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रोलेक्स में ऐसा क्या है कि कीमत ₹50 करोड़ पहुँच जाती है? जानिए इन घड़ियों का असली सच!

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26 जनवरी 1950 वो तारीख जब भारत एक गणतंत्र बना और देश का संविधान लागू हुआ। वो दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए काफी खास था क्योंकि उन्होंने संविधान के लागू होने के बाद देश के पहले राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली। लेकिन यह दिन उनके लिए और खास बना एक नायाब घड़ी की वजह से जो उनकी कलाई पर बंधी थी। यह घड़ी थी rलेक्स होस्टर प्रपेचुअल जो 18 कैरेट पिंक गोल्ड से तैयार की गई थी जिस पर भारत का नक्शा बना था जिसमें अफगानिस्तान और नेपाल को भी भारत के नक्शे के साथ दिखाया गया था और इस पर अंकित थी 26 जनवरी 1950 की तारीख डॉ राजेंद्र प्रसाद को यह घड़ी इसी दिन की याद में गिफ्ट की गई थी rx कंपनी की तरफ से ऐसी दो घड़ियां बनाई बनाई गई थी। एक भारत के पहले राष्ट्रपति को गिफ्ट की गई और दूसरी भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए थी जो रोलेक्स के बॉम्बे एजेंट द्वारा बेची गई थी। राजेंद्र बाबू ने इस घड़ी को पूरे जीवन संभाल कर रखा। 13 मई 1962 तक भारत के राष्ट्रपति बने रहने से लेकर और 28 फरवरी 1963 में अपनी मृत्यु तक राजेंद्र बाबू ने कई ओकेजंस पर इस घड़ी को पहना। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद इस घड़ी का क्या हुआ? परिवार की मानें तो राजेंद्र बाबू की इस घड़ी को पटना म्यूजियम को सौंप दिया गया था। लेकिन 1965 के आसपास यह घड़ी अचानक गायब हो गई। ना तो परिवार और ना ही म्यूजियम को पता चला कि यह घड़ी आखिर गई कहां। पांच दशक बाद साल 2011 में यह घड़ी अचानक दुनिया के सामने आई। जब दुनिया के मशहूर नीलामी घर साउथबेज ने इस घड़ी को नीलाम करने के लिए ऑक्शन पर लगाया। उस वक्त इस घड़ी की कीमत एक से ₹ करोड़ आंकी गई थी।

यह खबर आग की तरह फैली और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के परिवार के विरोध और भारत सरकार के इंटरवेंशन के बाद इस नीलामी को रोक दिया गया। लेकिन साउथबेस ने कभी यह नहीं बताया कि ये घड़ी उनके पास लेकर कौन आया था और नीलामी रुकने के बाद ये घड़ी फिर से गायब हो गई। लेकिन पंडित नेहरू की घड़ी का क्या हो? नेहरू ने वो घड़ी पहनी या नहीं इसका कोई सबूत नहीं मिलता। लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक वो घड़ी भी दो बार नीलाम की गई। पहले 1993 में और फिर साल 2003 में। इसे भी साउथ बेस ने ही जिनीवा में नीलाम किया था। लेकिन यह कहानी हम आपको क्यों सुना रहे हैं? ताकि आप लग्जरी वॉच की उस दुनिया को जान पाए जो राजनेताओं से लेकर खिलाड़ियों, एक्टर्स और दुनिया के अमीरों के लिए स्टेटस सिंबल की तरह है। और यह आज से नहीं जब से लग्जरी वॉचेस की मार्केट बनती तब से ही यानी लगभग 300 साल से। कैसे एक छोटे से देश स्विट्जरलैंड ने पूरी दुनिया की वॉच इंडस्ट्री पर कब्जा किया? कैसे rx पेटिक फिलिप ऑडमास पिगे जैसे ब्रांड्स अमीरी और शान की निशानी बन गए। सुनाएंगे आपको कहानी उस घड़ी की भी जो नीलामी में ₹250 करोड़ में बिकी थी और दुनिया की सबसे महंगी घड़ी बन गई। बात होगी चांद पर जाने वाली पहली घड़ी की। वक्त के साथ कैसे यह घड़ियां इवॉल्व हुई और जेब में रखी जाने वाली घड़ी वर्ल्ड वॉर वन के दौरान हाथ पर कैसे बांधी जाने लगी? कैसे दुनिया भर की खुफिया एजेंसियां जासूसी के लिए घड़ियों का इस्तेमाल करती हैं। 