हर दो तरह के सिपाही पैदा करती है। एक जिनके नाम परेड में पुकारे जाते हैं, जिन्हें तमके मिलते हैं। दूसरे जिनके नाम घालों से भी मिटा दिए जाते हैं। लेकिन इतिहास दोनों की कीमत बराबर चुकाता है।
बस एक का हिसाब खुलेआम होता है। दूसरे का हिसाब अंधेरे में। सुबह के ठीक 4:00 बजे l के फंदे तक बस दो घंटे बचे। रस्सी की गांठे जांच रहा है। डेथ वारंट पर दस्तखत हो चुके। जेल के दफ्तर में एक अकेली मोमबत्ती जल रही है। बाकी पूरी इमारत गहरे अंधेरे में डूबी। [संगीत] इब्राहिम वक्त हो गया। आखिरी ख्वाहिश वो शख्स धीरे-धीरे सिर उठाता है। कुछ नहीं बोलता। पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट को नहीं पता था जिसे वो मोहम्मद इब्राहिम समझकर देने जा रहे हैं। उसका असली नाम कुछ और है और उसका सच भारत की सरहद से जुड़ा है। साल पहले एक धूल भरी सड़क पर बस रुकती है। एक शख्स नीचे उतरता है।
पठानी सूट, आंखों में सुरमा, कंधे पर एक पुराना थैला, चाल में वह इत्मीनान जो सिर्फ मुल्क के किसी बाशिंदे की होती है। उसके ठीक पीछे एक और मुसाफिर उतरता है। नजरें झुकी हुई, चेहरे पर एक अजीब बेचैनी। यही वो शख्स है जो कुछ ही घंटों में सबसे बड़ा दुश्मन साबित होगा। होटल में एंट्री, पहचान पत्र, बोली, भाषा सब कुछ इतना सटीक कि किसी को शक की गुंजाइश ना बचे।
पुलिस, डोंट मूव। सिक्योर। लेकिन पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों की एक नजर और शक की सुई घूम जाती है। दो बिना नंबर की गाड़ियां घेर लेती है। हथकड़ियां कबूल कर तू भारतीय जासूस है। इब्राहिम के होठ नहीं। ना हां ना सिर्फ खामोशी एक ऐसी खामोशी जो अगले 35 साल तक टूटने वाली नहीं थी।
यही इब्राहिम असल में है कश्मीर सिंह। होशियारपुर के एक छोटे से गांव नंगल चोरा का लड़का जो 1962 [संगीत] में भारतीय सेना में भर्ती हुआ। फिर पंजाब पुलिस में एक साधारण सी जिंदगी बीबी परमजीत कौर तीन छोटे बच्चे सबकी उम्र 10 साल से कम कश्मीर सिंह वी हैव अ क्रिटिकल मिशन फॉर यू स्टडी दिस मैप केयरफुली योर टारगेट इज हियर अगर देश तुम्हें ऐसा काम दे जिसमें तुम्हारा नाम हमेशा के लिए खो जाए तो नाम इंसान कमाता है। देश बचा रहे तो नाम फिर कभी कमा लूंगा। अगर पकड़े गए तो हम तुम्हें पहचानने से भी इंकार कर देंगे। कोई मदद नहीं आएगी। मंजूर है।
70 के दशक में भारतपाकिस्तान सीमा पर जासूसी करना बेहद जोखिम भरा होता था। सरकार कोई आधिकारिक पहचान पत्र देती नहीं थी। पकड़े गए तो पहचानने से इंकार। कश्मीर सिंह के साथ भी यही हुआ था। ₹400 महीने की तनख्वाह पर कश्मीर सिंह ने अपना नाम, अपना मजहब, अपनी पूरी पहचान मिटा दी। अगले सालों में वो पाकिस्तान की सरज पर करीब 50 बार दाखिल हुए। लाहौर के कहना काचा से लेकर सरहद के करीब फौजी छावनियों तक।
एक बार उन्होंने चीन से खरीदे गए पाकिस्तानी P59 टैंकों की तस्वीरें भी खींची। ऐसी जानकारी जो दिल्ली के लिए सोने से कम कीमती नहीं है। लेकिन जासूसी की दुनिया में एक गलती, एक गद्दार साथी और पूरा खेल पलट जाता है। वही साथी जिसने कभी उनके साथ काम किया था। अब पाकिस्तानी फौजी अदालत में उनके खिलाफ गवाही दे रहा था। नतीजा मौत की सजा। रुको ऊपर से हुकुम है फांसी टाल दी जाए। क्यों? किसके दबाव? यह सवाल आज भी अधूरा है। लेकिन एक बात तय थी। कश्मीर सिंह की असली सजा अब शुरू हो रही थी। फांसी का एक झटका नहीं।
35 साल का धीमा नरक जो हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके [संगीत] इंसान को खा जाता है। कुछ महीने पहले की एक शाम सरहद के पास एक रेलवे यारार्ड में चीन निर्मित T59 टैंक लदे वैगन खड़े थे। वही टैंक जिनकी तस्वीर भारत के लिए सोने से कम कीमती नहीं थी।
मियां जूते का फीता फिर खुल गया। ठीक से बांधो। सैनिक आगे बढ़ जाता है। इब्राहिम पहली बार इतनी लंबी सांस लेते हैं जैसे दोबारा जन्म मिला हो। उस दिन उन्होंने सिर्फ टैंकों की तस्वीर नहीं ली थी। मौत की आंखों में देखकर जिंदगी चुरा ली थी। कल का मिशन थोड़ा अलग रास्ता लेना रावलपिंडी हाईवे वाला वो ज्यादा सुरक्षित है। ठीक है। इब्राहिम को शक नहीं होता।
