दोस्तों, हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गाने सिर्फ गाने नहीं होते। वो किसी इंसान की पूरी जिंदगी का दर्शन बन जाते हैं। और अगर इस लाइन को किसी अभिनेता ने अपनी असल जिंदगी में जिया तो वह थे देव आनंद। एक ऐसा सुपरस्टार जिनकी मुस्कान पर लड़कियां दीवानी हो जाती थी। जिनकी चाल, हेयर स्टाइल और बोलने का अंदाज पूरे देश में कॉपी किया जाता था। और जिसकी लोकप्रियता इतनी खतरनाक स्तर पर पहुंच गई थी कि कहा जाता है अदालत को भी दखल देना पड़ा। जी हां, वही अभिनेता जिनके काले कोर्ट पर रोक लगाने की बातें आज भी बॉलीवुड की सबसे चर्चित कहानियों में गिनी जाती है। नमस्कार, मैं हूं राज माहौर। आज हम बात करेंगे बॉलीवुड के उस सदाबहार अभिनेता की जिसने संघर्ष देखा, प्यार देखा, धोखा देखा, अकेलापन देखा। लेकिन कभी रुकना नहीं सीखा। यह कहानी है देव आनंद की। उस इंसान की जिसने जिंदगी को बोझ नहीं एक सफर की तरह जिया। दोस्तों, आज के दौर में जब बॉलीवुड स्टार्स की लोकप्रियता सोशल मीडिया के लाइक्स और फॉलोअर्स से मापी जाती है, उस दौर में देव आनंद की फैन फॉलोइंग कुछ और ही थी। 1950 से 1970 का समय ऐसा था जब उनकी एक झलक देखने के लिए हजारों लड़कियां थिएटर के बाहर लाइन लगा देती थी। कई किस्से मशहूर हुए। कहा जाता है कि लड़कियां उनकी तस्वीर तक को अपने कमरे में रखती थी। कुछ उन्हें अपना प्रेमी मान बैठती थी। उनकी फिल्मों के गाने लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे। लेकिन सबसे दिलचस्प कहानी थी उनके ब्लैक कोट की। कहा जाता है
कि जब देव आनंद सफेद शर्ट के ऊपर काला कोट पहनकर बाहर निकलते थे तो लड़कियां उन्हें देखकर इतनी दीवानी हो जाती थी कि भीड़ बेकाबू हो जाती थी। मीडिया रिपोर्ट्स और पुराने किस्सों में तो यह तक कहा जाता है कि कुछ लड़कियां उन्हें देखकर छतों से कूदने तक को तैयार हो जाती थी। धीरे-धीरे बात इतनी फैल गई कि देव आनंद के ब्लैक को लेकर एक तरह की राष्ट्र चर्चा शुरू हो गई। हालांकि इस बात का कोई आधिकारिक कानूनी रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं है कि कोर्ट ने औपचारिक बैन लगाया था। लेकिन बॉलीवुड की दुनिया में यह कहानी एक लेजेंड की तरह आज भी सुनाई जाती है कि उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि उन्हें सार्वजनिक जगहों पर कालाकोट पहनने से मना कर दिया गया था। अब सोचिए जिस अभिनेता के सिर्फ ड्रेसिंग स्टाइल पर देश पागल हो जाए उनकी स्टारडम कितनी बड़ी रही होगी। लेकिन देववानंद सिर्फ एक हैंडसम अभिनेता नहीं थे। वे एक सोच थे। एक ऊर्जा थे। एक ऐसा इंसान जो जिंदगी को कभी रुकने नहीं देना चाहता था। देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को पंजाब के गुरदासपुर में हुआ था। उनका असली नाम था धर्मदेव किशोरीमल आनंद। बचपन साधारण था लेकिन सपने असाधारण थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे मुंबई पहुंचे। उस समय मुंबई लाखों सपने देखने वालों का शहर था। लेकिन उन सपनों को पूरा करना आसान नहीं था। देवानंद भी संघर्ष से गुजरे। शुरुआती दिनों में उन्होंने छोटी-मोटी नौकरियां भी की। कहा जाता है कि उन्होंने मिलिट्री सेंसर ऑफिस में क्लर्क तक की नौकरी की थी। लेकिन उनका मन फिल्मों में ही था। संघर्ष के उन्हीं दिनों में उन्हें प्रभात फिल्म कंपनी के बारे में पता चला। वहां नए कलाकारों की तलाश थी। देवानंद वहां पहुंचे और उन्हें पहला मौका मिला फिल्म हम एक हैं में।
हालांकि यह फिल्म ज्यादा सफल नहीं हुई लेकिन देवानंद ने हार नहीं मानी और फिर आई साल 1948 की फिल्म जिद्दी और बस यहीं से कहानी बदल गई। इस फिल्म में देवानंद को रातोंरात स्टार बना दिया। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, उनकी आंखों की चमक और उनका बोलने का अंदाज लोगों को अलग लगने लगा। उस दौर में जब अभिनय ज्यादा नाटकीय हुआ करता था, देव आनंद ने एक नेचुरल और स्टाइलिश अंदाज पेश किया। धीरे-धीरे वह बॉलीवुड के सबसे बड़े रोमांटिक हीरो बन गए। गाइड, ज्वेल थीफ, सीआईडी, पेइंग गेस्ट, तेरे घर के सामने, जॉनी मेरा नाम जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरस्टार बना दिया। लेकिन देवानंद की जिंदगी सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं थी। उनकी प्रेम कहानी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी और इस कहानी का नाम था सुरैया। जब देव आनंद इंडस्ट्री में नए थे उस समय सुरैया बहुत बड़ी स्टार बन चुकी थी। दोनों ने साथ काम करना शुरू किया और धीरे-धीरे दोनों के बीच प्यार हो गया। कहा जाता है कि देवानंद सुरैया से बेहद प्यार करते थे। दोनों घंटों बातें करते थे। शूटिंग खत्म होने के बाद भी मिलने के बहाने ढूंढते थे। एक बार शूटिंग के दौरान सुरैया नाव में थी और अचानक नाव पलट गई। उस समय देवानंद ने उन्हें बचाया। कहा जाता है कि उसी पल दोनों का रिश्ता और भी ज्यादा गहरा हो गया। लेकिन फिल्मों की तरह असली जिंदगी में हर प्रेम कहानी पूरी नहीं होती। सुरैया मुस्लिम थी और देवानंद हिंदू। सुरैया की नानी इस रिश्ते के खिलाफ थी। परिवार का दबाव इतना बढ़ गया कि दोनों का रिश्ता टूट गया। कहा जाता है कि देव आनंद शादी करना चाहते थे और सुरैया भी चाहती थी लेकिन हालात ने उन्हें अलग कर दिया। सबसे दर्दनाक बात यह रही कि सुरैया ने इसके बाद कभी भी शादी नहीं की। उन्होंने पूरी जिंदगी अकेले बिताई। देवानंद भी इस रिश्ते को कभी नहीं भूल पाए। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा कि वे सुरैया से सच्चा प्यार करते थे। लेकिन जिंदगी ने उन्हें सिखा दिया था कि हर दर्द के साथ जीना सीखना पड़ता है। शायद इसीलिए वे कहते थे मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया।
दोस्तों यही लाइन देवानंद की असली पहचान थी। उन्होंने जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे। कई फिल्में फ्लॉप हुई। लोगों ने उनका मजाक भी उड़ाया। उम्र बढ़ने के बाद भी वे लगातार फिल्में बनाते रहे। कई लोग कहते थे कि अब उन्हें रुक जाना चाहिए। लेकिन देव रुकने वालों में से नहीं थे। वे कहते थे अगर मैं घर बैठ जाऊं और कुछ नया ना करूं वही मेरी सबसे बड़ी हार होगी। यह सोच उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती थी। जब कई अभिनेता उम्र के साथ पर्दे से गायब हो गए तब भी देवानंद फिल्मों में सक्रिय रहे। वे सिर्फ अभिनेता नहीं थे। निर्माता, निर्देशक और लेखक भी थे। उन्होंने नवकेतन फिल्म्स की स्थापना की और कई नए कलाकारों को मौका दिया। उनकी सबसे खास बात थी उनका पॉजिटिव एटीट्यूड। वे कभी निराशा में विश्वास नहीं करते थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था दुख और परेशानी मुझे थोड़े समय के लिए प्रभावित कर सकती है। मैं रोता हूं और फिर सब कुछ भूलकर आगे बढ़ जाता हूं। आज की भाषा में कहें तो देव आनंद नेवर गिव अप मानसिकता के इंसान थे। शायद यही कारण है कि वे सिर्फ अभिनेता नहीं एक प्रेरणा बन गए। उनकी चाल, उनका स्कार, उनका हेयर स्टाइल, उनका सर झुकाकर बात करना सब कुछ आइकॉनिक बन गया। उस दौर में लाखों लड़के उनकी तरह बाल बनवाते थे।
आज भी अगर कोई पुराने बॉलीवुड स्टाइल की बात करता है तो सबसे पहले देवानंद का नाम आता है। लेकिन समय किसी के लिए नहीं रुकता। 3 दिसंबर 2011 को लंदन में देवानंद ने अंतिम सांस ली। वे 88 साल के थे। लेकिन सच कहें तो कुछ लोग मरते नहीं इतिहास बन जाते हैं। देवानंद उन्हीं लोगों में से एक थे। आज भी जब उनका गाना बजता है मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया। तो ऐसा लगता है जैसे कोई हमें जिंदगी जीने का सबसे आसान तरीका समझा रहा हो। ना ज्यादा शिकायत, ना ज्यादा डर, ना हार मानने की आदत। बस चलते रहो। शायद यही वजह है कि देवानंद सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे। वे जिंदगी को देखने का नजरिया थे और यही कारण है कि आज भी लोग उन्हें एवरग्रीन हीरो कहते हैं। उनकी फिल्में आज भी देखी जाती हैं। उनके गाने आज भी गाए जाते हैं और उनकी प्रेम कहानी आज भी लोगों की आंखें नम कर देती है। दोस्तों अब आप हमें कमेंट करके जरूर बताइए क्या आज के दौर में कोई अभिनेता देवानंद की जैसी दीवानियत हासिल कर सकता है और अगर आपको मौका मिले तो देवानंद की कौन सी फिल्म आप दोबारा देखना चाहोगे?