2018 के उस ऑपरेशन की भी बात करेंगे जब इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने अपने एक एजेंट की घड़ी रिकवर करने के लिए पांच दशक बाद एक ऑपरेशन चलाया। आखिर क्यों एक घड़ी की कीमत करोड़ों तक पहुंच जाती है और कैसे इसके पीछे कारीगरों की मेहनत और मार्केटिंग काम करती है। घड़ी में लगने वाले उस पुर्जे की भी बात करेंगे जिसके चक्कर में यह घड़ियां इतनी महंगी बिकती हैं और अंत में बात होगी उस सवाल पर कि आखिर टाइम बताने वाली चीज करोड़ों की कैसे हो जाती है। नमस्कार, मैं हूं भूपेंद्र सोनी और आप देख रहे हैं खबर गांव और यह किस्सा है लग्जरी वॉचेस का। इतिहास में जाएंगे तो दुनिया की सबसे पहली

मैकेनिकल घड़ी का आविष्कार किया था चीन के एक इंजीनियर सुसोंग ने जिन्हें चीन का लार्डो द विंची भी कहा जाता है। सुसोंग ने 1088 एडी में दुनिया का पहला मैकेनिकल एस्ट्रोनॉमिकल क्लॉक टावर बनाया था। हालांकि यह हाथ में पहनने वाली घड़ी नहीं थी, लेकिन इसमें पहली बार एस्केपमेंट मैकेनिज्म और चेन ड्राइव जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हुआ था। जो आज की मैकेनिकल वॉचेस का बेस है। यह 40 फीट ऊंचा टावर पानी की ताकत से चलता था और समय बताने के साथ-साथ तारों और ग्रहों की मूवमेंट को भी ट्रैक करता था। रही बात पोर्टेबल वॉचेस की तो जर्मनी के एक ताला बनाने वाले और घड़ियों का काम करने वाले शख्स पीटर हेनलिन ने साल 1505 में दुनिया की पहली पोर्टेबल घड़ी बनाई थी। इस घड़ी को पोमेंडर वॉच कहा जाता है। इससे पहले जो घड़ियां थी वो ग्रेविटी की मदद से या किसी भारी वजन से चलती थी। लेकिन पीटर हेनलेन ने घड़ी को छोटा और पोर्टेबल बनाने के लिए मेन स्प्रिंग का उपयोग किया था। उन्होंने लोहे की एक पतली पट्टी

से एक स्प्रिंग बनाया। स्प्रिंग को लपेटा जाता और फिर यह धीरे-धीरे खुलने पर घड़ी के गिय्स को चलाता था। यानी इस घड़ी में चाबी भरने का मैकेनिज्म था। शुरुआती घड़ियों में सिर्फ घंटे की सुई हुआ करती थी और पीटर हेलन की वॉच में भी यही था। घड़ी में मिनट की सुई इसके लगभग 70 साल बाद 1577 में स्विस घड़ी सांस जोसबर्गी ने जोड़ी थी। जोसबर्गी ने ही 16वीं सदी के अंत में अपनी घड़ी में सेकंड की सुई को दर्शाया था। लेकिन सेकंड की सुई की कैलकुलेशन सटीक नहीं थी। फिर इसके लगभग आधी सदी बाद क्रिश्चियन हजंस ने सन 1656 में एक ऐसी घड़ी का आविष्कार किया जिससे सेकंड की सुई का कोई मतलब निकला। कुल मिलाकर बात इतनी है कि जो घड़ी आज आप अपनी कलाई पर देख रहे हैं उसे इस शेप में आने में लगभग 300 साल का वक्त लगा। घड़ियों की हिस्ट्री जानने के बाद अब बात करते हैं कि कैसे जिनेवा