ये कहानी मध्य प्रदेश के उज्जैन की है. एक बेटी ने अपनी मर्जी से इंटरकास्ट लव मैरिज कर ली. परिवार इस बात के खिलाफ था. बेटी से नाराज परिजनों ने उसे जिंदा होते हुए भी मृत मान लिया. समाज और रिश्तेदारों की मौजूदगी में बेटी की तस्वीर का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया गया, फोटो जलाया गया और उससे सभी रिश्ते खत्म करने का ऐलान कर दिया.
बेटी के जन्म पर जिस घर में खुशियां मनाई गई थीं, उसी घर में उसकी तस्वीर के सामने लोग बैठे थे. फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार कोई जन्मदिन नहीं मनाया जा रहा था. तस्वीर के सामने रस्में हो रही थीं, लोग रो रहे थे, और कुछ देर बाद उस तस्वीर को आग के हवाले कर दिया गया. यह किसी की मौत का मातम नहीं था. जिसकी तस्वीर जलाई जा रही थी, वह जिंदा है.
मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के खाचरौद नगर नरसिंह मंदिर क्षेत्र से सामने आई इस घटना ने लोगों को हैरान कर दिया है. यहां एक परिवार ने अपनी जीवित बेटी का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर उससे सारे रिश्ते खत्म करने का ऐलान कर दिया.परिजनों के मुताबिक, उनकी बेटी कोमल
परिजनों के मुताबिक, उनकी बेटी कोमल प्रजापत ने परिवार की मर्जी के खिलाफ अंतरजातीय प्रेम विवाह कर लिया. परिवार ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. मामला थाने तक पहुंचा. आरोप है कि थाने में भी कोमल ने अपने माता-पिता और भाइयों को पहचानने से इनकार कर दिया. यही बात परिवार को सबसे ज्यादा आहत कर गई.
इसके बाद परिवार ने ऐसा फैसला लिया, जिसकी पूरे इलाके में चर्चा हो रही है. रिश्तेदारों और समाज के लोगों को बुलाया गया. आंगन में बेटी की तस्वीर रखी गई. उसके सामने ‘गोरनी’ की रस्म शुरू हुई. फिर तस्वीर को जलाकर प्रतीकात्मक दाह संस्कार किया गया. इसके बाद वे तमाम रस्में निभाई गई, जो आम तौर पर किसी व्यक्ति की मौत के बाद की जाती हैं.
युवती की बहन ने कहा कि परिवार का यह फैसला उन लड़कियों के लिए एक मैसेज है, जो बिना परिवार की सहमति के घर छोड़ देती हैं और बाद में अपने माता-पिता से भी रिश्ता तोड़ लेती हैं. वहीं भाई ने भी कहा कि परिवार ने बहन को काफी समझाने की कोशिश की थी, लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी.दरअसल, ‘गोरनी’ कुछ समुदायों में प्रचलित एक सामाजिक और प्रतीकात्मक परंपरा है. इसमें परिवार अपनी इच्छा के विरुद्ध विवाह करने या परिवार से पूरी तरह संबंध तोड़ देने वाले सद को प्रतीकात्मक रूप से मृत मानकर अंतिम संस्कार जैसी रस्में निभाता है. इस परंपरा का कोई कानूनी दर्जा नहीं है.
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