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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद Viral इरफान ने जो कहा जानकार रो पड़ेंगे आप।

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जिस तरीके से नए नवेले दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार जी आए और उन्होंने एक पुलिसिया डंडे और जूते से एक खूबसूरत लोकतंत्र को कुचलने की जो कोशिश करी उसके वो बधाई के पात्र आज मुगंबो बहुत खुश हो गए उनके दरबार में उनको 100 नंबर मिले सपन झड़े फूल से मीच चुभे फूल से लुट गया श्रृंगार सभी बाघ के बबूल से हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे कारवा गुजर गया गुबार देखते रहे नींद भी खुली ना थी आए धूप डल गई पांव भी उठे ना थकी जिंदगी फिसल गई पांचपात झड़ गए साग साग जल गई चाहत तो निकल सकी ना पर उमर निकल गई समझिए सर इस दर्द को इस तड़प को इस क्या सोच रहा है देश नीरज ऐसे नहीं लिख रहे हैं सुबह जब मैं उठा ना सर अपनी झोपड़ी में फोन खोला तो ऐसा लगा कि ये सरकार मतलब पूरी तरीके से तानाशाही पे उतर गई मैं कहता हूं लोकतंत्र में ना अहंकारी संवाद होना चाहिए और संवाद के दरवाजे दोनों तरफ से खुले होने चाहिए।

अगर यही सरकार एक नारियल पानी लाती यूपीए ने अन्ना जी को नारियल पिला दिया इंदिरा जी ने इनके पिताजी को पिला दिया। महात्मा गांधी जी ने महात्मा गांधी को अंग्रेजों ने पिला दिया सर। यह सरकार भी एक संवाद का रास्ता अपना सकती थी और उनके सम्मान जैसे संविधान की शपथ में ना गरिमा सबका व्यक्ति की गरिमा राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित कर तो व्यक्ति की गरिमा गरिमा गरिमा नहीं गिरनी चाहिए सर। व्यक्ति बैठा था 20 दिन से हंगर स्ट्राइक पे इस देश की लाचार शिक्षा व्यवस्था को लेके वो क्या मांग रहा था? यह नहीं कह रहा था 200 गज का लुटन दिल्ली में कोई प्लाट काट दीजिए। राज्यसभा की सीट दे दीजिए या मोदी मंत्रिमंडल में कोई पद दे दीजिए।

वही कह रहा था इस लाचार शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त कीजिए और जिम्मेदारी दे कीजिए। इस्तीफा दीजिए। कोई बड़ी मांग नहीं थी। जिस तरीके से नए नवेले दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार जी आए और उन्होंने एक पुलिसिया डंडे और जूते से एक खूबसूरत लोकतंत्र को कुचलने की जो कोशिश करी उसके वो बधाई के पात्र है। आज मुगंबो बहुत खुश हो गए। उनके दरबार में उनको 100 नंबर मिले। समझ रहे हैं? जब आदमी हताश और निराश हो जाता है ना तो नीरज की एक लाइन कह रहा हूं सर। सपन जड़े फूल से मीच चुभे फूल से लूट गया श्रृंगार सभी बाग के बबूल से हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे। कारवा गुजर गया गुबार देखते रहे। नींद भी खुली ना थी। आए धूप डल गई। पांव भी उठे ना थकी जिंदगी फिसल गई। पातपात झड़ गए। साग-साग जल गई। चाहत तो निकल सकी ना पर उमर निकल गई। समझिए सर इस दर्द को इस तड़प को इस क्या सोच रहा है देश। नीरज ऐसे नहीं लिख रहे हैं। नीरज को कोई ख्वाब नहीं आया। नीरज सोच रहे कि कितने वक्त आए गए, कुछ अच्छे, कुछ बुरे, कुछ लोग मेरे साथ थे। आज मेरे हिस्से में धूल और गुबार आई है। नीरज का कहने का मतलब यह है तो हमारा कहने का मतलब है कि लोकतंत्र में असहमति रखना कोई अपराध नहीं है। भारतीय संविधान तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमें अभिव्यक्ति अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है।