घड़ियों की कैपिटल बन गई। इसके लिए हमें जाना होगा 16वीं सदी के जिनेवा में साल 1541 जिवा शहर में एक बड़ा बदलाव आ रहा था। जॉन केल्विन नाम के एक धार्मिक नेता ने एक नया कानून बनाया। कोई भी आदमी या औरत ज्वेलरी नहीं पहन सकता। सोने चांदी के गहने, हीरे जवाहरात सब बंद। केल्विन का मानना था कि यह सब दिखावा है, पाप है। इस फैसले का सबसे बड़ा असर पड़ा उन सुनारों और ज्वेलरी बनाने वालों पर जो पीढ़ियों से यह बिजनेस करते आ रहे थे। एक झटके में उनका सारा धंधा खत्म हो गया था। जिनेवा के सुनारों के सामने एक अजीब मुश्किल आ गई। हुनर है, सोना चांदी है, अमीर ग्राहक भी हैं। लेकिन गहने बनाने पर पाबंदी है। तो इन कारीगरों ने अपनी सारी रचनात्मकता, अपना सारा हुनर लगा दिया एक ऐसी चीज में जो गहना नहीं थी लेकिन उतनी ही खूबसूरत और शानदार चीज थी यानी घड़ी। उसी दौर में फ्रांस से बहुत सारे प्रोटेस्टेंट्स भागकर स्विट्जरलैंड आ रहे थे। फ्रांस में उन पर अत्याचार हो रहे थे। तो उन्होंने पनाह लेने के लिए जिनीवा को चुना। इन शरणार्थियों में बहुत सारे घड़ी साज भी थे जो घड़ियां बनाने का काम जानते थे। एक तरफ जिनेवा के सुनार जिन्हें बारीक काम करने की कला आती थी। दूसरी तरफ फ्रांस के घड़ी साज जिनके पास घड़ी की मशीनरी बनाने का हुनर था। दोनों ने मिलकर काम शुरू किया और इस तरह जिनेवा में वॉच इंडस्ट्री की नीव पड़ी। अमीर लोगों ने अपना पैसा गहनों की जगह घड़ियों में लगाना शुरू कर दिया। इस तरह जिनेवा ने खुद को इतिहास के पन्नों में दुनिया की वॉच कैपिटल के तौर पर दर्ज करा लिया। इस धार्मिक पाबंदी ने अनजाने में स्विट्जरलैंड को दुनिया की वॉच मेकिंग इंडस्ट्री का केंद्र बना दिया। वो जमाना रेस्ट वॉच का नहीं बल्कि पॉकेट वॉच का था। यह घड़ियां छोटी गेंद या अंडे के आकार की होती थी। जिन्हें अक्सर गले में पेंडेट की तरह पहना जाता था या बेल्ट से लटकाया जाता था। 1790 तक आते-आते जिनेवा में सालाना 60 हजार घड़ियां बन रही थी। यह उस जमाने में काफी बड़ी बात थी। लेकिन अभी तक यह सिर्फ धंधा था। लग्जरी का कांसेप्ट अभी नहीं आया था। उसके लिए एक सदी और इंतजार करना था। 1795 की बात है। अब्राहम लुई ब्रिगेड नाम के एक घड़ी साज ने एक ऐसी चीज बनाई जिसने घड़ी की पूरी इंडस्ट्री ही बदल दी। उन्होंने टूरबिलिन का इजाद किया। जो घड़ी में टिक टिक की आवाज आती है, वह इसी छोटे से पुरजे की वजह से आती है जिसे टूरबुलिन कहते हैं। सीन यह था कि उस जमाने में जो घड़ियां बनती थी, उन्हें अगर सीधे जेब में रखते थे, तो ग्रेविटी की वजह से वो घड़ियां सही से काम नहीं कर पाती थी। ऐसे में ब्रिगेड ने एक ऐसे पिंजरे का इजाद किया जिसमें पुर्जे फिट किए जाते और घड़ी किसी भी पोजीशन में रहे तो वह पुरजों पर इसका असर नहीं पड़ने देता था। इसी को टूरबिलिन कहा गया। इससे घड़ी की सटीकता बहुत बढ़ गई। लेकिन टर्बुलन बनाना बहुत मुश्किल काम था। इसमें सैकड़ों छोटे-छोटे पुरजे होते थे। यह कोई मशीनी युग नहीं था। तो एक टर्बुलिन बनाने में महीनों का वक्त लग जाता था और यही चीज लग्जरी घड़ियों की पहचान बन गई। जिस