवाल भी है।
अभी तक ना एयर इंडिया और ना ही डीजीसीए ने बताया कि झटका बादलों की वजह से लगा या साफ आसमान में लगा। इसी एक जानकारी से पूरी जवाबदेही बदल गई है। अगर यह बादलों वाला टर्बुलेंस था तो अगला सवाल यह बनता है कि विमान का मौसम रडार क्या दिखा रहा था? क्या पायलट को रास्ता बदलने का मौका दिख रहा था? क्या उस इलाके के लिए मौसम की चेतावनी यानी सेगमेंट जारी हुई थी और क्या आगे उड़ रहे विमानों ने कोई रिपोर्ट दी थी? अगर यह साफ आसमान वाला टर्बुलेंस था तो पायलट के पास बचने का कोई तरीका था ही नहीं। और सवाल पूरी तरह इस पर आ जाता है कि उस वक्त केबिन में लोग बेल्ट लगाए बैठे थे या नहीं। एक और बात ध्यान देने लायक है। अगस्त का महीना चल रहा है। कहा जाता है यह महीना फ्लाइट्स के लिए बड़ा मुश्किल वाला महीना होता है। यही मानसून का सबसे एक्टिव दौर है। बंगाल की खाड़ी और पूर्वी भारत के ऊपर इस मौसम में बनने वाले बादल 45 से 500 फीट तक ऊपर चले जाते हैं। यानी वह विमान के उड़ने की ऊंचाई से भी ऊपर होते हैं और उनके ऊपर से निकलने का विकल्प पायलट के पास नहीं होता। उसे बगल से घूम कर निकलना पड़ता है। इस मौसम में इस रास्ते पर बादलों वाले टर्बुलेंस की आशंका ज्यादा रहती है। लेकिन इस खास घटना में यही वजह थी कि यह अभी से दावे नहीं किए जा रहे। तो क्या ऐसा होता है कि टर्बुलेंस में अचानक कई फीट नीचे आ जाता है विमान। टर्बुलेंस का मतलब होता है हवा का बहाव अचानक बदल जाना जिससे विमान को झटके लगने लगते हैं। इस दौरान विमान कुछ वक्त के लिए ऊपर नीचे या दाएं-बाएं हिल जाता है और कभी-कभी कुछ फीट नीचे भी आ जाता है।
इसी वजह से यात्रियों को लगता है कि विमान गिर रहा है। हालांकि ज्यादातर मामलों में ऐसा होता नहीं है। टर्बुलेंस तीव्रता के लिहाज से तीन तरह के होते हैं। हल्के टर्बुलेंस। इसमें प्लेन 1 मीटर तक ऊपर नीचे होता है। यात्रियों को पता भी नहीं चलता। मध्यम टर्बुलेंस। इसमें जहाज 3 से 6 मीटर तक ऊपर नीचे होते हैं। इससे ड्रिंक गिर सकती है। गंभीर टर्बुलेंस तब होता है जो इसमें दिखा आपको। इसमें जहाज 30 मीटर तक ऊपर नीचे होते हैं। सीट बेल्ट नहीं लगाएंगे तो पैसेंजर उछल सकते हैं। क्या टर्बुलेंस की वजह से प्लेन क्रैश हो सकता है? आधुनिक तकनीक और बेहतर सुरक्षा सिस्टम की वजह से आज टर्बुलेंस से विमान हादसे की आशंका बहुत कम हो गई है। हालांकि बहुत गंभीर टर्बुलेंस या खराब मौसम में दुर्घटना का खतरा पूरी तरीके से खत्म नहीं होता। आज के आधुनिक विमान हर तरह के टर्बुलेंस को झेलने के हिसाब से बनाए गए हैं। पायलटों को भी ऐसी परिस्थितियों से सेफली निकलने के तरीके बताए जाते हैं और उनको स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है। विमान के फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर, एफडीआर और कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर सीवीआर को सुरक्षित रख लिया गया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उड़ान के दौरान अचानक ऊंचाई में गिरावट क्यों आई। विमान को फिलहाल हैंगर में रखकर उसकी तकनीकी जांच की जा रही है। नागरिक उ्डयन मंत्रालय और डीजीसीए पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।
इस बीच केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राममोहन नायडू ने मंत्रालय के सचिव समीर कुमार सिन्हा के साथ फोर्टिस अस्पताल पहुंचकर घायलों का हालचाल जाना। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी फोर्टिस और मेदांता अस्पताल में भी मौजूद हैं और Air इंडिया और अस्पताल प्रशासन के साथ मिलकर घायलों के इलाज और सहायता की निगरानी कर रहे हैं। एक बार फिर से Air इंडिया की मैनेजमेंट पर सवाल उठ रहे हैं। Air इंडिया के विमान पर सवाल उठ रहे हैं। लोग वीडियो बनाकर कह रहे हैं कि वह आगे से कभी भी Air इंडिया में ट्रैवल नहीं करेंगे। Air इंडिया उनके लिए सेफ फ्लाइट कंपनी नहीं है। अगर आप यह वीडियो YouTube पर देख रहे हैं तो हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर बेल आइकन दबाएं और Facebook पर देख रहे हैं तो हमारे पेज को लाइक