ये लोकतंत्र सिमटते जा रहा है। मैं जंतरमंतर पे ऐसे भाग के आया कि जब अभिजीत दी ने कहा ना मुझे पीटा और वो रोने लगे। मैं कहा यार मुझे भी पीटना चाहिए। मेरे शरीर की मांसपेशियां मेरी आत्मा से लड़ने लग गई। कैसे खड़े हो? कैसे बैठे हो चुग्गी के अंदर। चलो यार पिटाई खाएंगे दिल्ली पुलिस की। नए नवेले कमिश्नर आए हैं। बड़े जोश में है। [गला साफ़ करने की आवाज़] बहुत बड़ी व्यवस्था और ताकत और धन बल और बड़ी व्यवस्था है उनकी। बड़ा मारेंगे। चलो मार खाएंगे उनकी। ये नहीं है लोकतंत्र का ये रास्ता नहीं है।

लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए। कोई आपसे सहमत हो या ना हो टाइपिल दोनों के लिए। आइए बात करते हैं। कुछ कुछ गलतफहमी है तो उसे दूर करते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन किसी को किसी के किसी को अपमानित करना आए उठाए कपड़ा ढका ले गए और मीडिया ने खबर चला दी। हेडलाइंस वांगू को उठा लिया। आतंकवादी था। बदमाश था। गुंडा था। क्या था? इस देश का महान पर्यावरण एक्टिविस्ट था। शिक्षा विद था। दुनिया का सम्मान नागरिक था। कितना आविष्कार किए भारतीय सेना के लिए देश के लिए महान साइंटिस्ट था उठा लिया उठा लिया उठा लिया इस आंदोलन से और तमाम आंदोलन से हमारी आत्मा जुड़ जाती है सर हम जन संघर्ष से पैदा हुए हुए लोग हैं हमने स्कूल और किताबों का ज्ञान नहीं है हमारे पास जो बोल रहे हैं वो जीवन से जुड़ा हुआ है आत्मा रो पड़ी रो पड़ी सर समझ रहे हैं जब हम उस लाइन को पढ़ते हैं कि पीपल ऑफ इंडिया हम भारत के लोग भारत को संपन्न प्रभु संपन्न समाज वादी धर्मनिरपेक्ष लोकात्मक राज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार अभिव्यक्ति विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्र प्रतिष्ठा और अवसरों की समानता प्राप्त कराने के लिए कहता हूं उन सब में व्यक्ति की गरिमा व्यक्ति की गरिमा व्यक्ति की गरिमा राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प हो गए 26 नवंबर 1949 को अंकित अधिनियम और आत्मसमर्पित करते फिर इतनी बड़ी आबादी आज भी अमान्य जीवन कैसे जी रही है? सभी की तो बात करी गई थी।

सभी की तो बात करी गई थी। सभी की भलाई की बात करी थी। शिक्षा में, राजनीति में, सामाजिक स्तर पे, धार्मिक स्तर पे, किसी भी स्तर पे किसी को नहीं छोड़ा गया। फिर भी भारत की आज शक्ल देखो। बड़ी आबादी नरक जीवन जी रही है। सर इस दुनिया विश्व के पटल पे दौड़ती अर्थव्यवस्था है। भारत चमकता सितारा है। लेकिन उसके विपरीत बड़ी कंडीशन खराब है। आप ही तो एक देश और एक राज्य। एक कानून की बात करते हैं। पूरे देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग श्रम कानून अलग न्यूनतम मजदूरी है।

कहीं एक नहीं मिलती। जहां लागू है वो भी नहीं मिलती। आप पूरी तरह से नौजवानों के नजर में फेल है। मैं अपनी सहमति रखता हूं। बोलूंगा आज मेरी जवान कब कब आ रही है। पता नहीं बहुत बोलता हूं सर मैं। लेकिन कहते हैं ना इतना तोड़िए मत लोगों को। इतना कमजोर मत कीजिए।

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