घड़ी में टर्बुलिन हो वो आम नहीं हो सकती। यही कारण था कि ब्रिगेड के ग्राहकों में नेपोलियन बोनापार्ट और मैरी एंडोनेट शामिल थे। मैरी फ्रेंच रेवोल्यूशन से पहले फ्रांस की आखिरी रानी थी। नेपोलियन अपनी जेब में ब्रिगेड की घड़ी रखते थे। इतिहास के पन्नों को पलटे तो विंस्टन चर्चिल जैसे बड़े नेता भी ब्रिगेड की पॉकेट वॉच के दीवाने थे। मैरी एंटोनेट ने तो एक ऐसी घड़ी बनाने का आर्डर दिया जिसमें उस जमाने की हर आधुनिक चीज फिट हो। लेकिन वो घड़ी उनकी जिंदगी में पूरी नहीं हो सकी। इस घड़ी को बनाने में 44 साल लगे। यह घड़ी 1827 में बनकर तैयार हुई। लेकिन तब तक मैरी एंटनेट की मौत हो चुकी थी। फ्रेंच रेवोल्यूशन के दौरान उनका सर कलम कर दिया गया था। शुरुआत में यह सब जेब घड़ियां थी जो आकार में बड़ी थी, भारी थी और सिर्फ अमीरों की शानो शौकत का हिस्सा थी। लेकिन 1810 में कहानी में एक नया मोड़ आया। नेपल्स की रानी ने ब्रिगेड से कहा कि एक ऐसी घड़ी बनाओ जो कलाई पर बांधी जा सके। ब्रिगेड ने आदेश का पालन किया और इस तरह दुनिया की पहली कलाई घड़ी बनी यानी रिस्ट वॉच। लेकिन उस जमाने में रिस्ट वॉच सिर्फ औरतों के पहनने की चीज मानी जाती थी। मर्द इसे पहनने में शर्म महसूस करते थे। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध ने इस सोच को बदल दिया। असल में जंग के दौरान सैनिक खाइयों में छिपकर गोलियों और तोपों का सामना कर रहे थे। दुश्मन को हराने के लिए उन्हें बाकी टुकड़ियों के साथ तय किए गए वक्त पर एक साथ हमला करना होता था। और इस वक्त को देखने के लिए उन्हें घड़ी की जरूरत थी। लेकिन ऐसी स्थिति में जेब से घड़ी निकालना काफी मुश्किल काम था और जान जाने का जोखिम भी था। ऐसे में सैनिकों ने अपनी जेब घड़ियों को चमड़े की पट्टी से कलाई पर बांधना शुरू कर दिया और इस तरह यह वर्ल्ड वॉर वन ही थी जिसने रिस्ट वॉचेस को नॉर्मलाइज किया और घड़ी को लग्जरी की जगह एक आम जरूरत बना दिया। 1839 में एक पॉलिश वॉच मेकर एंटनी पेटिक और एक फ्रांसीसी आविष्कारक एड्रियन फिलिप ने मिलकर एक कंपनी बनाई। नाम रखा पैटिक फिलिप। इन दोनों का मकसद था

दुनिया की सबसे बेहतरीन घड़ियां बनाना। कोई समझौता नहीं, कोई शॉर्टकट नहीं। हर घड़ी एक कला का नमूना होनी चाहिए। कंपनी अच्छे से चल ही रही थी। तभी 1851 में एक बड़ी घटना हुई। लंदन में एक प्रदर्शनी लगी जहां पैटिक फिलिप ने भी अपनी घड़ियां शोकेस की। इस प्रदर्शनी में ब्रिटेन की क्वीन विक्टोरिया भी मौजूद थी। उन्होंने पैटिक फिलिप की एक घड़ी देखी। यह एक पेंडेंट घड़ी थी जिसमें हीरे जड़े हुए थे। वो घड़ी रानी को इतनी पसंद आई कि उन्होंने तुरंत खरीद ली। बस फिर क्या था? यहीं से पैटिक फिलिप की किस्मत बदल गई। जब दुनिया को पता चला कि ब्रिटेन की महारानी पैटक फिलिप पहनती है तो बाकी राजा महाराजा और अमीर भी पैटक फिलिप खरीदने लगे और देखतेदेखते यह रॉयल्टी का सिंबल बन गई। पैटक फिलिप यह दावा करती है कि अगर उनकी घड़ी खराब होती है तो उसे ठीक करने की गारंटी उनकी है। वह भी बिना किसी चार्ज के। फिर चाहे वो 100 साल पुरानी हो या 200 साल पुरानी। आज