भरोसा वही चीज है जो एक जासूस को जिंदा रखती है और वही चीज उसे मार भी सकती है। पाकिस्तानी दस्तावेजों के अनुसार गिरफ्तारी में एक साथी की गवाही की भूमिका थी। वो साथी कौन था? गवाही की वजह क्या थी? यह आज तक स्पष्ट नहीं है और जासूसी की दुनिया में आज तक एक काला अंधेरा कुना बना हुआ है। गिरफ्तारी के बाद पूछताछ के नाम पर बेरहम टॉर्चर हुआ। लाहौर से मुल्तान, मुल्तान से पेशावर, कश्मीर सिंह को सात अलग-अलग जेलों में भेजा गया।
भागने की एक नाकाम कोशिश के बाद उन्हें ऐसी कोठरी में डाल दिया गया जहां से सूरज देखना भी नसीब नहीं था। अगले 17 साल वो सिर्फ बेड़ियों में रहे। सरकारी कागजों से उनका नाम मिटा दिया गया। सरहद के इस पार एक और जंग चल रही थी खामोशी की नहीं भूख की। परमजीत कौर के पास ना पति की कोई खबर थी ना सरकार का कोई साथ। तीन बच्चे सबकी उम्र 10 साल से कम और घर चलाने का कोई जरिया नहीं। तेरे बापू ने देश के लिए अपनी पहचान दी थी। मैं तेरी पढ़ाई के लिए यह अंगूठी नहीं दे सकती। 1973 में गिरफ्तारी के बाद भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर कश्मीर सिंह को पहचानने से इंकार कर दिया था। परिवार को ना कोई पेंशन मिली और ना ही कोई सहारा।l
गांव के लोग कहते कश्मीर सिंह अब नहीं रहे। लेकिन परमजीत ने ना सफेद साड़ी पहनी ना चूड़ियां तोड़ी। उन्हें यकीन था उनका पति कहीं जिंदा है और एक दिन जरूर लौटेगा। कश्मीर जिंदा है। लाहौर की जेल में है। [संगीत] 13 साल बाद पहली बार परिवार को पता चला कि जिसे सब मुर्दा मान चुके थे वो अब भी सांस ले रहा है। हिंदुस्तान घर सब ठीक है। इसके बाद भी 22 साल गुजर गए। ना सुनवाई हुई ना रिहाई हुई। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने एक छोटी सी मासिक पेंशन शुरू की। लेकिन इंतजार तो 2008 में खत्म होना था। ये कौन है? इसकी ये हालत किसने की?
कौन जाने साहब? पुराना जासूस है साहब। मर जाएगा यहीं। 35 साल हो गए। इसने तीन दशक से ना सूरज देखा ना आसमान। [संगीत] बुजुर्गवार घर कहां है आपका? सदर साहब ये शख्स 35 साल से बिना किसी ट्रायल के हमारी जेलों में बंद है। ये इंसानियत के खिलाफ है। 35 साल यह नामुमकिन है। मानवीय आधार पर मैं इसे फौरन रिहा करने का हुक्म देता हूं। रुकिए जनाब। दस्तावेजों में एक दस्तखत की कमी है। आप पार नहीं जा सकते। ठीक है क्लियर है आगे बढ़िए सरहद के उस पार से कांपता बुजुर्ग शख्स धीमे-धीमे कदमों से चला आ रहा है। सामने खड़ी है.
परमजीत कौर। वही औरत जिसने 35 साल ना सफेद साड़ी पहनी ना चूड़ियां तोड़ी। [गहरी सांस लेने की आवाज़] मैं देर से आया। आ गए ऊपर वाले का शुक्र है फिर। कुछ रिश्ते इंतजार से नहीं टूटते और मजबूत हो जाते। पाकिस्तान का दावा है कि आप राह भटक कर सीमा पार कर गए थे। क्या आप सच में सिर्फ एक आम नागरिक थे? मैं भारतीय जासूस था। मैंने मिलिट्री इंटेलिजेंस के लिए अपना फर्ज निभाया है। उन्होंने मुझे 35 साल काल कोठरी में रखा, जंजीरों से बांधा। लेकिन इस कश्मीर सिंहके मुंह से मेरे देश का एक भी राज नहीं निकलवा पाए। कबूल कर तू भारतीय जासूस कर। दादा जी आप पाकिस्तान में क्या करते थे?
देश की नौकरी गांव का नाम बदल चुका था। चेहरे बदल चुके थे। दुनियाबदल चुकी थी। लेकिन एक चीज नहीं बदली। वो मिट्टी जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जवानी दांव पर लगा दी थी। इतिहास जीतने वालों को याद रखता है। लेकिन राष्ट्र उन लोगों की वजह से सुरक्षित रहते हैं [संगीत] जिनके नाम कभी इतिहास में लिखे ही नहीं जाते। कश्मीर सिंह की कहानी सिर्फ एक भारतीय जासूस की कहानी नहीं। ये उन अनगिनत जासूसों की कहानी है जिन्होंने अपना परिवार, अपना वर्तमान, अपनी पहचान सब कुछ दांव पर लगाया।