पैटिक फिलिप साल में सिर्फ 60 हजार घड़ियां बनाती है क्योंकि हर घड़ी हाथ से बनती है। हर पुर्जा हाथ से तराशा जाता है। पैटिक फिलिप की कुछ घड़ियां बनने में तो 9 महीने से लेकर 2 से 3 साल तक का वक्त लग जाता है। रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन को अक्सर पैटिक फिलिप पहने देखा जा सकता है। वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की कलेक्शन में भी रेलेक्स के साथ-साथ पैटिक फिलिप एक खास जगह रखती है। इस घड़ी को पहनने वाले अक्सर वह लोग होते हैं जो दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि वह सिर्फ अमीर नहीं बल्कि कला के पारखी भी हैं। पैटिक फिलिप की घड़ी साल 2019 में ₹32 मिलियन में बिकी थी जिसकी कीमत लगभग ₹50 करोड़ के करीब थी जो नीलाम होने वाली दुनिया की सबसे महंगी घड़ी बनी थी। इसकी कहानी हम वीडियो में आगे सुनाएंगे। 1926 में RX ने दुनिया की सबसे पहली वाटरप्रूफ घड़ी बनाई। इस घड़ी का नाम था RX ऑस्टर। यह वो जमाना था जब घड़ियां काफी नाजुक हुआ करती थी। जरा सा भी पानी लगने पर झट से खराब हो जाती थी। यही कारण था कि जब रोलेक्स ऑस्टर मार्केट में आई तो लोगों को इसके वाटरप्रूफ होने पर विश्वास नहीं हो रहा था। ऐसे में RX ने एक धांसू मार्केटिंग की। Rollex ने यह घड़ी पहनाई Mercedes Glits नाम की एक स्विमर को। ग्लिट्स ने इंडियन चैनल तैर कर पार किया जिसमें उन्हें 10 घंटे का वक्त लगा और इस दौरान उनके हाथ पर बंधी थी रोलेक्स ऑइस्टर। जब वह पानी से बाहर निकली तो घड़ी एकदम सही चल रही थी। यह खबर अखबारों में छपी तब जाकर लोगों को इस घड़ी के वाटरप्रूफ होने पर यकीन हुआ और रोलेक्स ऑस्टर रातोंरात मशहूर हो गई। साल 1931 में रोलेक्स ने ही पहली ऑटोमेटिक घड़ी भी बनाई थी। यानी एक ऐसी घड़ी जो खुद से चलती रहे जिसमें चाबी भरने की जरूरत नहीं होती थी। खैर सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान एक ऐसा वाकया हुआ जिसने रोलेक्स को लेकर लोगों का नजरिया बदल दिया। हुआ यह था कि वर्ल्ड वॉर टू के दौरान ब्रिटिश एयरफोर्स के ज्यादातर पायलट्स रेलेक्स की घड़ियां पहना करते थे। क्योंकि सरकारी घड़ियां भरोसेमंद नहीं थी। लेकिन जब यह पायलट जंग के दौरान जर्मन सेना के हाथ लगते तो उन्हें कैदखाने में डालते वक्त उनकी घड़ियां उतार ली जाती थी। जब यह बात रोलेक्स के फाउंडर हेंस विलफ को पता चली तो उन्होंने इन सैनिकों को रोलेक्स की नई घड़ियां देने की पेशकश की। 2022 में नीलामी में ऐसी ही एक रोलेक्स की जो एयरफोर्स के अफसर जेराल्ड इमेसन की थी। वो उसी कैदखाने में बंद थे जिसने 1944 के मशहूर द ग्रेट एस्केप को प्रेरित किया था। एमसन ने हेंस की पेशकश से घड़ी मंगवाई थी और ऐसा माना जाता है कि उन्होंने वो घड़ी 24 मार्च 1944 को भागने के दौरान इस्तेमाल की थी। 2022 की नीलामी वो घड़ी ₹1.5 करोड़ से ज्यादा में बिकी थी। फिर 1953 में rलेक्स की सबमरीन आई। एक ऐसी घड़ी जो समुद्र में सैकड़ों मीटर गहराई तक जा सकती है। फिर 1963 में डेटोना आई जो रेस कार ड्राइवरों के लिए बनाई गई थी। लेकिन रोलेक्स की असली ताकत घड़ियां नहीं उनकी मार्केटिंग थी। जब एडममंड हिलरी और तेंजिंग नर्ग ने एवरेस्ट पर फतेह हासिल की तो उनकी कलाई पर रोलेक्स ही बंधी हुई थी। 1953 के अभियान के लिए rक्स ने टीम के सदस्यों को रोलेक्स ऑस्टर प्रिपेचुअल दी थी। हिलरी ने शिखर पर पहुंचने के बाद उस घड़ी को परीक्षण के लिए वापस कंपनी को भेज दिया था। आज वो घड़ी स्विट्जरलैंड के बियर वॉच एंड क्लॉक म्यूजियम में सुरक्षित रखी हुई है। यही नहीं सीन कॉनरी जो जेम्स बॉन्ड का किरदार निभाते थे तो उनके हाथ में rलेक्स ही बंधी रहती थी। पॉल न्यूमेन भी रेस कार चलाते वक्त rक्स डेटोना पहनते थे। इस स्ट्रेटजी के जरिए कंपनी ने अमीर ग्राहकों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली और यह घड़ियां स्टेटस सिंबल बनती चली गई। बाकी भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद वाला किस्सा तो हमने आपको वीडियो की शुरुआत में ही सुनाया जिन्हें rलेक्स ऑस्टर प्रपेचुअल ही गिफ्ट की गई थी। सोचिए भारत के पहले राष्ट्रपति ने शपथ लेते वक्त रोलेक्स की घड़ी पहन रखी थी। यही नहीं आधुनिक राजनीति में भी इसका क्रेज कम नहीं हुआ है। बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप जैसे अमेरिकी राष्ट्रपतियों से लेकर भारत में राघव चड्डा, डी के शिवकुमार और विंटेज डे डेट पहनने वाले चिराग पासवान तक सबकी कलाई पर रोलेक्स दिखाई देती है। यहां तक कि क्यूबा के क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो भी रोलेक्स सबमैरिनर के ही मुरीद थे। फिर एक वक्त वो भी आया जब जापान की एक कंपनी ने ऐसी घड़ी बनाई जिसने स्विस वॉच कंपनियों की नींव हिला कर रख दी। 25 दिसंबर 1969 को जैपनीज़ कंपनी SKO ने Astron 35 एसक्यू मॉडल वाली घड़ी बाजार में उतारी। यह क्वार्ट्स रिस्ट वॉच थी जिसमें आम स्विस घड़ियों की तरह स्प्रिंग का इस्तेमाल नहीं होता था। यह घड़ी एक बैटरी की मदद से चलती थी। इस घड़ी की सटीकता ऐसी थी कि इसमें पूरे महीने में सिर्फ 5 सेकंड का ही फर्क आता था। तो उस जमाने के हिसाब से यह काफी बेहतर तकनीक थी। जबकि बाकी घड़ियों में 2 दिन में ही कई सेकंड्स का अंतर आ जाता था। उस वक्त इस घड़ी की कीमत थी 4,50,000 ये। यानी कि यह घड़ी इतनी महंगी थी कि इतने में Toyota की एक कार खरीदी जा सकती थी। लेकिन इस घड़ी ने तहलका तब मचाया जब से ने इसके पेटेंट को फ्री कर दिया। जिसके बाद कई जैपनीज कंपनियां इस तकनीक से घड़ियां बनाने लगी जिससे यह घड़ी काफी सस्ते में मार्केट में मिलने लगी क्योंकि यह बेहतर तकनीक भी थी तो sis वॉच कंपनियों की बिक्री कम हो गई। हालात यह बने कि जहां 1970 में sis वॉच इंडस्ट्री में 1600 कंपनियां हुआ करती थी और 90 हजार नौकरियां थी वहीं 1983 आते-आते सिर्फ 600 कंपनियां बची थी और हजारों लोगों की नौकरियां जा चुकी थी। यही नहीं वॉच मार्केट में स्विट्जरलैंड की घड़ियों की हिस्सेदारी वर्ल्ड वाइड 50% से गिरकर 24% पर आ गई थी। लेकिन तभी कहानी में एंट्री होती है निकुलस जॉर्ज हाई की। लेबनानी मूल का स्विस सलाहकार जिन्होंने दो समूहों को मिलाकर स्वॉच घड़ी बनाने की सलाह दी। यह पहली बार था जब स्विस कंपनियों ने एक सस्ती घड़ी बनाई जिसने जापानी घड़ियों को वैश्विक बाजार में टक्कर दी और स्विस वॉच कंपनीज को डूबने से बचाया। अब बात करते हैं उस शख्स की जिसने एक ही रात में घड़ी का एक ऐसा डिजाइन बनाया जिसने स्टील की घड़ियों को भी फेमस कर दिया। बात 1970 के ही दशक की है जब जापान की सस्ती क्वार्ट्स घड़ियों के चक्कर में महंगी मैकेनिकल स्विस घड़ियों की बिक्री गिरने लगी थी। जिसके चलते ऑडमार्स पिगे कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर जॉर्ज गोले परेशान थे। उन्हें कुछ अलग करना था। कुछ ऐसा जो लोगों का ध्यान खींचे। 10 अप्रैल 1970 की शाम 4:00 बजे गोले ने एक डिजाइनर को फोन किया। इस डिजाइनर का नाम था जेरा जेंटा। गोले ने जेंटा से कहा कि उन्हें स्टील की घड़ी चाहिए जो स्पोर्ट्स वॉच जैसी दिखती हो लेकिन लग्जरी भी हो। एक ऐसी घड़ी जो पहले कभी नहीं बनी हो। उन्होंने जेंटा को सिर्फ एक रात का वक्त दिया। जेंटा के लिए यह काम चुनौती भरा था। लेकिन जेंटा ने उस रात जो डिजाइन बनाया उसने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया। जेंटा ने एक गोताखोर के हेलमेट से प्रेरणा लेकर एक ऐसी घड़ी का डिजाइन बनाया जिसके चारों तरफ आठ स्क्रू लगे हो। यह डिजाइन एकदम अलग था

। एकदम बोल्ड था। सुबह तक डिजाइन तैयार हो चुका था। गोले को डिजाइन पसंद आया और 1972 में लॉन्च हुई रॉयलक। दुनिया की पहली स्टील से बनी लग्जरी स्पोर्ट्स वॉच। उस जमाने में लग्जरी घड़ियां सोने या प्लैटिनम की हुआ करती थी। स्टील तो आम धातु था लेकिन रॉयलक ने स्टील को स्टेटस सिंबल बना दिया। आज रॉयलक एडममार्स पिगे की सबसे मशहूर घड़ी है और इसकी वेटिंग लिस्ट साल भर से भी ज्यादा की है और कीमत 20 लाख से लेकर करोड़ों तक। जेरा जेंटा ने इसी तरह 1976 में पेटक फिलिप के लिए भी एक घड़ी डिजाइन की थी। नाम था नोटिलस। यह घड़ी भी उतनी ही मशहूर हुई जितनी कि रॉयलक। कहते हैं जेंटा ने यह डिजाइन एक रेस्टोर में बैठे-बैठे महज 5 मिनट में एक नैपकिन पेपर पर बनाया था। वह भी एक जहाज की खिड़की से इंस्पायर होकर। जेंटा को घड़ी डिजाइन का पिकासो कहा जाता है। एक रात हो, 5 मिनट हो, जो भी हो, लेकिन उनके डिजाइन आज भी चलते हैं और करोड़ों में बिकते हैं। रॉयल का बोल्ड डिजाइन आज भारतीय राजनीति में भी अपनी जगह बना चुका है। महाराष्ट्र के अजीत पवार को अक्सर ऑडस पिघे रॉयल क्रोनोग्राफ पहने हुए देखा जाता था। अब बात करते हैं उस घड़ी की जो पहली बार चांद पर पहुंची। 21 जुलाई 1969 अपोलो 11 चांद पर उतरा। नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर पहला कदम रखा। इस ऐतिहासिक घटना को दुनिया भर के 60 करोड़ लोगों ने टीवी पर लाइव देखा। आर्मस्ट्रांग के बाद बज ऑलन ने चांद पर कदम रखा जिनके हाथ में बंधी थी ओमेगा स्पीड मास्टर। आर्मस्ट्रांग के पास भी यही घड़ी थी जो वह मिशन पर साथ लेकर गए थे। लेकिन उन्होंने इसे चंद्रयान के अंदर ही छोड़ दिया था। इस तरह बज ऑल्ड्रिन की स्पीड मास्टर दुनिया की पहली घड़ी बनी जो चांद की सतह पर पहुंची। लेकिन यह घड़ी सिलेक्ट कैसे हुई इसकी भी कहानी है। असल में 1964 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 10 वॉच कंपनियों को अंतरिक्ष अभियानों के लिए घड़ी बनाने का न्योता भेजा। इनमें से महज चार कंपनियों का जवाब आया। यह कंपनियां थी हेमिल्टन, रोलेक्स, लजीजन और ओमेगा। हेमिल्टन की घड़ी तो पहले ही राउंड में बाहर हो गई लेकिन बाकी बची तीन घड़ियों को कड़े परीक्षणों से गुजारा गया। 71 डिग्री सेल्सियस गर्मी, शून्य से 18 डिग्री नीचे ठंड, नमी, वाइब्रेशन जैसे करीब 11 टेस्ट किए गए। बाद में सिर्फ एक घड़ी रेस में बनी रही और वो थी ओमेगा स्पीड मास्टर। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस घड़ी ने अपोलो 13 मिशन के लोगों की जान भी बचाई थी। चांद पर पहुंचने से पहले ही बीच रास्ते में जब अंतरिक्ष यान का ऑक्सीजन टैंक फट गया तब बिजली बचाने के लिए सारे इलेक्ट्रॉनिक यंत्र बंद किए गए। इसी बीच इन अंतरिक्ष यात्रियों को चांद के रास्ते पर बने रहने के लिए एक तय वक्त पर यान का इंजन 14 सेकंड के लिए फायर करना था। ठीक 14 सेकंड एक भी सेकंड ना कम ना ज्यादा। सभी इलेक्ट्रॉनिक यंत्र बंद थे।

ऐसे वक्त में ओमेगा स्पीड मास्टर ही काम आई। जिसकी वजह से तीन अंतरिक्ष यात्री धरती पर वापस लौट आए। बस ओल्ड्रिन की वह ओरिजिनल चांद वाली घड़ी 70 के दशक के शुरुआत में स्मिथ सोनियन संग्रहालय भेजी जा रही थी। लेकिन वो रास्ते में ही गायब हो गई। यह चोरी कैसे हुई? किसने की? आज तक कोई नहीं जानता। चांद पर गई वह घड़ी आज भी लापता है। लेकिन लग्जरी घड़ियों की बात सिर्फ अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। 1960 में जब जैक्स पिकार्ड और डॉन वॉल्च अपनी पनडुब्बीर ट्रिएस्ट में बैठकर दुनिया के सबसे गहरे पॉइंट मेरियाना ट्रेंच की ओर बढ़ रहे थे तो वह ना सिर्फ विज्ञान की परीक्षा थी बल्कि वॉच मेकर्स के गुरूर की भी परीक्षा थी। पनडुब्बी के बाहर एक घड़ी बांधी गई थी। RX डीप सी स्पेशल समुद्र के 11 कि.मी. नीचे जहां पानी का दबाव इतना होता है कि वह लोहे की चादर को कागज की तरह मरोड़ दे। वहां उस घड़ी की कांच पर 7 टन का वजन पड़ रहा था। लेकिन जब वो सतह पर वापस आए तो वो घड़ी वैसे ही चल रही थी जैसे उसे कुछ नहीं हुआ था। यह वो दौर था जब लग्जरी घड़ियां सिर्फ अमीरों का शौक नहीं बल्कि इंसानी खोज और जांबाजी का एक अनिवार्य हिस्सा बन गई थी। यहीं से वो टूल वॉच का दौर भी शुरू हुआ जहां घड़ियों को उनके काम के आधार पर पहचाना जाने लगा। वहीं अंतरिक्ष की दौड़ में ओमेगा की धाक सिर्फ बस ऑर्डरिंग तक सीमित नहीं रही। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निकसन के पास भी ओमेगा स्पीड मास्टर का खास गोल्ड एडिशन हुआ करता था। घड़ियां सिर्फ स्टेटस सिंबल ही नहीं थी बल्कि जासूसी में भी इनका इस्तेमाल किया जाता था। साल 1961 में एक शख्स जिनीवा के एक शोरूम से एक महंगी घड़ी खरीदता है। यह घड़ी थी एटरनामेटिक सेंटियर 61। यह एक लग्जरी वॉच थी और इस शख्स ने यह घड़ी इसलिए खरीदी ताकि वह अमीर बिजनेसमै

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